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युग-विमर्श (YUG -VIMARSH) یگ ومرش

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03 Jun 2010
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हिन्दी में ग़ज़ल कहने का है स्वाद ही कुछ और्

हिन्दी में ग़ज़ल कहने का है स्वाद ही कुछ और्।रचनाओं में होता है यहाँ नाद ही कुछ और्॥आशीष दिया करती है माँ सुख से रहूँ मैं,पर मुझसे समय करता है संवाद ही कुछ और्।सीताओं की होती है यहाँ अग्नि परीक्षा,राधाओं के है प्यार की मर्याद ही कुछ और्।वह आँखें हैं
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धर्मों के हाथ उगते हैं मानव शरीर से

धर्मों के हाथ उगते हैं मानव शरीर से। अधयात्म है जुड़ा हुआ मन के कुटीर से॥अन्तस की इन्द्रियों से नहीं जिनका कुछ लगाव, करते हैं दो शिकार वही एक तीर से॥लालित्य द्रौपदी का न कम हो सका कभी,लीला का है प्रसार जो लिपटा है चीर से॥विद्या शरीर की है अलग मन की है
Jun 03 2010 02:22 PM
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लोग झुक जाते हैं वैसे तो सभी के आगे

लोग झुक जाते हैं वैसे तो सभी के आगे।सर झुकाया न कभी हमने किसी के आगे॥देख कर आंखों से भी कुछ नहीं कहता कोई,लब सिले रहते हैं क्यों आज बदी के आगे॥ग़म ज़माने का है जैसा भी हमें है मंज़ूर,हाथ फैलाएंगे हरगिज़ न ख़ुशी के आगे॥माँगने वाले हुआ करते हैं बेहद
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धूल हवाओं में शामिल है

धूल हवाओं में शामिल है।गर्द है ऐसी जान ख़जिल है॥सूरज की शह पाकर मौसम, दहशतगर्दी पर माइल है॥दरिया में है शोर-अंगेज़ी, सन्नटा ओढे साहिल है॥चाँद समन्दर में उतरा है, शर्म से पानी-पानी दिल है॥क़त्ले-आम तो होना ही है, तख़्त-नशीं जब ख़ुद क़ातिल है॥खो गया सब कुछ
May 15 2010 11:19 AM
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खीज से जन्मे हुए शब्दों को जब भी तोलें

खीज से जन्मे हुए शब्दों को जब भी तोलें।झिड़कियाँ माँ की मेरे कानों में अमृत घोलें॥देखें बचपन की उन आज़ादियों की तस्वीरें,बैठें जब साथ अतीतों की भी गिरहें खोलें॥रात में भी तो उजालों की ज़रूरत होगी, आओ कुछ धूप के टुकड़ों को ही घर में बो लें॥आस्तीनों से
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नहीं हूँ मुक्तक और ग़ज़ल्

नहीं हूँ मुक्तक और ग़ज़ल्। समय की हूं रोचक हलचल्।पढ न सकोगे मुझको तुम,अक्षर-अक्षर तरल-तरल॥चिन्तन मेरा अमृत-कुण्ड, वाणी मेरी गंगाजल ॥बाहर से हूं वज्र समान,भीतर से बेहद कोमल्॥नीलकंठ का है संकल्प,गरल समाहित वक्षस्थल्॥कभी हूं बिंदिया माथे की, कभी हूं आँखों
May 12 2010 02:39 PM
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अहमद फ़राज़ [14 जनवरी 1931-25 अगस्त 2008] /प्रोफ़ेसर शैलेश ज़ैदी

अहमद फ़राज़ [14 जनवरी 1931-25 अगस्त 2008] नौशेरा में जन्मे अहमद फ़राज़ जो पैदाइश से हिन्दुस्तानी और विभाजन की त्रासदी से पाकिस्तानी थे उर्दू के उन कवियों में थे जिन्हें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बाद सब से अधिक लोकप्रियता मिली।पेशावर विश्वविद्यालय से उर्दू तथा
May 10 2010 11:16 AM
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निशाते-दर्दे-पैहम से अलग हैं

निशाते-दर्दे-पैहम से अलग हैं।ख़ुशी के ज़ाविए ग़म से अलग हैं॥दिलों को रोते कब देखा किसी ने, ये आँसू चश्मे-पुरनम से अलग हैं॥तलातुम-ख़ेज़ियाँ वीरानियों की, हिसारे-शोरे-मातम से अलग हैं॥शिकनहाए-जबीने-होश्मन्दाँ,ख़ुतूते-इस्मे-आज़म से अलग हैं॥बज़ाहिर साथ रहकर
May 08 2010 09:28 AM
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सहूलतें सभी आसाइशों की यकजा हैं

सहूलतें सभी आसाइशों की यकजा हैं।हमारे बच्चे घरों में भी रह के तनहा हैं॥तमाम रिश्ते ही आपस के जैसे टूट गये, तकल्लुफ़ात की ख़ोलों में अहले-दुनिया हैं॥जदीद ज़हनों के सब ज़ाविए हैं रस्म-शिकन,मगर तनाव के हर मोड़ पर शिकस्ता हैं॥ सज़ाए-मौत का है झेलना बहोत
May 07 2010 02:44 PM
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सफ़र का सारा मंज़र सामने था

सफ़र का सारा मंज़र सामने था।कहीं बच्चे कहीं घर सामने था्। हमें जो ले गया मक़्तल की जानिब, थका-माँदा वो लश्कर सामने था॥मिली थी नोके-नैज़ा पर बलन्दी,मैं हक़ पर था मेरा सर सामने था।फ़ना के साहिलों से क्या मैं कहता,बक़ा क जब समंदर सामने था॥तलातुम मौजे-दरिया
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सरों से ऊँची फ़सीलें हैं क्या नज़र आये

सरों से ऊँची फ़सीलें हैं क्या नज़र आये।कहाँ से आती ये चीख़ें हैं क्या नज़र आये॥उमीदो-बीम के जंगल में हूँ घिरा हुआ मैं,तमाम शाख़ें-ही-शाख़ें हैं क्या नज़र आये॥वो पहले जैसी बसीरत कहाँ इन आंखों में,बहोत ही धुंधली सी शक्लें हैं क्या नज़र आये॥तअल्लुक़ात कई
May 05 2010 05:47 PM
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मैं ग़ज़ल क्यों कहता हूं / शैलेश ज़ैदी

मैं ग़ज़ल क्यों कहता हूं ग़ज़ल अरबी भाषा का शब्द अवश्य है किन्तु ग़ज़ल का प्रारंभ अरबी भाषा में नहीं हुआ।वैसे भी प्राचीन परिभाषाओं पर आधारित ग़ज़ल के अर्थ को रेखांकित करना ग़ज़ल की परंपरा के अनुरूप प्रतीत नहीं होता।ग़ज़लकारों ने प्रारभ से ही अपने युग के
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क़ल्बो-जिस्मो-जाँ सभी उसकी मुहब्बत में हैं एक्

क़ल्बो-जिस्मो-जाँ सभी उसकी मुहब्बत में हैं एक्।इश्क़ के उन्वाँ सभी उसकी मुहब्बत में हैं एक॥वो है मर्कज़ में तो फिर आपस की तफ़रीक़ें हैं क्यों,आक़िलो-नादाँ सभी उसकी मुहब्बत में हैं एक॥दाग़े-दिल, सोज़े जिगर,बेचैनियाँ, आवारगी,हिज्र के सामाँ सभी उसकी मुहब्बत
May 01 2010 09:11 PM
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ठेस लगे तो रोते कब हैं

ठेस लगे तो रोते कब हैं।शब्द किसी के होते कब हैं॥हम अपना ही हाल न जानें, जागते कब हैं सोते कब हैं॥आँसू मेरी आँखों में हैं, उसकी आँख भिगोते कब हैं॥हमको फ़स्लों से मतलब है, खेत ये हम ने जोते कब हैं॥आंखों वाले ही अन्धे हैं, अन्धे अन्धे होते कब हैं॥*******
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भाई ये बातें सच्ची हैं

भाई ये बातें सच्ची हैं।तहज़ीबें मिटती रहती हैं॥फूलों की ख़्वाहिश रखती हैं। आरज़ुएं शायद तितली हैं॥आसमान सर पर टूटा है,धरती की रूहें काँपी हैं॥सूरज तो बेहिस होता है, ख़्वाब ज़मीनें ही बुनती हैं॥चाँद की मिटटी छू कर देखो,लम्स की मुद्दत से प्यासी हैं॥दर्द
May 01 2010 11:30 AM
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ख़्वबों से थक जाएं पलकें

ख़्वबों से थक जाएं पलकें।कितना बोझ उठाएं पलकें॥ दिल की तमन्ना बर आने पर, झूमें नाचें गाएं पलकें॥मातम है एहसास के घर में, बच्चे आँसू माएं पलकें॥झपक झपक कर दिखलाती हैं, कैसी शोख़ अदाएं पलकें॥आधी आधी जब खुलती हैं , एक क़यामत ढाएं पलकें॥दिल रंजीदा आँखें
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जब भी कुछ फ़ुर्तसत होती है

जब भी कुछ फ़ुर्तसत होती है। तनहाई नेमत होती है।शायर कोई और है मुझ में, पर मेरी शुहरत होती है॥उर्दू के शेरों में बेहद, तरसीली क़ूवत होती है॥लफ़्ज़ों के जादू में पिनहाँ, मानी की ताक़त होती है॥वादा-ख़िलाफ़ी करते क्यों हो, दोस्ती बे-हुरमत होती है॥वो अदना
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देह मे जब तक भटकती सांस है/घनश्याम मौर्य

महोदय, मै आप्के युग विमर्श ब्लॉग का नियमित रूप से अनुसरण करता हूँ. इस पर उत्कृष्ट एवं स्तरीय रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं. हिंदी साहित्य का प्रेमी होने के साथ ही मैं हिंदी में काव्य-रचना भी करता हूँ. अपनी एक ग़ज़ल आपके ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु भेज रजा हूँ.
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काश मेरे पास कुछ होता सुबूत

काश मेरे पास कुछ होता सुबूत।दे न पाया बेगुनाही का सुबूत॥हो चुका है नज़्रे-आतश सारा जिस्म,ये सुलगती राख है ज़िन्दा सुबूत्॥क़ाज़िए-दिल वक़्त का नब्बाज़ है, देख लेता है ये पोशीदा सुबूत्॥इश्क़े-मजनूँ क्यों न होता लाज़वाल, दे रही है आजतक लैला सुबूत्॥कैसे-कैसे
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बन्धनों में रहूँ मैं ये संभव नहीं

बन्धनों में रहूँ मैं ये संभव नहीं॥अनवरत साथ दूँ मैं ये संभव नहीं॥मेरी प्रतिबद्धता का ये आशय कहाँ, झूट को सच कहूँ मैं ये संभव नहीं॥मैं हूँ मानव,मैँ तोता या मैना नहीं,जो पढाओ पढूँ मैं ये संभव नहीं॥पत्थरों में प्रतिष्ठित करूँ प्राण मैं,सब के आगे झुकूँ मैं
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जब हवाएं शिथिल पड़ गयीं

जब हवाएं शिथिल पड़ गयीं। मान्यताएं शिथिल पड़ गयीं॥ऐसे साहित्य कर्मी जुड़े,संस्थाएं शिथिल पड़ गयीं॥शून्य उत्साह जब हो गया, भावनाएं शिथिल पड़ गयीं॥गीत संघर्ष के सो गये,वेदनाएं शिथिल पड़ गयीं।शोर संसद भवन में हुआ, शारदाएं शिथिल पड़ गयीं॥हम दलित भी न कहला
Apr 28 2010 11:50 AM
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कल थीं रसमय भूल गयी हैं

कल थीं रसमय भूल गयी हैं ।कविताएं लय भूल गयी हैं॥अहंकार-गर्भित सत्ताएं, विजय परजय भूल गयी हैं॥समय खिसकता सा जाता है, कन्याएं वय भूल गयी हैं॥लगता है अपनी ही साँसें, अपना परिचय भूल गयी हैं॥ संघर्षों में रत पीड़ाएं, मन का संशय भूल गयी हैं॥हाथ की रेखाएं भी
Apr 27 2010 08:08 PM
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आँखें चित्र-पटल होती हैं

आँखें चित्र-पटल होती हैं। इसी लिए चंचल होती हैं।जब भी चित्त व्यथित होता है,ये भी साथ सजल होती हैं॥मेरी, उसकी सबकी आँखें, ठेस लगे, विह्वल होती हैं॥मन की बातें सुन लेती हैं, आँखें कुछ पागल होती हैं॥हमें भनक सी लग जाती है, जो घटनाएं कल होती हैं॥पनघट की
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गीतों ने किया रात ये संवाद ग़ज़ल से

गीतों ने किया रात ये संवाद ग़ज़ल से। हुशियार हमें रहना है इतिहास के छल से॥जब आस्था मन में न थी क्यों आये यहाँ आप, इक पल में हुए जाते हैं क्यों इतने विकल से॥क्या आगे सुनाऊं मैं भला अपनी कहानी,प्रारंभ में ही हो गये जब लोग सजल से॥मुम्ताज़ के ही रूप की आभा
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ब्रज भाषा और अवधी का तिरस्कार

ब्रज भाषा और अवधी का तिरस्कार अभी कल तक, यानी देवनागरी आन्दोलन से पहले तक, ब्रज और अवधी भाषाएं अपने उच्च स्तरीय साहित्य के लिए समूचे देश में एक विशेष पहचान रखती थीं।उस समय तक बंगला, मराठी, गुजराती,उड़िया आदि भाषाओं के पास इतनी पूंजी भी नहीं थी कि इसके
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भाषा का शुद्धतावादी दृष्टिकोण

भाषा का शुद्धतावादी दृष्टिकोण हिन्दी के प्रति अतिरिक्त प्रेम दर्शाने वाला आज एक वर्ग ऐसा भी है जो उर्दू और अंग्रेज़ी शब्दों के प्रति कुछ ऐस घृणा भाव रखता है कि उनके स्पर्श मात्र से उसे हिन्दी के अशुद्ध हो जाने की प्रतीति होती है।रोचक बात यह है कि अपने इन
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ये मुहब्बत की बारीकियाँ।

ये मुहब्बत की बारीकियाँ।कुछ सिखा दें मुझे मेह्रबाँ॥साँस लेता है आतश-फ़िशाँ, राख हो जायेगा आस्माँ॥कुछ कमी सी है जज़बात में,दामने-दिल है क्यों बेनिशाँ॥कल था क्या आज क्या हो गया, सब हैं ये वक़्त की ख़ूबियाँ॥मग़रिबीयत की मय का नशा, देर-पा हो सका है कहाँ॥कैसे
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तुम समन्दर के उस पार से।

तुम समन्दर के उस पार से।जीत लोगे मुझे प्यार से॥मैं तुम्हें देखता ही रहूं, तुम रहो यूं ही सरशार से॥रौज़नों से सुनूंगा सदा, अक्स उभरेगा दीवार से॥इन्तेहा है के इक़रार का, काम लेते हो इनकार से॥गुल-सिफ़त गुल-अदा बाँकपन,जाने-जाँ तुम हो गुलज़ार से॥खे रहा
Apr 23 2010 11:01 PM
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बेचैन सी हैं पलकें शायद

बेचैन सी हैं पलकें शायद। रोई हैं बहोत आंखें शायद।कुछ देर तो बैठें साथ कभी, कुछ प्यार की हों बातें शायद्॥जो शीश'ए दिल कल टूट गया, चुभती हैं वही किरचें शायद्॥इस बार गुज़ारिश फिर से करूं, मंज़ूर वो अब कर लें शायद॥कैफ़ीयते-दिल पहचानती हैं,मग़मूम हैं ख़ुद
Apr 23 2010 05:41 PM
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बचपन में खेलने के लिए जो मिले नहीं

बचपन में खेलने के लिए जो मिले नहीं।मिटटी के वो खिलौने कभी टूटते नहीं॥जुगनू जो रख के जेब में होते थे ख़ुश बहोत,वो ज़िन्दगी में बन के सितारे टँके नहीं॥मिटटी का तेल भी न मयस्सर हुआ कभी,शिकवा है दोस्तों को के हम पढ सके नहीं॥मेहनत्कशी से आँख चुराते भी किस
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कहते हो के हम कोई नया ख़्वाब न देखें

कहते हो के हम कोई नया ख़्वाब न देखें।क्या ख़ुद को तसव्वुर में भी शादाब न देखें॥क्यों अपने शबो-रोज़ से हम मूंद लें आँखें,कैसे तेरी जानिब दिले-बेताब न देखें॥साहिल पे चेहल-क़दमियाँ करते रहें दिन-रात,बस कैफ़ियते-माहिए-बेआब न देखें॥आँगन में उतर आये अगर रात
Apr 21 2010 08:00 AM
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ये क़ाफ़ेला ख़्वाबों का कभी काम न आया

ये क़ाफ़ेला ख़्वाबों का कभी काम न आया। सरमाया उमीदों का कभी काम न आया॥अच्छा है के था अपनी ही कोशिश पे भरोसा,कुछ मशवेरा यारों का कभी काम न आया॥सूरज की शुआएं मेरे आँगन में न उतरीं,मंसूबा उजालों का कभी काम न आया॥लिप्टी थी मेरे जिस्म से यूं गाँव की
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दबी थीं राख में चिंगारियाँ ख़बर थी किसे

दबी थीं राख में चिंगारियाँ ख़बर थी किसे।जला्येगी ये ज़मीं आस्माँ ख़बर थी किसे॥सुख़नवरों में थे गोशानशीन हम भी कहीं,हमारे दम से थी महफ़िल में जाँ ख़बर थी किसे॥ख़मीरे इश्क़ भी क़ल्बे-बशर की साख़्त में है, ये रंग लायेगा होकर जवाँ ख़बर थी किसे॥हयात में था
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रात की आँखें बेहद नम थीं

रात की आँखें बेहद नम थीं।वो भी शायद शामिले-ग़म थीं ॥सूरज कुछ ज़र्दी माएल था,किरनों की पेशानियाँ ख़म थीं॥दरिया की तूफ़ानी लहरें,तल्ख़िए-साहिल से बरहम थीं॥सुस्त पड़ी थीं तेज़ हवाएं,बून्दें बारिश की मद्धम थीं॥ फूल सभी मुरझाए हुए थे, तितलियां सब मह्वे-मातम
Apr 19 2010 09:00 AM
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हुआ है कैसा तग़ैयुर हवाएं जानती हैं

हुआ है कैसा तग़ैयुर हवाएं जानती हैं।शिकस्ता ख़्वाबों की हालत फ़िज़ाएं जानती है॥ये लड़कियाँ जो बदलती हैं सुबहोशाम लिबास,ये ज़िन्दा रहने की सारी कलाएं जानती हैं॥भरम बना रहे पानी का इन ज़मीनों पर, बरस न पायेंगी हरगिज़ घटाएं जानती हैं॥वो चान्द दूर से रखता है
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टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ

टुकड़े-टुकड़े सुबह हुई था होश कहाँ।दामन में थी आग लगी था होश कहाँ॥उसके दर पर सज्दा करने आया था,पेशानी फिर उठ न सकी था होश कहाँ॥वो आमाल तलब कर बैठा बेमौक़ा,फ़र्द थी बिल्कुल ही सादी था होश कहाँ॥दिल के दाग़ नुमायँ हो कर बोल उठे, बरत न पाया ख़ामोशी था होश
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प्रारंभिक सूफ़ी चिन्तन और हज़रत हसन बसरी [642-728ई0] / प्रो0 शैलेश ज़ैदी

सूफी चिंतन वस्तुतः उस अन्तःकीलित सत्य का उदघाटन है जिसमें जीवात्मा और परमात्मा की अंतरंगता के अनेक रहस्य गुम्फित हैं .सूफियों ने सामान्य रूप से ऐसे रहस्यों का स्रोत नबीश्री हज़रत मुहम्मद [स०] और हज़रत अली [र०] के व्यक्तित्त्व में निहित उस ज्ञान मंदाकिनी
Apr 16 2010 07:04 AM
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फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं

फ़िज़ा में आइनों के अक्स जब दम तोड़ देते हैं।रुपहले ख़्वाब सब थक हार कर हम तोड़ देते हैं॥ लिए मजबूरियाँ हम दर-ब-दर फिरते हैं बस्ती में,कभी ज़ख़्मों की सौग़ातें कभी ग़म तोड़ देते हैं॥लबालब मय न हो तो लुत्फ़ पीने का नहीं आता, वो साग़र जिसमें हो मेक़दार कुछ
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अल्ताफ़ हुसैन हाली और हयाते-जावेद

अल्ताफ़ हुसैन हाली और हयाते-जावेद अल्ताफ़ हुसैन हाली [1837-1914] उर्दू के उन प्रख्यात साहित्यकारों में हैं जिन्होंने कविता और आलोचना को नए आयामों से परिचित कराया. मिरज़ा गालिब के शिष्य होने का दायित्व उनकी वैचारिकता में झलकता भी है और उनके लेखन में मुखर
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हो चुकी हैं राख जलकर बस्तियाँ ऐसी भी हैं

हो चुकी हैं राख जलकर बस्तियाँ ऐसी भी हैं।आँखें कर देती हैं नम महरूमियाँ ऐसी भी हैं॥झीने आँचल में समेटें धूप ये मुम्किन नहीं,बर्फ़ सी चुभती हैं दिल में बदलियाँ ऐसी भी हैं॥अब तो बाग़ीचे में कोई फूल खिलता ही नहीं,नाउमीदी की ख़िज़ाँ-अँगड़ाइयाँ ऐसी भी
Apr 14 2010 08:59 AM