Snehanchal's Image
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
31 Dec 2009
कुल प्रविष्टियां
20
पाठक भेजे
588
पसंद
13
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
29.40
पसंद करें
0
नापसंद करें

आप से आंखें हमारी लड़ गईं

आप से आंखें हमारी लड़ गईं; दिन हुए छोटे कि रातें बढ़ गईं। ज़िदगी की ओढ़नी पर प्रेम की; बूटियां कितनी न जाने कढ़ गईं। खिल उठी मन की कली मधुमास में; पत्तियां सूखी हुई सब झड़ गईं। ज़िंदगी में आप की परछाइयां; इंद्रधनुषी चित्र कोई जड़ गईं। अब न आंखों को ल
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

शत्रु का मुख मोड़ना भी जानते हैं

हम अहिंसा के पुजारी हैं मगर अवसर पड़े तो; शस्त्र लेकर शत्रु का मुख मोड़ना भी जानते हैं। मन-कलश से प्रेम का पीयुष छलकता है सदा पर; विष भरी गागर घृणा की फोड़ना भी जानते हैं। धर्म को माना नहीं है राष्ट्र का आधार हमने; विश्व को बाँटा सदा ही प्यार का उपहा
 
Hemant Snehi
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

शाम नहीं ठहरी

फिसली सुर्ख सुबह मुट्ठी से,रुकी न दोपहरी; लाख मनाया पर निर्मोही शाम नहीं ठहरी । सिमट गयी सांसों में लाखों सूरज की गरमी; चुभने लगी बदन में रजनीगंधा की नरमी; दिन बीता उथला-उथला पर रात हुई गहरी। फिसली सुर्ख सुबह मुट्ठी से, रुकी न दोपहरी। यादें जागी-जागी
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

मन की बात

फूल अपने हृदय का खिल जाए; चाक दामन भी हो तो सिल जाए; और कुछ चाहिए न फिर मुझको; स्नेह यदि साथियों का मिल जाए। आरज़ू ये नहीं कि छा जाएं; चाहते बस यही कि भा जाएं; ज़िंदगी हो गई सफल समझो; काम गर हम किसी के आ जाएं। तुम कहीं और हम कहीं होंगे; किंतु दिल से
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

वर्ष, महीने और दिन

वर्ष, महीने और दिन, सदियाँ और पल-छिन, आते हैं और जाते हैं, बहुत कुछ हम पाते हैं, लेकिन, सब कुछ है बेकार, न मिले यदि अपनों का प्यार। सह सकते हैं हम हर अभाव, बस, न मिले किसी सम्बन्ध के टूटने का घाव। -हेमन्त 'स्नेही' *
 
Hemant Snehi
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ (बालगीत)

मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ। बढ़िया सी पिकनिक कर आएँ। बात चाँद की बड़ी निराली, लगता है अमृत की प्याली, आसमान में घूमे जैसे तारों की बगिया का माली। मगर न आता पास हमारे चाहे जितना इसे बुलाएं। मम्मी, चलो चाँद पर जाएँ। चमके तो धरती उजियाली, छिप जाए तो रातें क
 
Hemant Snehi
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

राजघाट

राष्ट्रपिता का जन्मदिवस जग मना रहा था सारा, रुकी न दिन भर राजघाट पर उमड़ रही जनधारा । श्रद्धा से सब शान्तिदूत को सुमन चढ़ाते जाते, चरखा-यज्ञ किया भक्तों ने रामनाम धुन गाते । गाँधी की जयकारों के स्वर दिशा-दिशा में गूंजे, अधरों पर संकल्प आज थे आसमान से
 
Hemant Snehi
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक अमूल्य उपहार

सुबह-सुबह उठा ही था। आदत के मुताबिक ड्राइंग रूम में आकर बैठा और अखबार उठा कर देखने लगा। तभी दोनों पुत्र और पुत्र वधुएं आए और जन्मदिन की बधाई देने लगे। साथ में दोनों पौत्र और पौत्री भी थे। चूँकि औपचारिक तौर पर अपना जन्मदिन कभी मनाया नहीं, इसलिए जन्मति
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ (ग़ज़ल)

हर तरफ़ लगता चमन जलता हुआ, आदमी को आदमी छलता हुआ। हो गया हर लक्ष्य बौना इस तरह, बर्फ जैसे धूप में गलता हुआ। हो न पाया जो कभी साकार वो, ख्वाब आंखों में रहा पलता हुआ। घोषणाओं पर अमल होता नहीं, देखिए हर फ़ैसला टलता हुआ। जो गया दरबार खाली हाथ ले, लौट आया
 
Hemant Snehi
Dec 29 2009 11:57 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

उमर खैयाम की रुबाइयां

ईरान का दार्शनिक कवि उमर खैयाम दुनिया भर को आकर्षित करता रहा है. हिंदी में खैयाम की रुबाइयों के अधिसंख्य रूपान्तर मूल कृति (फारसी) से न होकर एडवर्ड फिट्ज़जेराल्ड कृत अंग्रेजी अनुवाद से हुए हैं. यह जानते हुए भी कि मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पन्त और
 
Hemant Snehi
पसंद करें
2
नापसंद करें

बंजारे हैं जाना होगा ( ग़ज़ल )

बंजारे हैं जाना होगा, जाने फिर कब आना होगा। बस उतनी ही देर रुकेंगे, जितना दाना-पानी होगा। शहर बड़ा पर दिल छोटे हैं, जाने कहाँ ठिकाना होगा। भूल गए वो चाहे हमको, लकिन हमें निभाना होगा। प्रियतम को देने की खातिर, कुछ तो यहाँ कमाना होगा। जिसने पथ में कांट
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

आप यह भ्रम बनाए ही रखते (चार मुक्तक)

फूल सी गन्ध कहाँ पाओगे; ये मधुर छन्द कहाँ पाओगे; धन से सुख तो खरीद लोगे पर, मन का अनन्द कहाँ पाओगे। भाव का मेह कहाँ पाओगे; प्यार का गेह कहाँ पाओगे; मीत चाहे जिसे समझ लेना, किन्तु यह स्नेह कहाँ पाओगे। प्रेम प्रासाद क्यों ढहा होता; आँख से नीर क्यों बहा
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

आए याद पुराने लोग (ग़ज़ल)

यों ही राहों में मिल जाते कुछ जाने-अनजाने लोग;अक्सर याद दिला देते हैं कुछ भीगे अफ़साने लोग।बरसों जिनको अपना समझो वही निकलते गैर कभी;पल भर में अपने हो जाते लेकिन कुछ बेगाने लोग।अच्छों को भी बुरा बताना कुछ लोगों की फितरत है;मगर न हमने सुनी किसीकी आए जब
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

एक ग़ज़ल की कहानी

अपनी एक ग़ज़ल आए याद पुराने लोग (ग़ज़ल) के उद्भव और फ़िर उसकी परिणति की कहानी से आपको अवगत कराना अपना कर्तव्य समझता हूँ। दरअसल कुछ दिन पूर्व (गत १३ सितम्बर को) मैंने डरता हूँ 'अक्लमंदों' से (रुबाइयाँ) शीर्षक के अन्तर्गत चार रुबाइयाँ पोस्ट की थीं। इन रुबाइ
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

डरता हूँ 'अक्लमंदों' से (रुबाइयाँ)

काश , ऐसा न कुछ करे कोई, रात भर सिसकियाँ भरे कोई,बेवफाई न इस कदर कीजे,प्यार के नाम से डरे कोई। लोग कितने अजीब होते हैं,गर्ज़ हो तो करीब होते हैं,फेर लेते नज़र खुदा बन कर,क्योंकि दिल के ग़रीब होते हैं।खौफ़ कैसा खुदा के बन्दों से,खंजरों से लगे न फन्दों से,
 
Hemant Snehi
पसंद करें
0
नापसंद करें

कद्र कीजिए नातों की ( ग़ज़ल )

कद्र कीजिए नातों की,दिल से दिल की बातों की।अक्सर बहुत रुलाती हैं,यादें कुछ आघातों की।सूरज वो जो धो डाले,सारी स्याही रातों की।क्या-क्या रंग दिखाती हैं,चन्द लकीरें हाथों की।देखे ऐसे लोग बहुत,खाते जो बस बातों की। पढ़ो इबारत फुरसत में,अपने दिल के खातों
 
Hemant Snehi
Aug 22 2009 05:08 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

प्यार है अनमोल

प्यार हर सम्बन्ध का आधार है; प्यार से मन को मिला विस्तार है; ज़िन्दगी निःसार है बिन प्यार के, प्यार जीवन का सहज सिंगार है। प्रेम-पथ की यात्रा अविराम है; सार्थक लेकिन सदा निष्काम है; प्यार का अभिप्राय चंचलता नहीं, प्यार अविचल साधना का नाम है। प्यार है
 
Hemant Snehi
पसंद करें
1
नापसंद करें

ज़िन्दगी यों गुज़रनी चाहिए

ज़िन्दगी यों गुज़रनी चाहिए. आदमीयत निखरनी चाहिए. जो परेशां करे किसी को भी, बात ऐसी न करनी चाहिए. लोग हमको न बेवफा कह दें , सोच कर रूह डरनी चाहिए. दर्द दिल में रहें दफ़न कितने, मुस्कराहट बिखरनी चाहिए. काश, कुछ काम वो करें जिससे, कोई किस्मत संवरनी चाहि
 
Hemant Snehi
पसंद करें
1
नापसंद करें

कुछ पंक्तियाँ, नवभारत टाईम्स के सहयोगियों के नाम...

कुछ पंक्तियाँ, नवभारत टाईम्स के सहयोगियों के नाम... सुबह गुज़रती और शाम कट जाती है, मगर हमेशा याद आपकी आती है। अख़बारों के साथ सुबह दस्तक कोई, हर दिन मेरा दरवाज़ा खटकाती है। ख़बरों के ही बीच झरोखे से अक्सर, कोई शक्ल उभर कर कुछ मुस्काती है। किसी पृष्ठ
 
Hemant Snehi