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वैतागवाड़ी

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10 Jun 2010
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जाना सुना मेरा जाना

अर्थ बचा रहे इसके लिए ज़रूरी है कि लिपि में शब्दों के बीच दूरी बनी रहेदोनों पैर एक साथ बढ़ाता हूं तो गिर जाता हूं उछलना पड़ता है इसके लिएचल सकूं अपने पैरों को बारी-बारी आगे बढ़ाता हूंसड़क से मुहब्बत का यह आलम है उसे चोट नहीं देना चाहताफिर क्यों तुमको
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जो था, है

जो था, वह था ही नहीं रहता, है भी हो जाता है... जो नहीं था, वह भी है हो जाने को अकुलाता हैनया क्‍या है?जो नया है, वह यहां है.कहां मिलेगी?झलक यहां है, यहां मिलेगी.और यहां भी. 
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जुगनू

बहुत पहले दुनिया में सिर्फ़ रात थी, मेरी कंखौरियों में मिट्टी के दिए चिपके थे. मैं उड़ने के लिए हाथ उठाता, दिए अपने आप बल उठते. रोशनी की फुहार उठती, बरसती. मैं हाथ नीचे करता, अंधेरा फिर हो जाता. मुझे इस तरह देखने के बाद ईश्‍वर ने जुगनू बनाए. फिर भी उड़ने
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अलसाहट के बीच दस साल पुरानी तस्‍वीर

'मेरे मन टूट एक बार सही तरह, अच्‍छी तरह टूट मत झूठमूठ ऊब मत रूठ, मत डूब सिर्फ़ टूट' रघुवीर कह गए थे. मन टूटा हुआ है, जबकि चाह थी कि ये दिन टूटें. इन दिनों को घुटने पर रखकर ऐसा झटका मारा जाए कि टूटकर दो टुकड़े हो जाएं. दिन नहीं टूट रहे. घुटना टूट रहा है.
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एक पुरानी यात्रा की यादें - ४

(पिछली पोस्ट से आगे)अगले दिन होली है और मैंने उनकी नाप के कुरते पहले ही से ले कर रखे हैं। दोनों के चेहरों पर पहला रंग घर में ही लगाया जाता है। फिर लोगों का आना शुरू होता है और शुरूआती हिचक और संकोच के बाद दोनों ने रंग लगाने और गले मिलने का तरीका सीख लिया
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पुरानी, बहुत पुरानी, मेरी स्मृति से पुरानी नहीं पर

ठीक-ठीक याद नहीं है कि यह तस्वीर किस वर्ष की है, शायद 98 या 99; पर इस मुलाक़ात की यादें हैं. मुंबई में कवि अनूप सेठी का घर है, कुमार वीरेंद्र, संजय भिसे और गुरुदत्त पांडेय की कविताएं हैं, राकेश शर्मा जी की छेड़छाड़ है, रमन‍ मिश्र-शैलेश के ठहाके हैं, अनूप
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मध्‍य-वर्ग का मर्म-गीत

यह श्री गुरु गोबिंद सिंह हिंदी प्राइमरी स्‍कूल में पढ़ाई जाने वाली राइम्‍स में से हैअम्‍मा-बाबा-दादी टाइप के संबोधनों वाले बूढ़ों के ज़माने के कांपते गीतों में सेकिसी की मौज या शग़ल है ताल-बेताल-क़दमतालओह, देखो-देखो, अब भी वही सिंदूर तिलकित भालया पूरे
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अंधेरे में कोहरा

हर पलंग के पास एक बुरा सपना होता है. कमर टिकाते ही जकड़ ले. हर घर में कुछ बूढ़ी रूहें रहती हैं. रात की नीरवता में किचन में कॉफ़ी की गिरी बोतल उठाने में पीठ पर आ लदें. हर नींद में एक ग़फ़लत होती है और हर ग़फ़लत एक भय को साथ ले आती है. सच होने का बीज ह
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फिर कविता के बारे में

पिछली पोस्‍ट पर कुछ बातें उठी हैं, उनके बारे में अपनी राय जल्‍द ही; इस बीच पोलिश कवि चेस्‍वाव मिवोश का एक टुकड़ा, जो कि उनकी किताब 'न्‍यू एंड कलेक्‍टेड पोएम्‍स: 1931-2001' (संस्‍करण : 2003) की प्रस्‍तावना से लिया गया है. I strongly believe in the pas
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आज की कविता के बारे में

आज की कविता के बारे में कुछ भी बोलने से पहले मैं उस समाज के बारे में सोचता हूं, जिसमें मैं रहता हूं, जो कि बोर्हेस के शब्‍दों में ‘स्‍मृतियों और उम्‍मीदों से पूर्णत: मुक्‍त, असीमित, अमूर्त, लगभग भविष्‍य–सा’ है; मैं उस भाषा के बारे में सोचता हूं, जिसम
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जो मार खा रोईं नहीं

विष्णु खरे की कविता ‘जो मार खा रोईं नहीं’ का एक ख़याल-पाठ हिंदी कविता के पारंपरिक काव्‍य-आस्‍वादन-पठन-अभिरुचियों की रूढ़ता को विष्‍णु खरे की कविता जिस तरह-जितनी बार-जितने तरीक़ों से तोड़ती है, उनकी कविता के बारे में उतने ही रूढ़ शब्‍द-क्रम में बात की
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सेल्फ पोर्ट्रेट

एडम ज़गायेवस्‍की की एक और कविता कंप्‍यूटर, पेंसिल और एक टाइप राइटर के बीच  गुज़र जाता है मेरा आधा दिन। एक दिन गुज़र जाएगी आधी सदी। मैं एक अजनबी शहर में रहता हूं और कई बार  अजनबियों से ऐसे मुद्दों पर बात करता हूं जो ख़ुद मेरे लिए अजीब होते ह
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वर्मीर

यान वर्मीर की पेंटिंग और एडम ज़गायेवस्‍की की कविता वर्मीर की नन्‍ही लड़की जो अब काफ़ी प्रसिद्ध हो गई है मुझे देखती है. एक मोती देखता है मुझे. वर्मीर की नन्‍ही लड़की के होंठ सुर्ख़, नम और चमकीले हैं ओह वर्मीर की नन्‍ही लड़की, ओह मोती नीली पगड़ी : तुम
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narimi narimi said the bird

Nadia Danon.  Not long before she died a birdon a branch woke her. At four in the morning, before it was light, narimi narimi  said the bird.What will I be when I’m dead? A sound or a scentor neither. I’ve started a mat. I may still finish it.
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Nov 04 2009 03:12 PM
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चंदन का ब्‍लॉग

उसका कहना है कि उसका नाम चंदन पांडेय है और वह कहानियां लिखता है. और यह भी कि वह बार-बार कही गई बात को एक बार फिर कह देने में कोई गुरेज़ नहीं करता. हम उसके कहे हुए को सच मानते हैं. लेकिन जब वह ब्‍लॉग बनाता है, तो उसका नाम 'नई बात' रखता है. यह एक शालीन
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इस साल किसे मिलेगा नोबेल?

लेबनान के उपन्यासकार इलियास खौरी, (जिनका उपन्यास ‘गेट ऑफ़ द सन’ पिछले दिनों पढ़ी सबसे अच्छी किताबों में से एक मानता हूं) ने ओरहान पामुक को नोबेल पुरस्कार की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद एक लेख लिखा था, जिसमें कुछ ऐसा याद किया था- ‘2005 में जिस समय नोबेल
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आत्मकथा के विरुद्ध

कमरे में घुसते ही उसे देखा. वह, सोफ़े के पास जो एक कॉर्नर रखा है, जिस पर अमूमन एक ट्रे में पानी से भरी मेरी केतली रखी होती है और पास ही हरे रंग का एक मग औंधा, और जहां अक्सर मेरे उंड़ेले जाने से कुछ बूंदें गिरी होती हैं, इन सबकी अनुपस्थिति में वह बैठी
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दान्‍सा दान्‍सा

जब कोई आपको नाचता देखना ही चाहता हो, तो क्‍यों नहीं बत्तियातो की स्‍टाइल में पूछता. क्‍यों नहीं कहता-  वोयल्‍यो वेदर्ती दान्‍सारे, कोमे ले ज़ीन्‍गारो देल देत्‍ज़र्तो... क्‍यों नहीं, बोलो, क्‍यों नहीं ?
Sep 25 2009 12:50 AM
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जब उसका मन भर जाता है

उसका कोई एक नाम नहीं है। वह किसी एक शहर में नहीं रहती। उसका कोई एक देश नहीं है। वह अपने लिए किसी ब्रह्मा की मोहताज नहीं, वह अपना विधान ख़ुद लिखती है। शिव की ज़रूरत भी नहीं, विष्णु की भी नहीं। वह ख़ुद ही पालती है ख़ुद को और अपनी ही तीसरी आंख के सामने खड़ी
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Sep 20 2009 03:40 AM
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द क्‍वेस्‍ट फ़ॉर द सेल्‍फ़

All novels, of every age, are concerned with the enigma of the self.Man hopes to reveal his own image through his act, but that image bears no resemblance to him. The paradoxical nature of action is one of the novel’s great discoveries. But if the self
Sep 18 2009 01:17 PM
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कज़ुओ इशिगुरो : संगीत हमसे वादा करता है

हर सुख के लिए संगीत है, हर दुख के लिए भी. सांध्‍यसंगीत में उदासी और अवसाद जाने क्‍यों आ जाता है. मैंने किसी के लिए सेरेनेड जैसा कुछ नहीं बजाया कभी. आता भी नहीं. सेरेनेड सुने हैं, पढ़े हैं. और महसूस किया है, रात के वीराने में अकेली गूंजती हुई वायलिन की
Sep 03 2009 02:18 AM
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बाबा बोर्हेस

कविता लिखने के उतने तरीक़े, गुण-धर्म या सिद्धांत हो सकते हैं, जितना कि दुनिया-भर में कवि.Time is the substance from which I am made. Time is a river which carries me along, but I am the river; it is a tiger that devours me, but I am the tiger; it is a
Aug 10 2009 01:53 AM
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तीन अज़रबैजानी गाने

सब्र हो तो सुनें, कुछ याद आता है क्‍या? Powered by Podbean.com----------------- Powered by Podbean.com-----------
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Aug 07 2009 02:55 AM
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तुम्‍हारा शुक्रवार

तुमने कहा था कि तुम पेड़ इसलिए नहीं होकि तुमने कभी पत्‍ते नहीं पहनेफिर भी मैं तुम्‍हारी छांव में बैठाऔर तुम्‍हारे पत्तों से ढंका अंधेरा देखामैं तुम्‍हारी तस्वीर कभी नहीं बना सकताकुछ आकार मैंने इससे पहले कभी नहीं जानेइतने ज़्यादा कोण मिल जाएं तो सिर्फ़
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Jul 27 2009 02:36 AM
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ट्रेन में एक शाम

वह जिस तरह लेटा था, उसे युवा हो जाना चाहिए था. वह स्‍त्री इस तरह उस अधेड़ की मां लग रही थी. बाहर कुछ नहीं दिख रहा था. ट्रेन को पता था, कहां जाना है, इसीलिए वह बिना हांफे दौड़ रही थी. खिड़की पर टंगा परदा अचानक उठ जाता, पर हवा जैसी कोई चीज़ नहीं आती. व
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उस देखे की मौन भाषा

व्‍यास हिमाचल को रूप देती है, आकार देती है. शील, सैन, संस्‍कार देती है. व्‍यास तीरे मैं उसे देखता रहा, सुनता रहा. कहते हैं कि वशिष्‍ठ ने पुत्रशोक से विह्वल होकर अपने को रस्‍सी में बांध यहीं-कहीं व्‍यास में छोड़ दिया था. इस गंभीरा नदी ने वशिष्‍ठ को पाश
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सेब का लोहा

पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर जब वह अपने आग होने से थक जाती है गिरते हुए कंकड़ को अभय दे अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने
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मेरी लम्‍बी कहानियां

अपनी लंबी कहानियों के लिए मेरे भीतर कुछ वैसा ही त्रास भरा स्‍नेह रहा है, जैसा शायद उन मांओं का अपने बच्‍चों के लिए, जो बिना उनके चाहे लम्‍बे होते जाते हैं- जबकि उम्र में छोटे ही रहते हैं. ऐसी कहानियों को क्‍या कहा जाए, जो कहानी की लगी-बंधी सीमा का उल
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माउथ ऑर्गन

भूले को फिर याद करने के सिलसिले में याद करता ढंग से माउथ ऑर्गन बजाना देर तक की पीं-पीं सुनता भाषा सीखने के क्रम में ता-ता करते बच्चे की कोशिश जैसे कैलेंडर पर गोले लगे दिनों को छोटे-छोटे छेदों से पार कर दूं ऐसे कि लय की गांठ में बांधूं इलेक्ट्रॉनों-सी
Dec 09 2008 02:54 PM
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अतल में

हर उदासी की शुरुआत तालियों से होती है. सबसे होहराती धुनों में भी उदासी खोज लेता हूं. कितौ धुनें ही खोज लाती हैं और सामने पटक देती हैं. गिरकर छितराई हुई उदासी, जो गिरने के बाद भी चढ़ी रहती है. यानी इसी तरह उदास करता है. उसके यहां जो पियानो बजता है, या
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साथ-साथ क्‍यों नहीं?

मेरी बातों में छल्‍ले बनते थे और तुम्‍हारे बालों में. जब मैं सिगरेट का धुआं उड़ाता था, तो उससे भी छल्‍ले बनते थे. लोग कहते कि इसकी बातों के छल्‍ले में मत पड़ना, हसंते-हंसते फंसा लेता है. मैं कहता था, दरअसल, बात के छल्‍लों से ज़्यादा घातक तुम्हारे बाल
Oct 24 2008 04:57 AM
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??? ??? ??? !!!

आइला झप्‍पा आइला झप्‍पा बड़े सिपाही जी का ढेटा हुड़ हुड़ हुप्‍पा फूल के कुप्‍पा बड़ा सिकंदर वाह वाह. %^%777&&&889534
Oct 15 2008 04:07 PM
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जैसे सांस

धूप के कटोरे में पड़ी पानी की बूंदें भाप बन जाती हैं जैसे हवा बन जाते हैं मेरे शहर के लोग शहर एक बुरी हवा था मुहल्ले-पाड़े जैसे आंच के थपेड़े बुख़ार के फेफड़ों से निकली उसांसें थीं गलियां इन गलियों में जीवाणुओं की तरह रहते थे लोग जिनकी आबादी का पता द
Oct 08 2008 11:35 AM
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ब्‍लॉग जगत में कुमार अंबुज का स्‍वागत है...

हिंदी कवि कुमार अंबुज भी अब ब्‍लॉग जगत में आ गए हैं. नवें दशक में कविता की जो पीढ़ी आई, उसमें कुमार अंबुज मुझे सबसे गहरे कवि के रूप में दिखते हैं, प्रभावित करते हैं और प्रेरित करते हैं. 'कुमार अंबुज' नाम से ही अपना ब्‍लॉग, उन्‍होंने कुछ दिनों पहले बन
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अंधेरे की परिक्रमा

थकान इतनी छायादार हो सकती है, उससे पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। मैं थकान के नीचे लेट गया। आंखें बंद किए। निर्मल जी की एक पंक्ति दिमाग़ में लगातार गूंजती रही- `जीवन में असफल होने का फ़ायदा यह है कि मेरे पास अपने होने के अलावा और कुछ नहीं है, और मेरे पा
Sep 30 2008 05:41 PM
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इमरे कर्तेश की दुनिया से बाहर

कहते हैं कि इमरे कर्तेश को पढ़ने के तुरंत बाद वैसे भी कुछ करने का मन नहीं करता. एक अजीब कि़स्म का अवसाद, घुटने मोड़कर बैठी हुई चुप्पी, हथौड़े की तरह पूरे वजूद पर आ गिरा अकेलापन, अपने होने पर सकुचाता कोई लजीला संवाद, अचानक चीख़ में बदल गई कोई कराह और
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नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी

कर्ट कोबेन और बोरिस रीज़्झी में क्या समानता है? रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अ
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चादर, पैर और दिल्ली की डकार

दिल्ली एक बहुत बड़ी चादर लग रही थी, जिसमें से अनगिन पैर बाहर निकले हुए थे. चादर में न अंट पाने का दोष पैरों को देना ग़लत है. नींद में ग़ाफि़ल उन लोगों को खोजना चाहिए, जिन्होंने चादर का ऊपरी सिरा कहीं दांतों में खोंच रखा है. मैं पैदल चलता था और दिल्ली
Sep 09 2008 03:26 AM
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झोंक या झक का आज-टाइप रंग

जो नहीं समझ सका तुम्‍हारी चुप्‍पी व‍ह क्‍या समझेगा तुम्‍हारे बोल? कितना बुरा था यह सुनना मैं तुमसे प्‍यार करता हूं हंड्रेड परसेंट और सच है ये सच हंड्रेड परसेंट नहीं, कहन का तरीक़ा नहीं था यह माप लेने की नपी-तुली साजि़श थी अब कम से कम आसमान से गिरती ह
Sep 07 2008 07:21 PM