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ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
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17 Jun 2010
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फूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे ख़त में...फ़िरदौस ख़ान

चांदनी रात में कुछ भीगे ख्यालों की तरहमैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरहसाथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हेंमेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरहइक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिएमैं भटकती रही बेचैन गज़ालों की तरहफूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे
 
फ़िरदौस ख़ान
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उसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गए...

कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गएअहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गएजीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभीउसके बगैर कितने ज़माने गुज़र गएमाज़ी किताब है या अरस्तु का फ़लसफ़ाऔराक़ जो पलटे तो कई पल ठहर गएकब उम्र ने बिखेरी है राहों में कहकशांरातें मिली स्याह,
 
फ़िरदौस ख़ान
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सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे...

मुस्कराते रहे, ग़म उठाते रहेसरफ़रोशी के हम गीत गाते रहेरोज़ बसते नहीं हसरतों के नगरख़्वाब आंखों में फिर भी सजाते रहेरेगज़ारों में कटती रही ज़िन्दगीख़ार चुभते रहे, गुनगुनाते रहेज़िन्दगीभर उसी अजनबी के लिएहम भी रस्मे-दहर को निभाते रहे-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...

गरमी से बेहालप्यासी चिड़ियों के लिएघने दरख्तों की शाख़ों परठंडे पानी से भरे मिट्टी के कोरे कूंडे टंगे हैं...किसी न ख़त्म होने वालेसवाब की तरह...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...फ़िरदौस ख़ान

अल इश्क़ो नारून, युहर्री को मा सवीयिल महबूब...यानी इश्क़ वो आग है, जो महबूब के सिवा सब कुछ जला डालती है...इश्क़ वो आग है, जिससे दोज़ख भी पनाह मांगती है... कहते हैं, इश्क़ की एक चिंगारी से ही दोज़ख की आग दहकायी गई है... जिसके सीने में पहले ही इश्क़ की आग
 
फ़िरदौस ख़ान
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ऋतु बसंत की मादक बेला, तुझ बिन सूनी ओ हरजाई

ऋतु बसंत की मादक बेला तुझ बिन सूनी ओ हरजाई मन का दर्पण बिखरा-बिखराजैसे अम्बर की तन्हाई... कंगन, पायल, झूमर, झांझर सांझ सुहानी, नदी किनाराआकुल, आतुर विरह, व्यथित मनपंथ प्रिय का देख के हाराकल की यादें बांह में ले के मुझको सता रही अमराई...क्षण, रैना, दिन सब
 
फ़िरदौस ख़ान
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ताक़ पर रख दो, उन किताबों को... फ़िरदौस ख़ान

ताक़ पर रख दो उन किताबों को...जो ख़ुद को 'श्रेष्ठ' दूसरों को 'तुच्छ' समझने का सबक़ पढ़ाती हों... ताक़ पर रख दो उन किताबों को...जो मर्द को 'ज़ालिम'और, औरत को 'मज़लूम' बनाती हों...ताक़ पर रख दो उन किताबों को...जो इंसान को 'हैवान'और हैवान को 'इंसान' बताती
 
फ़िरदौस ख़ान
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इस प्यार ने क्या कुछ बदला है...

सच!आज पहली बार सुबह सूरज निकला तो कितना भला लगा सूरज की सुनहरी किरनों ने चूम लिया बदन मेरा तुम थे कोसों दूर पर यूं लगाजैसे यह प्यार भरा पैगाम तुमने ही भेजा है इस प्यार ने क्या कुछ बदला है कि अब तो हर शय निखरी-निखरी लगती है... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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ब्लॉगवाणी और ब्लॉगर साथियों, हम आपके शुक्रगुज़ार हैं...

पिछले दिनों ब्लॉग जगत में जो कुछ हुआ... और उस वक़्त जिन ब्लॉगर साथियों ने हमें अपना समर्थन दिया... उसके लिए हम सभी ब्लॉगर साथियों के तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हैं... साथ ही हम ब्लॉगवाणी का भी आभार व्यक्त करते हैं... हमारे लिए सभी ब्लॉगर आदरणीय और सम्माननीय
 
फ़िरदौस ख़ान
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सरफ़रोशी के हम गीत गाते रहे...

मुस्कराते रहे, ग़म उठाते रहेसरफ़रोशी के हम गीत गाते रहेरोज़ बसते नहीं हसरतों के नगरख़्वाब आंखों में फिर भी सजाते रहेरेगज़ारों में कटती रही ज़िन्दगीख़ार चुभते रहे, गुनगुनाते रहेज़िन्दगीभर उसी अजनबी के लिएहम भी रस्मे-दहर को निभाते रहे-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझे...

रातभर दर्द के जंगल में घुमाती है मुझेयाद उस शख्स की हर रोज़ रुलाती है मुझेख़्वाब जब सच के समन्दर में बिखर जाते हैंउम्र तपते हुए सहरा में सजाती है मुझेज़िन्दगी एक जज़ीरा है तमन्नाओं काधूप उल्फत की यही बात बताती है मुझेहर तरफ़ मेरे मसाइल के शरार बरपा
 
फ़िरदौस ख़ान
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ब्लॉगवाणी से अनुरोध : असामाजिक तत्वों का बहिष्कार करे...

कुछ असामाजिक तत्व, (इस्लाम के ठेकेदार ब्लोगर) जो ब्लॉगवाणी  के सदस्य भी हैं... बेहद बेहूदा कमेन्ट कर रहे हैं...ब्लॉगवाणी से हमारा अनुरोध है कि ऐसे तत्वों को बाहर का रास्ता दिखाए...साथ ही अपने भाइयों और बहनों से अनुरोध है कि वो भी वो इन ग़द्दार
 
फ़िरदौस ख़ान
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मौसम दहक रहा है...

मौसम दहक रहा है... आसमान से आग बरसातीसूरज की तेज़ किरणें...बदन को और झुलसाते लू के गरम झोंके...गुलमोहर की शाखों पर दहकते फूलों के सुर्ख़ गुच्छे...सूनी गलियों में बंजारन ख्वाहिशों-सी भटकती आवारा दोपहरें...दूधिया चांदनी मेंमोगरा-सी महकती सुलगती
 
फ़िरदौस ख़ान
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परिजात के फूल और श्रीकृष्ण से मेरा कौन-सा रिश्ता है...

परिजात के फूल और...एक दिन की बात है... मैं अपने कमरे में बैठी थी, तभी मेरी स्कूल की सखी संतोष, पूनम और अनु आ गईं और कहने लगीं आज मन्दिर चलते हैं... मैंने कहा क्या बात है? आज कोई विशेष दिन है, क्या वे कहने लगीं मन्दिर के पास मेला जैसा माहौल होता है...
 
फ़िरदौस ख़ान
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आज़ाद मुल्क की, ग़ुलाम औरतें...

आज़ाद मुल्क कीग़ुलाम औरतें...मुस्लिम समाज में जन्म लेने कीउम्रभर सज़ा भोगतीं बेबस, लाचार औरतें... आज़ाद मुल्क कीग़ुलाम औरतें...शाहबानो, इमराना और गुड़िया-सी कठमुल्लों के ज़ुल्मों कीशिकार औरतें... आज़ाद मुल्क कीग़ुलाम औरतें...'मज़हब' की सलीब पर तंगीइंसानों के
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रोम-रोम में होंठ तुम्हारे टांक गए अनबूझ कहानी...

जब किसी से इश्क़ हो जाता है, तो हो जाता है... इसमें लाज़िम है महबूब का होना (क़रीब) या न होना... क्योंकि इश्क़ तो 'उससे' हुआ है...उसकी ज़ात (अस्तित्व) से हुआ है... उस 'महबूब' से जो सिर्फ़ 'जिस्म' नहीं है... वो तो ख़ुदा के नूर का वो क़तरा जिसकी एक बूंद के
 
फ़िरदौस ख़ान
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यही मुहब्बत है...

कड़ी धूप थीआसमान से शोले बरस रहे थे...उसने कहा-कितनी प्यारी खिली चांदनी है...मैंने कहा-बिलकुलक्योंकि...मुहब्बत में दिल की सुनी जाती है, ज़हन की नहीं यही मुहब्बत है, मुहब्बत की रिवायत है...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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बरसात का मौसम...

नज़्म गर्मियों का मौसम भीबिलकुल ज़िन्दगी के मौसम-सा लगता है...भटकते बंजारे-सेदहकते आवारा दिन औरविरह में तड़पती जोगन-सी सुलगती लंबी रातें...काश!कभी ज़िन्दगी के आंगन में आकर ठहर जाएबरसात का मौसम... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं...

वाल्ट व्हिटमेन के शब्दों में " ओ राही! अगर तुझे मुझसे बात करने की इच्छा हुई तो मैं भी तुझसे क्यों न बात करूं... ज़िन्दगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ़ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है...हालांकि...आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक
 
फ़िरदौस ख़ान
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वो जुस्तजू, वो मोड़, वो जंगल नहीं रहा

जूड़े में फूल आंखों में काजल नहीं रहामुझसा कोई भी आपका पागल नहीं रहाताज़ा हवाओं ने मेरी ज़ुल्फ़ें तराश दींशानों पे झूमता था वो बादल नहीं रहामुट्ठी में क़ैद करने को जुगनू कहां से लाऊंनज़दीक-ओ-दूर कोई भी जंगल नहीं रहादीमक ने चुपके-चुपके वो अल्बम ही चाट ली महफूज़
 
फ़िरदौस ख़ान
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जगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन में

किसी को दुख नहीं होता, कहीं मातम नहीं होताबिछड़ जाने का इस दुनिया को कोई ग़म नहीं होताजगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन मेंहर इक क़तरा मेरी जां क़तरा-ए-शबनम नहीं होताहम इस सुनसान रस्ते में अकेले वो मुसाफिर हैंहमारा अपना साया भी जहां हमदम नहीं
 
फ़िरदौस ख़ान
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ये चांद की बातें, वो रफ़ाक़त की कहानी

हर बात यहां ख़्वाब दिखाने के लिए हैतस्वीर हकीक़त की छुपाने के लिए हैमहके हुए फूलों में मुहब्बत है किसी कीये बात महज़ उनको बताने के लिए हैचाहत के उजालों में रहे हम भी अकेलेबस साथ निभाना तो निभाने के लिए हैमाज़ी के जज़ीरे का मुक़द्दर है अंधेरागुज़रा हुआ लम्हा
 
फ़िरदौस ख़ान
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कुछ यादें...

कुछ यादेंउन हसीं लम्हों कीअमानत होती हैंजब ज़मीन परचांदनी की चादर बिछ जाती हैफूल अपनी-अपनी भीनी-भीनी महक सेफ़िज़ा को रूमानी कर देते हैंहर सिम्त मुहब्बत का मौसमअंगराईयां लेने लगता हैपलकेंसुरूर से बोझल हो जाती हैंऔरदिल चाहता हैये वक़्त यहीं ठहर जाएएक पल मेंकई
 
फ़िरदौस ख़ान
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मुहब्बत का मौसम

वो नज़्मजो कभीतुमने मुझ पर लिखी थीएक प्यार भरे रिश्ते सेआज बरसों बाद भीउस पर नज़र पड़ती है तोयूं लगता हैजैसेफिर से वही लम्हें लौट आए हैंवही मुहब्बत का मौसमवही चम्पई उजाले वाले दिनजिसकी बसंती सुबहेंसूरज की बनफशी किरनों सेसजी होती थींजिसकी सजीली दोपहरेंचमकती
 
फ़िरदौस ख़ान
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अट्ठारह सितंबर

फ़िरदौस ख़ानआज अट्ठारह सितंबर है। वही अट्ठारह सितंबर जो आज से छह साल पहले था। वो भी मिलन की खुशी से सराबोर थी और ये भी, लेकिन उस अट्ठारह सितंबर और इस अट्ठारह सितंबर में बहुत बड़ा फ़र्क़ था। दो सदियों का नहीं, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा, शायद समंदर और सहरा
 
फ़िरदौस ख़ान
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चांदनी रात में कुछ भीगे ख्यालों की तरह

चांदनी रात में कुछ भीगे ख्यालों की तरहमैंने चाहा है तुम्हें दिन के उजालों की तरहसाथ तेरे जो गुज़ारे थे कभी कुछ लम्हेंमेरी यादों में चमकते हैं मशालों की तरहइक तेरा साथ क्या छूटा हयातभर के लिएमैं भटकती रही बेचैन गज़ालों की तरहफूल तुमने जो कभी मुझको दिए थे
 
फ़िरदौस ख़ान
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गुलमोहर के दहकते फूल

सुलगती दोपहरी में खिड़की से झांकते गुलमोहर के दहकते फूल कितने अपने से लगते हैं...बिल्कुलहथेलियों पर लिखे 'नाम' की तरह...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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मेरा महबूब

नाम : बहारों का मौसम तअरुफ़ : मेरा महबूबज़बान : शहद से शीरी लहजा : झड़ते फूलपता : फूलों की वादियां
 
फ़िरदौस ख़ान
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तन्हाई का मौसम...

जबज़िन्दगी की वादियों मेंतन्हाई का मौसम होऔरअरमानपलाश से दहकते हों...तबनिगाहेंतुम्हें तलाशती हैं...जबकिदिल जानता हैतुम कभी नहीं आओगे...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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सुलगते अहसास...

ज़िन्दगी के आंगन मेंमुहब्बत की चांदनी बिखरी है...हसरतों की क्यारी मेंसतरंगी ख़्वाबों के फूल खिले हैं...ख्वाहिशों के बिस्तर परसुलगते अहसास की चादर है...इंतज़ार की चौखट परबेचैन निगाहों के पर्दे हैं...माज़ी के जज़ीरे परयादों की पुरवाई है...फिर भीज़िन्दगी के आंगन
 
फ़िरदौस ख़ान
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Mar 08 2010 06:33 AM
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आप कहते हैं तो...

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी समझूंगी मैंआप कहते हैं तो फिर जी लूंगी मैंजब सर तस्लीम खुम कर दियाना नहीं, हां बोलूंगी मैंगर नहीं है आपको जूड़ा पसंदइन घटाओं को खुला रखूंगी मैंआप अगर यूं ही मुझे तकते रहेनाम अपना आइना रख लूंगी मैंलब हिलने की ज़रूरत ही नहीं रहीआपके चहरे
 
फ़िरदौस ख़ान
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Mar 06 2010 05:28 PM
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तू मेरे गोकुल का कान्हा...

तुमसे तन-मन मिले प्राण प्रिय! सदा सुहागिन रात हो गईहोंठ हिले तक नहीं लगा ज्यों जनम-जनम की बात हो गई राधा कुंज भवन में जैसे सीता खड़ी हुई उपवन में खड़ी हुई थी सदियों से मैं थाल सजाकर मन-आंगन में जाने कितनी सुबहें आईं, शाम हुई फिर रात हो गई होंठ हिले तक
 
फ़िरदौस ख़ान
टैग: गीत
Mar 02 2010 01:22 PM
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चाहत का गुलाल

फागुन की मादक बेला में सुर्ख़ पलाश दहकता है...और ज़िन्दगी के रुख्सारों परचाहत का गुलालमहकता है...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
टैग: नज़्म
Mar 01 2010 01:50 PM
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इश्क़ का रंग

होली... मुझे बहुत अज़ीज़ है क्योंकि इसके इन्द्रधनुषी रंगों में इश्क़ का रंग भी शामिल है...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
टैग: नज़्म
Feb 28 2010 12:39 PM
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इंतज़ार

मेरे महबूब तुम्हारे इंतज़ार नेउम्र के उस मोड़ परला खड़ा किया हैजहां सेशुरू होने वाला एक सफ़रसांसों के टूटने परख़त्म हो जाता हैलेकिन-फिर यहीं से शुरू होता है एक दूसरा सफ़र जो हश्र के मैदान में जाकर ही मुकम्मल होता है...इश्क़ के इस सफ़र में मुझे ही तय करना
 
फ़िरदौस ख़ान
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इश्क़ का घूंट

एक कप कॉफ़ी...जिसका एक घूंट उसने पिया और एक मैंने लगा कॉफ़ी नहीं इश्क़ का घूंट पी लिया हो जैसे...-फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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वो चाहता है मैं कोई गीत लिखूं

वो चाहता है मैं कोई गीत लिखूं मुहब्बत के मौसम का... लेकिन उसको कैसे बताऊं क़ातिबे-तक़दीर ने मेरे मुक़द्दर में लिख डाली है उम्रभर की खिज़ा... -फ़िरदौस ख़ान
 
फ़िरदौस ख़ान
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ऐ चांद ! मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना...

ऐ चांद ! मेरे महबूब से फ़क़्त इतना कहना... अब नहीं उठते हाथ दुआ के लिए तुम्हें पाने की ख़ातिर... हमने दिल की वीरानियों में दफ़न कर दिया उन सभी जज़्बात को जो मचलते थे तुम्हें पाने के लिए... तुम्हें बेपनाह चाहने की अपनी हर ख़्वाहिश को फ़ना कर डाला... अब नही
 
फ़िरदौस ख़ान
Dec 29 2009 11:41 AM
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तुम एक ख़्वाब लगते हो...

कभी मैं सोचती ज़ुल्फ़ों की घनी, महकी, नरम छांव में तुम्हें बिठाकर वो सभी जज़्बात से सराबोर अल्फाज़ जो मैंने बरसों से अपने दिल की गहराइयों में छुपाकर रखे तुम्हारे सामने बिखेर दूं और तुम मेरे जज़्बात, मेरे अहसासात पढ़ लो लेकिन मेरा ज़हन मेरा साथ नहीं देता क्
 
फ़िरदौस ख़ान