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मन की बात

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10 Jun 2010
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शहर भोपाल

मंज़ूर एहतेशामयह बड़ी लाचारी है कि खुद अपनी बात किये बिना आप अपने शहर को याद नहीं कर पाते। सिर्फ़ इतना ही नहीं, खुद तक पहुँचने के लिए पहले आपको अपने बुजुर्ग़ों की उँगली पकड़ना पड़ती है और बुज़ुर्गों का ज़िक्र उत्तर-आधुनिक आख्यान-सा लगता है, जो कभी-कभी, मन को
 
Atmaram Sharma
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garbhanal

garbhanal
 
Atmaram Sharma
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अरे! ओ अजनबी

वो है यारों का यारशायद ही करे कोई इनकारउसके बारे में हरेक के पास हैं - दसियों वाकयेकि वह बोलता है कमऔर सुनता है ज्यादाकरो तारीफ तो - बदल देता है बातचार यार सहमत हों ऐसा कम होता हैपर उसका जिकर आते हीसब होते हैं एक सुरवो - बगैर बोले कहता हैबिना सुने समझता
 
Atmaram Sharma
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साहित्यिक सुख

देश में शादियों का मौसम चरम पर पहुँचकर गुजरा है. इस दौरान तरह-तरह की पातियों और कार्डों से बाजार भरे पड़े थे. इस सुखद मौके के बहाने लोगों ने अपनी कलात्मक और साहित्यिक अभिरुचि को जाँचा-परखा और अभिव्यक्त किया. एक ज़माना वह भी था जब हल्दी-चावल छींट कर
 
Atmaram Sharma
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छवि और भय

कह डालने से क्यों डरते हो? क्यों स्थगित करते हो आज को कल पर तब कि जब माँजते थे रकाबियाँ गंदे और सड़े होटल में और देखते थे ख्वाब कि जब होऊँगा कदवान कह जाऊँगा सब कुछ... अब कि जब परछाईं भी बताती है पाँच-फुटा तो हो ही पर अब तुम्हें कह जाने के लिए ताड़-सा क
 
Atmaram Sharma
Dec 29 2009 11:53 AM
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पहेली

बहुत बुरा लगता है तब और अच्छा लगता है जब क्यों कर उपजती है कविता अबूझ है यह सवाल उसी से ठंडा - उसी से गरम मार्का.
 
Atmaram Sharma
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प्रिया! घर आने वाली हैं...

मन से उठी पुकार प्रिया! घर आने वाली हैं... घर की थानेदार प्रिया! घर आने वाली हैं... कागद-पत्तर करो व्यवस्थित तकिया चारपाई और बिस्तर तेल का पीपा धरो यथावत होओ होशियार प्रिया! घर आने वाली हैं... विदा करो ठलुओं को घर से बरतन-भांडे माँजो फिर से करो सफाई
 
Atmaram Sharma
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प्रिया! घर आयेंगी...

किये साज-श्रृंगार प्रिया! घर आयेंगी मन के खोले द्वार प्रिया! घर आयेंगी हृदय-तंतु झनझना उठेंगे शहनाई की तान सुनेंगे रोम-रोम पुलकित होगा खनकेगा तन का तार प्रिया! घर आयेंगी... मन मयूर नाचेगा उस क्षण देहरी लाँघ आओगी जिस क्षण भर आयेगा कंठ पुलक जाओगी बारम्
 
Atmaram Sharma
Dec 29 2009 11:53 AM
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प्रिया तुम पास नहीं हो

फूल आई कचनार प्रिया तुम पास नहीं हो रातें हुईं पहार प्रिय तुम पास नहीं हो सूख गई मन की चिकनाई गुजरी रात भोर हो आई बिसर गई मनुहार प्रिया तुम पास नहीं हो लगते घर के कमरे खाली ज्यों शरबत की चटकी प्याली सूना सब संसार प्रिया तुम पास नहीं हो मेरा हाल हुआ ह
 
Atmaram Sharma
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गड़े मुर्दे-5

मंज़ूर एहतेशाम के चर्चित उपन्यास 'सूखा बरगद' के एक पात्र से मुलाकात) जहाँनुमा पैलेस भोपाल के पुराने और आलीशॉन होटलों में से एक है. रिसेप्शन पर बैठी लड़की से मैंने पूछा कि कमरा नंबर 502 में ठहरे मिस्टर परवेज़ आलम से मिलना चाहता हूँ तो उसने कहा कि वे कमरे
 
Atmaram Sharma
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गड़े मुर्दे-4

मंज़ूर एहतेशाम के चर्चित उपन्यास 'सूखा बरगद' के एक पात्र से मुलाकात) रवींद्र भवन के खुले मंच पर चल रहे सारे कारोबार को देखते हुए भी मैं अनदेखा कर रहा था. कानों में आवाज़ें जा रही थीं, लेकिन क्या बोला जा रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा था. यह ऐसे ही था कि बग
 
Atmaram Sharma
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गड़े मुर्दे-3

मंज़ूर एहतेशाम के चर्चित उपन्यास 'सूखा बरगद' के एक पात्र से मुलाकात) यूँ तो विजय की कोठी की ओर मैं पहली बार जा रहा था. पर जाने क्यों सारा नज़ारा मुझे जाना-पहचाना लग रहा था. हालाँकि पिछले बीस वर्षों में इस इलाके का नक्शा ही बदल गया है. बेतरतीब इमारतें उ
 
Atmaram Sharma
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गड़े मुर्दे - 2

मंज़ूर एहतेशाम के चर्चित उपन्यास 'सूखा बरगद' के एक पात्र से मुलाकात) तमाम हिम्मत जुटाकर मैं कॉफी हाउस में घुसा. पहली मंज़िल के कोने वाली टेबल पर विजय और रशीदा बैठे थे. विजय वेटर से कुछ कह रहा था. जबकि रशीदा बड़ी-सी खिड़की के पार दिखते चमकदार शोरूमों में
 
Atmaram Sharma
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गड़े मुर्दे

मंज़ूर एहतेशाम के चर्चित उपन्यास 'सूखा बरगद' के एक पात्र से मुलाकात) कल अज़ब इत्तेफाक हुआ. न्यू मार्केट में गीताजी से मुलाकात हो गई. चौंकिए मत नाम सुनकर. ये वही गीताजी हैं जिन्हें आप मझधार में छोड़ आए - जैसा कि उन्होंने बताया. ज्यादा भूमिका बनाए बगैर मै
 
Atmaram Sharma
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अमीवा

सजता है उनका दरबार और उसमें होने को शामिल तरसते हैं सब. जैसे तरबूजे को देखकर तरबूजा बदलता है रंग, वैसे ही उनकी नज़रें-इनायतों की खातिर सभी लगे हैं अपना काया-कल्प करने में. वे कहते हैं हाँ तो सामूहिक स्वर हामी भरता है. उनकी ना को सभी अनुनासिक होकर स्वी
 
Atmaram Sharma
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रुटीन

हरेक अपने रुटीन का आदी होता है. यह बदलते ही छटपटाहट होती है. एक रुटीन के छूटते ही दूसरे को जमाने का प्रयास शुरू हो जाता है. लगातार एक जैसे काम नीरसता पैदा करते हैं और जोश में उन्हें बदलने की झोंक उठती है. एक बार जंगल में जानवरों की सभा हुई. सभी ने तय
 
Atmaram Sharma
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बड़ा आदमी : एक खुशफहमी

प्रसिध्द फिल्मी डॉयलाग है- 'एक दिन में बड़ा आदमी बनूँगा'. जबकि असल ज़िंदगी में बहुत कम लोग इसे इस तरह और इन शब्दों में कहते हैं. यही कारण है कि अधिसंख्य लोग आम आदमी हैं. हालाँकि आम आदमी होना कोई बुराई नहीं है और ना ही बड़ा आदमी बनना कोई महान उपलब्धि. यह
 
Atmaram Sharma
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सनातन भाष्य

ओ वाक् दुनियावी सच और इंसानी फितरतों की साक्षी हो तुम. मर्मांतक सच है यह शरीर का तुम आधा हिस्सा हो प्रेरणा देती हो पौरुष जागता है तुम्हारे ही दर्प से हिंस्र-पशु का उफनता है अहंकार और अंतत: मिट्टी में मिलता है. ओ देवी! प्रलय का कापालिक क्योंकर जगाती ह
 
Atmaram Sharma
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एक परीक्षा

वे जब कर रहे थे तैयारी एक परीक्षा देने की सैकड़ों अनजान थे ऐसी किसी परीक्षा की बाबत जो बदल देती है नज़रिया ज़िंदगी का. ऑंखें तो वे ही होतीं पर दृश्य के मायने बदल जाते हैं कान तो वैसे ही सुनते हैं पर अहसास जुदा होता है इक तंग घेरे से बड़े घेरे में धकेल दे
 
Atmaram Sharma
Dec 29 2009 11:53 AM
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नफरत के बीज

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली मेरी बेटी ने मुझे एक गाना सुनाया. मैंने सुना और हँस दिया. गाने पर आप भी गौर करें - (सुनो गौर से दुनिया वालो, बुरी नज़र न हम पर डालो, चाहे जितना ज़ोर लगा लो) की तर्ज पर गाना था - सुनो गौर से दुनिया वालो फटे दूध की चाय बना लो
 
Atmaram Sharma
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भरा-पूरा इंसान

उन्हें पढ़ते हुए अक्सर ही ईर्ष्यालु हो उठता हूँ कि देखो 94 साल के बुजुर्गवार किस कदर ज़िंदगी के मज़े उड़ा रहे हैं. रोज़ दो पेग शैम्पेन और बढ़िया स्कॉच पीते हैं. महिला-मित्रों और तमाम नामी लोगों के किस्से चटकारे लेकर लिखते हैं. दुनियाभर की खुशफ़हम बातें सुनाते
 
Atmaram Sharma
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कीमती संदर्भ

पिछले दिनों अथर्ववेद पर प्रख्यात विद्वान करपात्रीजी की टीका पढ़ रहा था। हालाँकि इस टीका में उन्होंने कहीं भी ऐसा दावा नहीं किया है कि अथर्ववेद की उनकी यह मौलिक व्याख्या है। टीका की भूमिका में - कवि न होऊँ, नहिं चतुर कहावउँ - वाली विनम्रता ही उजागर हो पाती
 
Atmaram Sharma
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अपराधबोध

जानकार ऐसा कहते हैं कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र विक्टोरियन अपराधबोध से पीड़ित है - एक ऐसी मानसिकता जो हमारे आचार-व्यवहार में दिखाई देती है, जो हमें उन्मुक्तता के साथ प्रदर्शित होने में बाधा बनती है. हमारा खान-पान, जीवनशैली सभी इससे संचालित होते हैं. हमा
 
Atmaram Sharma
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हिंदी के पारस पत्थर

मुझे उसके पिता के बारे में पता नहीं था, पर उसके भाई को मैं जानता था. बचपने में ही सही मैंने उस पर एक लम्बी कविता लिखी थी. उसे देख मैं आज भी गहरीर् ईष्या में डूबने-उतराने लगता हूँ. उसका लिखा हुआ कोई महान साहित्य होगा, स्वयं वह भी इस बात पर शायद ही इत्
 
Atmaram Sharma
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छबीली

उनके दफ्तर में उन्हें लेकर कई तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है. वे कब आती हैं, क्या करती हैं उनसे कोई नहीं पूछता. लेकिन उनकी काया बताती है कि ब्यूटीपॉर्लर वे नियमित जाती हैं. दिनोंदिन उनकी उमर घट रही है और कई बरस पहले दिखती प्रौढ़ता अब वे नाजुकता
 
Atmaram Sharma
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ओ पिता हमें क्षमा करना

आत्मा बेच आया हूँ और उदास हूँ ओ पिता हमें क्षमा करना. पूछो कितने में? तो सौदा बहुत सस्ता था अनमोल नगीना बेमोल बिक गया बेकीमत ही समझो चंद सुविधाएँ चंद बेफ्रिकी और महीने की पगार बस यही मोल था एक अदद ज़मीर का. आत्मा थी जागृत तो थीं तमाम दिक्कतें बेवजह उठ
 
Atmaram Sharma
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दोराहा

मूँग की बड़ी डालते समय उठा यह सवाल कि इसमें कद्दू डालें या लौकी वह थी अनजान मैं भी सिफर यह पहेली बूझने उसने अपनी सास को फोन लगाया वहाँ से उत्तर पाया जो ठीक लगे डालो साथ ही कहा चलो अच्छा है घर-गृहस्थी में मन तो लगा तुम्हारा पहेली अबूझी रही आयी और मुँह
 
Atmaram Sharma
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शव और शिव

अवमानना (अपमान) वह ताप है जो आपके भीतर छुपे विकारों को उकसाता है -- वे खौलने लगते हैं और परीक्षा की घड़ी तो तब आती है जब वे बाहर बगरने को आतुर हो जाते हैं. मज़ा यह कि अधिकतम लोग इस खौलते लावे को बाहर उगल देते हैं और सारी ऊर्जा व्यर्थ बह जाती है. कुछ
 
Atmaram Sharma
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एकालाप

अभी तक ज़िंदा है शरीर के भीतर एक और शरीर जो रोकता है टोकता है कटु-वचन बोलकर भर उठता है ग्लानि से अपकर्म करके करता है पश्चाताप पर-दुख-कातरता अभी भी बची है शेष मेरे-तेरे भेद को नहीं मानता यह ठीक है कि उसका जीवन बहुत कम शेष है लेकिन, निराश मत होओ मन क्य
 
Atmaram Sharma