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31 Dec 2009
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एक कविता

जुकाम जुकाम जब अपने चरम पर होता है तो नहीं सुनाई पड़ती बम की आवाज़ कानों के भीतर सांय-सांय दौड़ता है बम का सन्नाटा किसी की मौत पर भी झनझना कर नहीं खड़े होते रोएँ सुंदर से सुंदर स्त्री देखकर नहीं होती प्यार करने की इच्छा काम करते हुए जब टपकती है नाक तो
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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मेघा रे ...

काली बदरिया से दो बोल जैसे घटाओं के पुष्पक विमान पर बैठकर धरती के अंगनारे में बूंदों की बारात आई हो... जैसे प्यासी धरती की तड़प ने महासागर की तलहटी को झकझोर दिया हो... जैसे बीजों के भीतर सो रहे अंकुरने वाले गीतों ने कोरस में मल्हार गाया हो... जैसे सू
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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अब दुनिया को जीत फकीरे

उमर न जाए बीत फकीरे। अब दुनिया को जीत फकीरे। जब तक बची कौम भूखों की, रोटी ही है गीत फकीरे। कैसा रामराज आया है, स्वयं राम भयभीत फकीरे। साथ नहीं जो मुट्ठी ताने, उनको कहो अतीत फकीरे। समय बांसुरी बजा रहा है, तुम तो गाओ गीत फकीरे। ओम द्विवेदी kon hai
 
ओम द्विवेदी
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मत कर रे तकरार पड़ोसी

मत कर रे तकरार पड़ोसी। हम दोनों हैं यार पड़ोसी । चाँद यहाँ भी वैसा ही है, जैसा तेरे द्वार पड़ोसी। एक- दूसरे के दुक्खों में, रोये कितनी बार पड़ोसी। अपनी-अपनी रूहों का हम, करते हैं व्यापार पड़ोसी। रोटी-बेटी के नातों पर, मत रख रे अंगार पड़ोसी। बम का मजह
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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दोहे - दीप

करे रोशनी आजकल, मंत्रीजी की टीप। फाइल- दर- फाइल बुझा, लोकतंत्र का दीप। सिंहासन के पास है, सिंहासन का घात। दीप तले हरदम रहे, एक छोटी सी रात। सूरज ने जब से किया, जुगुनू के संग घात। लाद रोशनी पीठ पर, घूमे सारी रात। ओम द्विवेदी kon hai
 
ओम द्विवेदी
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दोहा पंचामृत

जिसकी-जिसकी पीठ पर, पड़ी समय की मार। दर- दर ढूढे जिंदगी, करता चीख-पुकार। पग- पग पर फैला यहाँ, ईश्वर का विस्तार। छोटी-छोटी आंख में, सपनों का संसार। रिश्ते धरती की तरह, घूम रहे हैं गोल। कब किससे मिलना पड़े, बोलो मीठे बोल। सड़क कहीं जाती नहीं, जाता है इंसा
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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दोहा त्रिशूल

भिखमंगे से आ गए, कल तक जो थे नाथ। बना दिया है वोट ने, जनम - जनम का साथ। जनता आंसू खून के, रोई सालोंसाल। पड़ा वोट का काम तो, लेकर चले रुमाल। घूर- घूर कर देखते, इन्हें गांव के लोग। पाँच साल के लिए फिर, होना वही वियोग। ओम द्विवेदी kon hai
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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खतरनाक संकेत

मालेगाँव ब्लास्ट मामले में सेना के कर्नल का गिरफ्तार होना भयावह भविष्य की ओर संकेत करता है। इस्लामी दहशत के खिलाफ सरकारों का मौन और टालने की प्रवित्ति ने हिंदू मानस को झकझोरना शुरू कर दिया है। यह चिंगारी किस हद तक भीतर-भीतर सुलग रही है, इसका अंदाजा इ
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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सन्नाटे की डायरी

कई दिनों से आसपास सन्नाटा पसरा हुआ है। चारों ओर भीड़ है, शोर है, रिश्ते हैं, आदमी हैं, कुदरत है, लेकिन उनसे तादात्म्य बनाने वाला बोध शायद कहीं अनुपस्थित है। कोई भी दुर्घटना दिल को ऐसा नहीं हिलाती कि आंखों से आंसुओं के बादल झर पड़ें, कोई भी खुशी इतना न
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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एक दोहा और

सुन चुनाव की घोषणा, खुश बकरी परिवार। नहीं करेगा शेर अब, कुछ दिन मेरा शिकार। ओम द्विवेदी kon hai
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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एक झकास दोहा

राम नोकरी में मगन, लक्ष्मण का व्यापार। चौराहे पर हो रहा, रावण का श्रृंगार। ओम द्विवेदी kon hai
 
ओम द्विवेदी
Dec 29 2009 11:55 AM
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उम्मीद का एक शेर

हालात के क़दमों में कलंदर नहीं गिरता। टूटे भी तारा पर ज़मी पर नहीं गिरता। गिरता है समंदर में शौक से दरिया, पर किसी दरिया में समंदर नहीं गिरता। (मित्र राजेश साहनी द्वारा भेजा गया संदेश) kon hai
 
ओम द्विवेदी
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रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक कविता

कलम, आज उनकी जय बोल जला अस्थियां बारी बारी छिटकाईं जिनने चिनगारी जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर लिए बिना गरदन का मोल कलम आज उनकी जय बोल जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे जल-जलकर बुझ गए किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल कलम, आज उनकी जय बोल पीकर ज
 
ओम द्विवेदी
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व्यंग्य-वो आए थे

वो दिखाने के लिए ही आए थे...आपने भी देखा होगा। क्या रूप-रंग था...क्या लाव-लश्कर... क्या संगी-साथी थे... क्या अदा थी... चेहरे पर विराजी मुस्कराहट का तो कहना ही क्या?उनके व्याकरण में लोकतंत्र है और आचरण में राजतंत्र। उनका शासन भले दुःशासन का हो मगर सिहांसन
 
ओम द्विवेदी
Aug 26 2009 12:50 AM
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हां! मैने भी हबीबजी के साथ काम किया है

१९९७ का अगस्त महीना। हबीब तनवीर रंगमंच में किसी देव पुरुष के रूप में जाने जाते थे। सारी दुनिया में उनकी ख्याति थी। दिल्ली में नया थियेटर चला रहा थे। उनके नाटकों के प्रदर्शन देश-विदेश में हो रहे थे। फिल्मों में काम कर चुके थे। तमाम राष्ट्रीय सम्मान उन
 
ओम द्विवेदी
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तंबाकू का दर्शनशास्त्र

उस दिन तंबाकू निषेध दिवस था। एक दार्शनिक किस्म के तंबाकू सेवक से मुलाकात हो गई। फिर क्या था? लगा तंबाकू का दर्शन समझा जाए। इधर से सवालों की शुरुआत हुई कि उधर से झमाझम जवाबी बारिश होने लगी। 'आप दिनभर तंबाकू या गुटका क्यों चबाते रहते हैं?' 'अमीर गरीब क
 
ओम द्विवेदी
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होमी की मौत को लाल सलाम

इप्टा के जरिए वामपंथी आंदोलन में कुछ दिनों सक्रिय रहने के बाद भी होमी दाजी के बारे में ज्यादा नहीं जानता था। इंदौर आने के बाद उनकी शख्सियत के बारे में पता लगा। वे बीमारी से लड़ रहे थे और अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव पर थे। इसलिए उनके व्यक्तित्व का जादू भी
 
ओम द्विवेदी
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इस चुनाव का चेहरा

एक चरण के लोकसभा चुनाव हो गए, दूसरे चरण के कल होने हैं। तीसरा चरण कुछ दूर है। इन दिनों हर कहीं केवल चुनाव की चर्चा और व्यस्तता है। सारा प्रशासनिक अमला चुनाव में व्यस्त, नेता चुनाव में व्यस्त, गुंडे-अपराधी चुनाव में व्यस्त, मीडिया चुनाव में व्यस्त, बा
 
ओम द्विवेदी
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शबे मालवा का जादू

आप किसी शहर पर मुग्ध होना चाहें तो कभी-कभी बेवजह भी हो सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई लड़का किसी लड़की और कोई लड़की किसी लड़की पर। मुग्धता कभी-कभी गुण देखकर आती है और कभी मुग्धता गुणों को चिन्हित करती है। आमतौर पर आप जिस जगह, समाज और शहर में रहते हैं उसस
 
ओम द्विवेदी
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इंदौर की रंगपंचमी

बड़ा ही अद्भुत शहर है इंदौर। इसकी उत्सप्रियता का कोई जवाब नहीं। दूर से देखने पर यह और शहरों की तरह साधारण दिखेगा लेकिन इसमें रहने पर इसकी कुल-गोत्र का पता चलेगा। पिछले तीन सालों से मैं इस शहर के उत्सव का साक्षी हूं और इसके आनंद को महसूस कर रहा हूं। हो
 
ओम द्विवेदी
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व्यंग्य - दंगा उत्सव

दंगे हमारे शहर, प्रदेश और देश का गौरव हैं। महीने-चार महीने में दमदार दंगे न हों तो पता ही नहीं चलता कि हमारी कौमें जिंदा हैं और उनका अपना धर्म भी है। जैसे सिर में दर्द होने पर सिर का बोध होता है, पिछवाड़े बालतोड़ होने पर पिछवाड़े का अहसास होता है, पेट म
 
ओम द्विवेदी
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व्यंग्य- रंगों को पानी दे मौला

ज्ञानचंद से भगवान बचाए। मिल गए कि ज्ञान देकर ही मानेंगे। आप लाख उनके ज्ञान को धूल की तरह झाड़ते रहिए, वे बिना दिए नहीं मानेंगे। उनके पिटारे में मौसम, समय और परिस्थिति के अनुकूल ज्ञान तैयार रहता है। होली का मौसम देख बंदे के ऊपर झट से एक ज्ञान उन्होंने
 
ओम द्विवेदी
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ओबामा त्रिशूल

ओबामा है जप रहा , अब तो सारा देश. जैसे वे ही हरेंगे, अपना सारा क्लेश. कल तक चमड़ी श्वेत थी, और काला था राज. हो गए दोनों एक से, फिर भी करते नाज. सिंहासन पर बैठकर, काग सुनाता मंत्र. दुनिया का सुख छीनकर, हँसता है जनतंत्र. kon hai
 
ओम द्विवेदी
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या तो मारो या फिर मरो

वे आए थे हमारा ताज जलाने और जला कर चले गए। उसके बाद से हम माथा और छाती पीट रहे हैं। पडोसी देश पर दबाव बनाने का ढोल भी लगातार पीटे जा रहे हैं लेकिन हाथ कुछ नहीं आ रहा है। सांप निकल गया और लकीर बची है सो उसे धुने पडे हैं। हमारी पीढी यही देखकर और भुगतकर
 
ओम द्विवेदी