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ये है इंडिया मेरी जान

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30 Apr 2010
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मई दिवस है तो क्या

दास्तां पुरानी-रोजी-रोटी के लिए कड़ी मशक्कत करती इस महिला को शायद ये आभास नहीं कि कल शनिवार को हमारा दिन यानी मई दिवस है। यह अपनी बानगी में प्रतिदिन की तरह रोजी-रोटी की लड़ाई लड़ रही है। मई दिवस पर कहीं सभाएं होंगी तो कहीं समारोह। मजदूरों को बेहतर जीवन
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उफ ये गर्मी

उफ! अभी से ये गर्मी तो मई और जून में क्या होगा? हर किसी की जुबान से बरबस यहीं निकल रहा है। झुलसा देने वाली गर्म हवाओं से पूरा उत्तर भारत बेहाल है। ऐसे बचें गर्मी से- ज्यादा भारी काम न करें। तंग जगह व खुली हवा न मिलने वाली जगह पर काम करने से बचें। - तरल
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तो क्या करें महिलाएं

एक ओर संसद में महिलाओं का बराबरी का हक दिलाने के लिए खींचतान जारी है, दूसरी ओर धर्मगुरु अपना अलग ही राग अलापने में लगे है। राजनीति में आने के लिए मर्द बनने वाले बयान के बाद एक और मौलाना ने महिलाओं के राजनीति में आने पर ऐतराज जताया है। शिया धर्मगुरु का
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तो अकेली न जाएं महिलाएं

आजकल साधु-संतों को न जाने क्या हो गया है जो वह हमेशा चर्चा में बने रहना ही चाहते हैं। वे खुद का तो आचरण व व्यवहार सुधारने से रहे, पर दूसरों से इसे सुधारने की नसीहत जरूर दे देते हैं। एक ओर तो संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने की बात हो रही है।
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ये कैसे गुरुजी

प्यार और दुलार से पत्थर दिल भी समझ जाते हैं, पर इन गुरुजी को कौन समझाए। इन्होंने आव देखा न ताउ और हो गए शुरू। ये पता नहीं किस का तैश अपने शिष्य पर उतार रहे हैं। कबीर जी ने कहा हैगुरु कुम्हार शिश कुम्भ है गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट ।अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे
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कब होगा हमारा सशक्तिकरण

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जहां अधिकतर महिलाओं ने अपने अधिकारों की मांग की। वहीं सड़क के किनारे बनी दीवार के पत्थरों को रंगने में मशगूल ये महिलाएं नारी सशक्तिकरण का अर्थ नहीं जानती, इनकी चिंता सिर्फ यह है कि काम नहीं मिला तो चूल्हा कैसे जलेगा। ऐड देखो,
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ये कैसे बाबा

जिस तरह हाथी के दांत दिखाने के लिए और होते हैं और खाने के लिए और, ठीक उसी तरह होते हैं संत। ये दूसरों को तो उपदेश देते फिरते हैं कि तुम ऐसा करो-वैसा करो, और खुद क्या कुछ नहीं करते। दिखावे के लिए भले ही ये लंबा तिलक लगात हों, लाल-पीले कपड़े पहनते हों पर न
Mar 05 2010 01:55 AM
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लूट सको तो लूट लो (2)

जब भविष्य संवारने वाले ही उनके भविष्य से खिलवाड़ करने लगे..भले ही उन्हें इनका भविष्य संवारने के एवज में मोटी पगार मिलती हो.. पर वह पढ़ाना-लिखाना तो दूर की बात है, इन्हें जानती भी नहीं। जानेंगी तो तब जब शिक्षा के मंदिर में पहुंचे, लेकिन इन्हें तो घर ब
Dec 29 2009 11:44 AM
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लूट सको तो लूट लो (1)

जब हर तरफ लूट मची हो तो आम नागरिक के हाथ निराशा ही तो लगेगी। काम कोई भी कराना हो, बिना कुछ खर्च किए नहीं होने वाला है। शिक्षा के मंदिर भी अब लूटने में पीछे नहीं हैं। चाहे किसी कक्षा में दाखिला लेना हो या फिर घर बैठे डिग्री लेनी हो। अगर पैसा खर्च करोग
Dec 29 2009 11:44 AM
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क्या हुआ तेरा वादा?

पहली पत्‍‌नी और बच्चों को खून के आंसू रुलाया। पिता की इज्जत और धन-दौलत दांव पर लगा दी। फिर भी इन्हें अपने किए का कोई पछतावा नहीं है, और न ही कुतर्क करने से बाज आ रहे हैं। 'प्यार' के लिए धर्म और उपमुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने वाले हरियाणा के चंद्र मोह
Dec 29 2009 11:44 AM
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क्या नाम दूं?

जिनकी वे पूजा करते हैं, उनके बताए मार्ग पर चलते हैं। उनके एक इशारे पर मरने मारने को तैयार हो जाते हैं। शायद उन्हें यह नहीं मालूम कि जिनके प्रति उनमें इतनी आस्था है, उनका दामन कितना पाक-साफ है? और वे क्या गुल खिलाते हैं? दरअसल ये तो अपनी ही महिला भक्त
Dec 29 2009 11:44 AM
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संत-संयम और शर्म

जिस तरह हाथी के दांत दिखाने के लिए और होते हैं और खाने के लिए और, ठीक उसी तरह होते हैं संत। ये दूसरों को तो उपदेश देते फिरते हैं कि तुम ऐसा करो-वैसा करो, और खुद क्या कुछ नहीं करते। दिखावे के लिए भले ही ये लंबा तिलक लगात हों, लाल-पीले कपड़े पहनते हों
Dec 29 2009 11:44 AM
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कैसा सलूक करेंगे?

पाकिस्तान की कथनी और करनी जग जाहिर है। भले ही उसने भारत और अमेरिका के भारी दबाव के चलते एक-दो आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया है। फिर भी क्या गारंटी कि पाक उनसे सख्ती से निपटेगा। क्या पाक में दो ही आतंकी हैं? और आतंकी क्यों नहीं दबोचे गए? इनमें भी सिर्फ
Dec 29 2009 11:44 AM
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...और फंस गए मंत्री जी

चांद और फिजा यूं ही इक-दूजे के नहीं हो गए। इसके लिए चांद को क्या कुछ नहींकरना पड़ा। पहले तो दूसरी शादी के लिए धर्म छोड़ना पड़ा, और फिर उन्हें पद भी छोड़ना पड़ गया। फिर भी शायद ही इस शादी को कानूनी मान्यता मिल सके। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन न
Dec 29 2009 11:44 AM
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कुछ तो शर्म करो

उन्हें मालूम था कि आतंकी कहां से आएंगे और कहां हमला करेंगे। सिर्फ यहीं नहीं मालूम था कि वे कब हमला करेंगे। शायद इसीलिए चौकसी नहीं बरती गई। फिर भी नेताओं को शर्म तो आती नहीं। गृहमंत्री शिवराज पाटिल खुद मानते हैं कि खुफिया तंत्र ने आतंकी हमले की सूचना
Dec 29 2009 11:44 AM
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कैसे भरेंगे जख्म?

जब दिल्ली दहल रही थी तो गृहमंत्री शिवराज पाटिल कपड़े बदल रहे थे। और इस बार जब मुंबई दहल रही थी तो गृह मंत्रालय को यह समझ में नहीं आ रहा था कि संकट की इस घड़ी में क्या किया जाए, उसे कई घंटे संभलने में ही लग गए। इतनी देर में अस्सी से ज्यादा लोगों की जा
Dec 29 2009 11:44 AM
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फिर हुए शर्मशार

राष्ट्र के प्रति हम इतने गंभीर और जागरूक हैं तभी तो कभी राष्ट्रीय ध्वज को उल्टा फहरा दिया जाता है तो कभी जमीन पर गिरा दिया जाता है, और कभी समारोह खत्म होने के बाद उसे पैरों तले रौंदा जाता है। इस बार हरियाणा के अंबाला में एक दुकान पर ग्राहकों को नाश्त
Dec 29 2009 11:44 AM
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पुलिस सुस्त, लुटेरे चुस्त

पहले दिन : बैंक से तेईस लाख, अस्सी हजार की लूट। दूसरे दिन : बैंकों में कैश पहुंचाने वाली वैन से सत्तरह लाख की लूट। लूट की ये वारदातें किसी गांव या कस्बे की नहीं,बल्कि देश के सर्वाधिक सुरक्षा वाले क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी की हैं। यहां पुलिस जितनी सुस
Dec 29 2009 11:44 AM
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हम नहीं सुधरेंगे

राष्ट्रीय राजधानी कितनी महफूज है यह तो सभी जानते हैं, फिर उसकी सीमा से सटे इलाके कितने महफूज होंगे यह बताने की जरूरत नहीं है। अगर ऐसा न होता तो सोमवार को दिनदहाड़े दिल्ली में स्टेट बैंक आफ बीकानेर एंड जयपुर से 23 लाख अस्सी हजार रुपये न लूट लिए जाते।
Dec 29 2009 11:44 AM
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मजबूती हाजिर है

पुल इतना मजबूत क्यों बनाया जाता है, जो क्षमता की जांच के दौरान की ढह जाता है? क्या इसी तरह पुल ढहते रहेंगे और निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी? ये वो पुल है जो जम्मू-कश्मीर में झेलम नदी पर लगभग बन कर तैयार हो गया था, और इसे अगले सप्ताह यातायात के लिए
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19 साल बाद ये इंसाफ

उसने इसलिए आत्महत्या कर ली थी, क्योंकि वह अपने साथ हुई छेड़खानी बर्दाश्त नहीं कर सकी थी। उसकी सहेली और उनके माता−पिता ने 19 साल इंसाफ की लड़ाई लड़ी। इस लड़ाई में इन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। मगर उन्हें ही नहीं हर किसी को मलाल है कि इस मामले
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जरा याद करो कुर्बानी

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा.. इन पंक्तियों को लिखने वाले अमर शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने कभी नहीं सोचा होगा कि शहीदों के नाम पर सरकारें सिर्फ घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगी। कारगिल युद्ध के दौरान शहीद
Jul 26 2009 02:54 AM
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ये कैसा फरमान?

सरकार भले ही जाति पंचायत के अस्तित्व को नकारती रही हो, इसके बावजूद देश में जाति पंचायतों का प्रभुत्व देखने को मिल ही जाता है। हरियाणा के झज्जर जिले के ढराना गांव की पंचायत पत्नी को बहन बताकर गांव से निकालने पर आमदा है। ढराना में रहने वाले रविंद्र ने
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कौमार्य परीक्षण

मध्य प्रदेश में कन्यादान योजना के तहत विवाह अनुदान लेने वाली कन्याओं की कौमार्य जांच के साथ-साथ गर्भ परीक्षण क्या उचित है? क्या इससे इस तरह की योजनाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार रुकेगा। क्या यह नारी जाति का मजाक नहीं?सरकार भले ही यह कह रही हो कि यह कौमार
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हम नहीं सुधरेंगे

भले ही जगह-जगह यह लिखा हुआ मिल जाए कि दुर्घटना से देर भली घर पर बच्चे आप की प्रतीक्षा में होंगे...मगर इन्हें जो अपनी जान से जरा सा भी प्यार होता या फिर परिजनों की चिंता होती तो क्या ऐसे जान-जोखिम में डाल कर सफर करते? फिर भी हम तो यहीं दुआ करते है कि
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...मुझसे शादी करोगी?

चंद्रमोहन से चांद मुहम्मद बने हरियाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री की दूसरी पत्नी अनुराधा बाली उर्फ फिजा की महानता के क्या कहने। वह महान होने के साथ-साथ काफी दयालु भी थी, तभी तो उन्हाेंने चंद्रमोहन जैसे िभखारी से शादी कर ली। िफजा का कहना है िक मुझसे शादी
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क्या करे अवाम?

मेरा भारत महान चांद उससे भी महान क्या करे अवाम? घर तो संभलता नहीं कैसे संभालेंगे देश? जाने कहां गए वो िदन... अब क्या होगा िफजा का? कैसे आएगी िफजा के फूल में बहार? अब तो नींद की गोली भी नहीं दे रही साथ.
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ये कब सुधरेंगे?

भले ही वह उनसे हर माह मनमाना किराया वसूलते हों, फिर भी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि ये हमारे मकान में किराए से रहते हैं। बिजली का बिल वैसे तो दो रुपये साठ पैसे प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली बोर्ड की तरफ से आता है, पर ये चार रुपये प्रति यूनिट क
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लूट सको तो लूट लो (6)

हड़ताल से भले ही किसी का खास फायदा न हुआ हो, पर उन्होंने खूब चांदी कूटी। कूटते भी क्यों न आखिर ऐसा मौका बार-बार तो आता नहीं है। इसीलिए मौके की नजाकत समझते हुए उन्होंने तीन सौ पांच रुपये में मिलने वाला रसोई गैस सिलेंडर आठ सौ रुपये तक ब्लैक में बेचा। औ
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लूट सको तो लूट लो (5)

भोले-भाले यात्रियों को किस तरह लूटा जाता है, यह कोई बस कंडक्टरों से सीखे। भले ही इन्हें मोटी पगार मिलती हो पर जब तक ये भोले-भोले यात्रियों से पैसे नहीं ऐंठ लेते हैं, तब तक इन्हें सकून नहीं मिलता है। अन्य परिवहन डिपो की बसों में भले ही कंडक्टर यात्रिय
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लूट सको तो लूट लो (4)

लालू की रेल कहीं और फायदे में न पहुंच जाए, इसका खास ख्याल रखा जा रहा है। इसीलिए तो भोले-भाले यात्रियों से कहा जाता है कि जितने का टिकट लोगे उसके आधे पैसे में हम ले चलेंगे। बताओ कहां जाना है? अगर बैठ कर सफर करना चाहते हो तो जितने का टिकट मिलता है, उसक
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लूट सको तो लूट लो (3)

उनका कसूर यहीं है कि वह आम हैं और जब आम हैं तो उसका खामियाजा तो भुगतना पड़ेगा ही। अगर वे इस खामियाजे को भुगतने से बचना चाहते हैं तो फिर खास बनें, नहीं तो भुगतते रहें खामियाजा। लुटते रहें जगह-जगह... रेलवे स्टेशन पर एक बुजुर्ग काफी देर से लाइन में टिकट