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तृषा'कान्त'

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22 May 2010
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देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक ‘फुटबाल के बराबर अंडा’ .. [नाटक ] - वीडिओ संपादन एवं प्रस्तुति श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

चंडीगढ़। ‘बेशक देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है, लेकिन आम जनता क्या आजादी से अपने बारे में सोच सोचती है। क्या लोग आजादी से काम कर सकते हैं। इंसाफ पाने के इंतजार में आम आदमी मौत के द्वार तक पहुंच जाता है,लेकिन इंसाफ नहीं मिल पाता। इस सबके बावजूद आम जनता इसी
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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नारी नदी का प्रवाह ...... [कविता एवं स्वर] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

शीर्ष तुंग से क्षरित दुग्ध धार सी धवल सर्पिणी सी इठल मस्त मेघ सी मचल यौवन प्रवेग से शिव जटाजूट घेर स्नेहसिक्त शैलखण्ड उर कठोर दम्भ तोड़ सारे तटबन्ध तोड़ अडिग यतीचित्त को करती हो निर्मल बहती हो कलकल पवन सा उन्मुक्त मन भावयान पर सवार नेह्दृष्टि आकुल
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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ढीली गाँठ ...... - स्वर कथा

तेंदू पत्ते के जंगलों से आच्छादित और पत्थरों के रूप में अनमोल खजाने से परिपूर्ण मध्यप्रदेश की आदिवासी बाहुल्य भूमि बस्तर ... प्रायः नक्सल समस्या के लिए अख़बारों की सुर्खियों में रहा यह क्षेत्र आदिवासी और जनजातियों की निश्छल संस्कृति और सभ्यता की धरोहर को
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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टेसू के फूल

टेसू के फूलखिल आये है फ़िर बबूल के जंगल मे स्नेह की बरसात न सही…. मुक्‍त ….. सर्द रिश्तों की जकड़न से बेखबर ... बौराये आम, पीले पत्‍तों बीच वासन्ती बयार से मुसकराने लगे हैं खिलखिलाने लगे हैं स्नेह सुगंध के बिना ही सही ...... आतंक की गर्मी, अभी आगे भी
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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लोकतन्‍त्र की द्रोपदी का चीरहरण ... [आलेख] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त',

08 मार्च 10 : आज भारतीय लोकतन्‍त्र की द्रोपदी का राजनीतिक दुशासन ने भरी लोकसभा में सारी दुनिया के सामने चीरहरण कर दिया. पौराणिक कथानक में तो द्रोपदी की लाज उस समय के महानायक भगवान श्रीकृष्ण ने चीरहरण होते होते बचा ली थी किन्तु फिर भी उस अक्षम्य अपराध के
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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नचकैया ........ [कहानी ] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

[...........उसके मस्तिष्क में फिर पृश्न कौंधे. क्या तिवारी जी और नचकैया के संबंध आज की गे विचारधारा का पूर्ववर्ती काल था. हां होली और दीपावली पर उनका महिलाओं जैसा श्रृंगार जो कभी औरतों के बीच खासी चर्चा का विषय हुआ करता था तिवारी की मृत्यु के बाद उन्हें
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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क्या .. तुम हो ...... ! [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

कवि के स्वर में घर के कोनों मेंबंद रोशनदान सेफूटती किरण .....चमकती स्वर्णरेखा ......मकड़ी के जालों परपड़ती है जबस्मृति की धूप ....कुलबुलाने लगता हैकीड़े जैसा फंसा मनतड़प तड़प करदम तोड़ देता हैचंचल उन्मुक्त मनस्मृतियां .....सदैव नहीं होतींफूलों का सुखद
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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’कान्त’ पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा .... [गजल] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो वक्त का मरहम हटाया जायेगा लहू से लोहित हुयी सरयू अभी मैली पड़ी आज क्या फिर से वही लोहू बहाया जायेगा तारीख़ के पन्नों से निकली धुंध फिर सबओर है राम को घर से हटाकर बाब़र बिठाया जायेगा उनको अब तो छोड़ दो दो जून रोटी के लि
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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मां .... [कविता] - भोजराज सिंह

नवांकुर प्रोत्साहन के लिये तृषाकान्त पर सभी नवोदित रचनाकारों का स्वागत है. यदि किसी कारणवश आपकी रचना भावपरक होने के उपरांत भी कहीं प्रकाशित नहीं हो सकी है तो अपनी रचना अपने संक्षिप्त परिचय के साथ हमें नवांकुर शीर्षक सहित skant124@gmail.com पर मेल करे
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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जीत लो चाहे अवनि आद्यान्त तक ..[कविता] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त',

जीत लो चाहे अवनि आद्यान्त तक जीत ना पाओ मुझे तुम कभी भी अरे मैं तो ‘तत्व’ हूँ क्या ‘व्यवस्था’ से मुझे लेना है ‘पंच तत्वों' की निरी भंगुर महा इस सृष्टि से, आद्यान्त अभिनव ब्रह्म से मैं परे हूँ ….. बंधे हो तुम इन्द्रियों की पाश में, यों ही पा सकोगे न क
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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मुम्बई हमले के एक वर्ष उपरांत ... [आलेख एवं वीडिओ] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त’

यथार्थ में आतंकवाद का दोषी कौन ... क्या वो हाथ जिन्हें जन्म लेते ही बंदूक थमा दी गयी हैं अथवा वो मस्तिष्क जो अपने स्वार्थ के लिये आतंक की फैक्ट्री चलाते हैं " स्वर अब तक कानों में गूंज रहे हैं ...] 26/11 का आतंकवादी हमला. सम्पूर्ण घटनाक्रम के वीभत्स
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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धरती के फूल

धरती के फूल उग आए हैं इस बार.... राजनीति की आँधी, और आतंक की बेमौसम 'मुंबई बरसात' से होती हैं जड़ें बहुत गहरी सुना है पाताल तक ... धरती के फूल की कंक्रीट के जंगल में पांचसितारा संस्कृति में परोसे जाने वाले व्यंजन ने फैला दी है अपनी खेत खलिहान ... विल
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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शब्द ....... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

भाषा एवं श्ब्दों को लेकर आज न जाने कितना ववाल राज ठाकरे जैसे नेता मचा रहे हैं .. ऎसे में तृषाकान्त के मंच प्रथम पोस्ट ’शब्द’ का स्मरण स्वाभाविक हो जाता है... ] शब्द लिफाफे हैं खोल कर पढ़ो छोडक़र नाव को, घाट से आगे बढो, कोष शब्दों का पुराना है बहुत, भ
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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पीड़ा ........ [कविता] - अमिता ’नीर’

उर में पीड़ा रोये ऑंखों से लोहू बरसे तेरी स्मृति की सुरभि मानस में धीरे बरसे घन तम में पीड़ा रोयी आंखों से लोहू बरसा आंखों का बेकल पँछी युग युग से तुमको तरसा दुख दर्द भींच होंठों में हमने चाहा मुस्काना बह चली अचानक पीड़ा आंखों नें रोना जाना हा देव !
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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यह कैसा मापदण्ड ....... [ लघुकथा] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

महाराष्ट्र सहित 3 राज्यों का चुनावी दंगल टी वी से लेकर प्रिंट मीडिया तक चरम पर है. जनसामान्य की स्मृति रष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के बिंदुओं पर से कुछ अधिक ही विस्मरणशील होती है. साथ ही राष्ट्रीय दायित्व का चैथा स्तंभ मीडिया और पत्रकार के हाथ ऐसे में टी आ
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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वो देखो एक इंसान ..... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

वो देखो एक इंसान पागल सा वर्तमान के चीथड़ों को लपेटे अतीत की सुई से सीता सा वो देखो …. गांधी का डंडा सुभाष की आवाज भगत की फाँसी का फन्दा गले में डालता सा वो देखो …. हँसते है सडक़ चलते लोग छात्र.. नेता ... अभिनेता और कर्मचारी दु कानदार.. पुलिस... अफसर
 
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वो देखो एक इंसान ... [ कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

वो देखो एक इंसान पागल सा वर्तमान के चीथड़ों को लपेटे अतीत की सुई से सीता सा वो देखो …. गांधी का डंडा सुभाष की आवाज भगत की फाँसी का फन्दा गले में डालता सा वो देखो …. हँसते है सडक़ चलते लोग छात्र.. नेता ... अभिनेता और कर्मचारी दु कानदार.. पुलिस... अफसर
 
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कलम आज उनकी जय बोल

जला अस्थियां बारी बारीछिटकाईं जिनने चिनगारीजो चढ़ गए पुण्य-वेदी परलिए बिना गरदन का मोलकलम आज उनकी जय बोलप्रिय पाठकों !यह सप्ताह भारत के इतिहास का एक विशिष्ट सप्ताह है। १०० वर्ष पहले इसी सप्ताह इस धरती पर दो महान विभूतियों ने जन्म लिया था। एक क्रान्तिदूत
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Sep 27 2009 04:57 PM
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दोषी कौन..... [आलेख] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

[मित्रों वर्षों पूर्व जम्मू कश्मीर से लेकर सम्पूर्ण देश में फैला आज जैसा आतंकवाद नहीं था. हां पंजाब प्रांत में राजनीतिक दुष्चक्रों से प्रभावित होकर आतंक की छिटपुट घटनाओं ने आहट देना प्रारम्भ कर दिया था. उन्हीं दिनों लिखा डायरी का यह पृष्ठ आज फिर मेरे
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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क्यों अमृत में गरल घोलते [कविता] - अमिता 'नीर'

महामौन तुम नहीं बोलते क्यों अमृत में गरल घोलते तुम्हें नहीं बहला पाते हैं रातें चन्द्रकिरण रस भीनी ये हिमवर्षी सुन्दर दिन अतिरंजित सपनें मानव के क्यों ले मन के विजन डोलते महामौन तुम नहीं बोलते क्यों अमृत में गरल घोलते अरे ! मौन ये भी अच्छा है अंधकार
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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नियंत्रण रेखा पर फायरिंग पाकिस्तान की सोची समझी हुयी रणनीतिक चाल.... [आलेख] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

पाकिस्तान आर्मी द्वारा कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर स्वघोषित युद्धविराम का उल्लंघन करते हुये फायरिंग करना सोची समझी हुयी रणनीतिक चाल है. इस चाल के पीछे पाकिस्तान सरकार और उसके सभी महत्वपूर्ण संस्थानों में तालिबान से सहनुभूति रखने वाले तत्व उपस
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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सुख और स्वतंत्रता ...... [कविता] - शिवेंद्र कुमार मिश्र

सुख और स्वतंत्रता स्मरणीय है जीवन यदि हो निरभ्र आकाश सा बदली हो या चमकती धूप छटती है क्योंकि छटनी है रह जाता है नीलाम्बर का एहसास व्यापक अनन्त सीमातीत क्या सीमाहीनता सुख है? हाँ तो क्यों बॅधता है इन्सान सीमाओं के अनन्त जाल में परिवार समाज राष्ट्र विश
 
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ओ बारूद के ढेर पर बैठने वालो ..... [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त',

वर्षों पूर्व भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की दुखद हत्या पर लिखी यह कविता संभवत: इसी दिवस की प्रतीक्षा में अब तक अप्रकाशित रही है. प्रभाकरण के बर्बरतापूर्ण युग के अंत पर प्रस्तुत है डायरी का यह वर्षों पूर्व भूला हुआ पृष्ठ ... ] सुनो…
 
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एक और नये खतरे की घण्टी बज चुकी है......

अपने ही देश में सैनिकों को कोयम्बटूर के पास खदेड़ने घटना ....... खतरे की घण्टी बज चुकी है...... विगत दिवस कोयम्बटूर के पास आर्मी के कानवाय पर तथाकथित लिट्टॆ समर्थकों द्वारा हमला करके आर्मी की युनिफ़ार्म पहने सैनिकों का अपने ही देशवासियों द्वारा खदेड़
 
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मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं ...[गीत] - शिवेन्द्र कुमार मिश्र

चाँदनी रात थी और नदी का था तट बल खाती हवा मन रहा था भटक तुमको आवाज दी पर तुम आई नहीं गुनगुनाती रहीं गीत गाती रहीं दूर आकाश में व्योम के कोण से उठ रहे मेघ थे साँवले साँवले मैने इगिंत किया तुमने जाना नहीं मुस्कराती रहीं गीत गाती रहीं मेघों की गर्जना दा
 
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चुनाव के नाम पर न कोई ’खंडिस्तान’ चाहिये [कविता] - श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

हिन्दू न ढूँढ़ता हूँ मैं.. न मुसलमान चाहिये पहचान ढूँढ़ता हूँ बस.. पहचान चाहिये हिन्दू मिले और बौद्ध जैन सिख मिल गये अगड़े मिले पिछड़े मिले पर 'हम' ही रह गये कोई पूछने लगा क्या सवर्ण हो तुम..? मण्डल और कमण्डल की ना दुकान चाहिये पहचान ढूँढ़ता हूँ पहचा
 
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वह खोखला बूढ़ा बरगद मेरा पिता था [कविता] - शिवेन्द्र मिश्र

वो बरगद का वृक्ष बुढ़ा गया था उसकी जड़ों से फूट्कर निकले चिल्लड़ अब खुद बन गये थे जवान बरगद और अपनी बल शाली शा खाओं की नाजुक उंगलियों से दे रहे थे बुढाते वृ क्ष को सहारा वह बूढ़ा बरगद थक गया था झड़ गए थे उसके पत्ते टूट फूट गईं थीं उसकी बल शाली शा खाए
 
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तृषा'कान्त'

वो बरगद का वृक्ष बुढ़ा गया था उसकी जड़ों से फूट्कर निकले चिल्लड़ अब खुद बन गये थे जवान बरगद और अपनी बल शाली शा खाओं की नाजुक उंगलियों से दे रहे थे बुढाते वृ क्ष को सहारा वह बूढ़ा बरगद थक गया था झड़ गए थे उसके पत्ते टूट फूट गईं थीं उसकी बल शाली शा खाए
 
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धूप आने दो हमारे पास ..[कविता]...श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

धूप आने दो हमारे पास सूरज है हमारा भी तुम हमारी ही जड़ों से ख़ाद पानी चूस कर इतरा रहे हो ? दर्प की हर शाख से हमको कुचलते जा रहे हो और कितने झोपड़ों को यों उजाड़ोगे.. ....? 'सत्तासुन्दरी' का साथ पाने के लिये… महल आलीशान की हर नींव में है दबा कोई हमारा
 
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सूखा घाट ........ [कविता एवं स्वर] श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सूखा घाट और तालाब पत्ते पीपल के सूख चुके हैं सारे ’बरमबाबा’ की डालें हिलती हैं जब हवा से, सुनायी देती है मुझे रुनझुन .... तुम्हारी नयी पायल की आवाज अब भी .... खड़कते हुये पत्तों में कैथे का पेड़ अब हो गया है बहुत बड़ा, सींचा था जिसे अक्सर कलश की बची
 
श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’
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क्षितिज के पार तो नवकल्पना है [कविता] ...

मैं देखना चाहता हूँ क्षितिज के पार कुहासा ढक लेता है आखों की रोशनी चाहता है तोड़ दें स्वप्न उगने की कल्पना मैं आक्रोश से मूँद लेता हूँ आँख की पुतलियां देखने को क्षितिज के पार का अदभुत विहान कुहासा घना और घना हो जाता हैं क्षितिज के पार का द्रश्य मानो
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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होली के रंग और उमंग भरे पर्व की हार्दिक शुभकामना !

सुधी मित्रो ! होली के रंग और उमंग भरे पर्व की हार्दिक शुभकामना ! रंग और भंग दोनों में ध्वनि साम्य अवश्य है किन्तु आज के दिन भंग के कारण रंग में भंग नहीं होता है अपितु उमंग का साथ मिलता है. सो सभी माननीय और ज्ञाननीय मित्रों को उमंग भरे स्नेह और अभिवाद
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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ब्राम्हणों की बौद्धिक पराजय और वेंटिलेटर पर जिन्दा हिन्दू समाज [आलेख] शिवेंद्र कुमार मिश्र

वसन्तपंचमी से हिन्दू समाज में विवाह कार्यक्रम प्रारम्भ किए जाते हैं जो होलिकोत्सव के आठ दिन पूर्व ' होलिकाष्टक ' तक निरन्तर चलते रहते हैं . ' लगन ' का यह सिलसिला होली के पश्चात नवदुर्गा से ही प्रारम्भ होता है . मुझे समझ में नहीं आता कि प्रेम , काम ,
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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मुक्तिद्वार की सीढियां ...[कहानी] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

हेलो " " हेलो... आज इतने दिनों बाद " " हाँ आज तुम्हारा स्मरण बहुत आवेग के साथ कर रहा था " " सच पूछो तो मैं भी कल से ...." " क्लासेस ...? डिस्टर्ब तो नहीं ..... " " नहीं .. नहीं ... अभी फ्री हूँ. स्टूडेंट्स एनुअल फंक्शन की रिहर्सल में बिजी हैं . इतने
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
Feb 17 2009 03:25 PM
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वाह रे ! राजनीति की रामलीला....[देश] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

वाह रे ! राजनीति की रामलीला...... राम और रावण भीड़तंत्र के थियेटर में भरत मिलाप का दृश्य अभिनीत कर रहे हैं. ऐसे में बेचारे भरत पादुकाएँ लेकर अयोध्या के स्थान नागपुर से दहाड़ रहे हैं. देश के गाँव गाँव और खेत खलिहान तक फैले चुनावी थियेटर की दर्शक दीर्घ
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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मैं ठहरा गंवार... क्या जानूँ … [ कविता ] श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

गाँव की कच्ची पगडंडी .. हरी दूब से निकल कर हरियाली निगलते कंकरीट के जंगलों में महानगर की …. ऊँची अट्टालिकाओं में अक्सर खो जाता हूँ घबरा जाता हूँ राजपथ पर कई बार युवकों की ‘धूम’ और वाहनों की .. तेज रफ्तार देखकर मै ठहरा गँवार मैं क्या जानूँ … विकास की
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
Jan 18 2009 10:11 AM
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सूनी राहें सूना है मन [कविता] अमिता 'नीर'

सूनी राहें सूना है मन वाट निहारूं किसकी आकुलता बढ़ती जाती है चैन नहीं है पल की सुख बयार सिहरन सी लगती घना अँधेरा छाया क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी सब धीरज चुक आया पथ कंटकाकीर्ण हुआ है आतप फिर आ घेरे जीवन क्षण भंगुर लगता है व्याकुल नैना मेरे निशि दिन नभ
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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मैं कड़ुआ हो गया हूँ .. [आलेख] शिवेंद्र मिश्र

हाय रे..! हिंदू समाज तेरे धर्मनेता समाज को आनंद का रास्ता दिखाते दिखाते स्वयं के लिए सुखो का अंबार लगा लेते हैं और निरीह जनता को दुखों के सागर में डूबकर मरने के लिए छोड़ देते हैं. आनंद और ईश्वर , की बात कहते कहते... और बस …! मेरा मन कसैला होने लगता ह
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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प्रतीक्षा में किस कृष्ण की.... हम मूक जैसे क्यों खड़े हैं

है जमीं ये जल रही आसमां ये जल रहा घर पडोसी का नहीं ये देश मेरा जल रहा आज अरि के हाथ में कुछ सुत हमारे खेलते हैं घात कर के मातृभू संग जो अधम धन तौलते हैं आज उन सबके लिये न्याय का प्रतिकार दो विहंसता है कुटिल अरि अब युद्व में ललकार दो नीर आंखों का हुआ
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
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अन्याय से... आतंक से ... अब पार कर दो

युग पुरूष' …. तातश्री ! भीष्म पितामह ...!! यही नाम ... मान देकर , बंदी बना दिया युग ने.... कालजयी अपराजेय.. ब्रह्मचारी .... अक्षुणयुवा ... पिता ... पितामह ... सिहासन रक्षक जीवन के पथ पर ... कंटकों से बेखबर ... निडर .. किन्तु... फांसा गया बस कुटिलता क
 
श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'