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पाल ले इक रोग नादां जिंदगी के वास्ते...

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20 May 2010
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एक असैनिक व्यथा...

दोस्त मेरे !अच्छे लगते होअपनी आवाज बुलंद करते हुयेमुल्क के हर दूसरे मुद्दे परजब-तब, अक्सर हीकिशब्द तुम्हारे गुलाम हैंकिकलम तुम्हारी है कनीज़बहुत भाते हो तुमओ कामरेड मेरे !कवायद करते हुयेसूरज को मिलते अतिरिक्त धूप के खिलाफबादल को हासिल अनावश्यक पानी के
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एक हीरो की शहादत...एक सैनिक की मनोव्यथा

पिछले दो हफ़्ते मिले-जुले रंग वाले रहे। कुछ बड़ी सफ़लताओं वाले हर्षोल्लास के रंग तो कुछ शहादत के उदास रंग...जहाँ ढ़ेर सारे सरफिरों को दोज़ख तक का छोटा रस्ता इन दो हफ़्तों ने दिखाया, वहीं दूसरी तरफ इन्हीं दो हफ़्तों ने कुछ साथियों की शहादत से "हीरो" शब्द को नया
May 17 2010 08:00 AM
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सुख की मेरे पहचान रे...

विगत कुछ दिनों से ब्लौग से एक अपरिभाषित-सी दूरी बन गयी है। मोह-भंग, कुछ अपनी व्यस्ततायें, वादी में गर्माता माहौल, ब्लौग-जगत की अजीबो-गरीब लीलायें...तमाम वजहें हैं, लेकिन वो कहते हैं ना कि शो मस्ट गो ऑन तो इसी कहन के हवाले से पेश है एक गीत। पिछले साल
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जुगलबंदी - दर्पण और अर्श की

कुछ अनूठे और आधुनिक बिम्बों का अपनी कविता, त्रिवेणी, क्षणिका और इन दिनों अपनी कहानी में भी इस्तेमाल कर, दर्पण ने कम समय में ही अपना एक बहुत ही खास स्थान बना लिया है हिंदी ब्लौग-जगत में। वहीं दूसरी तरफ अपने इश्किया शेरों और नाज़ुक ग़ज़लों को लेकर अर्श की
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मेजर जोगेन्दर की शहादत पर...

सुना था कि सुबह सूर्य की प्रथम किरण निकलने से ठीक पहले की बेला सबसे शुभ बेला होती है पूरे दिन की। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं और शास्त्रों में भी लिखा है, तो शायद सही ही बात होगी। किंतु उस दिन...इस मनहूस बीस मार्च की सुबह की ये कथित शुभ-बेला उतनी शुभ नहीं थी और
Mar 29 2010 07:24 AM
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त्रासदी प्रेम की...कविता की

पुरानी डायरी के पुराने पन्नों को पलटना एच० जी० वेल्स के टाइम-मशीन सा ही चमत्कार दिखाता है...पीछे छूट गयी दुनिया में ले जाते हुये। कहीं रेनोल्ड, तो कहीं एड जेल, तो कहीं फाउंटेन पेन की बेतरतीब अटपटी लेखनी में तन्हा रातों को उकेरे गये शब्द कभी खुद को
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यक़ीं कीजे, ये मैं ही हूँ, जरा फोटो पुरानी है

छुट्टियाँ कब बीत जाती हैं, पता भी नहीं चलता। ड्युटी पर आये हुये ये चौथा दिन और फिर से वही अहसास कि जैसे यहीं हूँ सदियों से। सतरह सालों बाद इस बार उपस्थित हो पाया था होली पर अपने गाँव में और क्या खूब होली जमी। अबके इधर कश्मीर में खूब-खूब बर्फ गिरी
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कुछ रंग अनदेखे-से...

होली की खुमारी चेहरे पे लगे रंगों के गीलेपन के साथ ही धीरे-धीरे सूखती हुई...उतरती हुई। रंगों की ये धमाचौकड़ी पूरे मौसम को ताजगी देती हुई-सी, जिसकी आगे आने वाले पतझड़ के वास्ते डटे रहने के लिये दरकार है। हर रंग अपनी कहानी कहता हुआ...और ऐसे में अचानक से मुझे
Mar 02 2010 11:55 AM
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सितारों ने की दर्ज है ये शिकायत...

अब ग़ज़ल की बारी है। विगत कुछ प्रविष्टियों में इधर-उधर की सुनाने के बाद अब एक ग़ज़ल। पुरानी है, मेरे चंद साथियों के लिये जो श्री पंकज सुबीर जी के ब्लौग के नियमित पाठक हैं| पुरानी ग़ज़ल नये लिबास में कि मतले में बदलाव है और चंद अशआर नये जोड़े हैं। जानता हूँ कि
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Mar 01 2010 08:05 AM
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प्रेम-चतुर्दशी पर अपनी कुछ प्रेमिकाओं की याद में

उम्र का ये पड़ाव बड़ा ही विचित्र-सा है। ये वो पड़ाव है जब "बड़प्पन" की तलाश में भटकती उम्र को अचानक से उस्ताद की ऐसी झिड़की पड़ती है कि कमबख्त बगलें झांकने लगती है अपनी...और इसी पड़ाव पर अपने "लड़कपन" को बचाये रखने की मुहिम में यही बिचारी उम्र इन दर्पणों,
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आइ लव यू, फ्लाय-ब्वाय...!

तारीख: 27 जनवरी 10जगह: जम्मु-नगरौटा में कहीं एक सैन्य हेलिपैड।दोपहर के चार बजने जा रहे हैं। दिन भर की जद्दो-जहद के बाद कुहासा चीरते हुये आखिरकार सूर्यदेव मुस्कुराते हैं। चुस्त स्मार्ट युनिफार्म में आर्मी एवियेशन के दो पायलट, एक मेजर और एक कैप्टेन, वापस
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अब शहीदों की चिताओं पर न मेले सजते हैं

भूल तो नहीं गये आपलोग मोहित शर्मा को, ऋषिकेश रमानी को, आकाशदीप को या फिर...या फिर सुरेश सूरी को ??? घबड़ाइये मत, मैं नहीं भूलाने दूँगा। इस छब्बीस जनवरी को लाल किले की प्राचीर पे महामहीम के हाथों मोहित की पत्नि ऋषिमा को तो देखा ही होगा आपसब ने अपने पति की
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एरिक सिगल की स्मृति में...

"love means not ever having to say you are sorry"...हम जैसे कितने ही आशिकों के लिये परम-सत्य बन चुकी इस पंक्ति के लेखक एरिक सिगल की मृत्य हो गयी इस 17 जनवरी को और मुझे इस बात का पता चला बस कल ही। यहाँ कश्मीर वादी के इस सुदूर इलाके में राष्ट्रीय अखबार
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कुमार विनोद : ग़ज़ल-गाँव का नया दुष्यंत

हिंदी-साहित्य की समस्त विधाओं में चाहे वो कहानी हो, कविता हो, गीत-नवगीत हो, उपन्यास हो, लेख, यात्रा-संस्मरण या आलोचना आदि हो...इन समस्त विधाओं में ग़ज़ल हमेशा से हाशिये पर ही खड़ी नजर आती है। आप कोई भी साहित्यिक पत्रिका उठा कर देख लीजिये...हफ़्ते, पखवारे,
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घर में सूबेदारनी के क्या दिवाली फाग क्या

कई दिनों से अपनी कोई ग़ज़ल नहीं लगायी थी मैंने ब्लौग पर, तो आज मूड-सा बना ग़ज़ल का। पुरानी ग़ज़ल है, जिसे शायद कुछ सुधि पाठकों ने कोलकाता से निकलने वाली मासिक पत्रिका वागर्थ के अक्टूबर 09 वाले अंक में पढ़ा होगा और कुछ पाठकों ने साहित्य-शिल्पी पर भी पढ़ा होगा। एक
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शार्दुला नोगजा- छंदबद्ध रचनाओं की एक सशक्त हस्ताक्षर

छंदबद्ध और छंदमुक्त...? बहस शायद अनंत-काल तक चलती रहे। पिछली दो पोस्टों के जरिये कुछ विज्ञजनों के अप्रतिम विचारों ने मेरे गिने-चुने ज्ञानतंतुओं को खूब हिलाया-डूलाया। आप सब का आभार। इन बहसों से परे आईये मिलते हैं छंद की एक सशक्त हस्ताक्षर से। अंतरजाल पर
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कविता के बहाने कुछ टिप्पणियों का पोस्ट-रुपांतरण

किसी ब्लौग पर पढ़ा था कि "कुछ टिप्पणियाँ बस ’टिप्पणियाँ’ नहीं होतीं"... तो अपने पिछले ब्लौग पर मेरी उस कथित कविताई-शंका को दूर करने आयी कुछ टिप्पणियों को टिप्पणी-बक्से में ही छोड़ देना मुझे उन शब्दों की तौहीन करना प्रतीत हुआ। सोचा क्यों न उन्हें पोस्ट का
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त्रासदी पुरानी डायरी के पन्नों की,चंद ब्लौगरी-संकल्प और एक कविताई शंका

मेरी डायरी के पन्ने पीले क्यों नहीं होते...सोचता हूँ मैं अक्सर। कब से लिख रहा हूँ...कब से ही तो। एक पूरा बीता हुआ बचपन सिमटा हुआ है इसमें, एक पूरी जवानी भी जो अपने बचपने से कभी उबर ही नहीं पायी। लेकिन फिर भी ये पन्ने सारे-के-सारे वैसे ही हैं- श्वेत...धवल
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टौफियाँ, कुल्फियाँ, कौफी के जायके...

कुछ टिप्पणियाँ वाकई संवाद के नये रास्ते खोलती हैं। अभी पिछली पोस्ट पर जो अपनी ग़ज़ल सुनायी थी आपलोगों को मैंने, उस पर वाणी जी की एक टिप्पणी ने मन को छू लिया। उन्होंने लिखा था - "एक काम्प्लेक्स सा आ जाता है ...कहाँ हम वही काल्पनिक प्रेम वीथियों में अटके
Dec 28 2009 06:06 AM
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हाकिम का किस्सा...

उधर कई दिनों से >संजीव गौतम जी की ब्लौग पर अनुपस्थिति और फोन पर बात किये हुये एक लंबा अर्सा बीत जाना एकदम से चिंतित कर गया था कि जनाब ठीक तो हैं। फोन लगाया तो उनके कहकहों ने आश्वस्त किया और पता चला कि छुट्टी मनायी जा रही है। बातों ही बातों में वो लगे
Dec 21 2009 06:24 AM
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फ़िकर करें फुकरे..

विख्यात{और कुख्यात भी} वर्ल्ड हैविवेट बाक्सिंग चैम्पियन माइक टायसन अक्सर अपना बाउट शुरु होने से पहले कहा करता था और क्या खूब कहा करता था कि:- "everybody has a plan till he gets a punch on the face" बस यूं ही याद आ गयी ये बात। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी म
Dec 14 2009 06:22 AM
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वादी में रंगों की लीला...

ड्‍युटी पर वापस लौटे ये ग्यारहवां दिन। ड्‍युटी पर...?? हाँ, कुछ हद-बंदियाँ{रेस्ट्रिकश्‍न} हैं चोट की वजह से, फिर भी ड्युटी तो है ही। इधर वादी अपना रंग-रूप बदल रही है...बदल चुकी है। हरी-भरी वादी एकदम से लाल, भूरा और सफेद होने की तैयारी में। रंगों की य
Dec 07 2009 05:07 AM
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सितारे डूबते सूरज से क्या सामान लेते हैं

सोचा, बहुत दिन हो गये आपलोगों को अपनी ग़ज़ल से बोर किये हुये। तो आज एक ग़ज़ल- एकदम नयी ताजी। जमीन अता़ की है फ़िराक़ गोरखपुरी साब ने...." बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं/तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं "...सुना ही होगा आपसब ने?...तो इस
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हे हर, हमहु पैहरब गहना...

छुट्टियाँ बीत रही हैं....बीतती जा रही हैं। हर रोज मिलने-जुलने वालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा और मिलने-जुलने वाले घाव-चोट से अधिक इच्छुक उस घटना का विस्तार जानने में रहते हैं। मिथिलावासियों को वैसे भी गप्प-सरक्का का व्यसन होता है। मैं मैथिल
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चंद सौलिड ख्वाहिशों का मरहमी लिक्विडिफिकेशन...

श्रीनगर से पटना तक की दूरी- बीच में पीरपंजाल रेंज को लांघना शामिल- महज पाँच घंटे में पूरी होती है...लेकिन पटना से सहरसा तक की पाँच घंटे वाली दूरी खत्म होने का नाम नहीं लेती, जबकि नौवां घंटा समापन पर है। ट्रेन की रफ़्तार मोटिवेट कर रही है मुझे नीचे उतर
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प्रथम परमवीरचक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की स्मृति में

बात पुरानी तो है, लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं कि उसे भूला दिया जाये। बस बासठ साल पहले की ही तो बात है...आज ही का दिन, बासठ वर्ष पहले। पाकिस्तानी सेना और कबाईलियों की मिली-जुली पाँच सौ से भी ज्यादा फौज के खिलाफ़ वो अपने गिने-चुने पचपन जवानों के साथ भिड़ ग
Nov 03 2009 05:08 AM
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खुद से ही बाजी लगी है, हाय कैसी जिंदगी है

उधर इलाहा्बाद में वो ब्लौगर-संगोष्ठी क्या संपन्न हुयी, विवादों के नये पिटारे खुल गये हैं। समझ में नहीं आता कि हम सबलोगों ने हर चीज का सकारात्मक पहलु देखना बंद क्यों कर दिया है। एक व्यर्थ की तना-तनी के लिये सब कोई कमर कसे तैयार बैठे रहते हैं। एक पहल ह
Oct 26 2009 06:38 AM
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ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली

उम्र के इस पायदान पर भी अंदर का बचपन किलकारियाँ मार उठता है छोटी-छोटी खुशियों पर भी। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि दीपावली की शाम को एक स्नेहिल नर्स द्वारा चुपके से आकर कैडबरिज का फ्रूट एंड नट वाला बड़ा-सा पैकेट पकड़ा देना। छोटी-छोटी खुशियाँ...जैसे कि एक
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हेडलाइन टूडे के रिपोर्टर गौरव सावंत के नाम

अमूमन हफ़्ते में एक ही पोस्ट लगाता हूँ मैं, लेकिन आज इस पोस्ट को लगाने की एक खास वजह है। विगत तीन दिनों से मन की विचलित हालत सबकुछ अस्त-व्यस्त किये हुये थी। ...और मन की ये विचलित हालत थी इस एक रिपोर्ट की बिना पर। गौरव सावंत एक बहुत ही सम्मानित और भरोस
Oct 15 2009 06:18 AM
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गुरुजी के जन्म-दिवस पर उनकी एक सुलगती कविता

कोई पावन-सी सुबह ये...कोई पवित्र-सा दिन ये...कोई खास-सी तारीख ये- अक्टूबर 11 की । हाँ, खास-पवित्र-पावन...!!! हमारे उस्ताद, हमारे गुरूदेव श्रद्धेय पंकज सुबीर जी का जन्म-दिन। सोचा कैसे सेलेब्रेट करूँ इस दिन को...कैसे करूँ? हमारी बिसात क्या कि खुद दो ला
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कभी मौत पर गुनगुना कर चले...

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिमरस्मे-दुनिया भी है, मौका भी है, दस्तूर भी हैमुगलिया सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के इस शेर को ईद के पावन मौके पर सुनाने से रोक नहीं पाता खुद को- विशेष कर अपनी चंद महिला-मित्रों को। फिलहाल चलिये एक ग़ज़ल सुनाता
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मेजर आकाशदीप सिंह- शौर्य का एक और नाम

विगत दो-एक हफ़्ते अजीब-सी मायूसियाँ लिये हुये थे। निष्ठा, लगन और जुनून के बावजूद हासिल हुई विफलता उतावली हो उठी थी नियति, प्रारब्ध, सर्वशक्तिमान के अस्तित्व और खुद अपनी ही क्षमता पर अलग-अलग प्रश्‍न-चिह्न खड़ा करने को। ...और जब इन से उबर कर उठा तो आकाश की
Oct 07 2009 04:34 PM
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ये तेरा यूं मचलना क्या...

इधर वादी में सर्दी की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है और साथ ही बढ़ गयी है हमारी व्यस्तता। एक बार बर्फ गिरनी शुरू हो जाने पर, एक तो मेहमानों का आना कम हो जायेगा और दूसरे जो रहे-सहे आयेंगे भी तो उनकी आव-भगत में तनिक परेशानी होगी।...तो इसलिये इन दिनों ब्लौग-जगत को
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Oct 07 2009 04:32 PM
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शब्दों की दुनिया सजती है अलबेले फनकारों से...

उधर आपलोगों की तरफ, सुना है, "कमीने" ने खूब धूम मचा रखी है? सच है क्या? ...तो मुझे भी ख्याल आया कि अपनी गुल्लक तोड़ूँ, कोई गुडलक निकालूँ और ढ़ेनटरेनssss करके अपनी एक फड़कती हुई ग़ज़ल ठेलूँ !!!...तो पेश है अभी-अभी अशोक अंजुम द्वारा संपादित अभिनव प्रयास के
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Oct 07 2009 04:30 PM
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सौ दर्द हैं, सौ राहतें...

छुट्टी खत्म हुये और ड्यूटी पे आये गिन के छः दिन बीते हैं, लेकिन यूं लग रहा है कि कब से यहीं हूँ मैं। उस दिन जब हवाई-जहाज ने श्रीनगर हवाई-अड्डे पर लैंड किया तो परिचारिका की उद्‍घोषणा ने चौंका दिया। बाहर का तापमान 39* सेल्सियस...??? मुझे लगा हवाई-जहाज
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Oct 07 2009 04:25 PM
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एक वर्ष, पचास पोस्ट और टिप्पणियाँ जो धरोहर बन गयीं...

मुझे लगा कि अपने ब्लौग-जगत का रिवाज है ये, तो सोचा कि मैं भी घोषणा कर देता हूँ। एक साल पहले इसी दिन अपना पहला पोस्ट लिखा था...तो "पाल ले इक रोग नादां..." का एक साल पूरा हुआ और ये पचासवीं पोस्ट ठीक एक साल बाद। बुरा नहीं है न? अपनी तमाम व्यस्ताओं में पचास
Oct 07 2009 04:24 PM
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हाँ, तेरे जिक्र से कुछ शेर सँवारे यूं तो...

बहुत साल पहले एक कविता लिखी थी। तब ग़ज़ल के शास्त्र की जानकारी नहीं थी। अब जब थोड़ी-सी समझ आ गयी है इस जटिल शास्त्र की तो यूँ ही खाली क्षणों में बैठ उन पुरानी रचनाओं को कभी-कभी ग़ज़ल के छंद पर बिठाने की कोशिश करता रहता हूँ। ...तो आज पेश करता हूँ एक ऐसी ही
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Oct 07 2009 04:23 PM
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सुरेश की स्मृति में...

आज की शाम तय थी वैसे तो एक बर्थ-डे बैश के लिये, किंतु नियती ने कुछ और ही तय कर रखा था। वो इकतीस का होता आज। अभी उस 22 सितम्बर की सुबह तक तो हमने आज के इस शाम की बातें की थी...एक खास डांस-स्टेप की बात, जो उसे सिखना था...जो मुझे सिखाना था। मिलेट्री हास
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लेम्बरेटा, नन्हीं परी और एक ठिठकी शाम...{एक कहानी}

संदेशा आये कितना वक्त बीत चुका था उसे कुछ पता नहीं। संदेशे को पढ़ते ही वो तो विचलित मन लिये घर से बाहर निकल गया था पापा का क्लासिक लेम्बरेटा स्कूटर उठाये। लाजिमी ही था...उन आँसुओं को छिपाने के वास्ते।...और अब शहर की तमाम सड़कें-गलियां लेम्बरेटा से नाप
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आकाश छूने की कहानी फुनगियों से पूछ लो...

दर्द भी अजीब तेवर लिये आता है कई बार। कई भार भारी-भारी से चोट दर्द के वो तेवर नहीं दिखाती, जो महज मोबाईल पे आने वाला एक छोटा-सा एस.एम.एस. दिखा देती है। एक बड़ा ही प्यारा-सा दोस्त मेरी कुछ मासूम गुस्ताखियों की ऐसी सजा देगा, सोचा भी नहीं था... खैर उस दि
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Jul 16 2009 06:12 AM