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मनोज बाजपेयी

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02 Jun 2010
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‘राजनीति’ के लिए...

एक महीने की भागादौड़ी के बाद घर में बैठने का मौका मिला। बस ‘राजनीति’ के प्रचार प्रसार में लगा था। बहुत बडी फिल्म है। तो बड़ा कमिटमेंट भी था। हर जगह उपस्थित रहना था। बीच में बीमार भी पड़ा, जिसके कारण टीम के साथ दुबई नहीं जा पाया। इस बीच लगातार गिने हुए
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व्यस्तता के बीच बिहार यात्रा

इन दिनों मारामारी चल रही है। तारीखों के बंटवारे की। फिर, मैंने अपने आपको पूरी तरह ‘राजनीति’ के प्रचार प्रसार में समर्पित किया हुआ है। लेकिन इसके बावजूद बहुत सारे कमिटमेंट्स हैं या फिर कुछ लोग चाहते हैं कि आप उनके इंटरव्यू दें या उनके किसी कार्यक्रम में
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‘राजनीति’ के बहाने राजनीतिक विमर्श

राजनीति। ये ऐसा विषय है, खासकर हिन्दुस्तान में, जिस पर फिल्म बनाना अति कठिन कार्य है। दरअसल, राजनीति में सिर्फ राज की नीति शामिल नहीं होती। इसमें मानव व्यवहार के कई पहलू शामिल हो जाते हैं। लालच, दंभ, घृणा, साम, दाम, दंड, भेद और न जाने क्या क्या। और इन
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लिखने-पढ़ने का मन नहीं

आज-कल न लिखने का मन कर रहा है, न पढ़ने का। बस, यूं ही फांके मस्ती का मन कर रहा है। और कोई काम जबरदस्ती नहीं होता मुझसे। दिल और दिमाग में सामंजस्य ने बैठे तो क्या फायदा। ब्लॉग पर पहले लिखने के बारे में सोचा, फिर अचानक लगा कि लिखा नहीं जाएगा। तो सोचा, कुछ
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सूर्या सेन का किरदार जीना अद्भुत अनुभव है

अभी-अभी ‘चिटगोंग’ फिल्म की शूटिंग करके लौटा हूं। इस फिल्म में मैंने मास्टर दा उर्फ सूर्या सेन का किरदार निभाया है। पूरी प्रक्रिया में रहने का बहुत मजा आया। एक अजीब सी बात यह है कि सारा हिन्दुस्तान इतने बड़े क्रांतिकारी के योगदान से बिलकुल अनभिज्ञ है।
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बहुत याद आओगे निर्मल तुम

मेरे दोस्त स्वर्गीय श्री निर्मल पांडे को मेरी तरफ से श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे और उसके परिवार को इस परिस्थिति से उबरने की शक्ति दे। जब मुझे अचानक एक एसमएस आया, अपने प्रिय मित्र अनिल चौधरी का कि निर्मल का देहांत हो गया तो कुछ देर के लिए
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Feb 20 2010 09:16 AM
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घातक है संकीर्ण राजनीति का विष

सपनों के शहर मुंबई में इससे पहले ऐसा वातावरण कभी नहीं था। एक अंजान सी चेतावनी हमेशा कानों से टकराती रहती है। घर से बाहर न निकलो। घर में दुबककर रहो। घर से बाहर सड़क पर जाओगे तो वो दूसरे के क्षेत्र में होगा। सड़क के पार जाओगे तो वो भी किसी और का दायरा
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जिसे ज़रुरत उसे नसीब नहीं उनका ‘प्यार’

कुछ दिनों से मैं बिलकुल सुन्न हो चुका हूं। मस्तिष्क में कोई सवाल नहीं उठ रहा। और सवाल नहीं उठे तो फिर जवाब भी नहीं है। द्वंद भी नहीं है। फिर एक शहर से दूसरे शहर काम की अफरातफरी में भाग रहा हूं। महाबलेश्वर में अपनी फिल्म ‘दस तोला’ की शूटिंग पूरी की है।
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नए साल का संकल्प

नए साल की आप सभी को बहुत सारी शुभकामनाएं। मैं कभी दिल्ली,कभी मुंबई,कभी महाबलेश्वर और कभी हैदराबाद में कुछ शूटिंग तो कुछ दूसरे कामों मेंम व्यस्त रहा, इसलिए एक तारीख को ब्लॉग पर पोस्ट नहीं लिख पाया। दिल्ली की ठंड बर्दाश्त के बाहर थी। लेकिन, इस बात का सुकून
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कब साफ रखना सीखेंगे अपने समुन्दर के किनारों को....

गौराई बीच। समुन्दर का एक किनारा है और मुंबई में होते हुए भी मुंबई से अलग है। यहां मेरी एक फिल्म की शूटिंग चल रही है। यहीं एक क्लब में रहना हो रहा है। करीब चालीस मिनट की दूरी पर लॉकेशन पर वापस सुबह सुबह आना होता है। मुंबई में रहते हुए भी मुबंई की चकाच
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अधूरा रह गया दुबई देखने का ख़्वाब

पिछले हफ्ते दुबई में था। दुबई कभी गया नहीं था। उसके बहुत सारे कारण थे। जब भी ऐसे मौके मिले तो मैंने उस प्लान को खारिज कर दिया या वो प्लान खुद ही खारिज हो गया। इस बार मौका लगा तो मन में खुशी थी कि दुबई देखने का मौका मिलेगा। दुबई एयरपोर्ट पर उतरे, गाड़
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26/11 की याद कर दहल उठता है दिल

ऐसा लगता है कि मैं कल ही मलेशिया से आया था। और ऐसा लगता है कि मैं अभी रात को सोकर उठा हूं। हालांकि, बात पिछले साल 26 नवंबर की है, जब मुझे आधी रात के करीब ढेरों संदेश मिले मोबाइल फोन पर। रात के ढाई बजे थे, जब संदेशों का सिलसिला शुरु हुआ। मैं भौचक रह ग
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देश को टुकड़े करने वाले बयानों को प्रमुखता न दे मीडिया

काफी समय हो गया। ‘राजनीति’ की शूटिंग, ‘जेल’ के प्रचार-प्रसार, उसके बाद की मीटिंग्स और बाकी अपने व्यक्तिगत कामों में काफी व्यस्त रहा। जेल को आम जनता से प्रशंसा मिल रही है और मेरे अपने अभिनय के लिए भी मुझे प्रोत्साहन मिल रहा है। आपमें से जिन लोगों ने अ
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प्रचार बिन सब सून

अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब फैशन हो गया है? या इस हथकंडे से फिल्म के सफल होने की गारंटी मिल जाती है? ये सवाल शायद इसलिए भी बार ब
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चटोरी जुबान रुकती नहीं !

अभी मैं भोपाल में हूँ। ‘राजनीति’ की अंतिम चरण की शूटिंग जारी है। इस पूरी शूटिंग के दौरान खाने का सिलसिला लगातार चल रहा है। कभी-कभार वर्जिश कर लेता हूँ। लेकिन पता नहीं क्यों चटोरी ज़ुबान रुकती ही नहीं ! हर दिन कहीं-न-कहीं से चिकन बिरयानी आता है या फिर
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वोट न डालने का अफसोस है

एसिड़ फैक्ट्री’ का प्रदर्शन हो चुका है। मेरे अभिनय की लोग तारीफ कर रहे हैं। अच्छा लग रहा है कि मेहनत सफल हुई। दुख इस बात का है कि जिसके ऊपर फिल्म के प्रचार की जिम्मेदारी थी, वो अपना काम पूरा नहीं कर पाए। अमूमन संजय गुप्ता की फिल्में ठीक तरीके से दर्श
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अपने मुंह मियां मिट्ठू !

राजनीति” की शूटिंग अच्छी रही भोपाल में। दशहरा के दिन अपने दोस्त विजय जाजोरिया के घर खाना भी अच्छा रहा। कुल मिलाकर ये दस दिन अच्छे कटे। अब, मुंबई लौट रहा हूं। “एसिड फैक्ट्री” के प्रमोशन के लिए। वैसे, टीम तो हैदराबाद और कोलकाता जा चुकी है, लेकिन बंगलोर
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छुट्टी का सदुपयोग कर रहा हूँ

हैदराबाद में शूटिंग करते वक़्त मेरी पीठ में चोट लग गई थी। उसके बाद मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। चोट से उबर ही रहा था कि मुझे ‘जेल’ फ़िल्म की डबिंग करनी पड़ी। फिर ‘एसिड फ़ैक्ट्री’ के प्रचार-प्रसार में जुट जाना पड़ा। और उसके बाद प्रकाश झा की शूटिग के लिए भोपाल
Sep 16 2009 10:03 PM
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रात की शूटिंग के नाम से सिहर जाता हूं..

काफी दिन हो गए लिखे हुए तो सोचा आज कुछ बात कर लूं आप लोगों से। आजकल किसी पार्टी में अंदरुनी कलह की बातें आ रही हैं, कहीं सलमान खान के आईपीएल टीम खरीदने की चर्चा जोर शोर से दिख रही है। समाचार देखते देखते ऊब जाता हूं। फिर सो जाता हूं। आप सोच रहे होंगे कि
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बाप रे बाप...स्वाइन फ्लू...

स्वाइन फ्लू। स्वाइन फ्लू । स्वाइन फ्लू। स्वाइन फ्लू। चारों तरफ यही हाहाकार मचा हुआ है। डरने के बावजूद भी मास्क नहीं मिल रहे हैं। कोई आयुर्वेदिक दवाइयों की लिस्ट भेज रहा है तो कोई होम्यौपेथी की लिस्ट भेज रहा है-अपने अपने चहेतों को। सब के सब एक दूसरे को
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खुश हूं कि तेलुगु निर्देशकों की कसौटी पर खरा उतरा

इन दिनों मेरा आना जाना हैदराबाद लगा रहता है। हैदराबाद में तेलुगु इंडस्ट्री में लोग सुबह सात बजे से काम करना शुरु कर देते हैं। मेरे दोस्त आशीष विद्यार्थी तेलुगु फिल्मों में काफी व्यस्त हैं। उनका अपना मानना है कि आंध्र प्रदेश में बचपन से ही बच्चों को कड़ी
Jul 30 2009 11:58 AM
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सिर्फ लिखता नहीं, ब्लॉग पढ़ता भी हूं

मैंने माइकल जैक्सन से बड़ा सितारा इस उम्र में न तो देखा और न सुना। एक ऐसा सितारा, जो मेरे गांव से लेकर अमेरिका की गली गली में जाना पहचाना गया। विवादों से घिरी जिंदगी, परिवार से दूर जिंदगी, अकेलेपन से घिरी जिंदगी, प्यार की खोज में भटकती जिंदगी और बहुत
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मुंबई में अब कहां बची है खुली जगह

शाम को टहलने निकला तो बहुत अच्छा लग रहा था। आज पहली बार यहां रहते हुए सुंदर से पार्क में अलग अलग से चेहरों को देखते हुए, उनकी गतिविधियों और हावभाव को निहारते हुए अपनी वॉक पूरी कर रहा था। यहां ठीक मेरी बिल्डिंग के सामने टहलने के लिए एक बहुत ही कम जगह
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विरोध हो, लेकिन कायदे से

एयरफ्रांस के विमान के दुर्घटना ग्रस्त होने की खबर देखी तो दिल दहल उठा। मैं दुर्घटनाग्रस्त लोगों के परिवार वालों की हालत सोचकर ही सिहर उठ रहा हूं। और क्या हाल हुआ होगा उनका, जो इस हवाई जहाज में सवार होंगे। हवाई जहाज की यात्रा सबसे सुरक्षित यात्राओं मे
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हर नया किरदार बहुत पीड़ा देता है...

अभी तक मैं करज़त में ही हूं। शायद एक दो दिन में वापस मुंबई जाने के लिए अपनी पैकिंग शुरु करुं। बहुत गर्मी है यहां । लेकिन, शाम का समय अच्छा गुजर जाता है। बाकी कुछ सह कलाकार पनवेल के एक होटल में रुके हैं। दो दिन से उन्हीं के साथ जाकर गपशप मारता हूं, जब
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जन्मदिन पर भावुक बनाया 'जेल' की यूनिट ने

कुछ दिनों से मैं करजक में ही हूं। किसी से बात नहीं हो पाती क्योंकि मोबाइल नेटवर्क ठीक नहीं है यहां। इस कारण सुकून भी है। लेकिन,थोड़ी परेशानी भी क्योंकि कहीं न कही मोबाइल फोन अब जीवन का हिस्सा भी बन चुका है।करज़क में एक रिजॉर्ट में रुका हूं। मेरे ठीक
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हद हो गई अभद्र बयानबाजी की !

हद हो गई है। अब तो न समाचार देखने को मन करता है, न पढ़ने का। इस बार के चुनाव में राजनेता न सिर्फ अपनी मर्यादा पार कर चुके हैं, बल्कि उसकी परिभाषा भी बदल चुके हैं। कोई किसी को कुचल रहा है, कोई किसी को काट रहा है। कोई किसी को मारने की धमकी दे रहा है। औ
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बदल रहा है मेरा व्यक्तित्व

कुछ दिनों से मेरी कोशिश रही है कि लोग मुझे चाहे जितना भी कठिन क्यों न समझें, या फिर मेरे बारे में ग़लतफ़हमियाँ पाले बैठे रहें या उनको किसी बात से नाराज़गी हो, जिसका मुझसे कोई लेना देना भी नहीं; मैं ही उन्हें स्वयं संपर्क करुँ और करता रहूँ, चाहे वो अपनी
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‘जेल’ में मैं नहीं गैंगस्टर

राजनीति” की शूटिंग करके अभी भोपाल से लौटा हूं। ये शेड्यूल का अंतिम चरण था। अगल शेड्यूल सितंबर के पहले हफ्ते में शुरु होगा, जब सारे अभिनेताओं की तारीखें उपलब्ध होंगी। जब जब भोपाल जाना हुआ अच्छा लगा। एक अच्छा बदलाव था। मुंबई जैसे महानगर से बाहर निकलने
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खोज जारी है.....

आज ही खत्म किया “राजनीति” का पहला शिड्यूल भोपाल में। वापस मुंबई जाने की तैयारी है। अच्छा समय निकला यहां। पहली बार नाना पाटेकर, अजय देवगन, अर्जुन रामपाल और कुछ एक थिएटर एक्टर, जिनका नाम लिखना चाहूंगा जैसे दयाशंकर पांडे और चेतन, इनके साथ काम किया और बह
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अब तो स्लमडॉग को लेकर विवाद बंद हो...

स्लमडॉग मिलिनेयर बनी। प्रदर्शित भी हुई। और दुनिया भर में वाहवाही भी लूटी। हमारे अपनों ने इसमें भारी योगदान दिया है। दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कार के मंच पर भारत की प्रतिभा का प्रतिनिधित्व किया है। मैं ए आर रहमान, रसूल, श्री गुलजार साहब और फिल्म से जुड
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राजनीति और “राजनीति”

राजनीति” की शूटिंग के लिए भोपाल गया था,पांच दिन के लिए। कल रात ही वापस लौटा हूं। इस बीच, “जुगाड़” का जितना प्रचार मुमकिन था,मैंने किया। भोपाल में भी कई पत्रकार मित्रों से इस सिलसिले में मिला। यहां तक कि रीलिज से एक दिन पहले एक थिएटर मालिक ने मुझे आमं
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'जुगाड़' : थोड़ा स्वार्थी हो जाऊं

जुगाड़' 12 फरवरी यानी कल रिलीज हो रही है। ऐसे में थोड़ा वाजिब है मेरा स्वार्थी हो जाना और आप लोगों को 'जुगाड़' के बारे में कुछ जानकारियां देना तथा उत्साहित करना कि आप सभी लोग थिएटर में जाकर फिल्म देखें। जुगाड़ फिल्म दिल्ली की एमसीडी की सीलिंग घटना से
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कुछ अपनी, कुछ आपकी

रात को मुंबई पहुँचा तो भारत और श्रीलंका के बीच वनडे सीरिज़ का चौथा मैच चल रहा था। इन दिनों तो धोनी की टीम बुलंदियों पर है, और टीम जीते तो मैच देखने का मज़ा दोगुना हो जाता है। मैंने भी इसका आनंद लिया। लेकिन आज मैच की बात नहीं, क्योंकि मैच की बात की तो प
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नयी बिल्डिंग में पहला गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं। देश फिर से उठ खड़ा हो और शांति की राह पर चले। हमारे प्रधानमंत्री जल्द से जल्द अपने घर और काम पर लौटे, ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना है। आज अपने सोसाइटी की मीटिंग अटेंड की। ऐसा करना मुझे अच्छा लगता है। इस बिल्डिंग क
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क्या सब वास्तव में बदल रहा है?

सब कुछ बदल रहा है। समाज बदल रहा है। सांस्कृतिक विचारधारा बदल रही है। शिक्षा का स्तर बदल रहा है। ऐसा लोग कहते हैं। अगर वो कहते हैं तो सच में बदल रहा होगा। लेकिन, जो बदला है वो सबके सामने है। और वो है बराक ओबामा का पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति के रुप
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क्या सब वास्तव में बदल रहा है?

सब कुछ बदल रहा है। समाज बदल रहा है। सांस्कृतिक विचारधारा बदल रही है। शिक्षा का स्तर बदल रहा है। ऐसा लोग कहते हैं। अगर वो कहते हैं तो सच में बदल रहा होगा। लेकिन,जो बदला है वो सबके सामने है। और वो है बराक ओबामा का पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति के रुप
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'जुगाड़' से बेहाल

इन दिनों बहुत उलझा हुआ हूं। फिल्म 'राजनीति' के किरदार की तैयारी, उसके कॉस्ट्यूम फाइनल करना, निर्देशक प्रकाश झा के साथ हफ्ते में दो तीन बार बैठना, परिवार की जरुरत का ख्याल रखाना, कुछ स्क्रिप्ट को पड़ना और फिल्म 'जुगाड़', जो फरवरी में आ रही है, के प्रम
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आराम का आनंद ले रहा हूं मैं

पिछली कुछ पोस्ट पर भेजी आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ीं। आश्चर्य इस बात का है बहुत सारे लोग आज भी धर्म की वजह से एक दूसरे से घृणा भी करते हैं। कोफ्त इसलिए नहीं होती क्योंकि अपनी बात कहने का सभी को अधिकार है। हां,मैंने पिछली पोस्ट या अभी तक ब्लॉग में
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यादों के सफ़र में स्वतंत्रता दिवस

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सभी साथियों को मेरी तरफ से बधाइयां और शुभकामनाएं। एक छोटी सी झोपड़ी, लकडी की चौकी पर बैठे हुए मास्टर साहब, सामने बोरी पर बैठे हुआ मैं और मेरे साथ गांव के कई बच्चे। और क, ख, ग की आवाज से पूरा माहौल गूंज रहा था। क्लास खत्म कर