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कुछ लम्हे

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13 Jun 2010
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""नर्म लिहाफ" "

"नर्म लिहाफ" सियाह रात का एक कतरा जब आँखों के बेचैन दरिया की कशमश से उलझने लगा बस वही एक शख्स अचानक मेरे सिराहने पे मुझसे आ के मिला मै ठिठक कर उसके एहसास को छुती टटोलती आँचल में छुपा रूह के तहखाने में सहेज लेती हूँ कुछ हसरतें नर्म लिहाफ में दुबके मचलने
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वक़्त की गर्द से परे

"वक़्त की गर्द से परे"वक़्त की गर्द से परेएक पल तुमको सुन लेतीतारो की आगोश में छिप परअक्स तुम्हारा मन में धर लेती प्रेम ठिठोली चंदा की अठखेली संग तुम्हारे अंक में भर लेती..एक पल तुमको सुन लेती..... नदिया की धारा जुगनु तारा प्रीत से बोझिल आलम साराशीत पवन
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"सीहोर में कुछ अनमोल और अविस्मरनीय पलो के एहसास. 8.05.2010...."

"एक ख्वाब जो मेरी इन आँखों ने देखा भी नहीं था, मगर सच हो गया " पद्मश्री बशीर बद्र , पद्मश्री बेकल उत्साही , डॉ रहत इन्दोरी , नुसरत मेहंदी , शकील जमाली , खुरशीद हैदर , अख्तर ग्वालियरी , शाकिर रजा, सिकन्दर हयात गड़बड़ , अतहर सिरोंजी , सुलेमान मजाज , जिया
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"मुझको पुकारे "

"मुझको पुकारे"झिलमिलाते दूर तक उजले सितारेऔर चाँद का आंचल थाम के देखोचल रहे नदीया के कीनारेपत्तो की खन खन कुछ कहना चाहेअलसाई पवन ले जब दरख्तों के सहारेऔर रात की बाँहों में मचले हैं देखोजगमगाते जुगनू ये सारेधुन्दले से साये अनजानी राहेकुछ गुनगुनाते ये
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"विरह के रंग (काव्य संग्रह)"

"विरह के रंग ""(काव्य संग्रह) ISBN: 978-81-909734-1-०"आज शिवना प्रकाशन के आदरणीय पंकज सुबीर जी के मार्गदर्शन के तहत "विरह के रंग"के साथ अपने पहले काव्य संग्रह को साकार रूप में देख हर्ष उल्लास और एक बैचनी का अनुभव कर रही हूँ." विरह का क्या रंग होता है ये
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"पल रिसता रहा"

"पल रिसता रहा"प्रेम पराकाष्ठा की परिधि कोजिस पल ने था पार कियावो शरमा के सिमट गया जिस में भराआक्रोश था, तकरार थीवो पल विद्रोह करचला गयाजिस ने सही क्रोध की पीड़ावो अश्रुओं संग क्षितिज में विलीन हुआविरह अग्नि में जो अभिशप्त हुआ और झुलस गया वो अभागा "पल
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"शब्द भी रोने लगे "

"शब्द भी रोने लगे "निष्प्राण ह्रदय के ज़ीने पे,अनुभूतियों के मानचित्रविद्रोह करअपना आस्तीत्व संजोने लगेविवश हो,अभिव्यक्तियों के काफिले भी साथ होने लगे......अश्को के नगीनेबिखर गयेदिल के मलालअनुबंधित हो करआक्रोश की तलहटी मेंएकत्रित होने लगे,"तब "भावाग्नी
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"बेवफाई को एक नया नाम "

"बेवफाई को एक नया नाम " मन की आहटों का एक नाजुक सफर था तेरे मेरे दरमियाँ ...... ना मुझे चाँद तारो की ख्वाईश ना तुम्हारी कोई फरमाईश न मुझ पे तेरी निगाहों का पहरा न तुझ पे मेरी कोई ज़ोर आजमाईश दोनों के पास ही तो उन्मुक्त आसमान था .... तेरी बेरुखी की खामोश
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"वक़्त की कोख में नहीं..."

"वक़्त की कोख में नहीं..."शाम ढले हीख़ामोशी के तहखानों मेंकुछ वादों के उड़ते से गुब्बारसमेट लेते हैं मेरे अस्तित्व कोऔर अनजानी ख्वाइशों की आंखेकतरा कतरा सिहरने लगती हैंऔर रात के आंचल की उदासीसूनेपन के कोहरे में सिमटअपनी घायल सांसो से उलझतीओस के सीलेपन से
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'मधुर एहसास "

मधुर एहसास " चंचल मन के कोने मे मधुर एहसास ने ली जब अंगडाई, रेशमी जज्बात का आँचल पर फैलाये देखो फलक फलक... खामोशी के बिखरे ढेरो पर यादों के स्वर्णिम प्याले से कुछ लम्हे जाएँ छलक छलक... अरमानो के साये से उलझे नाजों से इतराते ख़्वाबों को चुन ले चुपके से
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"वादों के पुष्प"

वादों के पुष्प" बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो मै आँचल यकीन का बिछाये उन्हें समेटती रही.... अपने स्पर्श की नमी से वो उन पुष्पों को जिलाता रहा मै मासूम शिशु की तरह उन्हें सहेजती रही...... हवाओं को रंगता रहा वो इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से मै बंद पलक
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"होली की शुभकामनाये "

होली की शुभकामनाये " रंग उडाये पिचकारी रंग से रंग जाये दुनिया सारी होली के रंग आपके जीवन को रंग दे, ये शुभकामनाये है हमारी..... पिचकारी की धार गुलाल की बौछार अपनों का प्यार यही है होली का त्यौहार Subscribe to kuchlemhe by Email
Dec 29 2009 11:50 AM
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"तुम चाहो तो"

तुम चाहो तो" एक अधूरे गीत का मुखडा मात्र हूँ, तुम चाहो तो छेड़ दो कोई तार सुर का एक मधुर संगीत में मै ढल जाऊंगा ...... खामोश लब पे खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ तुम चाहो तो एक नाजुक स्पर्श का बस दान दे दो एक तरल धार बन मै फिसल जाऊंगा...... भटक रहा बेजान र
Dec 29 2009 11:50 AM
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"ख्वाबो की बरसाते बुनती हुं"

ख्वाबो की बरसाते बुनती हुं" रात के पहरों की सोगातें चुनती हुं उलझे से ख्वाबो की बरसाते बुनती हुं घुप अँधियारा , नींद उचटती , करवट करवट रूह तडपती, दीवारों की गुप चुप आवाजे सुनती हुं उलझे से ख्वाबो की बरसाते बुनती हुं छत पर सरकते धुंधले साये अनबुझ आक्र
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" मन की ओस की गर्म बुँदे "

मन की ओस की गर्म बुँदे " एक लम्हा जुदा होने से पहले, उँगलियों के पोरों के आखिरी स्पर्श का वही पे थम जाता तेरा एहसास बन मुझ में समा जाता अपनी पूर्णता के साथ मै कुछ देर और जी लेती.... Subscribe to kuchlemhe by Email
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मौन करवट बदलता नहीं

मौन करवट बदलता नहीं " शब्द कोई गीत बनकर अधरों पे मचलता नही सुर सरगम का साज कोई जाने क्यूँ बजता नहीं..... बाँध विचलित सब्र के हिचकियों मे लुप्त हो गये , सिसकियों की दस्तक से भी, द्वार पलकों का खुलता नहीं.... रीती हुई मन की गगरिया, भाव शून्य हो गये, खा
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"किस्मत का उपहास"

किस्मत का उपहास" हर बीता पल इतीहास रहा, जीना तुझ बिन बनवास रहा ये चाँद सितारे चमके जब जब इनमे तेरा ही आभास रहा चंचल हुई जब जब अभिलाषा, तब प्रेम प्रीत का उल्लास रहा, तेरी खातिर कण कण पुजा पत्थरों में भगवन का वास रहा विरह के नगमे गूंजे कभी कभी सन्नाटो
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं" झिलमिलाते दीपो की आभा से प्रकाशित , ये दीपावली आप सभी के घर में धन धान्य सुख समृद्धि और इश्वर के अनंत आर्शीवाद लेकर आये. दीप मल्लिका दीपावली -समस्त ब्लॉग परिवार के लिए सुख, समृद्धि, शांति व धन-वैभव दायक हो॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ इसी
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तुम चुपके से आ जाना

तुम चुपके से आ जाना " सूरज जब मद्धम पड़ जाये और नभ पर लाली छा जाये शीतल पवन का एक झोंका तेरे बिखरे बालों को छु जाए चंदा की थाली निखरी हो तारे भी सो कर उठ जाए चोखट की सांकल खामोशी से निंदिया की आगोश में अलसाये बादल के टुकड़े उमड़ घुमड़ द्वारपाल बन चोक्
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"याद तो फिर भी आओगे "

"याद तो फिर भी आओगे " ह्रदय के जल थल पर अंकित बस चित्र धूमिल कर जाओगेयाद तो फिर भी आओगे हंसना रोना कोई गीत पुरानासुर सरगम का साज बजानाशब्द ताल ले जाओगेयाद तो फिर भी आओगे सुनी राहे, दिल थाम के चलनासाथ बिताये पलो का छलनासब खाली कर जाओगेयाद तो फिर भी आओगे
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Sep 15 2009 03:53 PM
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"धरातल की थालियाँ"

"धरातल की थालियाँ"नैनो के पलक द्वार परदस्तक देती रही सिसकियाँकांपते अधर बोल ना पाएअंगारे बन धधकती रही हिचकियाँ तेरे दर्श का मेघ आकरप्रत्यक्ष में बरसा नहींशून्य के प्रचंड प्रहार सेबुझ गयी आशाओं की दिप्तियाँ यथार्थ के धरातल की थालियाँशोर कर चोकन्नी हो
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जब कश्ती लेकर उतरोगे

"जब कश्ती लेकर उतरोगे "झील के कोरे दामन पे,चन्दा की उजली किरणों सेचाहत का अंश है मैंने लिख डालाथाम के ऊँगली प्रियतम कीदुनिया की नज़रों से छुप करमुझे नभ के पार है उड़ जानातारो को झोली में भर करतेरे प्यार के बहते सागर मेंदूर तलक है तर जानाजब कश्ती लेकर
Aug 17 2009 07:05 AM
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"बरसात हो"

"बरसात हो" "काश" आज फ़िर ऐसी झूम के बरसात हो ,उनसे फ़िर एक हसीन दिलकश मुलाकात हो ,इस कदर मिलें तड़प के दो दिल आज की,धरकनो पे न कोई अब इख्त्यार हो ….. एक एक बूंद से सजी सारी कायनात हो ,आगोश मे फ़िर मेरी शरीके -हयात हो ,खामोश लबों की दास्ताँ मौसम भी सुने
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"अंतर्मन"

"अंतर्मन" अंतर्मन की ,विवश व्यथित वेदनाएं धूमिल हुई तुम्हे भुलाने की सब चेष्टाएँ,मौन ने फिर खंगालाबीते लम्हों के अवशेषों कोखोज लाया कुछ छलावे शब्दों के,अश्कों पे टिकी ख्वाबों की नींव,कुंठित हुए वादों का द्वंद ,सुधबुध खोई अनुभूतियाँ ,भ्रम के द्वार परपहरा
Aug 03 2009 07:05 AM
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"तेरे जाने के बाद"

तेरे जाने के बाद" आँखों मे जलजले , मरुस्थल दिल की जमीन . भावनाओ की साजिश , संभावनाओ का जलना . धधकते अंगारों से पल, दर्द का विकराल रूप , म्रत्यु से द्वंद , पथराये जिस्म का गलना . तेरे जाने के बाद...... Subscribe to kuchlemhe by Email
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"मौन जब मुखरित हुआ "

मौन जब मुखरित हुआ " मौन जब मुखरित हुआ और सुर मे आने लगा, प्रियतम तेरी यादो का झरना फुट फुट जाने लगा.. भूली बिसरी बातो के सोए खंडहर सहसा जाग उठे, पीडा के बोझ से दबा हर पल लड़खाने लगा... बिखरे हुए संबंधो की कडियाँ छोर भी न कोई पा सकी, अपनत्व का आस्तित्
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"अपनों का साया "

आज फिर आप सब के बीच अपने को देख पाना बडा ही सुखद एहसास है. आदरणीय ताऊ जी और अरविन्द मिश्र जी की दिल से आभारी हूँ जिन्होंने मेरी अस्वस्थता को अपने ब्लॉग पर स्थान देकर मेरे लिए इस ब्लॉग परिवार के हर सदस्य से मंगल कामनाओ का एक वीशाल भंडार अर्जित किया. उ
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तड़पने की दरखास्त

तड़पने की दरखास्त" कागज की सतह पर बैठ लफ्जो ने जज्बात से तड़पने की दरखास्त की है विचलित मन ने बेबस हो प्रतीक्षा की बिखरी किरचों को समेट बीते लम्हों से कुछ बात की है.. यादो के गलियारे से निकल ख्वाइशों के अधूरे प्रतिबिम्बों ने रुसवा हो उपहास की बरसात क
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"आदि ”

आदित्य रंजन (आदि ) के पहले जन्म दिवस पर असीम स्नेह प्यार , आशीर्वाद और ढेरो दुआओं के साथ ये कुछ पंक्तियाँ आज आदि के नाम.... "आदि ” हम सब की दुआओं का आदि तुम कुछ ऐसे फल पाना इश्वर के हर आशीर्वाद का तु म एक हिस्सा बन जाना थाम के ऊँगली बाबा की और माँ के
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"बारिशों ने घर बना लिए "

बारिशों ने घर बना लिए " यादे तेरी अश्रुविहल हो असहाय कर गई आँखों मे कितनी बारिशों ने घर बना लिए गूंजने लगा ये मौन तुझको पुकारने लगा व्यथित हो सन्नाटे ने भी सुर से सुर मिला लिए बिखरने लगे क्षण प्रतीक्षा के अधैर्य हो गये टूटती सांसो ने दुआओं मे तेरे ही
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निरूतर लौटे संदेश सभी

निरूतर लौटे संदेश सभी " सुनी लगती है ये धरती... अगन ये नभ बरसाता है तुमको खोजे कण कण मे ये मन उद्वेलित हो जाता है... अरमानो के पंख लगा एक स्पर्श तुम्हारा पाने कों सेंध लगा रस्मो की दीवारों मे दिल बैरागी हो जाता है..... हर आस सुलगने लगती है उम्मीद बोर
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"वक़्त की लाचारी"

वक़्त की लाचारी" हाँ वो लाचार वक़्त हूँ मैं छटपटाता हुआ बदहवास सा ठहरा हूँ मै तब से दो दिलो के वादों का साक्ष्य बना था जब से व्याकुल हो विरह में अश्कों में डुबे सिसकते एक दिल न कहा था " जब अंत समय आये और ये सांसे बोझ बन जाये एक बार मुझसे कह देना मै भ
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"कैसे जान पाओगे"

कैसे जान पाओगे" खामोश खडे हैं स्वर ये सारे शब्द बेबस हैं नजर चुराने को ऑंखें भी प्रतिज्ञाबद्ध हो रही अश्को को कोरो तले छुपाने को भाव भंगिमा ने श्रृंगार कर लिया दाग-ऐ-दर्द मिटाने को हरकते भी चंचल हो गयी कुछ झूठी उमंग लहर दर्शाने को बोझिल होकर अधरों ने
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अश्कों का दिया

अश्कों का दिया" रात गमगीन रही दिल वीरान रहा कितना खामोश ये आसमान रहा सिसकियों की सरगोशियाँ उफ़ "अश्कों का दिया " अंधेरों मे मेहरबान रहा Subscribe to kuchlemhe by Email
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अश्कों का दिया

अश्कों का दिया" रात गमगीन रही दिल वीरान रहा कितना खामोश ये आसमान रहा सिसकियों की सरगोशियाँ उफ़ "अश्कों का दिया " अंधेरों मे मेहरबान रहा Subscribe to kuchlemhe by Email
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'मधुर एहसास "

मधुर एहसास " चंचल मन के कोने मे मधुर एहसास ने ली जब अंगडाई, रेशमी जज्बात का आँचल पर फैलाये देखो फलक फलक... खामोशी के बिखरे ढेरो पर यादों के स्वर्णिम प्याले से कुछ लम्हे जाएँ छलक छलक... अरमानो के साये से उलझे नाजों से इतराते ख़्वाबों को चुन ले चुपके से
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"वादों के पुष्प"

वादों के पुष्प" बिखेरता रहा वादों के पुष्प वो मै आँचल यकीन का बिछाये उन्हें समेटती रही.... अपने स्पर्श की नमी से वो उन पुष्पों को जिलाता रहा मै मासूम शिशु की तरह उन्हें सहेजती रही...... हवाओं को रंगता रहा वो इन्द्रधनुषी ख्वाबो की तुलिका से मै बंद पलक
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"होली की शुभकामनाये "

होली की शुभकामनाये " रंग उडाये पिचकारी रंग से रंग जाये दुनिया सारी होली के रंग आपके जीवन को रंग दे, ये शुभकामनाये है हमारी..... पिचकारी की धार गुलाल की बौछार अपनों का प्यार यही है होली का त्यौहार Subscribe to kuchlemhe by Email
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"तुम चाहो तो"

तुम चाहो तो" एक अधूरे गीत का मुखडा मात्र हूँ, तुम चाहो तो छेड़ दो कोई तार सुर का एक मधुर संगीत में मै ढल जाऊंगा ...... खामोश लब पे खुश्क मरुस्थल सा जमा हूँ तुम चाहो तो एक नाजुक स्पर्श का बस दान दे दो एक तरल धार बन मै फिसल जाऊंगा...... भटक रहा बेजान र
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"झील को दर्पण बना "

झील को दर्पण बना" रात के स्वर्णिम पहर में झील को दर्पण बना चाँद जब बादलो से निकल श्रृंगार करता होगा चांदनी का ओढ़ आँचल धरा भी इतराती तो होगी... मस्त पवन की अंगडाई दरख्तों के झुरमुट में छिप कर परिधान बदल बदल मन को गुदगुदाती तो होगी..... नदिया पुरे वेग