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07 Jun 2010
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माओवादी हिंसा के मौन समर्थक

माओवादी हिंसा ने देश को एक 'गंभीर संकट' में डाल दिया है। उनकी तरफ से आए दिन होने वाले हिंसात्मक हमले साबित करते हैं कि माओवादी अपनी वैचारिकता को छोड़ घृणास्पद हिंसा के रास्तों पर हैं। वे बेकसूरों को मार रहे हैं। रेल की पटरियां उखाड़-उड़ा रहे हैं। बंद
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मीडिया के मुकाबले साहित्य बहुत सुस्त है

मीडिया के लिए साहित्य जरूरी नहीं। साहित्य से मीडिया परहेज करता है। मीडिया को हर पल अपने आसपास सनसनी की तलाश रहती है पर साहित्य में सनसनी जैसा कुछ नहीं होता। मीडिया में सबकुछ बहुत तेजी से चलता और बदलता रहता है मगर साहित्य में बदलाव न के बराबर होते हैं। कह
 
अंशुमाली रस्तोगी
May 24 2010 10:40 AM
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जातिवाद को बढ़ाएगी जाति आधारित जनगणना

सरकार नहीं चाहती कि जाति का वर्चस्व खत्म हो। समाज का जातियों में विभक्त बने रहना उसे भला लगता है। वो चाहती है कि समाज में व्यक्ति को उसके नाम से नहीं जाति से ही जाना-पहचाना जाए। जातियां रहेंगी तो सरकार की राजनीति का रसूख भी बना रहेगा। हम जानते हैं कि देश
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आखिर क्यों जातियां टूट नहीं पातीं?

जातियां अब भी टूटी नहीं हैं। बनी हुई हैं। हर धर्म में। हर समाज में। और हर व्यक्ति के भीतर। जातियों को तोड़ने के अब तक जो भी प्रयास किए गए वे नाकाफी ही साबित हुए। आए दिन कोई न कोई ऐसी खबर हमारे बीच से होकर गुजर ही जाती है कि कहीं कोई जातिय-दंभ का शिकार
 
अंशुमाली रस्तोगी
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नक्सलवाद विचारधारा है ही नहीं

नक्सलवाद सिर्फ सरकार के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी खतरनाक बनता जा रहा है। यह हकीकत है कि कैसी भी हिंसा या विचारधारा का पहला शिकार जनता ही होती है। सरकार की भूमिका तो महज अपनी बयानवाजी को निभाने के लिए रहती है। नक्सलवाद ने अपना पहला असर समाज और आम
 
अंशुमाली रस्तोगी
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लिव-इन-रिलेशनशिप बनाम समाज

समाज यह नहीं चाहता। समाज वो नहीं चाहता। समाज को यह पसंद है। समाज को वो पसंद नहीं। समाज यह कह सकता है। समाज वो कह सकता है। क्या आपको नहीं लगता कि समाज अकसर तानाशाह जैसा हो जाया करता है? क्या आपको नहीं लगता कि समाज हमारी निजी जिंदगी में बहुत ज्यादा दखल
 
अंशुमाली रस्तोगी
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ओह! पुरस्कार ठुकरा दिया, अरे यह क्या गजब किया कविवर?

खबर है कि हिंदी साहित्य के एक बड़े कवि ने एक बड़े साहित्यिक पुरस्कार को ठोकर मार दी है। पुरस्कार को ठोकर और वो भी हिंदी के साहित्यकार द्वारा, बात कुछ हजम नहीं हुई। मेरे विचार में बड़े कवि ने बड़ा पुरस्कार ठुकराकर अच्छा नहीं किया। जैसे-तैसे जोड़-जुगाड़
 
अंशुमाली रस्तोगी
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हाय हुसैन! तुम भारतीय नागरिक न हुए

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस अधिकार और हथियार को थामे हमारा प्रगतिशील तबका हर वक्त तैयार रहता है, किसी को भी सबक सिखाने के लिए। तर्क पास न होने के वाजूद भी तर्क गढ़ता है ताकि उसकी प्रगतिशील नाक ऊंची रह सके। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर प्रगतिशील
 
अंशुमाली रस्तोगी
टैग: विवाद
Mar 02 2010 01:25 PM
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लेडीज क्लब की अवधारणा के बहाने

शायद ही कोई दिन ऐसा खाली गुजरता हो जिस दिन शहर के किसी लेडीज क्लब की खबर, महिलाओं की तस्वीरों के साथ, अखबार में न छपती हो। लेडीज क्लब से जुड़ी सभी महिलाएं किसी न किसी ऐलिट वर्ग से आती हैं। न चाहते हुए भी, जब भी, उनकी खबरों पर मेरी निगाह गई है, उनमें कोई
 
अंशुमाली रस्तोगी
Feb 24 2010 11:31 AM
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बातों का बतरस

बातें बहुत हैं। हर तरह की हैं। जितने लोग उतनी बातें। हमारे मध्य बातों का एक साम्राज्य-सा विकसित होता जा रहा है। लोगों को बस बातें चाहिए। कैसी भी। कहीं की भी। कहीं से भी। किसी से भी। बातों से हम बातचीत करना सीखते हैं। बातें संवाद का जरिया भी हैं। बातचीत
 
अंशुमाली रस्तोगी
Feb 20 2010 10:07 AM
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अगर भूत से मुलाकात हुई तो...

ऐसा लोग कहते हैं कि भूत होते हैं। काले। नीले-पीले। रंग-बिरंगे। दैत्याकार। वहशी। प्रायः परेशान ही करते हैं। बनते काम को बनने नहीं देते। व्यक्ति का जीना मुहाल कर देते हैं। किसी पर अगर भूत का साया पड़ जाए या तो वो पागल हो जाता है या फिर दुनिया से ही विदा हो
 
अंशुमाली रस्तोगी
टैग: बतरस
Feb 11 2010 10:44 AM
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मैं भी बिकना चाहता हूं

मैं बिकना चाहता हूं। न न इसे मजाक न समझें। वाकई मैं बिकना चाहता हूं। बिककर बिकने का सुख भोगना चाहता हूं। देखना और महसूस करना चाहता हूं कि आखिर कैसा लगता है बिककर!वैसे खुद को बेचने का ख्याल मेरे मन में काफी दिनों से है। बस, मेरी संवेदनाओं और लोक-लाज का भय
 
अंशुमाली रस्तोगी
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क्यों नहीं लिखतीं महिलाएं व्यंग्य?

पिछले कई दिनों से ये प्रश्न मेरे दिमाग में उथल-पुथल मचा रहे हैं कि महिलाएं व्यंग्य क्यों नहीं लिखतीं? व्यंग्य लेखन में पुरुषों का ही दबदबा क्यों बना रहता है? लेखन के जिन खांचों के भीतर रहकर महिलाएं लिखती हैं, उनमें स्त्री-विमर्श तो हर कहीं मौजूद है,
 
अंशुमाली रस्तोगी
टैग: बहस
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कहीं यह जसवंत सिंह का श्राप तो नहीं!

क्या यह कह और मान लिया जाए कि जसवंत सिंह का 'श्राप' भारतीय जनता पार्टी को धीरे-धीरेकर सता रहा है। हालांकि जसवंत सिंह ने मीडिया में कभी अपने श्राप की चर्चा नहीं की मगर आहत दिल से उन्होंने भाजपा को श्राप अवश्य ही दिया होगा। ऐसे कयास लगाए जा सकते हैं। र
 
अंशुमाली रस्तोगी
Dec 29 2009 11:47 AM
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नए चेहरों के साथ कितना बदल पाएगा भाजपा का चाल और चरित्र

अंततः लालकृष्ण आडवाणी युग का अंत भारतीय जनता पार्टी से हो ही गया। आडवाणी अब से भाजपा के लिए कुछ नहीं हैं; ठीक अटल बिहारी वाजपेई की तरह। पार्टी के भीतर-बाहर अब लालकृष्ण आडवाणी का नाम कम ही सुना-बोला जाएगा। दरअसल, यह समय की निर्ममता है कि वो किसी व्यक्
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मीडिया का हेडली प्रसंग

इन दिनों मीडिया में हेडली-प्रसंग जोरों पर है। मीडिया अपनी हर खबर में 'हेडली का सच' हमें दिखा-बता रहा है। हेडली कहां गया। हेडली कहां से आया। हेडली कहां रहा। हेडली ने क्या खाया। हेडली ने कितनी दफा सांस ली-छोड़ी। हेडली की हैसियत क्या है। हेडली कैसा लगता
 
अंशुमाली रस्तोगी
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अश्लीलता और आंखें

पता नहीं लोग कैसे कह देते हैं कि अश्लीलता समाज के लिए खतरा है! अश्लीलता देखने से बच्चे बिगड़ते हैं। अश्लील साहित्य दिमाग में गंदगी भर देता है। अश्लीलता से यह होता है। अश्लीलता से वो होता है। अश्लील चीजों व बातों पर पाबंदी लगनी चाहिए। जिसे देखो वो अश्
 
अंशुमाली रस्तोगी
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भाषा रहेगी तो हम भी रहेंगे

यह कहीं किसी दूसरे देश में हुआ होता तो बात समझी जा सकती थी परंतु यह सब अपने 'लोकतांत्रिक देश' में हुआ तो शर्म नहीं घृणा होती है। घृणा होती है क्षुद्र राजनीति से। घृणा होती है भाषाई हिटलरशाही से। घृणा होती है अलोकतांत्रिक वर्चस्व से। घृणा होती है क्षे
 
अंशुमाली रस्तोगी
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हिंदुस्तान में सब भ्रष्ट हैं!

सुप्रिम कोर्ट के जज मार्कंडेय काटजू ने भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि 'हिंदुस्तान में सब लोग भ्रष्ट हैं। ये भ्रष्टाचार कभी ठीक नहीं हो सकता। मेरा वहम था कि मैं भ्रष्ट लोगों को ठीक कर सकता हूं। अब मैं समझ गया कि भ्रष्ट लोगों को ठीक करने का क
 
अंशुमाली रस्तोगी
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अगले जन्म मोहे कछुआ ही कीजौ

कछुए से मैं खासा प्रभावित हूं। इस धरती पर कछुआ ही मुझे सबसे समझदार और बेखौफ जीव लगता है। लड़ाई-झगड़े से दूर प्रायः शांत रहने वाला। कछुआ किसी दंद-फंद में इसलिए नहीं पड़ता क्योंकि उसे मालूम है कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आप उसके खिलाफ कुछ भी कहते
 
अंशुमाली रस्तोगी
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ईमानदार राजनीति के नेता!

नेताओं के प्रति मेरी सोच बेहद ईमानदार रही है। मैं नेताओं की ईमानदारी की कद्र करता हूं। धरती पर नेताओं के अतिरिक्त मुझे कोई भी ईमानदार नजर नहीं आता। हमारे देश की राजनीति का डंका देश-विदेश में सिर्फ हमारे नेताओं की 'ईमानदार छवि' के कारण ही बज रहा है। ह
 
अंशुमाली रस्तोगी
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आतंकवाद की भट्टी में झुलसते पाकिस्तान का खुदा ही मालिक

पाकिस्तान अपने ही बुने जाल में फंसता जा रहा है। पाकिस्तान में घोर अशांति का माहौल है। बिना लोकतंत्र का पाकिस्तान असहाय नजर आ रहा है। अब तक अमेरिका की मदद से जिस आतंकवाद को पाकिस्तान पालता-पोसता रहा आज वही उसके गले ही हड्डी बन गया है। पाकिस्तान में सर
 
अंशुमाली रस्तोगी
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समृद्धि का प्रतीक सेंसेक्स

सेंसेक्स हमारा देवता है। हमारा दोस्त है। हमारी सुख-समृद्धि का प्रतीक है। सेंसेक्स की सफलता में हमारा औद्योगिक विकास निहित है। हम केवल सेंसेक्स के सहारे ही विकसित व विकासशील होने का सपना देख सकते हैं। अब तो सरकार ने भी यह मान लिया है कि सेंसेक्स की सं
 
अंशुमाली रस्तोगी
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चांद से ऊंचा सेंसेक्स

उम्मीद है, इस दफा सेंसेक्स की दीवाली ठीक-ठाक मनेगी। मंदी के गम से ऊबरता सेंसेक्स प्रसन्न लग रहा है। दलाल पथ पर चहलकदमी बढ गई है। औद्योगिक विकास दर में इजाफा हो रहा है। वित्तमंत्री के चेहरे पर विकास की चमक है। हालांकि महंगाई के दाग को सरकार और वित्तमं
 
अंशुमाली रस्तोगी
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बोफोर्स कांड : आखिर बड़ी मछली को बचा ही लिया

राजनीतिक जमीन पर खड़े होकर किसी बयान को देना बहुत आसान काम है। नेता या मंत्री राजनीतिक बयान देने से पहले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि वो नेता या मंत्री पहले हैं; जन-सेवक बाद में। यह हकीकत है कि नेता जन-सेवक केवल वोट पाने के लिए बनता है, जन के लिए नही
 
अंशुमाली रस्तोगी
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पत्नी की मांग : चांद पर बसेरा

चांद पर पानी की पुष्टि।पत्नी इस खबर पर बेहद उत्साहित है। धरती पर रहकर उक्ता गई पत्नी को अब चांद पर बसेरा चाहिए। मुझसे जिरहा शुरू हो गई है कि अब हम चांद पर ही रहेंगे। चांद पर रहना सुखद रहेगा। न वहां पानी की किल्लत होगी न गर्मी का एहसास। माहौल हर पल
 
अंशुमाली रस्तोगी
Sep 26 2009 11:30 AM
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कोशिश करें भ्रष्टाचार की पुरानी परंपरा जीवित रह सके

स्थिति गंभीर है। सरकार भ्रष्टाचार पर सख्त हो रही है। भ्रष्टाचार समान पुरानी परंपरा पर खतरा बढ़ गया है। इससे बड़ी मच्छलियां दिक्कत में आ सकती हैं। न जाने सरकार को क्या हो गया है, भ्रष्टाचार के पीछे ही पड़ गई है। बेचारे भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार की आड़ में
 
अंशुमाली रस्तोगी
Sep 15 2009 01:36 PM
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क्या इतिहास के बासी पाठों को पढ़ना हमारी मजबूरी है?

क्या जिन्ना-राग देश में व्याप्त सूखे और महंगाई के कहर से कहीं ज्यादा जरूर है? क्या यह कब्र में दफन जिन्ना के कंकाल को पुनः बाहर निकालने का प्रयास तो नहीं? क्या आत्महत्या करते किसानों के दर्द से कहीं ज्यादा जरूरी है जिन्ना-प्रेम? क्या राजनीति में मुद्दे
 
अंशुमाली रस्तोगी
Sep 09 2009 01:02 PM
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यहां विचारधारा नहीं व्यक्तिविशेष ही सबकुछ

भारतीय जनता पार्टी में न असहमतियों न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कहीं कोई जगह है। वहां दोनों ही चीजें एकदम हाशिए पर हैं। भाजपा का चाल, चरित्र और चेहरा खासा फासीवादी है। वहां न किसी को सुना जाता है न ही समझा। यह पार्टी बस कुछ वरिष्ठों के
 
अंशुमाली रस्तोगी
Aug 24 2009 01:22 PM
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ज से जसवंत ज से जिन्ना

इन दिनों राजनीति और बुद्धिजीवियों के बीच दो 'ज' बेहद महत्वपूर्ण बने हुए हैं। एक ज हैं जसवंत और दूसरे ज हैं जिन्ना। जसवंत और जिन्ना पर राजनीति गर्म है। गर्म तवे पर हर कोई अपने हाथ तापने को बेताव बैठा है। पर हाथ जले नहीं, इसका खास ख्याल रखा जा रहा है।असफोस
 
अंशुमाली रस्तोगी
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स्वाइन फ्लू की टीआरपी से ग्रस्त मीडिया

इस समय मीडिया का सारा ध्यान स्वाइन फ्लू पर केंद्रित है। हर चैनल स्वाइन फ्लू पर अपनी 'ब्रेकिंग न्यूज' दिखा रहा है। बेक्रिंग न्यूज भी ऐसी की भला-चंगा आदमी भी दहशत में आ जाए। चैनलों पर स्वाइन फ्लू का चैबीस घंटे का प्रसारण हमें सोचने पर मजबूर कर देता है कि
 
अंशुमाली रस्तोगी
Aug 11 2009 12:11 PM
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'मजबूरी' है इसीलिए तो प्रेमचंद को याद करते हैं!

आज हम प्रेमचंद को याद कर रहे हैं। याद इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मजबूरी है। मजबूरी यह है कि आज प्रेमचंद जयंती है। आपको पता होना चाहिए कि धारा के विरूद्ध चलने वालों को मजबूरी में ही याद किया जाता है। यही कारण है कि हमें न तो हंसराज रहबर याद आते हैं न ही
 
अंशुमाली रस्तोगी
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मुसीबत का मारा, बेचारा सच

इन दिनों सच मुसीबत में है। भीषण मुसीबत में। मुसीबत है कि दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। लोग सच पर सवाल उठाने लगे हैं। शक करने लगे हैं। सच को गरियाया जा रहा है। मीडिया से लेकर आम जन तक हर कोई हर कहीं सच से 'सच' जानना चाहता है। सच पर दवाब बढ़ता जा रहा है।
 
अंशुमाली रस्तोगी
Jul 24 2009 11:06 AM
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समीक्षक बोले तो, मिठाई की दुकान चलाने वाला हलवाई

आप मानें या न मानें लेकिन हिंदी साहित्य में जो लोग अच्छे लेखक या साहित्यकार न बन सके, वे अंततः समीक्षक बन गए। हिंदी साहित्य में समीक्षक की स्थिति ‘मिठाई की दुकान चलाने वाले हलवाई’ के समान होती है। जिस प्रकार हलवाई अपनी दुकान में, ग्राहकों के लिए, तरह
 
अंशुमाली रस्तोगी
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जहां पुरस्कार, वहां क्रांति

साहित्य में क्रांतियां होती रहती हैं। यह कोई नयी या अनोखी बात नहीं। यहां क्रांतियां आसानी से इसलिए भी हो जाया करती हैं, क्योंकि यहां बड़े-बड़े साहित्यिक क्रांतिकारी मौजूद हैं। हर साहित्यिक क्रांतिकारी की अपनी क्रांति है। इनकी क्रांतियों की दास्तानें
 
अंशुमाली
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माइकल जैकसन और हिंदी के साहित्यकार

माइकल जैकसन का साहित्य से कोई मतलब नहीं था। माइकल ने कभी साहित्य को पढ़ा या समझा भी था, ऐसी कोई जानकारी हमें मिलती भी नहीं। अब तक माइकल जैकसन पर जितना भी कुछ टी. वी. या अखबारों में आया है, उसे सिर्फ एक महान गायक और डांसर के रूप में ही याद किया गया है
 
अंशुमाली
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जिन्हें महिलाओं के पहनावे पर ऐतराज है

कुछ लोग बहस से इसलिए कतराते हैं, क्योंकि उन्हें अपने नंगे होने का डर लगा रहता है। बहस में तर्क भी होते हैं वितर्क भी। मगर उन तंग-दिमाग लोगों के पास न तर्क होते हैं न वितर्क। बहस उन्हें आतंकित करती है। वे दूसरों पर खुलना नहीं चाहते। बंधनों को तोड़ने स
 
अंशुमाली
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क्या बिखराव भाजपा को खत्म कर देगा?

भाजपा गहरे संकट में है। संकट हैं कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे। अभी लोकसभा चुनावों में मिली 'करारी हार' का संकट टला नहीं कि संगठन के भीतर अपने ही अपनों से लड़-झगड़कर उसे और संकटग्रस्त करने पर तुले हैं। भाजपा के भीतर व्याप्त कलह अब खुलकर सामने आ
 
अंशुमाली
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सुख-सुविधा का हिंदी साहित्य और महान साहित्यकार

हमारा हिंदी साहित्य काफी सुविधा-संपन्न है। यहां हर साहित्यकार ने अपने साहित्यिक-कर्म को विशेष सुविधाओं में बांट रखा है। अगर साहित्यकार बड़ा और ख्याति-प्राप्त है तो कहना ही क्या। फिर उसे कुछ करने की अवश्यकता नहीं। चेले हैं न। चेले उसकी सुविधा का ख्याल
 
अंशुमाली
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नेता कभी नहीं हारते

यह सब आपकी खुशफहमी है कि नेता चुनाव हार जाते हैं। जबकि नेता कभी चुनाव नहीं हारते। जिसे आप और हम उनकी हार समझते हैं, दरअसल वो उनकी 'अप्रत्यक्ष जीत' होती है। यह अप्रत्यक्ष जीत उनका हर पल मनोबल बढ़ाती रहती है। उन्हें दिल, दिमाग और शरीर से मजबूत करती रहत
 
अंशुमाली