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Kuchh kahi kuchh unkahi

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31 May 2010
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गनीमत है की दिन के बाद रात होती है

गनीमत है की दिन के बाद रात होती है, उनसे कुछ पल ही सही मेरी बात होती है।ख्वाब में ही दिखते हैं आजकल वो अक्सर ,उनसे यूँ ही हर दिन मेरी मुलाकात होती है।भींगी जुल्फों को जब भी जोर से झटकती हैं मेरे घर बिन बादल ही फिर बरसात होती है।उनसे मिलता हूँ तो बातें
 
VIJUY RONJAN
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भविष्य : एक प्रश्न

सारा माहौल ही बदरंग हो गया है,चोर और सिपाही का संग हो गया है।राज करना चाहते हो तो आओ सुनो ,भीख में वोट मांगना ढंग हो गया है।एक कुर्सी के कई दावेदार हैं यहाँ पर,बेटे और बाप में ही जंग हो गया है।क़त्ल करना अब कोई अपराध है नहीं,क़त्ल तो राजनीति का अंग हो गया
 
VIJUY RONJAN
Apr 19 2010 10:12 PM
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खामोश दर्द

ख़ामोशी भी दर्द से रिश्ता जोड़े है पछताए है,चुप चुप रह कर चुपके चुपके,घुल घुल कर मर जाए है।हूक सी उठती है दिल में तो आँखें खून रुलाती हैं,प्यास अगर जन्मों की हो तो प्यासी ही रह जाती है,समझ के सब कुछ भी न समझे,न समझ के भी समझाए है।कांच के किरचों सी आँखों
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तुम्हारे लिए

तेरी आँखों से जो देखूं दुनिया मुझको रंग रंगीली लागे,रात चाँद बन उतरे अंखियन ,सूरज पलकन पे है जागे।तेरे अलकों में बंध कर हम , खोज रहे हैं खुद को कब से,तेरे स्नेह में पिरो गए हम , जैसे पिरोई हो सूई में धागे।**********************************************एक
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कविता की प्रासंगिकता

मैं किनका कवि हूँ - यह मुझे नहीं मालूम,पर यह सच है - और, मैं इससे अच्छी तरह वाकिफ हूँ,की मेरी कविता -शब्दों की नंगी दौड़ नहीं है।यह सिर्फ 'खुलेपन' को फैशन के तौर पर नहीं देखती, वरन जीती है उस अहसास को खुलकर।मेरी कविताओं की अपनी प्रासंगिकता है - अपनी
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खामोश अदालत अभी जारी है

आज की रात बहुत ही भारी है, मेरी गर्दन है और उनकी आरी है।बोया था फूलों का बीज हमने , जो उगी है वो कैक्टस की झारी है।गरीबी, भूख ,हिंसा बढ़ रही, देश की कागज़ी प्रगति फिर भी जारी है।डब्बे में बंद लोग बढ़ते जा रहे हैं, ढलान पर इस देश की गाडी है।हर जगह
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निरर्थकता का रिश्ता

हो सकता है मैं तुमसे कुछ सवाल करूँ -मुझमें अनंत जिज्ञासा है।लेकिन मैं जानता हूँ - की जब तुम,उत्तर देने लगोगे - तो मेरे दोनों कान बहरे हो जायेंगे -तुम्हारे समाधान कुछ भी नहीं दे पायेंगे मुझे।जो भी खोजना है - जो भी पाना है - जो भी घटाना है और बढ़ाना है
Apr 03 2010 03:35 PM
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उनके जाने से मौसम रंगत बदल रहा है.

नम हुयी आँख मेरी और दिल बैठा जा रहा है,या खुदा उनके जाने का दिन करीब आ रहा है।घर आये तो रौशनी का झूमर खिल उठा जैसे,उनके जाने का ख्याल मुझे अब खाए जा रहा है।उनके क़दमों की आहट सुन बुलबुलें गाने लगी ,उनके जाने की बात सुन कोई मर्सिया गा रहा है।वो आये तो जैसे
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Kuchh kahi kuchh unkahi

मैं -एक दिन राख हो जाऊँगा श्मशान में -या, गाड दिया जाऊँगा कब्रिस्तान में -या, किसी ऊंची मीनार पे रख दिया जाऊँगा,ताकि मरने के बाद भी मैं काम आ सकूँ,उन पक्षियों के , जो मुझे पचा सकें।पर, -फिर भी, मैं जीवित रहूँगा -एक एहसास बन, उन दिलों में -जिन्हें मैंने
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कविताओं का विद्रोह

उस वक़्त मेरी कवितायें,मुझसे विद्रोह कर देती हैं,जब मैं उन्हें प्रसंगों से जोड़ नहीं पाता।पर मैं उन्हें क्या समझाऊं? - कितना समझाऊं?-की - जो आजीवन प्रसंगों से खुद कटा कटा सा रहा -अपने मन के कई भागों में बँटा बँटा सा रहा -अपने अतीत के साए से सटा सटा सा
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खाली हाथ

तुम सोच रहे होगे - की,जब भी मैं आता हूँ - खाली हाथ ही आता हूँ।इस बार भी,मैं खाली हाथ ही आया हूँ।वैसे, आने से पहले - इस बार,मैंने भी सोच लिया था,की -नहीं जाऊँगा खाली हाथ मैं।पर, हूँ ना आदत से मजबूर - ,इसलिए,आ ही गया मैं फिर से खाली हाथ -मैंने सोचा था -
Mar 28 2010 04:54 PM
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कुछ उलझी कुछ सुलझी लट

कुछ उलझी कुछ सुलझी लट को आओ मैं सँवार दूँ,बाहों में भर लूँ तुमको और जी भर तुमको प्यार दूँ।मुझको नशा तेरी आँखों का है जिनमे डूबा रहता हूँ,सागर जैसी इन आँखों को आ मैं कजरे की धार दूँ।पतझड़ के मौसम में जब नग्न हो जाएँ सारे वृक्ष,तब मैं तुमको अपने हाथों से
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दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है

दिल को दिल की बात सुनाने को दिल करता है,कुछ भूली बिसरी बात सुनाने को दिल करता है।उनकी जुल्फें बिखरी बिखरी जैसे हों काले बादल,उनकी चितवन मदहोशी का फैला है जैसे आँचल,लब उनके ऐसे जैसे पगे हों अमृत रस की धार में,उन होठों से पीकर खिल जाने को दिल करता है।उनकी
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है अनूठी साधना यह अनवरत वर्षों चलेगी...

है अनूठी साधना यह अनवरत वर्षों चलेगी,कर्मजीवी की तपस्या से धरा प्रतिफल पलेगी।साध्य साधक साधना मिलकर सब लक्ष्य साधें,मौन के मुखरित स्वरों से वासना का बाँध बांधे। ये ज़मीं और आसमां जाकर जहाँ पर एक होंगे,शायद वहीँ पर सभी को जीने के अवसर मिलेंगे।बढ़ चलो खोजें
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दर्द - ए - राग एं अन्य गीत / ग़ज़ल / कवितायेँ

जल रहा है दिल में , वो तो बस आग है,होठों पर मचल रहा दर्द - ए- राग है ।आँखों में तो अश्क सी हैं यादें पल रहीं, बन्धनों में बांधे हुए एक विरही नाग है।जूड़े में उनके मैं कोई फूल टंक ना सका,मेरे हिस्से आया हुआ काँटों का बाग़ है।सारे बदन में कोढ़ सा उग गया है
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तेरी याद बहुत तड़पाती है ....

तेरी याद बहुत तड़पाती है,सीने में आग लगाती है।जब कोहरे छत पे टंगने लगे,तब धूप कहाँ रह जाती है,वह घूंघट में छिप जाती है, सजनी की याद दिलाती है। तेरी याद बहुत तड़पाती है।वर्षा जब बरसे वर्षों तक, तब ये तन्हाई क्या गाती है,गा - गा के मुझे सताती है, सपनो से
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कोई गीत प्यार के गाओ तुम

कोई गीत प्यार के गाओ तुम,मेरे थके हुए मन को,हौले से आ दुलरा जाओ तुम।कोई गीत प्यार के गाओ तुम।मैं पंछी बन नभ में घूमूं,और मस्ती में हरदम झूमूँ,दूँ प्यार लुटा अपना सारा और अश्क भरी आँखें चूमूं,अपनी आँखों में मेरे सपनों के रूप अनेक सजाओ तुम।कोई गीत प्यार के
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कैसे गाऊं प्रेम के गीत

कैसे गाऊं मैं प्रेम के गीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत ।अवरुद्ध हो वाणी मेरी सीने के भीतर घुट रही है,दुनिया मेरी मेरे ही हाथों देखो कैसे लुट रही है,हार में तब्दील हो गयी जीत,बिछुड़ गया मेरा मन मीत।कल तलक जो संग रहने की कसम थे खा रहे,आज मुझसे रूठ कर वो तो
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मेरे महबूब तुम मेरे बिन नहीं रह पाओगे

(एक इरादा किया अपने पुराने दिनों को पुनर्भ्रमण करने का.बहुत सारी कवितायेँ हैं जो उन् दिनों की हैं जहाँ व्यक्तित्व में ठहराव नहीं था। अपनी संवेदनशीलता को लिख कर मैं खुद को उबारता था अपने एकाकीपन से। ये कविता १९८५ से १९९० के बीच लिखी गयी हैं। डायरी के
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शोर - धुआं - और चीख

ये पंक्तियाँ वर्ष 1९८४-८५ के चंद महीनो की तकलीफ से निकली थी , जिन्हें मैंने कलमबद्ध किया था...अब इससे अपलोड कर दुनिया के सामने ला रहा हूँ....*******************************************************************************************शोर - धुआं - और चीख ,
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जब दर्द पल रहा सीने में

जब दर्द पल रहा सीने में,तब मज़ा आ रहा जीने में ।खून पानी में तब्दील हुआ ,बदन गला और बहा पसीने में।दिल टुकड़े हो कर बिखर गया,हम जुट गए उसको सीने में।जब दर्द का दरिया उफन गया ,तब छेद हो गया है सफीने में।आंसू को जब से मय है समझा,मज़ा आ रहा है उसे पीने में।
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यह जीवन है एक भार प्रिये एवं अन्य कवितायेँ

यह जीवन है एक भार प्रिये। थी तृषा जगी मन में मेरे,औ' प्यास कहाँ बुझ पाती है,जल की चाहत में भटक रहा,मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये।जो दूर कहकशां सा दिखा, तो मन मयूर सा नाच उठा,पर पास जो जाकर देखा तो,पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन है
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आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये

आँखों में काजल न यूँ आप लगाया कीजिये, यूँ रात की तीरगी ऐसे न बढ़ाया कीजिये।आपके छूते ही पत्थर भी हो जाता है आदमी ,मेरे दुश्मनों की फौज यूँ न बढाया कीजिये।जिंदगी की राह में सिर्फ कांटे ही कांटे हैं बिछे,पांव नाज़ुक हैं आपके, उन्हें न उतारा कीजिये।मैं नहीं
Mar 07 2010 06:00 PM
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चुप चुप से हो गुमसुम से हो

चुप चुप से हो गुमसुम से हो,मुझसे बातें क्यूँ नहीं करते हो,इतना दो बता दो मुझको क्या तुम आज भी मुझपर मरते हो।गर्म हवा सी चलती है और मौसम पतझड़पतझड़ सा होता है,गुस्से में जब तुम होते हो और फिर लम्बी लम्बी साँसे भरते हो।प्यार से जब बातें करते हो तो मन में
Mar 07 2010 05:54 PM
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मुबारक हो तुमको शादी की २२वीं सालगिरह

आज विवाह की २२वीं सालगिरह पर यह कविता है तुम्हें समर्पित,जिसने अपना यह जीवन मुझको कर दिया है पूर्ण रूप से अर्पित, मेरी हर सुख सुविधा का ख्याल रक्खा,कष्ट हरा सब मेरा जिसने,जिसके बिन मेरे जीवन का हर पल लगता ऐसे बीते जैसे हो
Mar 06 2010 02:03 PM
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मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं

मुझको मेरी तन्हाईयाँ अक्सर बुलाती हैं,और फिर मुझे तेरी यादों से नहलाती हैं।वो जो खुशबु का झोंका गुज़रा मेरे पास से ,तेरी जुल्फों की कैद से छूटी हवा कहलाती हैं।आँखें खुली रहती हैं तो दिखता नहीं कुछ भी ,बंद आँखें ही तो मुझे सबकुछ अब दिखलाती हैं।चीड़ों की
Mar 05 2010 11:02 AM
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है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद

है रौशनी का कतरा मेरी मुट्ठी में बंद,मन के भीतर मच गया है एक द्वन्द । वो मेरा जो कुछ भी नहीं तो ऐ दोस्त, याद उसकी आ आ के क्यूँ करती है तंग।जब भी मैं खींचता हूँ लकीर कागज़ पे,वो हो जाती है पूर्णतया उसमें जीवंत।लिखता हूँ उसको ख़त जब अपने हाल का,पढ़ के वो
Mar 05 2010 09:42 AM
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मुमकिन हो तो मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइए

मुमकिन हो तो सिर्फ मेरी खातिर एक बार मुस्कुराइये,अपनी पलकों का वरक उठाइये और मेरी सुबह लाइये।मैं समंदर में भटक रहा हूँ एक किश्ती की तरह ऐ दोस्त,मुझको मौजों से बचा कर आप किनारे तक तो ले आइये।तरस गया है ज़माना देखने को एक चौदहवीं का चाँद,उनकी खातिर ही सही
Mar 03 2010 08:40 PM
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कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे ......

कुछ अपनी बात कहूँ मैं तुमसे, कुछ तेरी बात सुनु,तेरे होठों पे खिलते गुलाब की कलियों को मैं चुनु।रात सोता सोच के तुमको सुबह उठूँ तेरा नाम लिए,फिर दिन भर तेरी तस्वीरों से मैं बातें ढेर करूँ।तेरी ही यादें दे जाती हैं मेरी सूनी आँखों में आंसू ,अपनी पलकों पे
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कुछ पल तुम बैठो पास मेरे......

कुछ पल तुम बैठो पास मेरे, और कुछ बातें मुझसे ख़ास करो,मुझको छूकर मुझको पाकर, तुम मुझको फिर से सुवास करो।मैं चातक बन कर वर्षों से बैठा, तक रहा तुम्हारी ओर प्रिये,तुम स्वाति बूँद बन कर बरसो और मेरे दुःख का नाश करो।मेरा जीवन तो है सूना सूना पतझर पतझर और
Mar 02 2010 07:21 PM
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जब याद तुम्हारी आती है

जब याद तुम्हारी आती है,तब हम माजी में खो जाते हैं ,आँखें बंद करके हम फिर , तेरे तसव्वुर से लग सो जाते हैं।जग जाते हैं तेरी आहट से, तेरी खुशबु से तर हो जाते हैं,तुम सांस जो लेते हो पास मेरे, हम उस पल को जी जाते हैं।तुम चलते हो तो चलती रहती है धड़कन मेरे
Mar 02 2010 06:41 PM
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खुलता हूँ तो किताब हो जाता हूँ,पन्नो पे बिखरा गुलाब हो जाता हूँ.

देखो सुरमई सांझ उतर आयी है,लगता है आपने अपनी जुल्फें लहराई है।मंदिर में बजी जो घंटियों की तरह,सुना है बस आपने पाजेब छनकाई है।सात सुरों की महफ़िल सजा के बैठे हैं,लोग कहते हैं की वो खिलखिलाई है।चेहरे से उसने अपनी जुल्फों को हटाया,चांदनी धीरे से धरती पे उतर
Mar 01 2010 07:22 PM
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सूरज को माथे पर बिंदी सा सजाया कीजिये

ख्वाब में मुझको रोज़ बुलाया कीजिये , चैन से रोज़ खुद को सुलाया कीजिये।एक दफा खुदा से मांग लो मुझको,फिर हर दफा मुझको यूँ ही पाया कीजिये।आपकी जुल्फें घटायें हैं सावन की, अपने चाँद से मुखरे से घटा हटाया कीजिए। सूरज आपकी खतिर उगा है लाल, अपने माथे उसको बिंदी
Mar 01 2010 11:37 AM
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जीवन एक भार,मन की व्यथा एवं दर्द का सागर

यह जीवन है एक भार प्रिये! थी तृषा जगी मन में मेरे पर प्यास कहाँ बुझ पाती है, जल की चाहत में भटक रहा, मन पाता है अंगार प्रिये।यह जीवन है एक भार प्रिये! जो दूर कहकशां सा दीखा, तो मन मयूर सा नाच उठा, पर पास जो जाकर देखा तो पाया मरू का सा सार प्रिये।यह जीवन
Feb 26 2010 06:16 AM
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एक सन्नाटा पसरा हुआ

सपनो की चादर ओढ़ जब भी सोता हूँ - तुम्हारे बदन की गर्मी मुझे नहलाती है,दिन भर की थकन हवा में गुम हो जाती है ,बाल उड़ उड़ कर चेहरे से अठखेलियाँ करते हैं,आंसू आँख से निकल बस भाप हो उड़ जाते हैं,कई दिनों की गुम हंसी वापिस लौट आती है।पर , मेरे हाथ ज्यूँही
Feb 24 2010 09:14 PM
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जादू सा छा रहा है,कोई मुझमे समा रहा है

जादू सा छा रहा है ,कोई मुझमे समा रहा है।जुल्फों में कैद बादलों को, सावन बना रहा है।चलने से उसके हर शू , आ जाती है बहारें,मरुभूमि में भी चल कर,मौसम बदल रहा है।पलकें उठा के अपनी, देखो ले आता है सहर वो पलकें गिरा ली उसने तो, बस तारीक छा रहा है।आवाज़ है उसकी
Feb 23 2010 09:10 PM
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तुम्हारी ही खातिर

उनको हम अपने दिल में छुपाये बैठे हैं,सारी दुनिया से जैसे उनको चुराए बैठे हैं।खुदा का नूर टपकता है उनके चेहरे से,इसलिए उनको तो हम खुदा बनाये बैठे हैं।उनकी रंगत जैसे सुबह की धूप खिली, हम खुद को उस रंग से नहलाये बैठे हैं।वो आईना है सब कुछ बता देता है
Feb 22 2010 02:10 PM
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मेरी आफरीन - तेरे ही नाम मेरी सुबह औ' मेरी शाम

तेरी आँखों के समंदर में डूब जाते हैं,इस तरह हम खुद को तुझ में पाते हैं।खुदा को देखा नहीं है कभी हमने पर,तुम में ही हम खुदा की झलक पाते हैं।तुम ही मेरी सुबह हो शाम भी तुम हो,तुम्हारी ही चांदनी में हम रातों को नहाते हैं।गीत लिखते हैं तो बस तेरी ही खातिर
Feb 21 2010 03:45 PM
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कुछ गजलें (भाग एक)

(ये ग़ज़लें मैंने वर्ष १९८९ से १९९१ के बीच अपने अकेलेपन से जूझते हुए लिखी थी.इन् गजलों की एक एक पंक्तियाँ मेरी भावनाओं का सच्चा प्रतिबिम्ब हैं...शब्द उन्हें हो सकता है बयां करने में असमर्थ हों ,पर उनसे उनकी परिभाषा पर असर नहीं पड़ता .उम्मीद है आपको पसंद
Feb 21 2010 03:43 PM