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Kuchh kahi kuchh unkahi

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15 Mar 2010
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कैसे गाऊं प्रेम के गीत

कैसे गाऊं मैं प्रेम के गीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत ।अवरुद्ध हो वाणी मेरी सीने के भीतर घुट रही है,दुनिया मेरी मेरे ही हाथों देखो कैसे लुट रही है,हार में तब्दील हो गयी जीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत।कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,आज मुझसे रूठ कर वो तो
Mar 15 2010 09:27 PM
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मेरे महबूब तुम मेरे बिन नहीं रह पाओगे

(एक इरादा किया अपने पुराने दिनों को पुनर्भ्रमण करने का.बहुत सारी कवितायेँ हैं जो उन् दिनों की हैं जहाँ व्यक्तित्व में ठहराव नहीं था। अपनी संवेदनशीलता को लिख कर मैं खुद को उबारता था अपने एकाकीपन से। ये कविता १९८५ से १९९० के बीच लिखी गयी हैं। डायरी के
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शोर - धुआं - और चीख

ये पंक्तियाँ वर्ष 1९८४-८५ के चंद महीनो की तकलीफ से निकली थी , जिन्हें मैंने कलमबद्ध किया था...अब इससे अपलोड कर दुनिया के सामने ला रहा हूँ....*******************************************************************************************शोर - धुआं - और चीख ,
Mar 14 2010 11:07 AM
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जब दर्द पल रहा सीने में

जब दर्द पल रहा सीने में,तब मज़ा आ रहा जीने में ।खून पानी में तब्दील हुआ ,बदन गला और बहा पसीने में।दिल टुकड़े हो कर बिखर गया,हम जुट गए उसको सीने में।जब दर्द का दरिया उफन गया ,तब छेद हो गया है सफीने में।आंसू को जब से मय है समझा,मज़ा आ रहा है उसे पीने में।
Mar 13 2010 10:16 PM
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यह जीवन है एक भार प्रिये एवं अन्य कवितायेँ

यह जीवन है एक भार प्रिये। थी तृषा जगी मन में मेरे,औ' प्यास कहाँ बुझ पाती है,जल की चाहत में भटक रहा,मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये।जो दूर कहकशां सा दिखा, तो मन मयूर सा नाच उठा,पर पास जो जाकर देखा तो,पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन है
Mar 12 2010 09:12 PM
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आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये, यूँ रात की तीरगी ऐसे न बढ़ाया कीजिये।आपके छूते ही पत्थर भी हो जाता है आदमी ,मेरे दुश्मनों की फौज यूँ न बढाया कीजिये।जिंदगी की राह में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं बिछे,पांव नाज़ुक हैं आपके, उन्हें न उतारा कीजिये।मैं नहीं
Mar 07 2010 06:00 PM
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चुप चुप से हो गुमसुम से हो

चुप चुप से हो गुमसुम से हो,मुझसे बातें क्यूँ नहीं करते हो,इतना दो बता दो मुझको क्या तुम आज भी मुझपर मरते हो।गर्म हवा सी चलती है और मौसम पतझड़पतझड़ सा होता है,गुस्से में जब तुम होते हो और फिर लम्बी लम्बी साँसे भरते हो।प्यार से जब बातें करते हो तो मन में
Mar 07 2010 05:54 PM
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मुबारक हो तुमको शादी की २२वीं सालगिरह

आज विवाह की २२वीं सालगिरह पर यह कविता है तुम्हें समर्पित,जिसने अपना यह जीवन मुझको कर दिया है पूर्ण रूप से अर्पित, मेरी हर सुख सुविधा का ख्याल रक्खा,कष्ट हरा सब मेरा जिसने,जिसके बिन मेरे जीवन का हर पल लगता ऐसे बीते जैसे हो
Mar 06 2010 02:03 PM
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मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं,और फिर मुझे तेरी यादों से नहलाती हैं।वो जो खुशबु का झोंका गुज़रा मेरे पास से ,तेरी जुल्फों की कैद से छूटी हवा कहलाती हैं।आँखें खुली रहती हैं तो दिखता नहीं कुछ भी ,बंद आँखें ही तो मुझे सबकुछ अब दिखलाती हैं।चीड़ों की
Mar 05 2010 11:02 AM
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है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द । वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो
Mar 05 2010 09:42 AM
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मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,उनकी खातिर ही सही
Mar 03 2010 08:40 PM
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कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे ......

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे, कुछ तेरी बात सुनु,तेरे होठों पे खिलते गुलाब की कलियों को मैं चुनु।रात सोता सोच के तुमको सुबह उठूँ तेरा नाम लिए,फिर दिन भर तेरी तस्वीरों से मैं बातें ढेर करूँ।तेरी ही यादें दे जाती हैं मेरी सूनी आँखों में आंसू ,अपनी पलकों पे
Mar 03 2010 10:26 AM
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कुछ पल तुम बैठो पास मेरे......

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे, और कुछ बातें मुझसे ख़ास करो,मुझको छूकर मुझको पाकर, तुम मुझको फिर से सुवास करो।मैं चातक बन कर वर्षों से बैठा, तक रहा तुम्हारी ओर प्रिये,तुम स्वाति बूँद बन कर बरसो और मेरे दुःख का नाश करो।मेरा जीवन तो है सूना सूना पतझर पतझर और
Mar 02 2010 07:21 PM
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जब याद तुम्हारी आती है

जब याद तुम्हारी आती है,तब हम माजी में खो जाते हैं ,आँखें बंद करके हम फिर , तेरे तसव्वुर से लग सो जाते हैं।जग जाते हैं तेरी आहट से, तेरी खुशबु से तर हो जाते हैं,तुम सांस जो लेते हो पास मेरे, हम उस पल को जी जाते हैं।तुम चलते हो तो चलती रहती है धड़कन मेरे
Mar 02 2010 06:41 PM
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खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर
Mar 01 2010 07:22 PM
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सूरज को माथे पर बिंदी सा सजाया कीजिये

ख्वाब में मुझको रोज़ बुलाया कीजिये , चैन से रोज़ खुद को सुलाया कीजिये।एक दफा खुदा से मांग लो मुझको,फिर हर दफा मुझको यूँ ही पाया कीजिये।आपकी जुल्फें घटायें हैं सावन की, अपने चाँद से मुखरे से घटा हटाया कीजिए। सूरज आपकी खतिर उगा है लाल, अपने माथे उसको बिंदी
Mar 01 2010 11:37 AM
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जीवन एक भार,मन की व्यथा एवं दर्द का सागर

यह जीवन है एक भार प्रिये! थी तृषा जगी मन में मेरे पर प्यास कहाँ बुझ पाती है, जल की चाहत में भटक रहा, मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये! जो दूर कहकशां सा दीखा, तो मन मयूर सा नाच उठा, पर पास जो जाकर देखा तो पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन
Feb 26 2010 06:16 AM
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एक सन्नाटा पसरा हुआ

सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ - तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।पर , मेरे हाथ ज्यूँही
Feb 24 2010 09:14 PM
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जादू सा छा रहा है,कोई मुझमे समा रहा है

जादू सा छा रहा है ,कोई मुझमे समा रहा है।जुल्फों में कैद बादलों को, सावन बना रहा है।चलने से उसके हर शू , आ जाती है बहारें,मरुभूमि में भी चल कर,मौसम बदल रहा है।पलकें उठा के अपनी, देखो ले आता है सहर वो पलकें गिरा ली उसने तो, बस तारीक छा रहा है।आवाज़ है उसकी
Feb 23 2010 09:10 PM
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तुम्हारी ही खातिर

उनको हम अपने दिल में छुपाये बैठे हैं,सारी दुनिया से जैसे उनको चुराए बैठे हैं।खुदा का नूर टपकता है उनके चेहरे से,इसलिए उनको तो हम खुदा बनाये बैठे हैं।उनकी रंगत जैसे सुबह की धूप खिली, हम खुद को उस रंग से नहलाये बैठे हैं।वो आईना है सब कुछ बता देता है
Feb 22 2010 02:10 PM
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मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर
Feb 21 2010 03:45 PM
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कुछ गजलें (भाग एक)

(ये ग़ज़लें मैंने वर्ष १९८९ से १९९१ के बीच अपने अकेलेपन से जूझते हुए लिखी थी.इन् गजलों की एक एक पंक्तियाँ मेरी भावनाओं का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं...शब्द उन्हें हो सकता है बयां करने में असमर्थ हों ,पर उनसे उनकी परिभाषा पर असर नहीं पड़ता .उम्मीद है आपको पसंद
Feb 21 2010 03:43 PM
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श्रिष्टि : कर्ता और कृति

यह स्केच मई १९८८ में मैंने बनाया था। इसमें मैंने ब्रम्हा ,विष्णु और महेश तीनो को कर्ता के रूप में प्रतिरूपित कर उसकी कृति को उसी में समाहित कर दर्शाने की कोशिश की है।-निहार, मई १९८८.
Feb 12 2010 11:56 AM
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हरी आँख का समंदर

(वर्ष १९८८,मई की तपती धूप और उनकी याद..बस खींच दी कागज पे चाँद लकीरें और लिख दी दिल की बात यूँ एक कविता के रूप में जो आपके लिए नीचे प्रस्तुत है।) सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ - तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है, दिन भर की थकान हवा में गुम हो जाती
Feb 09 2010 08:19 PM
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' द ट्रिनिटी '

यह चित्र वर्ष १९८८ में फुर्सत के उन क्षणों में बनाया गया था जब मेरे लिए ब्रह्मा विष्णु और महेश यानि की पूरी सृस्ती एक आकार में ही समाहित थी..मैंने कोशिश की है, की तीनो प्रमुख देवताओं को सांकेतिक रूप से ही सही यहाँ इस चित्र में ढाल एकाकार कर दूँ...(नीहार,
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अथ चोर पुराण एवं अन्य कवितायेँ

चोर बना सिपाही घर का,देख मेरा वाम अंग फड़का। कहा चोर ने प्रथा यही है, राजा और रंक की यारों जो चोरी में हो निष्णात, उसके गले पुष्पहार डारो, औ' ईमां का गला घोंट कर,छह फुट नीचे ज़मीं के गाड़ो, तभी देश की गाड़ी आगे बढ़ेगी, नहीं रहेगा कोई भी कड़का। देख मेरा वाम
Feb 07 2010 02:55 PM
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सभ्य समाज की विरूपता और आदमी का व्याघ्र मन

(वर्ष १९८८ में मैंने यह ऊपर वाला चित्र खींचा था अपनी डायरी के एक पन्ने पर.यह चित्र हमारे समाज की विरूपता एवं उस समाज में रहने वाले आदमी के भीतर के हिंसक व्यक्तित्व (जिसे मैंने व्याघ्र मन का नाम दिया है) को दर्शाती है।उसी दौरान मैंने कुछ कवितायेँ भी लिखी
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Kuchh kahi kuchh unkahi

जब भी मैंने अपनी अभिव्यक्ति को -शब्दों के जंगल में - निःशब्द घूमने के लिए छोड़ दिया है,मुझे एक ही एहसास हुआ है की मैं,एक बेजुबान आदमी - सिर्फ देख सकता , सुन सकता और,सूंघ सका हूँ......पर कह नहीं सकता कुछ भी।क्युंकी, शब्दों के जंगल में,सिर्फ और सिर्फ आदमखोर
Feb 01 2010 06:36 AM
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एक दूजे के लिए

(यह कृति जून १९८८ में मैंने बनाई थी और इसका नाम दिया था "मेड फॉर इच अदर"(एक दूजे के लिए)..)जाहिर है यह कृतित्व मेरे व्यक्तिगत भावों को दर्शाता है ..नीचे इस से जुडी एक छोटी सी कविता भी है ,जिन्हें मेरे दिल की धरकनो ने बुना, हाथों ने कलम उठाया, कागज़ पे
Jan 31 2010 06:53 AM
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रौशनी का प्रतिनिधि

मुझे - यानि सिर्फ मुझे - एक अँधेरे ने जकड़ रक्खा है ,अपने मजबूत हाथों में पकड़ रक्खा है।वे जानते हैं की मैं समरथ हूँ - सूरज अपनी हथेली पर उगा सकता हूँ,और, धुप की चाशनी में खुद को पका सकता हूँ।वो ये भी जानते हैं कि ,जिस दिन सूरज कि खेती शुरू हो जाएगी,उस दिन
Jan 26 2010 12:53 PM
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और मेरा खून खौल उठता है...

की कभी सोचा है -की, कैसा लगता होगा -मलमल के कपड़ों में सज, कड़ी की विशेषताओं पे बोलना।या, विदेशी 'बो" बंधे कंठ से स्वदेशी अंग वस्त्रं पहनने की सलाह।या, फ्रेंच अतर में नहा कर देशी दुर्गंधी पर एक अभिभाषण।या, मुर्गे की एक पूरी साबुत टांग अपनी दांत से नोचते
Jan 25 2010 10:27 PM
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मौन की समिधा

हैं दिशाएं चुप की बस अब मौन की समिधा जलेगी,मनुष्य के अंतःकरण में समय की दुविधा पलेगी,ज़िन्दगी का अर्थ कोई जान पाया है कहाँ तक,ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी ।जल रहे हैं सभ्यता के गरिमामयी अवशेष सारे,टूट कर गिरने लगे हैं संस्कृति के पुंज
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तुम्हारी याद

यूं मुझको याद आती है तुम्हारी ,ज्यूं सर्दियों की धुप में जैसे खुमारी,जैसे किसी मासूम की कोमल हँसी,जैसे किसी नवजात की बस किलकारी ।जैसे किसी झरने ने गाया एक तराना,जैसे कोई बारिश बरस जाये सुहाना,जैसे भवरें गुंजायमान हों बाग़ में,जैसे रंग बिरंगे फूलों से पट
Jan 17 2010 12:43 PM
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नाद ध्वनि

जब भी कुछ लिखना चाहता हूँ,मेरे भीतर कुछ खुदबुदाता है ,कुछ कुरेदता है मेरे दिल को ,नाखुनो में भरी मिटटी नम / गीली होती है।शायद,निर्माण की क्रिया अभी अधूरी है,शायद,निर्माण की प्रक्रिया चल रही है,शायद........शायद ....शायद,और, इस निर्माण - प्रतिनिर्मान -
Jan 16 2010 07:00 PM
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विघ्न हर्ता

यह चित्र मैंने वर्ष १९९८ में उकेरा था । हाई टेक पेन से चित्र को अंकित करने की आदत को अपनी अर्धांगिनी द्वारा दिए गए प्रोत्साहन की बदौलत मैंने वाटर कलर में बदलने की नाकाम कोशिश की है। अपनी कृति है इसलिए पसंद है। उम्मीद है आप सब को भी पसंद आएगा। _ निहार खान
टैग: vighnaharta
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वक्रतुंड

यह चित्र मेरे उन् कई गणपति के पेन स्केच का एक हिस्सा है जिसे रंग भर मैंने अपने घर के दीवार पे टांगने की हिम्मत जुटाई । इसे भी मैंने वर्ष १९९९ में ही चित्रित किया था... --निहार खान
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तुम्हारी लटें, मेरा ख्याल और चाँद रात

उलझी लटों को आओ मैं संवार दूँ,आओ मैं जी भर के तुम्हे प्यार दूँतुम चाँद बन मेरा घर रोशन करो, मैं आसमान बन के तेरा सत्कार करूँ।यूँ तो तुझसा है नहीं कोई सुन्दर यहाँ पर,फिर भी आ तेरा मैं नित नया श्रृंगार करूँ।तेरे होठों पे सजा दूँ खुशबु-इ-गुलाब की,तेरी आँखों
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Kuchh kahi kuchh unkahi

तुम्हारी आँख के समंदर में डूब जाता हूँ,दिन रात बस तुम्हारे ही गीत मीन गुनगुनाता हूँ।जब यादों की तपती धूप झुलसाने लगती है हमें,राहत-ऐ -जान के लिए अपनी आँखों से सावन बरसाता हूँ।तेरी जुल्फों से चुरा लाता हूँ घनी काली बदलियाँ मैं ,तेरे होठों पे गुलाब की
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Kuchh kahi kuchh unkahi

मुझको एक रात उधार दे दो,अपनी साँसों का उपहार दे दो।मैं ढून्ढ रहा तुमको इस बेजुबान शेहेर में दिन रात,तुम कहीं से दौर के आओ और मुझे अपना दीदार दे दो।यूँ तो हेर मौसम में आज कल खिल जाते हैं फूल ,तुम आके उन् फूलों को रंगत-ऐ -बहार दे दो।कभी बादल, कभी चाँद, कभी