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और जाओ... जला कर राख कर दो वैशाली को इस आग में....

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08 Mar 2010
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शिवसेना की गुंडई के वक्त धमाके का मुफीद वक्त

यूं, धमाकों को अहम या कम अहम धमाका तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शनिवार को पूना में जर्मन बेकरी के बाहर हुआ धमाका ऐसा धमाका है जिसके बड़े मायने हैं। पिछले नवंबर में असम में भी धमाके हुए थे और इसमें कोई शक नहीं कि वो भी आतंकवादियों की ही करतूत थी। इस लिहाज से
Feb 13 2010 09:28 PM
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ज्योतिदा… ‘जीडीपी’ तुम्हे जरुर माफ नहीं करेगी...!

देश के बड़े नेताओं में से एक ज्योति बसु चले गए...लेकिन वे हमारी पीढ़ी के ऊपर भी एक अमिट छाप छोड़कर गए। हम इतिहास के उस काल में जी रहे हैं जब नेहरु काल के साक्षी रहे एक-एक नेता धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं और देश की हुकूमत अब उन लोगों के हाथ आ रही है जो या
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जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...

प्रतिभा कटियारअभी-अभी कैलेंडर बदला है. अभी-अभी हमने पिछले बरस के अचीवमेंट्स का बहीखाता बंद किया है. अभी तक हमारे चेहरों पर सक्सेस की मुस्कुराहटें कायम हैं. जश्न दर जश्न...टीआरपी दर टीआरपी...सर्कुलेशन दर सर्कुलेशन... बेहद झूठी, खोखली सफलताओं के शोर में
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हम कहां जा रहे हैं....?

तमिलनाडु में हाल ही में एक सब-इस्पेंक्टर की मंत्रियों के सामने बेरहमी से हत्या और उसे बचाने में अधिकारियों के द्वारा दिखाई गई अनिच्छा ऐसी पहली घटना नहीं हैं जो हमारी बढ़ रही संवेदनहीनता की तरफ इशारा करती है। ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं जिसमें कहीं
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क्यों न दर्ज हो तिवारी के खिलाफ मुकदमा?

किसी बड़े बुद्धिजीवी की उक्ति है- हम कई औरतों से इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि दुनिया में बुद्धिमान लोगों की भारी कमी है...और इश्वर ने हमें इस विशेष काम के लिए भेजा है कि बुद्धिमान लोगों की आपूर्ति बनी रहे। एन डी तिवारी को बुद्धिजीवी के खांचे में रखने से
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत-7

दलितों के विकास में एक अहम बात सरकार के बड़े स्तर पर नीति निर्धारण से भी जुड़ी हुई है। ये बात ऐसी है जो तत्काल अपना असर नहीं दिखाती लेकिन ये देश के दलितों और गरीबों के विकास और देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुत जरुरी है। और वो मुद्दा है केंद्र राज्
Dec 29 2009 11:40 AM
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सबा सौ साल की कांग्रेस के जश्‍न में वेबसाइट का खलल

इसे अगर आप लापरवाही कहते हैं तो ये एक गंभीर किस्म की लापरवाही है। देश पर हुकूमत करनेवाली कांग्रेस के वेबसाईट में अगर इस तरह की गलतियां है तो ये वाकई दुर्भाग्यजनक है। कांग्रेस पार्टी की ऑफिसियल वेबसाईट बताती है कि कि राजीव गांधी सक्रिय राजनीति में सन्
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तेलंगाना के बहाने.....

तेलंगाना की केंद्र द्वारा एक तरह से स्वीकृति ने छोटे राज्यों के पैरोकारों में एक नया उत्साह भरा है। पूरे देश से इस तरह की मांग उठ रही हैं जिनमें से कई तो बहुत पुरानी है या फिर जिनका कुछ आधार भी बनता है। लेकिन कुछ लोगों द्वारा इसका विरोध इस अंदाज में
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मंहगाई पर बोलना गुनाह है।

सीएनबीसी के सैकड़ों पत्रकार सड़क पर आ गए, लेकिन कोई चूं तक नहीं बोला। बोलना भी नहीं चाहिए, क्योंकि लाखों लोग हर रोज जब नौकरी से निकाल दिए जाते हैं तब तो कोई नहीं बोलता-भला सीएनबीसी के लोगों में कौन से सुरखाब के पर लगे थे। यूं हमारी मीडिया कभी-कभी दूस
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हिंदी को गाय और ब्राह्मण की तरह पवित्र मत बनाईये

मेरे एक वरिष्ट फिरोज नकबी का मानना है कि देश में हिदी की दुर्दशा तभी से शुरु हुई जब आजादी के बाद इसे पवित्रतावादियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। महात्मा गांधी चाहते थे कि देश में हिंदुस्तानी का विकास हो जिसमें लिपि तो देवनागरी हो लेकिन उसमें उर्दू और
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मायावती के खुश नहीं होना चाहिए

उपचुनाव के नतीजों की व्याख्या खंगालने बैठा तो नेट पर खास हाथ नहीं लगा। इधर टीवी वाले तो ऐसे ही हैं। हर जगह सिर्फ हेडलाईन बनाने की होड़ थी कि बब्बर को शेर कैसे लिखा जाए और कांग्रेस का ‘राज’ अच्छा लगेगा या हाथी की चिंघाड़। बहरहाल इन सबसे उलट ये कहीं नह
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अंग्रेजी शिक्षा और दलित

संजीव एड एजेंसी में काम करता है। बोल रहा है कि उसका सीईओ भी कभी-कभी हिंदी बोल लेता है या अक्सर हिंग्लिश बोल रहा होता है। उस दिन रतन टाटा भी नैनो मसले पर पीसी में बोल रहे थे। लेकिन कैसे बोल रहे थे? वे अटक-अटक कर बोल रहे थे। सुना कि फिल्म जगत में अधिका
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दून-लंदन में पढ़ा शख्स कोबाद गांधी भी हो सकता है, राहुल गांधी ही नहीं...

टीवी पर कोबाद गांधी की खबर आ रही थी। आफिस में साथ करनेवाले एक मेरे मित्र ने उसे धोखे से राहुल गांधी समझ लिया। वजह ? वजह ये कि वो गांधी भी दून और लंदन में पढ़ा था। मतलब ये कि अधिकांश लोग यहीं सोचते हैं कि एक नक्सली दून और लंदन में कैसे पढ़ सकता है ? उसे
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कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...

रायबरेली के फिरोज भाई बड़े दिलदार इंसान हैं। वे गालिब से लेकर माईकेल जेक्सन तक की बात करते हैं। हाल ही में उन्होने एक हिंदी का एक गजल सुनायी। ये गजल इलाहाबाद में रहनेवाले उनके एक मित्र एहतेराम इस्लाम ने लिखी थी जिसे मैं अपने ब्लाग पर बांटने का लोभ नहीं
Sep 24 2009 07:17 PM
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बिहार उपचुनाव के नतीजे और निहितार्थ

बिहार विधानसभा का हालिया उपचुनाव बहुत से लालबुझक्कड़ों के लिए नीतीश कुमार के अवसान का पैगाम लेकर आया। लेकिन लालू के चेहरे पर खुशी का अतिरेक नहीं था। लालू जानते हैं कि नीतीश, डैमेज कंट्रोल में माहिर है। इसलिए उन्होने गंभीरता से बयान दिया, कम से कम उनके
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मोदी आज सठिया गए...

वैसे तो मोदी के कई फैसले पहले से ही इशारा कर रहे थे कि वे सठिया चुके हैं लेकिन आज अखबारों से पता चला कि वे वाकई सठिया गए हैं। वैसे सुना कि जब नेता सठियाता है तो क्रिकेट संस्थानों पर कब्जा कर लेता है। मोदी ये हाल ही में काम कर चुके हैं। लालू और पवार भी
Sep 18 2009 12:49 PM
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एक सनसनी जो बनते-बनते रह गई...

“लाख अन्यायपूर्ण और अनुचित आलोचनाओं के बावजूद सोनिया गांधी ने जिस गरिमा और गंभीरता के साथ सत्ता की कामना का वलिदान किया वो अपने आप में एक मिसाल है। वो एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिज्ञ हैं जिन्हे ग्रामीण और शहरी संभ्रान्त वर्ग समान रुप से पसंद करता है।
Sep 17 2009 01:33 PM
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बीजेपी का सतरंगी झगड़ा...कितना संगीतमय है!

आखिरकार मोहन भागवत दिल्ली आ ही गए। आना ही था। सुदर्शन भी पिछली बार चेन्नई में डेरा डाल आए थे जब आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाना था। हां, इतना तय है कि आडवाणी के जाने के बाद बीजेपी के आगामी नेता इतने बौने होंगे कि संघ प्रमुख उन्हे नागपुर से फोन पर ही निपटा
Aug 28 2009 07:09 PM
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हमें आगे कौन पढ़ाएगा सरकार...?

सुमन कहती है कि फरक्का में वो सब कुछ है जो एक छोटे शहर में होना चाहिए, मसलन अच्छी सड़के, अच्छे स्कूल-डीपीएस भी है-और अच्छे अस्पताल। लेकिन नहीं है तो सिर्फ कोई भी कालेज। मैं भौचक्का हूं। मैं उससे कुछ और जानना चाहता हूं। वो आगे बताती है कि फरक्का में वाटर
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नार्थ ऐवेन्यू का लाईजनर-2

एमपी साहेब (पूर्व) टहल रहे हैं। इस महीने कोई लाईजनिंग नहीं हो पाई, कोई पार्टी नहीं फंसा। विवेकजी भी तो आजकल कम आ रहे हैं नार्थ एवेन्यू। लगता है सुरेन्दर बाबू के यहां ज्यादा उठते बैठते हैं आजकल। हां, आदमी थोड़ा कमा लेता है तो कम भाव देता है वक्त-वक्त
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नार्थ ऐवेन्यू का लाईजनर-1

वह सियासत के लूडो (बिसात नहीं) का उस्ताद था। लेकिन सांप सीढ़ी के खेल में 99 पर उसे सांप ने डस लिया तो वह 25 पर आ गया। 4 बार सांसद रहने के बाद फिलहाल वो बेरोजगार है। वो लाईजनर बन गया है। वैसे लाईजनर बनने के लिए सांसद होना कोई अनिवार्य योग्यता नहीं है।
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तूने मोह लिया इलाहाबाद - अंतिम भाग

तारीख को हमें इलाहाबाद से वापस आना था, मन कर रहा था कि काश कुछ दिन और रुक पाते। सुबह आठ बजे हमारी ट्रेन थी, गौरव हमें स्टेशन तक छोड़ने आया। हमने आते वक्त वो खूबसूरत केथेड्रल देखा जो स्टेशन के नजदीक ही है। हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट भी देखा और उसके सामने
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तूने मोह लिया इलाहाबाद - 8

आनंदभवन से छूटते ही हमने रिक्शा ली, और चल पड़े संगम की तरफ...उस संगम की तरफ जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा था। जिस संगम का नाम सुनते ही मेरी दादी की आंखों में चमक आ जाती थी, जिस संगम के बारे में मां ने आते वक्त फोन पर खासतौर पर डुबकी मार लेने को
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तूने मोह लिया इलाहाबाद - 7

अगले दिन 9 जून थी, 8 जून की रात शादी थी, हम थककर चूर थे। हमारे पास एक ही दिन बचा था जिसमें हमें संगम, आनंद भवन और सिविल लाईंस जाना था। हम 12 बजे सोकर उठे और नहा धोकर आनंद भवन की ओर चले, हमने अपने आपको मामी की नजरों से बचा कर रखा जो कम से कम दो बार खा
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तूने मोह लिया इलाहाबाद - 6

संगम और आनंद भवन का जिक्र करने के लिए मैं खुद ही ललचा रहा हूं। लेकिन शादी वाली रात की इतनी यादें हैं कि मैं किस्सागो बनता जा रहा हूं। वैसे संगम भी तो हम शादी के बाद ही देख पाए थे। बहरहाल, शादी के दौरान दुल्हन का गमगीन चेहरा मुझे भावुक कर गया। यों, मा
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तूने मोह लिया इलाहाबाद-5

इलाहाबाद का जिक्र संगम, आनंद भवन, युनिवर्सीटी और सिविल लाईंस के बिना अधूरा है। लेकिन शादी के भागमदौड़ में हम दरअसल विवाह वाले दिन के बाद ही आनंद भवन और संगम जा पाए। अभी हम शादी के जिक्र का मोह नहीं छोड़ पा रहे। बहरहाल, शादी के मौके पर हम जम कर सजे सं
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तूने मोह लिया इलाहाबाद - 4

इलाहाबाद का पुराना नाम प्रयाग भी है, लेकिन अब इलाहाबाद इतना अपना सा लगता है कि प्रयाग के नाम से पुकारने की मन में कभी कल्पना ही नहीं आई। यूं मेरी दादी इसे प्रयाग ही पुकारती थी। राजीव का बड़ा वाला ममेरा भाई जो हैदराबाद में कम्प्यूटर इंजिनीयर है, उसे श
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तूने मोह लिया इलाहाबाद-3

दरअसल हम इलाहाबाद जाते ही इसे घूम नहीं पाए थे। इसकी वजह थी कि हम शादी वाले घर में गए थे, थोड़ा दिखाना भी था कि सिर्फ मेहमाननवाजी करने नहीं आए हैं। 7 जून की शाम को हम पहुंचे ही थे, 8 जून को शादी थी। दिन भर भागदौड़...उसी बीच में इलाहाबाद का दर्शन। संयो
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तूने मोह लिया इलाहाबाद-2

इलाहाबाद शुरु हो चुका था। हम रास्ते भर कल्पना करते आए थे कि यमुना कहीं हमारे बाजू से गुजरती होगी, दिख ही जाएगी। यमुना नहीं दिखी, वो तो संगम के पास दिखी। हमारा भौगोलिक ज्ञान थोड़ा दुरुस्त हुआ। बहरहाल, राजीव का ममेरा भाई यानी गौरव हमे रिसीव करने आया था
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तूने मोह लिया इलाहाबाद- 1

कुछ दिन पहले इलाहाबाद गया था। बचपन से काफी सुना था इस शहर के बारे में। हम हिंदुस्तानियों खासकर उत्तर भारतीयों के मन में जिन दो शहरों के बारे में एक खास किस्म की नॉस्टल्जिया है उसमें इलाहाबाद और कलकत्ता का नाम अहम है। पता नहीं क्यों- आप इन दोनों की शह
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6

हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का ले
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत-5

सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है। आज के युग में जब अधिकांश नौकरियां निजी क्षेत्र से आ रहीं हैं तो दलितों के लिए यहां दोहरा संकट है। एक तो यहां आरक्षण नहीं है दूसरी बात ये अंग्रेजी एक बड़ी वाध्यता है। निजी क्षेत्र की अधिकांश अच्छी नौकरियों में अंग्रेजी का ज
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मायावती, अम्बेदकर, सेक्यूलरिज्म और बीजेपी

मा यावती ने सत्ता हासिल करने के लिए जितनी भी कलाबाजियां खाईं हों लेकिन उनकी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। कई लिखित साक्ष्यों से ये साबित हुआ है कि अम्बेदकर के मन में इस्लाम को लेकर कोई अच्छी धारणा नहीं थी। अम्बेदकर ने जब
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत- 4

एक सवाल ये भी है कि दलितों के बच्चों को कमसे कम क्लास दसबीं तक कैसे स्कूल में रोक कर रखा जाए। देखने में ये आया है कि जैसे ही वो 12-14 साल के होते हैं उनपर परिवार चलाने की जिम्मेवारी आ जाती है, उनका परिवार इतना बड़ा होता है, उनके परिवार में अशिक्षा-जन
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत- 3

फिर सवाल ये है कि इन तमाम वाधाओं के रहते हुए एक दलित क्या करे ? क्या वो अपने मेहनत की गाढ़ी कमाई बैंक में महज कुछेक फीसदी ब्याज के लिए जमा करता जाए और एक उपभोक्ता बन कर रह जाए या फिर अपनी उत्पादकता भी बढ़ाए। अगर सरकार इस दिशा में कुछ पहल करे तो बात ब
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत-2

आजादी के तकरीबन छह दशक बाद भी दलितों की मूल समस्याएं क्या हैं। दलितों की मूल समस्या ये है कि उनके पास अभी भी देश में उपलब्ध भौतिक परिसंपत्तियों का एक बहुत ही छोटा हिस्सा है जिसके फलस्वरुप गरीबी और उससे पैदा हुई तमाम तकलीफों का समना दलितों को करना पड़
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दलित, समाज, सरकार और हकीकत-1

हाल के सालों मे कई बातें दलितों और आदिवासियों के हक में अच्छी हुई। भारत सरकार ने आदिवासियों को जंगल की जमीन और उसके उत्पादों पर उनका हक दिलाने के लिए आदिवासी कानून पास किया तो हरियाणा में हुड्डा सरकार ने हरेक दलित परिवार को सौ-सौ गज जमीन घर बनाने के
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लालूजी, आपकी चिंता जायज है....

किसी ने कहा कि लालू पिछले ൨൦ सालों में पहली बार बौखलाए हुए दिख रहें हैं। नब्बे के दशक में जातीय रैली करने वाले और बयानवाजी करनेवाले लालू इतने असुरक्षित कभी नहीं दिखे जितना इस चुनाव में दिख रहे हैं। टीवी चैनलों पर उनकी बाडी लेंग्वेज और अखबारों में उनक
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कांग्रेस, बीजेपी और चुनाव प्रचार

यूं तो चुनाव प्रचार की अहमियत विकसित देशों में भी काफी होती है, लेकिन पिछड़ापन, गरीबी और अशिक्षा से ग्रस्त देशों में चुनाव प्रचार कुछ ज्यादा ही मायने रखता है। यहां मतदाताओं के एक बड़े तबके को प्रचार, पैसा और संसाधनों के बल पर आसानी से प्रभावित किया ज
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मेरी शुभकामनाएं नीतीश के साथ है...

आमतौर पर लोग मान रहे हैं कि बिहार में इसबार नीतीश के सुशासन से लालू चारो खाने चित्त हो जाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और भी हो सकती है। नीतीश कुमार की लोकप्रियता उफान पर है इसमें कोई दो मत नहीं लेकिन उन्होने कुछ ऐसी गलतियां की हैं जिससे उन्हे लेने के