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राजेश गुप्ता आपसे रूबरू

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15 Jun 2010
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आपका क्या होगा रिटायरमेंट के बाद

कुछ जलवापरस्त अफसरों की तुनक-मिजाजी और नाज़ नखरे देख के लगता है क़ि इंसान किस कदर पद - मस्त हो सकता है। भारी लवाजमा लेकर चलना, अपने मातहतों को ऐसे घूरना कि साहब तो किसी दुसरे प्लेनेट से आये हैं और अज्ञानी लोगों को दर्शन लाभ दे रहे हैं। क्या होता है ऐसे
Jun 15 2010 03:37 PM
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दुनिया को कमीनी बनाने वालों पे लिखी कविता

बढ़ गए कितने भाव ज़मीनों के हौसले बुलंद हैं सब कमीनों के भोली सूरत के पीछे नीच इरादेधोकेबाज़ हैं, लगते हैं सीधे सादेफरेब करने का आया है ऐसा दौर सम्बन्ध है कहीं, रिश्ता कहीं औरसाँसों की खुशबू में जो भी फंसेगाझूठ के ज़हर में दम घुट के मरेगापरवरिश में ऐसों की
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क्या सफलता एक "पर्सनालिटी डिसोर्डर" है ?

गहन विश्लेषण के बाद इस नतीजे पर पंहुचा हूँ। आप भी तलाशिये- अपने पड़ोस, परिवार , ऑफिस , सोसायटी या गाँव में ढूंढिए सबसे सफल व्यक्ति । दो कोलम वाली तालिका बनाइये - एक में उस व्यक्ति के 'पोजिटिव एट्रीब्यूट्स' लिखिए और दुसरे में 'नेगेटिव एट्रीब्यूट्स' । दोनों
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क्या लिखा जाए मेरे समाधि पत्थर पे ?

विले पार्ले कब्रिस्तान से गुजरते हुए देखा- मृतकों के समाधि पत्र पर उकेरी उपाधियाँ और स्मृति वाक्य। ख़याल आया - मेरे समाधि पत्र पे क्या लिखा जायेगा? मुझसे बेहतर मुझे कौन जानता है ? तो कुछ आयडिया आये :-"राजेश गुप्ता ( 1975 -20**) :- एक सरकारी नौकर जिसे कभी
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राजनीति में भी 'लेटरल एंट्री' वालों की शामत

हमारे देश की हर व्यवस्था ढर्रेवादी है। कोई कितना भी एक्सपर्ट हो, उसका बीच में कूदना व्यवस्था को पचता नही है। जयराम रमेश मुश्किल में आये, शशि थरूर को तो जाना ही पडा। नौकरशाही हो या राजनीति, सब जगह 'लेटरल एंट्री' वालों को अस्वीकार ही किया जाता है।बरसों से
May 20 2010 07:24 PM
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मोबाइल पर हिन्दी टाइपिंग

नया नोकिया E63 खरीदा। अच्छा फोन है, क्वर्टी की पेड और पुश इ-मेल बहुत उपयोगी है, पर निराशा हुई जब पता चला की इस ब्लॉग पर हिन्दी लिखना सम्भव नही है। फिर गूगल बाबा की मदद से INDISMS नामक एप्लीकेशन डाऊनलोड किया जिससे एस.एम्.एस तो हिन्दी में लिख जाते हैं।पर
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मार्च का जादुई महीना

आजकल सभी मित्र व्यस्त चल रहे हैं. कारण? "मार्च एंडिंग" है भाई. तभी एक आयडिया आया- काश साल के सभी महीने मार्च होते तो आज हम अमेरिका से भी आगे होते. कितनी तेज़ तरक्की होती है मार्च में. जितने नसबंदी ओपरेशन मार्च में होते हैं, पूरे साल मिलकर भी उतने नही
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कल चौदवीं की रात थी..

सारा दिन मसरूफ रहा मैंअब सोच रहा क्या होना है.इस पूनम के चाँद से मुझकोदो बातें करके सोना है.जिनसे छन जाती है ये चांदनीकुछ उन पलकों को भिगोना है.असमान जंहा चाँद सजा हैलगता दिल का कोई कोना है.सुलझा कर मन के धागे कोयादों के मोती पिरोना है.सदियाँ बीतीं इस
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'माय नेम इज खान ' देखने के बाद आये कुछ विचार

करन जोहर की इस फिल्म में यूं तो कई विवाद हुए लेकिन फिल्म में मुझे जो 'बिटवीन द लाइंस' दिखाई दिया वो ये की 'रिलीजन' के कारण दुनिया में फैली अशांति को ख़त्म करना संभव नही है. 'रिलीजन' होंगे तो 'बाउंड्रीस ' होंगी और बाउंड्रीस होंगी तो झगडे फसाद होंगे ही.
Feb 20 2010 11:45 AM
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कुर्ग यात्रा की झलकियाँ:- आनंद विभोर करने वाला हिल स्टेशन

मैसूर के निकट कॉफी के प्लान्टेशन से भरपूर एक मनोरम स्थल जहां रूह को सुकून देने वाली शांति है-कुर्ग. जनरल करियप्पा के इस गाँव में है भारत का एकमात्र 'हाथी ट्रेनिंग स्कूल' और कुछ दिलचस्प हरियाली से परिपूर्ण बागान . जलप्रपात और इठलाती कावेरी यंहा के ठन्डे
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मैसूर यात्रा - महलों में गुनगुनाते शहर की सैर

रजवाड़ों की शानो-शौकत और चन्दन की खुशबू वाले इस शहर की यात्रा आरम्भ हुई रंगनाथ्स्वामी मंदिर से फिर हमने देखा 1764 में बना दरिया दौलत बाग़ . ये टीपू सुल्तान का ग्रीष्मकालीन महल था जो टीक वुड से बना है. दरिया दौलत में टीपू की बहादुरी की गाथा दर्शाते
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मुंबई मेराथन - एक जोश कार्निवाल

स्टेंडर्ड चार्टर मेराथन 2010 इस बार सी लिंक से रूट होने के कारण कुछ ख़ास ही थी. जंहा बांद्रा में कई सेलेब्रिटी मौजूद थी, वंही आज़ाद मैदान में अक्षय कुमार और जोन एब्राहम ने उत्साहवर्धन किया. इस बार में भी 6 किलोमीटर ड्रीम रन दौड़ लिया . 2008 की मेराथन में
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बैंगलोर - एक फर्स्टक्लास ऐ.सी. शहर

इन छुट्टियों में यात्रा की गार्डन सिटी - बैंगलोर की.ढेरों फ़्लाइओवर तो यंहा थे ही, मेट्रो का काम भी जोरों पर है, लगता है ट्रेफिक सुगम्य होने ही वाला है, फिर तो बैंगलोर भारत का सर्वश्रेष्ठ शहर बन जाएगा, और क्यों ना बने प्रकृति ने इसे नेचुरली ऐ.सी. जो बनाया
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मुंबई का गोवा- अलीबाग

तो अब आपको बीच होलीडे के लिए मुंबई से गोवा जाने की कोई ज़रुरत नही.- मुंबई के बाजू में ही है शानदार मिनी-गोवा. अलीबाग.शुरुआत कीजिये गेटवे ऑफ़ इण्डिया के स्फूर्तिदायक नज़ारे से. और फिर बैठ जाइए केटामेरान में .गेटवे से अलीबाघ के लिए तीन सेवायें उपलब्ध हैं-
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रिमझिम और 1250 सीढियां- विरार जीवदानी यात्रा

इस रविवार किया 900 फीट ऊंचे विरार पर्वत का आरोहन जहां स्थित है 350 साल पुराना एक देवी मंदिर. वैसे अब में आस्थावान नही रहा पर कहा जाता है की यह मंदिर देवी की 50 शक्तिपीठों ( जैसे कामाक्षी, मीनाक्षी ) में से एक है. 1 लाख 20 हज़ार की आबादी वाला विरार सन
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बस जान है ज़िन्दगी

जीत ले इसे अगर जंग है ज़िन्दगी चुन ले हर ख़ुशी जो बगिया है ज़िन्दगी सीख ले जीना अगर मदरसा है जिंदगी बन के दिखा शिला गर तूफां है ज़िन्दगी कर न कोई गिला चाहे जो दे ज़िन्दगी देख ले दुनिया गर सफ़र है ज़िन्दगी बन जा खुद खुदा गर इबादत है ज़िन्दगी मेरे लिए
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में सिर्फ़ कुछ , तू सब कुछ ....

तेरे साथ का सावन एक नहीं अंखियों से सावन गिरे हज़ार कुछ है जो मुझको पता नहीं , जो पता है वो करे दिल को तार तू याद करे क्या छोड़ा तूने, मुझे मत कर ऐसा जां तू ऐसा प्यार जब एक हुए हैं हम दोनों , क्यों छुपा रखा है तूने कुछ भी यार ? मैंने माना कि बिन आग उ
Dec 29 2009 11:47 AM
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कान्हेरी गुफाएं और बोरीवली नेशनल पार्क

हमारा यात्रा दल - अशफाक सपरिवार, अवि-परी , देखें किस तरह पैर में काँटा लगने के बाद भी मुस्कुरा रहा है अशफाक पूरा कान्हेरी केम्पस बेहतरीन ट्रेकिंग स्पॉट है। अविनाश- व्यवहार से मेरा ये मित्र किसी बुद्धिस्ट मोंक से कम नही। मुंबई की भाग दोड़ से एक दिन चु
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टू-डू लिस्ट :- क्या सच में हमें पता है क्या है करना ?

किसकी क्या हो प्राथमिकता ? अपनी टू - डू लिस्ट देखता और कुछ निशान लगाता तभी मेरा माथा ठिनकता और में कुर्सी से उठता कलम मेज पर पटकता और बालकनी जा पंहुचता और सोचता- क्या में कभी सही था ? समझ पाने में प्राथमिकता जितना जीवन है बीता क्या मुझे था पता ? गया
Dec 29 2009 11:47 AM
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चाँद पे पंहुचे हम भी - एक ख़याल

चाँद पे पडी नज़र वो जा रहा था बेखबर पूछा मैंने रोककर ऐ बादलों के हमसफ़र खफा है क्यों तू इस कदर कि देखता नहीं इधर बिना जवाब के मगर चल दिया अपनी डगर अपना मन मसोस कर हम भी आ गए हैं घर उदास हैं ये सोचकर जो रहते हैं ज़मीन पर मिलना नहीं उन्हें अगर चांदनी का
Dec 29 2009 11:47 AM
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महाबलेश्वर यात्रा - घाट और वाटरफाल

महाबलेश्वर यात्रा की झलकियाँ :- चलती गाडी से लिया घाटी का विहंगम दृश्य - आगाज़ इतना दिलकश है तो आगे क्या होगा ? रेस्ट हाउस पंहुच कर एन्ना झील को निहारा आश्चर्य हुआ ये जानकर की ये एक कृत्रिम झील है। एक अँगरेज़ की सोच और महनत का नतीजा। यकीन नही होता की
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केलवे रोड - एक अनजाना बीच

मुंबई से ८० किलोमीटर दूर एक अनछुआ बीच - केलव रोड। इस यात्रा की कुछ झलकियाँ :- ...............................................................तान्या बोली - कितना अच्छा है ...................... ..........................और हमने की एक तांगे की सवारी। त
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कुल्हड़ में रसगुल्ले

एक दिवसीय इलाहाबाद यात्रा की कुछ झलकियाँ :- नेशनल हाइवे # २७ पर कुल्हड़ में बिकते गुलाबजामुन, जिन्हें रसगुल्ले कहा जाता है। आकर्षक यमुना ब्रिज बूझो तो जानें ! जान कर दुःख हुआ :- शंकर्गड़ से इलाहाबाद आते हुए सारे रास्ते में बिजली गुल थी। सिविल लाइंस र
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सब मुमकिन है

भूल जाओ मेरी शक्ल, मुमकिन है । मेरी बातें भूल जाना मुमकिन है कुछ कदम का साथ भुलाना मुमकिन है अच्छे वक़्त में याद ना करना मुमकिन है। देखा जो हमने क्या क्या मुमकिन है छोड़ दिया कहना - ये नामुमकिन है।
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बाढ़ भ्रष्टाचार और नेता

इश्वर ने बिहार को सब कुछ दिया। उपजाऊ जमीन , खनिज और मेहनती लोग। पर साथ में दिए कुछ अभिशाप। बाढ़ और भ्रष्टाचार के बहाव में विकास गंगा बह गयी और करोड़ों लोगों की किस्मत बनते बनते रह गयी। नेता पनपे, अपराध पनपा और गरीब बढे। राजनीति अवसरवाद का पर्याय हो ग
Dec 29 2009 11:47 AM
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वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन..

दिलकश आवाज़ वाले करण सिंह के रेडियो प्रोग्राम में ये गाना सुनने के बाद कुछ हुआ. एक पल भारी तो अगला पल हल्का. इस उथल पुथल भरे एहसास से निकलने के लिए लिखी ये कविता:- "मेरा ज़िंदगी में कितने लोगों से परिचय है सौ, दो सौ पांच सौ या कुछ हज़ार? ज़्यादातर अच्छे
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फोन नंबर से जली उंगलियाँ

मेरे एक मित्र मिलने आये, फोन माँगा और मेरी तरफ देखते ही देखते उन्होंने नंबर डायल कर दिया, गोया ज़नाब की उँगलियों में आँखे हों. बस तभी सूझीं ये पंक्तियाँ :- कुछ फोन नंबर थे इस कदर इश्कियां जिन्हें याद रखती थी हमारी उँगलियाँ जिनको डायल करके मिलती थी दु
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अज़ब मिला , गज़ब मिला - जो दिल की राह मैं चला

किस कदर आती थी उनको, खुद को झुठलाने की कला. दिल घिरा था भीड़ से, वो भी क्या तन्हाई थी भला जिससे पीछा छूट गया, वो दिल्लगी थी या बला? हैरान हैं ये सोच कर, उसने क्यूं खुद को छला? शायद सुकून देता है, उन्हें अफसानों का सिलसिला हमराज़ जैसा ही दिखा, उनका हम
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टू व्हीलर पे गोवा भ्रमण - कोंकण तट का स्वर्ग.

वो क्या है जो गोवा को भारत का सर्वोत्तम टूरिस्ट स्पॉट बनाता है? वो है यंहां का माहौल. हर मंज़र में मस्ती. और ये खूबसूरती हमें देखने को मिली ट्रेन से ही. आप भी देखें:- गोवा- अरब सागर के बेहतरीन बीच देखे हमने काइनेटिक होंडा पर. कमरे की खिड़की का पर्दा
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एक दिन माही के तट पर :- गल्तेश्वर यात्रा

वडोदरा से 80 किलोमीटर दूर माही नदी के तट पर मनोरम गल्तेश्वर हम पंहुचे मित्र पंकज की नयी i -10 में . डाकोर होते हुए गलतेश्वर तक की यात्रा में दिखाई दिए केले के बगीचे, शानदार स्टेट हाइवे , नया वडोदरा -अहमदाबाद 6 लेन मार्ग और कई सारे बड के पेड़ ( क्या इ
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करवा चौथ का चाँद ढूँढ़ते लिखी पंक्तियाँ

चाँद निकला इस जहां में,जाने कितनी बार मैं भी जीया और मरा हूँ ,जाने कितनी बार ऐसे अफ़साने बने हैं , जाने कितनी बार जिनपे रोया चाँद होगा जाने कितनी बार ये खुशी और ग़म मिला है , जाने कितनी बार चांदनी चुभती लगी है, जाने कितनी बार जिंदगी ऐसी कितनी कटी हैं
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ऐसा होता है क्यूं

ऐसा होता है क्यूंज़माने की ठोकर के बाद, बहुत याद आती है माँ.ऐसा होता है क्यूंजिस पे हो खुद से ज्यादा भरोसा, वही देता है धोखा.ऐसा होता है क्यूंमंदिर की सीडियां चढ़ते चढ़ते टूट जाती है आस्था.ऐसा होता है क्यूंलगता है बच्चों के सिवा, नही कोई जीने की वज़ह.ऐसा
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Sep 11 2009 07:45 AM
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एयरटेल-ग्राहक शोषण का पर्याय

हमारे देश में निजी कंपनियों को ग्राहकों को परेशान करने की खुली छूट है. मेरे प्रीपेड मोबाईल पर अचानक एक दिन बिन मांगे 'लव-टिप' एस.एम्.एस. आने लगे. और साथ में तीन रुपये काटने का सन्देश. 121 पर कल करने से कोई लाभ न हुआ तो हमने एक सर्विस सेंटर पर जाकर शिकायत
Sep 09 2009 05:52 AM
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न मैं था कभी, ना मैं हूँ अभी

नासमझ जिंदगी को पता भी नहीं कितनी साँसों की डोर है बाक़ी अभीकल का सूरज दिखेगा इसे या नहींया ये रात अब ना होगी ख़त्म कभी इस पहेली का अब कोई हल भी नहींक्यूं खफा हो गए मुझसे अरमां सभी ये ना सोचूँ में ऐसा कोई पल नहीं इस दुनिया में आया ही था क्यों में कभी किसी
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Aug 27 2009 05:52 AM
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बनयान ट्री के नीचे लिखी एक कविता

बह चली थी ये कश्ती जिस मांझी के सहारे इक दिन पड़ा दिखायी वो किसी और ही किनारे क्यों झूठ की पतवार से सफ़र तय किये सारे क्यों लगते थे वो अपने जो कभी थे नहीं हमारे ये सोच रही कश्ती, सांझ ढली, अब किसको पुकारे कश्ती ये बनी तिनका -जो बहता है बेसहारे तिनके
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मुंबई भीगा पहली बारिश में

मुंबई की बरसात कुछ ख़ास है...और ये पहली बरसात तो कुछ और कशिश लिए आयी. केमरे में कैद कुछ पल. "ये जो बूंदों में बरसता है तेरा अक्स ही लगता है जो घटाओं में कहीं बसता है वो सावन भी समझता है हर बादल में तू दिखता है साथ बूंदों के पंहुचता है तेरा एहसास मुझे
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भायंदर की खाड़ी पे एक हसीन शाम

रविवार की एक शाम मनोरम भायंदर क्रीक पर. मेंग्रोव तो दिखायी नहीं देते पर शाम सुहानी लगती है. बादलों में छुपा सूरज डूबता गया और ब्रिज से गुज़रती ट्रेनों के संगीत में भायंदर क्रीक सो गया.
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शाम , समंदर और खलिश

आज फ़िर शाम को लहरों ने भिगोया तट को आज फ़िर ओढा आसमा ने लालिमा के घूंघट को आज फ़िर डूब गया सूरज समंदर के कटोरे में आज फ़िर कसक उठी और लोहा सा पिघला दिल में आज फ़िर नाम उसका होठों तक आया, रह गया आज फ़िर पलकों के भीतर यादों का दरिया बह गया आज फ़िर गहरा हुआ ब
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माथेरान- न स्कूटर न कार न सायकल , बस घोड़े ही घोड़े

मुंबई से 108 किलोमीटर दूर लाल मिटटी का स्वर्ग- माथेरान . 800 मीटर ऊँचाई वाले इस अपार शांतिपूर्ण वृख्शाछादित सुरम्य हिल स्टेशन को देखने के लिए चलिए नेरल , जहाँ से आपको मिलती है ये नेरो गेज़ ट्रेन :- क्यों गरम चाय का आनंद लिया जाए चलने से पहले । देखें