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03 Jun 2010
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लटकाना हमारी आदत में शूमार हो गया है.

आप मेरी और किसी बात से सहमत हों ना हों पर इस बात से तो सहमत होंगे ही कि हमें किसी भी चीज को लटकाने की आदत सी पड़ गयी है। मैं कंधे पर शाल या गले में टाई या खूंटी पर कपड़े लटकाने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं कुछ ऊंची आदतों की बात कर रहा था। जैसे किसी योजना की
 
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इंसान ही नहीं वस्तुएं भी बदकिस्मत होती हैं.

सन 1733। क्रेमलिन के आइवान वैलिकी के गिरजाघर में एक विशालकाय घंटे को लगाने का प्रस्ताव पास हुआ। सोचा गया कि घंटा इतना बड़ा हो कि दुनिया भर में उसकी चर्चा हो। अंत में 200 टन भार के घंटे को बनाने की सोची गयी। नक्शा बन गया। सांचा भी तैयार हो गया। घंटे को
 
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तंग आ कर नूरे ने लड़का किडनैप किया, पर :-)

हमारा नूरा जब से दिल्ली घूम कर अपने पिंड़ लौटा है तब से उसे शहर में कुछ करने का कीड़ा काट गया है। गांव के अपने तीनों लंगोटियों के साथ माथा पच्ची करने के बाद वे चारों इस नतीजे पर पहुंचे कि मां-बाप पर बोझ बनने से अच्छा है कि एक बार चल कर किस्मत आजमाई
 
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मेरी खिचडी और अटलबिहारी बाजपेयी जी के गुलाबजामुन

ललित जी तो निकल लिए चुपचाप दिल्ली क लिए । अपन रह गये वहीं के वहीं वह भी महज एक जिद के कारण। अच्छी भली 6x2 की चलायमान सरकारी जगह भी आरक्षित थी, दिन भी निश्चित था, कार्यक्रम भी बना पड़ा था बस जबान धोखा दे गयी। खुद तो कह कर भीतर घुस गयी मुसीबत झेलनी पड़ी सारे
 
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यकीन नहीं होता कि नूरा जैसे लोग होते हैं ?

आज रवीवार है। आज आपको एक प्यारे से भोले से बंदे के बारे में बताता हूं। इनका नाम है नूरा। ये बड़े पिंड के रहने वाले हैं। इनकी खासीयत है कि ये जो भी काम हाथ में लेते हैं उसे पूरा करते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए। चाहे लोग मजाक बनाएं या हसीं उड़ाएं ये मस्त रहते
 
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संवेदना ख़त्म हो चुकी है हमारे में !!!

कभी बेंगलूर, कभी दिल्ली, कभी हवाई जहाज, कभी बस, कभी रेल।वही वहशत, वही दरिंदगी, वही हैवनियत, वही बेगुनाहों की लाशें, वही मौत का नंगा नाच। वही आंकड़ों का जमा खाता। वही नेताओं के रटे-रटाए जुम्ले। वही दी जाने वाली धन राशि का एलान। जो मरे और जो सैकडों की तादाद
 
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आप के यहाँ भी बी.एस. एन. एल. है, भाई आप भी हिम्मती हैं.

कुछ दिनों पहले सरकारी फोन 45 दिन तक कोमा में रहा था। डेस्क-डेस्क, केबिन-केबिन के यंत्रं पर पुकार लगायी पर वे भी तो अपने आकाओं से कम कहां है, सब मशीनी आवाज लिए बैठे होते हैं। सब को हिलाया, डुलाया, झिंझोड़ा पर सरकारी कछुआ अपनी चाल चलता रहा। हां इतना बदलाव
 
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मेरे नीचे शेरों का शाह सोया हुआ है.

मैं शेरशाह सूरी का मकबरा हूं।वही शेरशाह जिसके बचपन का नाम फरीद था पर जिसने युवावस्था में ही एक आदम खोर शेर को मार यह नाम हासिल किया था। वैसे भी वह शेरों का शेर था। यह वही शेरशाह था जिसने मुगल सल्तनत को झकझोर कर रख दिया था। यह वही शेरशाह था जिसके ड़र के
 
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उनके जीते-जी मरने की खबर छप गयी

बात उन सांध्य पर्चों की नहीं हो रही है, जो बिक्री बढाने के लिए दो पन्नों के पर्चे में हेड़िंग दे देते थे "हेमा मर गयी" और नीचे छोटे-छोटे अक्षरों में लिखा रहता था कि फलाने सर्कस की हथिनी हेमा का इंतकाल हो गया। बात हो रही है बड़े अखबारों की, जिनमें पता नहीं
 
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काक्रोच या तिलचट्टा, तिल-तिल कर सब चट कर जानेवाला

काक्रोच या तिलचट्टा। दुनिया के आदिम जीवों में से एक। नाम भी कैसा है तिल-तिल कर हर चीज को चट कर जाने वाला। अपनी इसी लियाकत और हर हाल में "एडजस्ट' कर लेने के गुण के कारण ही यह बड़े-बड़े दिग्गजों के सफाए के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखने में सफल रहा है। इसका
 
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अंडे, अजीब पर गरीब नहीं

पहले मुर्गी आई कि अंड़ा यह सवाल वर्षों से लोगों को सर खुजलाने पर मजबूर करता रहा है। अपन इस पचड़े में ना पड़ आज सिर्फ अंड़ों की बात करते हैं जो अपने-आप में बहुत सारे अजूबे समेटे रहते हैं। कुछ सालों पहले एक वैज्ञानिक ने कौतुहलवश एक अंडे के चार टुकड़े कर फिर उसे
 
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"महामृत्युंजय मंत्र" का भावार्थ

हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना साहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो उन्हें पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसे जैसा
 
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क्या पान खाना स्वास्थ्यप्रद है?

पान का सेवन हमारे यहां सैकड़ों वर्षों से होने के प्रमाण मिलते हैं। खास-खास अवसरों पर या आदर-सत्कार में तो इसका चलन तो है ही। किसी बड़े या कठिन काम के लिए भी इसका बीड़ा दिया जाता रहा है। पर कहीं-कहीं यह व्यसन की सीमा तक भी जा पहुंचा है।आयुर्वेद में भी इसके
 
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कृत्य है जिनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?

यह कोई कविता नहीं है, क्योंकि मुझे कविता लिखनी आती ही नहीं, नाही उसकी समझ है। जब दिलो-दिमाग आक्रोशित हों, बेकाबू होती परिस्थितियों से, कुछ ना कर पाने की कशमकश हो, जो कुछ कर पा सकते हैं वे भी आग में आहूती देते दिखें तो ऐसे में उपजे उद्वेग से निकला यह शब्द
 
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आज तोता नहीं, कौवा है :-)

# संता और संतानी गोवा घूमने गये। वहां संता ने एक मोटर सायकिल किराए पर ली और दोनों घूमने निकल पड़े। अब संता तो संता ऊपर से पीछे बैठी बीवी उसने बीवी पर रौब ड़ालने के लिये उल्टी-सीधी बिना नियम कानून देखे गाड़ी चलाई फलस्वरूप एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने रोक कर
 
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तोला, माशा, रत्ती

पुरानी चीजों की तरह पुराने नाप-तौल भी चलन के बाहर होते चले गए। कभी-कभी मुहावरों में या किसी ख़ास खरीद फरोक्त वगैरह में उन्हें भले ही याद कर लिया जाता हो नहीं तो आज की पीढी को तो वे अजूबा ही लगते होंगे। चलिए एक बार उन्हें याद ही कर लेते हैं :- पुराने
 
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कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा

कभी-कभी कुछ अजीब सी स्थिति बन जाती है हमारी। उस समय तो कोफ्त ही होती है। पर ऐसा क्यों होता है कि :- * जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।* जब भी कोई
 
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धृतराष्ट्र हर युग में होते हैं।

कुछ दिनों पहले एक सामने घट रहे वाकये का जिक्र किया था "आज का धृतराष्ट्र जो खुद ही बैल को उकसा रहा है" के नाम से। जिसमें पुत्र मोह में पड़ा एक बाप अपने 32साला लड़के की इस बात को, कि उसका पहली पत्नि से तलाक हो चुका है और एक बच्चा भी है, छिपा कर फिर उसकी शादी
 
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आप ब्लॉग किस मुद्रा या माहौल में लिखते हैं ?

बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी सनकें। कोई सो कर लिखता था तो कोई खड़े हो कर। कोई सोने से पहले तो कोई जागने के बाद। कोई शराब पी कर तो कोई चाय। किसी को शोर-शराबा पसंद था तो किसी को संगीत, कोई अपने पालतू के बिना कुछ सोच भी नहीं सकता था तो किसी को किसी की भी
 
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गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर अभी जिंदा हैं, दैनिक भास्कर के अनुसार।

छोड़ो यार सब चलता है, क्या जरा सी बात का बतंगड़ बनाना, गल्तियां हो जाती हैं, जैसी नजर से देखें तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। पर यदि एक इतने बड़े अखबार को, जो अपने क्षेत्र में अग्रणी होने का दम भरता हो, मद्दे नजर रख देखें तो यह "ब्लंड़र" है।आज शुक्रवार 7 तारीख
 
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आखें, आप इन्हें पंद्रह मिनट दें ये आपका उम्र भर साथ देंगी.

किताबें, कंप्यूटर, लैपटाप, सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव और भी ना जाने क्या-क्या, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। पहले जरा से साफ पानी के छीटों से ही ये अपने आप को दुरुस्त रख लेती थीं। पर लगातार इनकी अनदेखी अब इन पर भारी पड़ने लगी है।
 
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ये महिलाएं हैं या कीड़े-मकोड़े

अब तो लगता है कि उल्टे-सीधे विज्ञापनों में बेतुके, अतिश्योक्तिपरक व अभद्रता लांघने वाले विषयों की आदत पड़ गयी है सबको। क्योंकि कहीं से भी विरोध का स्वर उठता या सुनाई नहीं देता। इसी से शह पा कर विज्ञापन देने और बनाने वालों में होड़ सी लग गयी है अश्लीलता
 
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स्वामी विवेकानंदजी की प्रत्युत्पन्नमति

स्वामी विवेकानंद हिंदू धर्म को लेकर फैली भ्रातिंयों और भारतीय संस्कृति के प्रचार के लिए योरोप यात्रा पर थे। वहां उन्हें बहुत बार विषम परिस्थितियों से दो-चार होना पड़ता था। खासकर अंग्रेज उन्हें अपमानित करने के मौके खोजते रहते थे।एक बार उन्हें एक गिरजा घर
 
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हेलो, मैं "मनाली" बोल रही हूँ.

यह पोस्ट है तो पुरानी, पर इस बार फिर जाना हो पा रहा है तो इस लालच में कि शायद कोई "अनदेखा अपना "वहाँ मिल ही जाए सो................................. नाम तो आपने जरूर सुन रखा होगा, फिर भी अपना परिचय करवाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ। मैं मनाली हूं
 
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दूर का अमेरिका सुहाना लगता है...

अमेरिका भी अब पहले जैसा नहीं रह गया है। दुनिया भर से सपने संजोये लोगों की आमद, बढ़ती जनसंख्या, दुनिया भर में फैली मंदी ने वहाँ भी अराजकता फैलाने में कोई कसार नहीं छोडी है....................................................अमेरिका, दुनिया का सबसे
 
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आज का धृतराष्ट्र, जो खुद ही बैल को उकसा रहा है।

एक आदमी नदी के किनारे बहुत उदास सा बैठा था। उससे कुछ दूरी पर एक संत भी बैठे थे, अपने प्रभू के ध्यान में। अचानक उनका ध्यान इस दुखी आदमी की ओर गया। संत उठ कर इसके पास आए और पूछा कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लग रही उदास भी बहुत हो क्या बात है? संत के प्रेम
 
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हंसने की कीमत नहीं देनी पड़ती,

कभी-कभी कुछ याद आ जाता है तो बांटने की इच्छा हो जाती है.........................संता सिंह का बेटा बंटी बहुत देर से नाई की दुकान में बैठा था। जब काफी समय हो गया तो नाई ने पुछा, क्यूं बेटा बहुत देर से बैठे हो क्या बात है?बंटी ने जवाब दिया, मुझसे बंता अंकल
 
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अपनी सेना के वीर जवानों की खातिर इसे पढ़ें और पढवाने की कोशिश जरूर करें.

यह मार्मिक अपील, स्व.ले.सौरभ कालिया, जिन्हें १५.०५.१९९९ को कारगिल में गश्त करते समय पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था तथा बाद में उनकी नृशंस ह्त्या कर दी थी, के पिताजी द्वारा की गयी है। वे वर्षों से इस मुहिम में जुटे हुए हैं जिससे पाकिस्तान का घिनौना
 
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जय हिंद, जय जवान. इसे जरूर पढ़ें और कोशिश करें कि ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ सकें.

ई-मेल से सीधे पेस्ट करने के कारण व्यवस्थित नहीं हो पाया है, उसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पर इसे आगे जरूर बढ़ाएं। Dear Sir/Madam ,SPARE 5-MINUTES from ur busy schedule. PLEASE !!!Lt. Saurabh Kalia of 4 JAT Regiment of the Indian Army laid down his life at
 
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तुम्हारे हुस्न का हुक्का बुझ चुका है...............

1, खादी, खाद का काम करती है, तभी तो इसे पहनने वाला हरा भरा हो जाता है।2, पेड़ जो लगाये गये वे तो बच ना सके, पर फोटो जो खिंचवाए गये वे सुरक्षित रह गये।3, नयी बनी दिवार दूसरे दिन ही 'आ' रही, ठेकेदार तो बच गया, ठेका दिलाने वाले को दबा गयी।4, जाने कैसी
 
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एक साक्षात्कार ऐसा भी

"नेट" पर एक साक्षात्कार में शामिल होने का अवसर मिला। आप भी आनंद लीजिए : OFFICER : WHAT IS YOUR NAME ?CANDIDATE : M P। SIROFFICER : TELL ME PROPERLYCANDIDATE : MOHAN PAL SIROFFICER : YOUR FATHER'S NAME ?CANDIDATE : M P। SIR OFFICER : WHAT DOES THAT MEAN
 
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भाग किसी का भी हो, छींका टूटना चाहिए

रेल में यात्रा करते समय यह कोशिश रहती है कि क्लास कोई भी हो, मौसम कैसा भी हो, यात्रा छोटी हो या बड़ी यदि अकेला हूं तो ऊपर की बर्थ होनी चाहिये। ऊपर वाले की कृपा से तीन-चौथाई यात्राएं ऊपर ही ऊपर की हैं। पर जब से सरकार मेहरबान हो गयी है तब से ऊपर की बर्थ
 
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"बैंक" जहां पैसे नहीं कपडे रखे जाते हैं.

ज्यादातर यही समझा जाता है कि बैंकों में पैसा या कीमती सामान ही रखा जाता है। पर झारखंड के जमशेदपुर मे एक बैंक ऐसा है जिसका पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। इस अनोखे बैंक में इंसान की मूलभूत जरूरत कपड़े रखे जाते हैं तथा इसे कपड़ों के बैंक के नाम से जाना जाता
 
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आने वाला समय एक नई तस्वीर दिखाएगा, दुनिया की

वर्तमान समय बदलाव का समय है, हर पांच दस सालों में नयी-नयी इजादें सामने आती चली जा रही हैं। आने वाले कुछ सालों में भी हमारी दुनिया की तस्वीर में कुछ नये बदलाव आने वाले हैं। जिनमें प्रमुख हैं --1:- विज्ञापन आकाश में छा जाएंगे। जी हां आकाश में लेज़र के जरिए
 
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एक चौंकाऊ खबर, पक्षियों में भी "दोस्ताना" होता है.

एक हैरतंगेज खबर आज ही पढने को मिली। विश्वास तो नहीं होता पर खबर तो खबर है, कुछ तो सच्चाई होगी।बात है इंग्लैंड़ की। वहां डोरसेट की एबट्सबरी की हंसों की नर्सरी में एक नर हंसों का जोड़ा ऐसा है जिसे मादा साथियों में कोई दिलचस्पी नहीं है। नर्सरी के प्रवक्ता
 
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जानी-मानी पत्रिकाओं की वादा खिलाफी

बहुत बार किसी खास मौके पर आप किसी पत्रिका या पत्रिकाओं ने कुछ आर्टिकल वगैरह भेज देते होंगे, वे छप भी जाते होंगें। मानदेय मिले या ना मिले इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। पर कुछ स्थापित पत्रिकाएं किसी खास विषय या विषयों पर रचनाएं आमंत्रित करती रहती हैं नियमित
 
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क्या ऐसे भी भुखमरी दूर होगी ?

खबर कुछ पुरानी है फिर भी ध्यान देने लायक है कि भुखमरी से निजात पाने का रास्ता बिहार सरकार ने ढ़ूंढ़ निकाला है। अब लोगों को चूहे का मांस खाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। जल्दी ही सड़क छाप ढाबों पर चूहे के मांस से बनने वाले उत्पाद, जैसे रैट टेल पास्ता, रैट
 
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भाग कर नहीं सामने रह कर अपने को सिद्ध करो

आदमी अपनी मर्जी का मालिक होता है। पर एक खास मुकाम हासिल करने के बाद इंसान फिर सिर्फ खुद का नहीं रह जाता। वह समाज का एक अंग बन जाता है। उसको भी सबकी राय सुननी, माननी पड़ती है। दूसरों की इच्छा-अनिच्छा का सम्मान करना पड़ता है। फिर ललित जैसा जो सबको, लायक को
 
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विश्वास करें तो पूरा करें :-)

विश्वास करें तो पूरा करें, नहीं तो न करें :-) दो दोस्त जंगल में ट्रैकिंग के लिये गये। अचानक एक बेहोश हो कर गिर पड़ा और मर गया, दूसरे ने घबड़ा कर मोबाईल से हेल्प लाईन पर फोन कर मदद मांगी कि मेरा दोस्त घने जंगल में मर गया है मुझे सहायता की जरूरत है। उधर से
 
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कुत्तों ने "शोले" देखी. पर क्या देखी !!!

तकरीबन 35 साल पहले फिल्म “शोले" ने जो तहलका मचाया था उसकी तपिश, उसका सरूर अभी तक लोग भुले नहीं हैं। इंसान तो इंसान जानवरों पर भी उसका जादू सर चढ कर बोला था। कलकत्ता के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर
 
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