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उनींदरा

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12 Mar 2010
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यही होता है, तो आखि़र यही होता क्‍यों है ...

मुझे लगा था,  वो जा चुकी है...हमेशा के लिए। इतने दिनों के मौन ने काफी तसल्‍ली दी थी, और मैंने इस बीच कई कवियों को पूरा पढ़ डाला। इस बात को तक़रीबन भूलते हुए कि मैं अब भी उससे उतना ही प्रेम करता हूं, पहले दिन जितना। लेकिन इसके बावजूद मैं कह सकता था
 
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प्रेम भटकने नहीं देता

एक गडरिए ने अपनी सभी भेड़ों को चराने के बाद बाड़े में लाकर बंद कर दिया, सिवाय भेड़ के एक बच्‍चे के। जिसे वह कंधे पर बिठाकर लाया था। उसने उसे नहला-धुलाकर हरी घास खिलाई। उक्‍त नजारे को पास ही एक पेड़ के नीचे बैठे ईसा मसीह अपने शिष्‍यों सहित देख रहे थे।
 
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अब ईश्‍वर नहीं पहले की तरह उदार...

क्‍या बुरा था...भयानक ठंड और गाढ़े कोहरे के बीच, हाईवे पर हर रात सैकड़ों किलोमीटर गाड़ी चला सकने का जुनून...। और, निहायत यूं ही सी एक छोटी सड़क आत्‍मविश्‍वास को पानी कर देती है...। मित्र नहीं होते प्रतिभाओं और पागलों के... अनसुना करते हुए एक बांई हथे
 
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तुम सुधर नहीं सकतीं सिंड्रेला...

सर्दी बढ़ रही है...सुधर जाओ सिंड्रेला। ज़रा ख़याल करो। अपने पांव देखो...कितने खुरदरे और रूखे हैं,जैसे कभी कोमल थे ही नहीं। कब तक राजकुमार पर बोझ बनी रहोगी...? खिड़की पर सिर टिकाए, राह देखोगी कि वह आकर तुम्‍हारा हाल पूछे...? बहुत समय बीता  उस बात
 
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Go to the desrt and shout,

अवसाद और  अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए वह निटिंग करती है...लेकिन कितनी बार उधेड़ना और बुनना, इस मर्ज की  दवा हो सकता है..।.बे यारो-मददगार, एक औरत का होना और उस होने की यंत्रणा हर भाषा और हर मुल्‍क में लगभग एक जैसा ही क्‍यों है...। ईरानी ले
 
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उदास गिटार और एक स्‍थगित धुन

प्रेम तब भी बाक़ी थी जब एक परित्‍यक्‍त पल में गिटार सहेज कर रख दिया गया। उसकी उदासी हमारी आंखों से ज्‍़यादा नम थी। आवाज़  देकर अगर उसने रुकने को कहा होता तो शायद अच्‍छा था...। आहूत धुनों की शर्मिन्‍दगी से आंख बचाते हुए हमने सारी हरी कोमल पत्तियो
 
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लीविंग यू लॉस्‍ट एंड लोनली...

जादुई शीशा तोड़ने के अपराध में तुम्‍हें कटघरे में नहीं खड़ा किया जाएगा...न ही ये जवाब मांगा जाएगा कि बिखरी किरचों से खुद को बचाने का हुनर तुमने मुझसे क्‍यों नहीं बांटा. ..तुम्‍हें माफ़ कर दिया जाएगा इस क्रूरता के लिए । पीली आंख और बेरौनक चेहरे के&nbs
 
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कैसे उसका सामना करूं

आज  सुबह मैंने एक पाप किया। बच्‍चे पर अपना गुस्‍सा निकाला,  अपनी खीज और फ्रस्‍ट्रेशन उस पर उतार दी। वो रोकर स्‍कूल चला गया लेकिन मैं इतने गहरे अपराधबोध में धंसी हूं कि समझ नहीं आ रहा कैसे उसका  सामना कंरूं ..। उसकी शरारतों और गलतियों प
 
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मिलिए इस जांबाज़ से

झुग्‍गी में तीन प्राणी थे। पांच बरस का टाइगर, डेढ़ बरस का संदीप और 3 बरस का कुलदीप। टाइगर सबसे बड़ा था और उसकी जि़म्‍मेदारी भी सबसे ज्‍यादा थी। घर का मालिक हरीराम उसे जाते वक्‍़त कहकर जाता था-टाइगर, घर का ध्‍यान रखना और बच्‍चों का भी। हमेशा तो यही कर
 
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चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज़ है

हम कितने ईमानदार होते हैं अक्‍सर...बायोडाटा, अपना प्रोफाइल और अन्‍या जानकारियां देते वक्‍त...। विस्वावा शिम्बोर्स्का की यह कविता यूं ही तो याद नहीं आ गई न...। खै़र पढि़ए, अनुवाद अशोक पांडे का है, हां वही कबाड़ख़ाना वाले। बायोडाटा लिखना क्या किया जाना
 
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रब से एक दुआ

आज रात मुझे कई काम करने थे। सोचा था एक अधूरी किताब पूरी कर सकूंगी। संडे को बुक फेयर जा सकने और उससे पहले सिर में तेल लगवाकर सिर धो सकने का वक्‍़त निकालने के लिए जैसे-तैसे सुबह होने से पहले सो सकूंगी....। लेकिन हमेशा तो यही हुआ है कि जो सोचा वो नहीं ह
 
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ख़याल भी सच हो जाते हैं

दिवाली मनाना हमेशा आपके हाथ में ही होता है क् ‍ या ... कभी आप दिये लेकर बैठे रह जाते हैं और देहरी तक पहुंच नहीं पाते , कभी देहरी पर बैठे रात गुज़र जाती है और दिये ही राह भूल जाते हैं ... लेकिन नीयत नेक हो तो अंधेरा एक दिन भाग ही जाता है , कम से कम मु
 
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Oct 19 2009 09:07 PM
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किसी को याद है....हठकर बैठा चांद

बचपन अपने साथ बहुत सारी चीजें ले जाता है, जैसे ये कविता- हठकर बैठा चांद एक दिन माता यह बोला, सिलवा दे मुझे भी ऊन का मोटा एक झिंगोला... .अगर किसी के पास है पूरी कविता तो प्‍लीज भेज दें, काफी दिन से मैं इसे ढूंढ रही हूं। मुझे सिर्फ इतनी याद है.. हठकर ब
 
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Oct 14 2009 07:52 PM
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हमारे सपनो की भाषा क्‍या है....

पहली पोस्‍ट से जारी.... आज इतने वर्ष बाद सोचने पर लगता है हिंदी-उर्दू में फ़र्क़ कहां है। मेरे लिए तो सचमुच फ़र्क़ नहीं है। जिस दिन फ़र्क़ दिखेगा, मैं ईश्‍वर  से कहूंगा- हे ईश्‍वर , मुझे उस शून्‍य की आरे से चलो.. मुझे पीछे मुड़कर देखने पर महसूस
 
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हमारे सपनों की भाषा क्‍या है....

दफ़तर की लाइब्रेरी में कुछ और खोजते हुए हाथ लगी थी एक किताब अतीत का चेहरा, जाबिर हुसेन की डायरी। राजकमल ने इसे छापा है। पढ़ते हुए एक जगह मैं बार-बार अटकी हूं, कई बार पढ़ा इस प्रसंग को। मुझे लगा यहां बांट लेना चाहिए इसे, पढ़कर देखिए आप भी मैंने ह
 
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फिर से एक बार हर एक चीज़ वही हो जो है....

दिन, किसी खूंटी पर टंगी क़मीज़ नहीं थे....तो भी उन्‍हें झटक कर पहनना सीख लिया मैंने।  हर सुबह घर से निकलते हुए साफ़ और बेदाग़ दिखता हूं,  जैसे देर रात इस्‍तरी से हर शिकन को मिटा दिया गया था......अब आदत हो गई है इसकी। कोसी आवाज़ में कोई पूछता
 
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उसकी आंख में बादल था

जिनकी आंख में बादल था... उसने पांचवीं बार यही लाइन कही लेकिन पूरा होने से पहले ही इस बार भी लड़की ने उसे टोक दिया। बोली-ये सब बाद में सुनाना बारह बजने से पहले अपने मोबाइल से दो एसएमस कर दो ताज के लिए... नहीं, मैं नहीं करूंगा। क्‍यों नहीं करोगे, तुम प
 
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फादर्स डे

बहुत दिन पहले की बात है. जंगल में एक शेर रहा करता था....अब वो वहाँ नहीं रहता. This May 7, 2009 photo provided by the Wildlife Conservation Society shows Bronx Zoo's lion M’wasi, left, and daughter Moxie enjoying a playful outing in the Zoo's African
 
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तेरे हाथों के लिखे खत मैं जलाता कैसे......

गंगा मेरे घर से बहुत दूर थी। कई शहर दूर। उसके खतों को गंगा के हवाले नहीं कर सकता था। जला सकता था लेकिन जगजीत  और रहबर साहब  बार-बार आड़े आते रहे। तेरे खु़शबू में बसे खत मैं जलाता कैसे...शायद सौवीं बार मैं इस नज्म को सुन रहा था। हर बार आंख भर
 
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कैसी अफीम घुली थी उन दिनों

कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां
 
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कैसी अफीम घुली थी उन दिनों मंे

कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां
 
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कैसी अफीम घुली थी उन दिनों मंे

कुछ तो ऐसा है जो मुझे समझ नहीं आता, जिसे डीकोड करने की कोशिश में अक्सर मैं उस जगह जाकर खड़ा होता हूं , जहां से पहली बार उसे आते हुए देखा था। अब वहां खड़ा होने पर मैं उसे नज़र नहीं आता... न ही वहां खड़े हुए उसका आना मैं देख पाता हूं। इस पहेली का सिरा कहां
 
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अब कभी ऐसी खबर न मिले

मिल गए मुकुल शिवपुत्र। होशंगाबाद रेलवे स्टेशन से इन्हें लगभग उसी तरह नशे की हालत में पहचाना गया जैसा पिछले दिनों भोपाल में देखा गया था।  अखबार में $खबर छपने के बाद वे वहां से चले गए थे। उनके दोस्त, मीडिया और सरकारी अधिकारी सभी उन्हें ढूंढने में
 
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मैं न सोने से डरती हूं....

मैं सोचती थी कि हम एक-दूसरे की आत्‍मा तक को देख सकते हैं, कि हम जुड़े हुए हैं, एक-दूसरे से....सियामी जुड़वाओं की तरह संबद़ध हैं। उसने ख़ुद को मुझसे दूर कर लिया था, मुझसे झूठ बोला था, और मैं यहां बैठी थी, कैफे़ की बेंच पर अकेली। मैं लगातार उसके चेहरे
 
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आखि़री रंग की नीलाई

ख्‍़वाब का दर शायद खुला रह गया था...पांव एक बार बाहर निकला और वापसी की राह धुंधला गई। बाहर की दुनिया में सात रंग थे..दिखते तभी थे जब उनपर नज़र रखो, पाबंदी इतनी कि आंखें झपक न जाएं। .उसने दोनों हाथों में भरकर उन्हें बंद कर लिया...इतना कसकर कि उड़ न सक
 
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सांड, टेपचू और एक उम्‍मीद के बहाने

और जब किसी मनुष्‍य के पास स्‍वप्‍न न रह जाएं, फैंटेसी न रहे और मिथक नष्‍ट हो जाएं तो वह घनघोर व्‍यवहारिक, यर्थाथवादी आदमी के रूप में बचा रह जाता है। स्‍म्रतिहीन, आध्‍यात्‍मवंचित, स्‍वप्‍नशून्‍य, आदर्श विरत, सपाट, चौकोर, दुनियादार, तिकड़मी, घटिया आदमी
 
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वो क्‍यों नहीं किसी के साथ भाग जाती....

मुझे सचमुच इस चीज़ से फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे कैसा लगता है मेरे बिना...खा़सतौर पर मैं उन दिनों से सीधे-सीधे आंख बचाकर निकल जाता हूं जिन पर हमने अपने नाम लिखकर उड़ा दिए थे। मैं वाकई नहीं जानना चाहता कि उड़ते रहने वाले वे दिन जब उसकी आंखों में उतर कर ध
 
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मौसम किसी का उधार नहीं रखते

ये बारिश कहीं और की थी...बर्फ़ भी शायद यहां की नही थी....किसी और जगह बरसना और बिखरना था इन्‍हें...। तो यहां क्‍यों आए....हां शायद कोई उधार बाक़ी रह गया था किसी का...ज़रूरी नहीं है कि भीगकर और छूकर ही कहा जाए कि मौसम किसी का उधार नहीं रखते...यूं भी सम
 
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तुम नेपोलियन नहीं हो...

लोगों को सोने से रोकना बहुत भयानक होता है...इससे वे पागल हो सकते हैं। मुझसे यह बर्दाश्‍त नहीं होता, सात साल हो गए मैं सड़ रही हूं, यहां बिलकुल अकेली, एक अछूत की तरह और वह गंदा झुंड हंस रहा है मुझ पर...इतने ऋणी तो तुम मेरे हो कि बदला लेने में मेरी मदद
 
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कोई कह सकेगा उसे...

मुझे विश्‍वास होता जा रहा है कि इस श्राप का तोड़ उस जालंधर वाले उस बूढ़े के पास ही है....शाम से याद कर रही हूं लेकिन नाम याद नहीं आ रहा उसका। दो साल पहले जनवरी में ही तो मिला था पहली और शायद आखि़री बार भी...। वो अपने हर मिलने वाले को क़लम बांटा करता
 
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कौन छिड़कता है निरंतर नमी

ऊपर चढ़ने के लिए पहली सीढ़ी पर पांव रखते ही तेज़ महक का अहसास होता है। बाक़ी सीढि़यां तय करना याद नहीं रहता....अहसास तेज़तर होता जाता है। बिना सांकल लगा दरवाजा खोलकर बैग रखने तक महक इतनी हावी हो जाती है कि सीधे किचन में जाकर देखना ही पड़ता है ढकी हुई
 
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यूं ही नहीं कहा जाता ऐसा

हार क्‍यों मानूं;..जबकि पता है कि शिल्‍प के सारे औज़ारों पर ख़ूब पैनी धार लगा रखी है मैंने। और ऐसा भी तो नहीं कि आज तक  कोई कविता लिखी ही न हो...चुटकियों में चमत्‍कार गढ़ता हूं...दुख, सुख, शोक, हर्ष सब को जीकर लिख सकने का हुनर साथ लिए फिरता हूं.
 
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सबसे ठंडी रात...

तो  सूर्योत्‍सव बीत चला...और चतुर्थी भी अब बीती हुई ही तो है...। दिन बड़े होंने लगेंगे....शायद कुछ कम सर्द भी। लेकिन...सबसे ठंडी रात के आकर गुज़र जाने से पहले कैसे जा सकते हैं ये सब....कैसे जा सकते हैं...। सूर्य उत्‍तरायण में है....शुभ काम शुरू ह
 
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हमारी याद आएगी

वो अंधेरा कितना गहरा है........इस अंधेरे सा ही... या इससे कुछ कम....पता नहीं पर ये गीत तो हर अंधेरे में इसी तरह बजता है न....ये बिजली राख कर जाएगी....तेरे प्‍यार की दुनिया........गीत है या कोरी बद-द़ुआ...मीलों-मील.......बरसों से एक ही सुर में बिना कि
 
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शहादत....

आज बस ये दो लाइनें पढ़ लें- जा अपने ख़ून दे इल्‍ज़ाम तों तैनूं बरी कीता.. शहादत देन वाले दा कोई क़ा‍तल नहीं हुंदा ।                       कविंदर
 
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ज़मीर को जगाने के लिए कौन सी धारा को संशोधित किया जा सकेगा....

लिवइन रिलेशनशिप पर इमरोज़) गुलज़ार की बात से शुरू करूं तो यह कहना क्या ग़लत है कि सिर्फ़ अहसास है ये रूह से महसूस करो...। यह भी कहा जा सकता हे कि सिर्फ़ महसूस करने से तो पेट नहीं भर जाता, लेकिन मैं तो अपना उदाहरण देकर ही बता सकता हूं कि अहसास सबसे बड
 
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एक सिगरेट देना कामरेड...

अंधेरे से डर लगता है....। अर्थ की गहराई समझ आने पर डर भी गहरा होता जाता है। ईमरे नॉज को जेल में बंद कर दिया गया। उसका चश्‍मा और पेन बाहर ही क़ब्‍जे़ में ले लिए गए थे। वो अकेला है, बहुत ऊंची छत के ऊपर वाले रोशनदान को भी बंद कर दिया गया...रोशनी अंदर न
 
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एक पल की मौत.....

रोशनदान पर टुक-टुक करती चिडि़या अपनी जगह थी, नीम के पेड़ की कत्‍थई होती पत्तियां भी। कैम्‍पस के सबसे मोटे तने वाला पेड़ अपनी जगह से ज़रा भी नहीं हिला। यहां तक कि लोहे की बैंच भी अपनी जगह पर कायम रही। फ़जल ताबिश का शेर और सिगरेट का ढेर सारा धुंआ लौट-ल
 
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मुझे याद रखना है......

मुझे जो याद रखना है उसमें नेरूदा भी हैं। हमेशा याद रखते हुए भी आज उन्‍हें  फिर से  याद करने का दिन है..... चलिए  नेरूदा को याद करें इन दो कविताओं से गुज़रते हुए......... पाब्‍लो नेरूदा 12 जुलाई 1904 से 23 सितंबर 1973 याद सबकुछ मुझे याद
 
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टेबल कैलेंडर पर चौमासा

बूंदें बाहर आकर भिगो तो नहीं डालेंगी.. और न ही सख़्त गर्मी की उमस आकर सांस को घोटना शुरू करेगी । गर्मी, जंगल, नदी और पहाड़ सब से बात की जा सकती है लेकिन इस ह्यूमिडिटी का क्या करूं, जो बारिश के बाद भी छंटती नहीं। और.. हवा कितनी भारी सी हो जाती है इन द
 
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