मैं समय हूँ ...'s Image

मैं समय हूँ ...

http://mainsamayhun.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
08 Mar 2010
कुल प्रविष्टियां
33
पाठक भेजे
1667
पसंद
49
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
50.52
पसंद करें
0
नापसंद करें

कमाल है ....( गज़ल )

सारा तो काम हमने संभाला कमाल है फ़िर भी तुम्हारे हाथ मे छाला कमाल है मुद्दत से जो चिराग जले ही नहीं कभी वो कह रहे हैं खुद को उजाला कमाल है लाजमी था आज तो मुंह खोलना मगर सबकी जुबां पे आज भी ताला कमाल हैभरता है जो किसान जमाने के पेट को मिलता नहीं है उसको
 
डा. उदय ’ मणि ’
Feb 23 2010 11:11 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

बस माँ का हाथ सर पे , हमेशा बना रहे ..

रहता है अन्धेरा तो अन्धेरा घना रहेदिन रात दिक्कतों से भले सामना रहेइसके सिवाय कुछ भी नहीं चाहते हैं हमबस माँ का हाथ सर पे हमेशा बना रहेडा उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
0
नापसंद करें
पसंद करें
0
नापसंद करें

कहूं गर आज महफ़िल मे ...

कहूं गर आज महफ़िल मे , सहे कितने सितम दिल ने नहीं मुमकिन बयां इसकी , सही मैं दासतां कर दू हुआ नाकाम ही अक्सर , जहां की ठोकरें खाकर न अब ये वक्त पे हंसता , न गम के दौर मे रोता परेशां हूं मैं खुद इससे , करूं किससे गिला शिकवा न ये दुनिया मेरी सुनती , न अ
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

श्री गणेश लाल व्यास " उस्ताद " - एक स्केच

कल से कोटा मे साहित्य अकादमी एवं " विकल्प" जन सांस्क्रतिक मंच द्वारा विख्यात कवि स्व श्री गणेश लाल व्यास " उस्ताद " की जन्म शताब्दी पर दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित हो रहा है इस संदर्भ मे इस कार्यक्रम के लिये कल मैने श्री गणेश लाल व्यास " उस्ताद " का एक
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

यहां पर कौन राजी है , हमारा साथ देने को - मुक्तक

कल से चार पंक्तियां जहन मे चल रही है एक मुक्तक के रूप मे , सबसे पहले आप सब से ही बांट रहा हू , कि - चले हैं इस तिमिर को हम , करारी मात देने को जहां बारिश नही होती , वहां बरसात देने को हमे पूरी तरह अपना , उठाकर हाथ बतलाओ यहां पर कौन राजी है , हमारा सा
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अगर मरते परिंदे को , बचाना जानते हैं हम ..गज़ल

हमारा फ़न अभी तक भी पुराना जानते हैं हम जमाने , दोस्ती करके , निभाना जानते हैं हम किसी भूचाल से जिनमे दरारें पड नही पायें अभी तक इस तरह के घर बनाना जानते हैं हम उठा पर्वत उठाये जा , हमे क्या फ़र्क पडता है इशारो से पहाडों को , गिराना जानते हैं हम हमारी
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

इशारे कम समझता हूं - मुक्तक

मै चंदा कम समझता हूं , सितारे कम समझता हूं मैं रंगत कम समझता हूं, नजारे कम समझता हूं उधर वो बोलता कम है नजर से बात करता है इधर मेरी मुसीबत मैं , इशारे कम समझता हूं डा उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मैं अपनी सांस को तब तक , कही जाने नही दूंगा

तुम्हारा मन हमारे गीत , जिस दिन तक नही गाता नशा मेरा तुम्हारे दिल पे , जिस दिन तक नही छाता मैं अपनी सांस को तब तक , कही जाने नही दूंगा तेरे लब पे हमारा नाम , जिस दिन तक नही आता डा उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

होली की अनन्य शुभकामनाओं सहित

सभी साथियो , मित्रों को होली पर असीम शुभकामनाओं सहित.. लगें छलकने इतनी खुशियां , बरसें सबकी झोली मे बीते वक्त सभी का जमकर , हंसने और ठिठोली मे लगा रहे जो इस होली से , आने वाली होली तक ऐसा कोई रंग लगाया , जाये अबके होली मे डा. उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
Dec 29 2009 11:43 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

बोल जमूरे सच सच बोल ...

ये जनकवि विपिन मणि की बहुत ही लोकप्रिय ओजस्वी कविताओं में से एक है
 
डा. उदय ’ मणि ’
Aug 29 2009 09:45 PM
पसंद करें
3
नापसंद करें

आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी

आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी अभाव की उडी पतंग , जिंदगी के गांव में पल रही मुसीबते , बरगदों की छांव मे आह भर रही बहार , पतझरों के द्वार पर स्वार्थों के पेड से बंधी हुयी है जिंदगी आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी धो रही नसीब आंख आंसुओं की ध
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी

आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी अभाव की उडी पतंग , जिंदगी के गांव में पल रही मुसीबते , बरगदों की छांव मे आह भर रही बहार , पतझरों के द्वार पर स्वार्थों के पेड से बंधी हुयी है जिंदगी आज दर्द की प्रिया बनी हुयी है जिंदगी धो रही नसीब आंख आंसुओं की ध
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
2
नापसंद करें

मेहरबां को हुआ आज क्या देखिये - ग़ज़ल

मेहरबां को हुआ आज क्या देखिये कर दिये गम हज़ारों अता देखिये भूख दी , प्यास दी, दी हैं मजबूरियां और क्या देगा हमको खुदा देखिये जख्म गहरे है , दर्दो का अंबार है फ़िर भी हंसते हैं हम, हौसला देखिये जिस अदा ने मेरे दिल को घायल किया आइने मे वो अपनी अदा देखिय
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

सूरज नया उगाना है - मुक्तक

कोटा मे हुये तीन दिवसीय नाट्य समारोह का संचालन करते हुये, शहर मे एक ओडीटोरियम की माग के संदर्भ मे कुछ एक मुक्तक लिखने मे आये - देखियेगा ये नाटक ये रंगकर्म तो , केवल एक बहाना है हम लोगों का असली मकसद सूरज नया उगाना है कभी मुस्कान चेहरे से हमारे खो नही
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

कभी दमदार कोशिश बेनतीजा हो नही सकती - मुक्तक

कोटा मे हुये तीन दिवसीय नाट्य समारोह का संचालन करते हुये, शहर मे एक ओडीटोरियम की माग के संदर्भ मे कुछ एक मुक्तक लिखने मे आये - देखियेगा ये नाटक ये रंगकर्म तो , केवल एक बहाना है हम लोगों का असली मकसद सूरज नया उगाना है कभी मुस्कान चेहरे से हमारे खो नही
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

तुम्हारी आंख मे आंसू खराब लगते हैं - मुक्तक

सभी साथियों को सादर अभिवादन पिछले एक सप्ताह से एक चिकित्स्कीय कार्यक्रम और विश्व रंगमंच दिवस पे यहां आयोजित तीन दिवसीय कर्यक्रम मे व्यस्तता रही , लिखने मे छुट्पुट ही आ पाया उसी मे से एक मुक्तक देखियेगा - तुम्हारे होठ मुकम्मल गुलाब लगते हैं तुम्हारे ब
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
0
नापसंद करें

इन चिरागो कि परवाह मत कीजिये - मुक्तक

ये जलेंगे हर-इक हाल मे रातभर ये करेंगे उजाला हमेशा इधर इन चिरागो कि परवाह मत कीजिये इनपे होता नही है हवा का असर " डा। उदय ’मणि’
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

मैं समय हूँ ...

कल से चार पंक्तियां जहन मे चल रही है एक मुक्तक के रूप मे , सबसे पहले आप सब से ही बांट रहा हू , कि - चले हैं इस तिमिर को हम , करारी मात देने को जहां बारिश नही होती , वहां बरसात देने को हमे पूरी तरह अपना , उठाकर हाथ बतलाओ यहां पर कौन राजी है , हमारा सा
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

कुर्सी मैय्या कुर्सी बाप - व्यंग्य

कुर्सी मैय्या कुर्सी बाप, कौन खेत की मूली आप" आज श्रेश्ठ व्यंगकार डा योगेन्द्र मणि जी के एक व्यंग की पे पंक्तिया काफ़ी देर जहन में घूमती रही फ़िर जो कुछ घूम रहा था उससे मैने इन दो पंक्तियो को इस तरह से बढाने की कोशिश की है कि कुर्सी मैय्या कुर्सी बाप,
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
4
नापसंद करें

जाता नही जहन से , पुराना मकान वो

दुनिया था हमारी वो , हमारा जहान वो लगता था हमें आन-बान ,और शान वो होने को बडा है ये , नया घर बहुत मगर जाता नही जहन से , पुराना मकान वो डा उदय ’मणि’ कौशिक
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी नजर किसी के , सहारे पे नही है - मुक्तक

सूरज पे नहीं चांद पे , तारे पे नहीं है चौखट पे किसी या किसी द्वारे पे नही है है अपने बाजुओं पे , भरोसा बहुत मुझे मेरी नजर किसी के , सहारे पे नही है डा. उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
0
नापसंद करें

कभी अपने गिरेबानों के अन्दर क्यों नही जाते - ग़ज़ल

हमेशा घर पे रहते हो , कहीं पर क्यों नही जाते बताओ तो सही तुम लोग, बाहर क्यों नही जाते अगर ये जिन्दगी इतनी , अधिक बेकार लगती है भला क्यों जी रहे हो तुम, भला मर क्यों नही जाते यहां आकर तुम्हें सब कुछ , समझ मे आ गया होगा यहां जो लोग आते है , वो आकर क्यो
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
2
नापसंद करें

दुश्मन तो मगर मुझको,बराबर का चाहिये ....गज़ल

सादर अभिवादन कल रात एक गज़ल के 4 - 5 शेर हुये हैं सबसे पहले आप के साथ ही बांट रहा हू देखियेगा .. रोटी का चाहिये , न मुझे घर का चाहिये लेकिन मुझे हिसाब, कटे सर का चाहिये कमतर से दोस्ती मे शिकायत नहीं मुझे दुश्मन तो मगर मुझको,बराबर का चाहिये ऐसी लहर उठा
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

ये हवाओं के भरोसे पर नहीं है - मुक्तक

पेट खाली , तन उघाडा , घर नहीं है देख लो फ़िर भी झुकाया सर नहीं है सब चिरागों से अलग है , ये चिराग ये हवाओं के भरोसे पर नहीं है डा उदय मणि
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

मैं समय हूँ ...

हिन्दी ब्लॉग परिवार के सभी साथियों मित्रों , अग्रजों को रंगो के इस त्यौहार पर सह्रिदय असीम शुभकामनाएं मौज मस्ती , ढेर सा हुडदंग होना चाहिये नाच गाना , ढोल ताशे , चंग होन चाहिये कोई ऊंचा ,कोई नीचा , और छोटा कुछ नही हर किसी का एक जैसा रंग होना चाहिये औ
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
2
नापसंद करें

तुम्हारी महफिलों में जब, हमारी बात होती है ..ग़ज़ल

तुम्हारी महफिलों में जब, हमारी बात होती है ॥ग़ज़ल शरारत बादलों की ये , धरा के साथ होती है जरूरत किस जगह पर है , कहाँ बरसात होती है हमें मालूम है तुमको बहुत अच्छा नहीं लगता तुम्हारी महफिलों में जब , हमारी बात होती है हमारी जिंदगी तो जंग के , मैदान जैस
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

मैं समय हूँ ...

साथी शिशिर मित्तल जी को उनके विवाह पर उपहार के लिये बनाया स्केच न जाने क्यों ये मुझे बडा अच्छा लगा ... और आपको ...
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
1
नापसंद करें

दुनियादारी सीख गया - एक मुक्तक

दिल मे नफ़रत मुंह पे बातें , प्यारी प्यारी सीख गया सारी तिकडम , तौर - तरीके सब अय्यारी सीख गया बुरा नहीं है अच्छा है ये जो कुछ मेरे साथ हुआ इसके कारण मैं भी थोडी , दुनिया दारी सीख गया सादर डा. उदय ’ मणि’
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
3
नापसंद करें

मैं समय हूँ ...

काफी समय बाद एक स्केच बनाने में आया है उसे आप सब के साथ बाँट रहा हूँ इस बार , ये दरअसल एक प्रसिद्द रूसी मूर्तिकार इवान शद्र की बनायी बहुत प्रसिद्द मूर्ती का स्केच
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
2
नापसंद करें

मुक्तक

बीते कुछ दिन मे हमारे आस पास आतंक और घ्रणा का बडा दुखद सा वातावरण रहा और , कल पाकिस्तान की अति दुखद घटना के बाद एक न्यूज चैनल पे बहुत छोटे बच्चों को हथियारों सहित दिखया , उस पे एक मुक्तक सा लिखने मे आया , देखियेगा " जिनकी आंखों मे तितली या तोते,चिडिय
 
डा. उदय ’ मणि ’
पसंद करें
2
नापसंद करें

व्यंग्य- नेता बनाम कुत्ता

तथाकथित पेशेवर नेता को कुत्ते ने काटा। कुत्तों की पूरी जमात ने उसे डांटा यह तूने क्या कर दालाजिसका काटाआई।ए।एस अफ़सर तकपानी नहीं माँगतातूने उसे काट ड़ाला।यदि तेरे काटने सेनेता जी मेंवफ़ादारी का गुण आ गयाऔर तुझपरनेताजी का खून असर जमा गयातो हम बरबाद हो जा
 
डा. उदय ’ मणि ’