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क्वचिदन्यतोअपि..........!

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16 Jun 2010
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गृहिणी -लक्ष्मी ,सरस्वती या दुर्गा ? एक परिशिष्ट चिंतन!

पिछली पोस्ट गृह लक्ष्मी ही क्यों गृह सरस्वती क्यों नहीं पर खूब चिंतन मनन हुआ! विद्वान् ब्लागरों ने एक से एक नायाब और दुर्लभ संदर्भ दिए ..मनुस्मृति तक से उद्धरण दिए गए -गृहिणी को लक्ष्मी माने जाने और कहने की परम्परा बहुत पुरानी लगती है .दूसरी देवियाँ भी
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गृह लक्ष्मी ही क्यों, 'गृह सरस्वती' क्यों नहीं ?

कभी कभी मन में कुछ बातें ऐसी उलझती हैं कि सुलझाए नहीं सुलझतीं बल्कि और उलझती  चली जाती हैं .यह आज की उलझन भी ऐसी है -गृह लक्ष्मी ही क्यों,  'गृह सरस्वती' क्यूं नहीं ? हम पत्नी को गृह लक्ष्मी क्यों कहते आये हैं और प्रकारांतर से उल्लू होने का बोझ
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मेरे ही बुकशेल्फ में छुपा था उन्मुक्त जी के प्रश्न का जवाब!

उन्मुक्त जी ने गणित विषय को लेकर अपनी यह रोचक पोस्ट लिखी तो एक  श्लोक भी उधृत किया और उसका स्रोत पूछा -श्लोक  है -यथा शिखा मयूराणां नागानां मण्यो यथा।तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम्।।जिस तरह से,मोरों के सिर पर कलगी,सापों के सिर में
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देवदूत नहीं है मनुष्य ....!

इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य प्रकृति की एक सुन्दरतम संरचना है -मगर वह देवदूत है ऐसा नहीं माना जाना चाहिए!  वह स्वर्ग से अवतरित कोई फ़रिश्ता नहीं बल्कि करोड़ों वर्षों के जैविक विकास से उद्भूत एक सामाजिक और 'सांस्कृतिक ' पशु ही है -जब यह बात १५० वर्ष
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...समीरलाल जी ने किया नेहरू जी के फार्मूले में संशोधन .....!

आज कुछ भी तो ऐसा नहीं था कि यहाँ लिखा जाय .मगर तभी निगाहें पडी पर शब्द शिखर के इस ब्लॉग पोस्ट पर  जिसमें  सत्तर वर्ष में भी युवा बने रहने का नुस्खा दिया गया है .आप उस पोस्ट को पहले पढ़ लें ..फिर यहाँ आगे पढ़ें -बात नेहरू जी की है जिनसे किसी सज्जन
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जैवीयता केवल मैथुन और जगह की मारामारी (territorialism ) ही नहीं है जैसा कि मेरे कुछ काबिल दोस्त सोचते आये हैं! ..

अनवरत पर हुई इस चर्चा ने मुझे प्रेरित किया है कि मैं मनुष्य की जैवीयता पर कुछ बातों को स्पष्ट करुँ ...जन स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक होती हैं ..मैंने इसी ब्लॉग पर मनुष्य की जैवीय प्रवृत्तियों और सांस्कृतिक  विकास पर एक विस्तृत पोस्ट पहले 
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मिलिए एक समर्पित टिप्पणीकार से ...दिव्या श्रीवास्तव यानि जील जेन ....

आप में से कई लोगों के ब्लॉग के टिप्पणी बाक्स में  जीन जेल (जो कहती हैं कि उन्हें आप खुद  खोजिये ,आखिर दुधमुहे बच्चे तो हैं नहीं आप -और एक दिलखीन्चू  मजाकिया सा इशारा-Its your job to discover, cannot spoonfeed you.....)  की
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क्या हिन्दी ब्लागिंग के ये अशुभ लक्षण हैं ?

ज्ञानदत्त जी स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं और इसलिए उनकी मानसिक हलचल पर कोई गतिविधि नहीं हैं ....मगर वे ट्विटर और फेसबुक पर सक्रिय हैं .इसी तरह मेरी एक (अ )भूतपूर्व मित्र जो कहती हैं कि वे ब्लॉगजगत से घोषित अवकाश पर हैं फेसबुक पर जीवंत हैं और दिन प्रतिदिन अपने
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तन ना भयो दस बीस ऊधो!

कलजुगी उधो से गोपियाँ कह रही हैं -हे उधौ तुम देह देह की रट लगाये हुए हो एक बार भी मन की बात करते तो हम उसे जिसे भी कहते उसे दे देते ..तुम्हे भी ..अगर तुम पूरी तरह से देह -राग से मुक्त  हुए होते तो तुम्हे भी पकड़ा देते ....यहाँ कितने  मन  तो
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नेहरू को नमन!

कृतज्ञ राष्ट्र किंवा विश्व आज नेहरू को याद कर रहा है .मुझे कहने में कोई हिचक नहीं है कि आधुनिक  भारत के किसी भी लाल ने मुझे इतना प्रभावित नहीं किया है जितना कि जवाहरलाल ने ,दूसरे नंबर पर हैं एक दूसरे लाल ,लाल बहादुर शास्त्री जी ....यह आवश्यक
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वे जिनका विवादों से चोली दामन का साथ है...ब्राह्मण हैं वे?

एक लम्बे अंतराल के बाद मेरी एक चुनिन्दा  ब्लॉगर ने मेरा कुशल क्षेम पूछा -कुछ गिले शिकवे हुए! मैंने पूछा  बहुत दिनों बाद मेरी सुधि आई है तो उन्होंने कहा कि चूंकि बीते दिनों मैं विवादों में रहा और वे विवादों से दूर रहती हैं इसलिए दूर ही दूर रहीं
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जिन्न बोतल के बाहर ,वैज्ञानिक भीतर :मेरी फरमाईश पर काजल कुमार ने बनाया यह कार्टून

प्रयोगशाला में जीवाणुओं की ऐसी फ़ौज बना ली गयी है जो कुदरत में कभी मौजूद न थी ...क्रैग वेंटर एक ऐसे  वैज्ञानिक है जिन्होंने विधाता के कामों में  दखलंदाजी कर डाली है -इसे लेकर तरह तरह की आशंकाएं व्यक्त हो रही हैं .अगर ये जीवाणु रोगाणु बन गए तो ?
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उनसे मिली खबर तो मेरे होश उड़ गए ....

जी हाँ हाथों के तोते और होश उड़ जाना शायद  ज्ञानी जन इसी को कहते हैं ..लफड़े की शुरुआत तब हुई जब सिद्धार्थ जी ने चैटियाया के उन्होंने अपनी पोस्ट पर मेरी एक  टिप्पणी को डिलीट कर दिया है ..मैं ऐसे निर्णयों को सहज भाव से लेने की इम्यूनिटी हासिल कर
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आपने कभी श्रीमदभागवत गीता पढी है ?

मन जब उद्विग्न हो तो अक्सर गीता के उपदेश याद आते हैं -गीता भारतीय वांग्मय की ऐसी धरोहर है जो विश्व विश्रुत है और शायद ही भारत का कोई महान व्यक्ति ऐसा रह गया हो जिसने गीता को न पढ़ा हो ---मतलब इसे महानता की कुंजी कह सकते हैं (:)) -मतलब महान बन जाने का आसान
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जाति न पूछो साधु की ...

आज से उत्तरप्रदेश में भी जातिवार जनगणना शुरू हो गयी ..मतलब जाति पाति पर एक और सरकारी मुहर ....आधुनिक आनुवंशिकी कहती है कि मनुष्य  -मनुष्य का जेनेटिक  फर्क एक फीसदी से भी कम का है मगर आज समूची मनुष्यता धरम  करम  सम्प्रदाय और जाति
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बंगलूरू की एक जीवंत और यादगार शाम कर दी प्रवीण जी ने हमारे नाम .....

हम तो गए थे  बेटे के एक संस्थान में दाखिले के चक्कर में -मतलब गए तो थे कपास ओटने  और  अनुभव हो गए अनिर्वचनीय हरि मिलन  के ..यह भाग्य कहिये (जो अपुन के मामले में ज़रा दुबला पतला ही रहा है ) या फिर ऋषि पुरुषों का पुण्य प्रताप कि 
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आक्रामक सेल्समैनशिप ....क्या आपने कभी इन्हें झेला है ?

सबसे पहले तो यह खेद प्रकाश कर दूं कि मैं सेल्समैनशिप के लिए कोई सुडौल सटीक शब्द नहीं ढूंढ पाया हूँ -आपके दिमाग में कौंधे  तो जरूर बताएं ....अब आईये विषय पर बतियायें! आज दफ्तर में एक फाईल में निमग्न यानि डूबा हुआ था कि अचानक कुछ अनकुस सा लगा ...
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कस्बे में कांफ्रेंस!

बनारस से लखनऊ  राष्टीय राज मार्ग संख्या ५६ पर बनारस से १५० किमी दूर बसा है सुल्तानपुर शहर जो बड़े शहरों की तुलना में एक कस्बाई नगर ही लगता है ..मगर अभी परसों ही मुझे अपने एक स्वजन के हार्निया के लैपरोस्कोपिक सर्जरी के लिए वहां  जाना पड़ा तो एक
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अच्छे बुरे लोगों की मेरी आख़िरी पोस्ट

पसंद नापसंद और अच्छे बुरे लोगों पर यह आख़िरी यानि समापन पोस्ट है. एक बात तय है कि अच्छाई बुराई एक सापेक्षिक अवधारणा है -विद्वान् टिप्पणीकारों अली सा आदि ने इस विषय की विवेचना और एक निश्चित राय /विचार तक पहुचने में बड़ी मदद की है -व्यक्ति तो निजी  तौर
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मिलन के क्षण!

मिलन- विछोह ,पीड़ा  -आनंद ,निकटता  और दूरी की पारस्परिक विपरीत अनुभूतियाँ तो आनी जानी रहती हैं इस फानी जीवन में ..एक कब गयी और दूसरी कब आई इसका भी क्या लेखाजोखा रखा जाय ..बस यही समझ लीजिये कि अगर इन जोड़ों में से कोई एक साथ है तो दूसरा भी ताक
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अच्छे और बुरे लोग -भाग दो (जानबूझ कर शीर्षक भड़काऊ नहीं है )

अंग्रेजी में एक  कहावत है ,बर्ड्स आफ सेम फेदर फ्लाक टुगेदर -मतलब एक जैसी अभिरुचियों और पसंद नापसंद के लोग एक साथ  रहते हैं ...सहज दोस्ती मित्रता और घनिष्ठ सम्बन्ध तक ऐसी अभिरुचि साम्य की बदौलत  ही होती है .कहते हैं की फला फला में दांत काटी
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अच्छे और बुरे लोग ....1

भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक  बेहद ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले अधिकारी जो  इस समय उत्तर प्रदेश में एक उच्च पद को सुशोभित  कर रहे हैं ने काफी वर्षों पहले अपने लिए गए  एक निर्णय पर थोड़ा विचलित  होकर मुझसे पूछा था कि क्या उनका लिया
Apr 29 2010 09:05 AM
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ॐ शान्तिः शान्तिः शातिः

अभी कुछ ही दिन बीते जब प्रियेषा कौमुदी मिश्र (बेटी जो दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययनरत है ) ने मुझसे रात में फोन कर कहा कि मुझे वह शान्ति पाठ नहीं याद आ रहा है जो मैंने  इलाहाबाद में महर्षि पातंजलि विद्यालय में सीखा था ...मैंने कहा इन दिनों जब
Apr 27 2010 07:06 PM
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बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है,एक चस्का है !

जी ,बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है!यह कोई नया नहीं बल्कि पुराना शौक है या यूं कहिये कि अब आउटडेटेड हो चला है -कारण कि अब कथित बुद्धिजीवियों की कोई साख नहीं रही समाज में -एक ढूंढो हजार मिलते हैं ,मतलब कौड़ी के तीन! इधर कुछ लोग बुद्धिजीवी बनने में मशगूल रहे
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किसी दिन कुछ ख़ास हो जाता है ....कुछ परोपकार कर ले मनुआ !

जब ऐसे ही हम रोज रोज की सुबह शामों में जिन्दगी  को तमाम  करते होते हैं  किसी दिन कुछ ख़ास हो जाता  है -कुछ यादगार सा! अभी उसी दिन ही तो मुझे एक एस एम् एस मिला और पहली नजर में मैंने उस पर रोजमर्रा की ही तरह सरसरी निगाह डाल कर दीगर
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किताबें ,रूपसियाँ ,प्रेमिका , प्रेयसी -एक चिंतन!

 ध्यान : इस पोस्ट को हलके फुल्के मन  से पढने की सिफारिश की जाती है,खुद के चैन  शांति कीमत पर ही इसे गंभीरता से ले ....क्योकि यह गंभीरता से लिखी ही नहीं गयी है!  मैंने अपनी पिछली पोस्ट में जो इस पोस्ट के लिखने तक ब्लागवाणी पर सात पसंद
Apr 20 2010 02:48 PM
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किताबें मिली ,कुछ पढ़ीं कुछ ....अधपढ़ीं !

मेज पर कुछ किताबें पडी हैं ..मतलब पूरी तरह पढी नहीं जा सकी हैं ..पढ़ ली गयी होतीं तो  अब तक शेल्फ में पहुँच चुकी होतीं ...विषय भी काफी डाईवेरसीफायिड है -वैदिक सूक्त संग्रह से लेकर आधुनिक  कविता संग्रह तक ....इनमे सभी में से कुछ न कुछ पढ़ चुका हूँ
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आखिर एहसानमंद होना भी कोई बात है! शुक्रिया उन्मुक्त जी!

कौन इस पर ऐतराज करेगा कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है .हम मिल जुल कर रहते हैं ,एक दूसरे के सुख दुःख में शरीक होते हैं . मदद मांगने वाले की मदद करते हैं -आज सारी धरती पर मनुष्य की विजय पताका ऐसे ही नहीं फहरा  रही है -हम अब अन्तरिक्ष विजय की ओर भी चल
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क्या आप मेरे साथ तुलसी के राम का नमन नहीं करेगें ?

 किसबी ,किसान -कुल ,बनिक,भिखारी, भाट ,चाकर ,चपल नट, चोर,  चार,  चेटकी   पेटको पढ़त,गुन गढ़त ,चढत गिरि ,अटत गहन -गन अहन अखेटकी ऊंचे -नीचे करम ,धर्म -अधरम  करि पेट ही को पचत ,बेचत बेटा- बेटकी 'तुलसी ' बुझायी एक राम
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चिलचिलाती धूप ,मनरेगा और औरतें!

अप्रैल माह में ही चिलचिलाती भयंकर  धूप ,गर्मी के थपेड़ों ने बनारस के जन जीवन को जहां बेहाल कर रखा है -मनरेगा के काम में धूप गर्मी की परवाह किये बिना औरतें भी  हाड तोड़ परिश्रम कर रही हैं -मैंने बनारस के हरहुआ ब्लाक के  उंदी गाँव में 
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चिट्ठाकार चर्चा में आज तशरीफ़ लाये हैं अली सैयद

अली सैयद से मेरी मुलाक़ात कोई बहुत पुरानी नहीं मगर लगता है हम कभी अपिरिचित रहे ही नहीं ...यह उन दिनों की बात है जब अंतर्जाल को लेकर  मेरे रूमान ढह रहे थे और कितने ही रूप रंगों के मनुष्य दर मनुष्य अपने चित्र विचित्र चेहरों के साथ यहाँ आ जा रहे थे-तभी
Apr 12 2010 01:03 PM
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ब्लॉग जगत की व्यथित करने वाली बातें!

पहली बात तो बेनामियों की है मगर इस पर कई बार कई किस्तों/किश्तों  में चर्चा हो चुकी है ...बेनामियों के पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर जबर्दस्त दलीले हैं -बेनामी हों या क्षद्म्नामी बात लगभग एक सी ही है .लोग बेनामी क्यों होते होगें ?-अपने ओहदे को छिपाते
टैग: मुददा
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यौन सम्बन्ध एक नीच और निषिद्ध कर्म है ,इसे पत्नी तक ही सीमित रखें-एक विमर्श !

इन दिनों एक भारतीय मूल की लेखिका का अंगरेजी उपन्यास पढ़ रहा हूँ ,विस्तृत समीक्षा  तो उपन्यास खत्म होने पर ही करूंगा -पर  यह है इतना रूमानी की मन  करता है यह ख़त्म ही न हो और मैं शेष जीवन भर इसे पढता ही चलूँ ..पर दुःख तो यही है कि मृत्युलोक
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केरल यात्रा संस्मरण की समापन किश्त:केरली केले,स्पाईस की सस्ती उडान ....

शास्त्री जे सी फिलिप से मिल लेने के बाद ऐसा लगा कि पूरी क्रेरल यात्रा का हेतु जैसे पूरा हो गया हो  .अब रात हो आई थी हमने होटल के समीप और रेलवे स्टेशन तक थोडा चहलकदमी की -इस दौरान जिस एक चीज ने ज्यादा ध्यान आकर्षित किया वह केरल में मिलने वाली केले की
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...केरल में हुआ इक महामिलन ......(केरल यात्रा संस्मरण -८)

आज की दुनियां की भाग दौड़ ,आपाधापी में लोगों को खुद अपने लिए ही फुरसत नहीं है तब दूसरों के लिये समय की जुगाड़ करना कितना मुश्किल तलब( मुआमला )होता है इसका मुझे पूरा अहसास है और इसलिए ही दूसरों के वक्त की सीमाओं / पाबंदियों का मुझे  ख़याल  रहता
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और हम खाते गाते बजाते वापस चल दिए .......(केरल यात्रा संस्मरण -७)

 विदा तिरुवनंतपुरम .....रेलवे स्टेशन का एक हिस्सा ..२६ मार्च ,२०१० ,तिरुवनंतपुरम से विदाई का दिन था .कन्याकुमारी मुम्बई सुपरफास्ट ट्रेन से १०.३० बजे चलकर २ बजे तक एर्नाकुलम/कोचीन  पहुँचने का कार्यक्रम बना .दक्षिण भारत के प्रायः सभी स्टेशन बहुत
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...आखिर कोवलम से मेरी सिनेर्जी नहीं हो पाई....किसने सरापा ?(केरल यात्रा संस्मरण -५)

नाश्ते पानी के थोड़ी  देर बाद ही उन्नीकृष्णन साहब मिलने को आ गए .साईंस फिक्शन की बाते हुईं -हिन्दी और साईंस फिक्शन की एक ही महादशा हिन्दुस्तान में चल रही है -दोनों भाषावाद के शिकार हैं! मैंने उन्नी से तिरुवनंतपुरम में जल्दी ही एक साईंस फिक्शन गोष्ठी
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अप्पम खाकर जैसे जन्म जन्मान्तर की भूख मिट गयी हो.. .(केरल यात्रा संस्मरण -५ ).

थेनामेला का घोषित पारिस्थितिकी पर्यटन मुझे खास आकर्षित नहीं कर सका बजाय मिस केरल के ...इसलिए मैं तो शाम को वापस हो लिया .मेरा दल वहीं मछलियों के शीशाघर मतलब अक्वेरियम के निर्माण  की प्रक्रिया को सीखने  में लगा रहा .शाम को डॉ. शोभना ने मुझे फिर
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..मेरी मुलाक़ात मिस केरल से हो गयी..(केरल यात्रा संस्मरण -४)

रात के सवा दस बज चुके थे..जोरों की भूख लगी थी ..मेरे और साथी तो रेलवे स्टेशन के निकट के एक ठीक ठाक से होटल अमृता में रुके हुए थे मगर मेरे केरल -आतिथेय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के १९७६ -७८ के संगी डॉ .के. शोभना कुमार  मुझे स्नेहवश अपने घर ले गए
Apr 01 2010 09:04 AM
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क्वचिदन्यतोअपि..........!

एअर इंडिया का यह विमान तनिक आधुनिक साज सज्जा लिए था -सभी यात्रियों के ठीक सामने यानि की अगली सीट के पीछे मानिटर था कुछ कुछ वैसे ही  जैसे  कभी अपनी  एक विज्ञान कथा जो चन्द्र उडान पर थी में वर्णित था ...कुछ पल के  लिए ऐसा लगा कि मैं