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13 Jun 2010
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महकते रंग गुल में........

महकते रंग गुल में, गुलज़ार होते हैं,मचलते ख़्वाब, स्वप्न के पार होते हैं,ना जाने क्यों, मोहब्बत इम्तहां लेती, जो भी डूबते इसमें, वही कुर्बान होते हैं,बङी खूबी से गिरते हैं, ये पतझङ के जो पत्ते हैं,नाम पत्ता रखा इनका,रंग खो कर भी सवरते हैं,जाम कोई भी हो
 
PREETI BARTHWAL
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दिल तो.........हम्मममम........

बिलकुल सच्चा है जी,कुछ मचलता है और,कुछ फिसलता है जी,दिल तो बच्चा है जी।थोङा कच्चा है जी।कुछ की चाहत में ये,यूं ही खोता रहे,न मिले कुछ अगर,फिर तो रोता रहे,पाने की चाह में,यूं बिलखता है जी,दिल तो बच्चा है जी।थोङा कच्चा है जी।कभी मुस्कुराए यूं, छोटी सी बात
 
PREETI BARTHWAL
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दिल की तमन्ना........

मन ख्वाब का पिटाराउङता है डोलता है,मिलती हैं,जबभी पलकें,गुप-चुप सा, बोलता है।मैं ख्वाब का समन्दर,तुम खुल के सांस लेना,बुनना उस खुशी को,जिसकी भी हो तमन्ना।उस मीठी-सी हंसी में,सुकूं है, कई पलों का,चलो आज खुल के हंस ले दिल की है ये तमन्ना।........... प्रीती
 
PREETI BARTHWAL
Feb 12 2010 11:57 AM
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सूर्यग्रहण पर स्टार न्यूज में जीता तर्कशास्त्र, खास बहस में पीछे रहा ज्योतिषशास्त्र

आज सूर्यग्रहण है इस बारे में कल से कई जगह चर्चा चल रही थी। कोई फिक्र कर रहा था तो कोई इस बारे में सोच भी नहीं रहा था। वहीं दूसरी तरफ मेरे पतिदेव इस बात से चिंतित थे कि ग्रहण लगने से पहले ही सब काम कर लिए जाएं और साथ ही भोजन वगैरा भी कर लिया जाए। क्योंकि
 
PREETI BARTHWAL
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चलो चलें एक नये से ख्वाब में.......

 एक कदम में बढ़ चले हम, एक नये से साल में, एक नई मंजिल को थामें, एक नये से ख्वाब में।    है सफर ये फिर वही, जोकि पिछली बार था, है मगर अब नई उमंगे, एक नयी सी बात में।  कुछ कहानी कल की
 
PREETI BARTHWAL
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आओ देखें इक स्वप्न नया........

आओ देखें इक स्वप्न नया, नई रचना हों, नई उम्मीदें,   छोटी-छोटी सी ख्वाहिशें हो,   हो अपनों की खुशियां जिनमें।   पल-पल के सपने तैर रहे,   छोटी-छोटी आशाओं में,   मन मचल रहा छूने को यूं,   हो सीप में,... कोई मोती जैसे। ठण्डी
 
PREETI BARTHWAL
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मेरे बिस्तर के सिरहाने.............

न पूछो क्यों, हम नींद में,   हंसते हैं, और कभी रोते हैं,   ख्वाब में अक्सर........,   दर्द की यादों में, तो कभी,   खुशियों की महफलों में होते हैं। यूं ही मिलते हैं हम,    जमाने से मुलाकातों में,   वर्ना तो मिलने में
 
PREETI BARTHWAL
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कुछ कहते हुए.....ख़्वाब

कुछ कहते हुए....ख़्वाब ,   कुछ सुनते हुए....ख़्वाब,   चलो इन ख़्वाबों को,   आज अपना बनालूं, कहदूं इन्हें दिल के ,   वो सारे जज़्बात,   और आंखों में अपनी,   मैं इनको सजा लूं,   जब खोल के देखूं,   मूंदी हुई पलकें
 
PREETI BARTHWAL
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मां पार लगा दे नैया....

शुभ नवरात्रि मां तेरे रंग में रंग जांएगे,मां तेरे ही हम गुण गाएंगे,हम बच्चें तेरे हैं, तू है मैया,मां पार लगा दे नैया, मां पार लगा दे नैया।तू दर आये की सुनती,तू हर खुशियों को बुनती,मेरी  इक आस है मैया,मेरे घर भी आये मैया,मां पार लगा दे नैया, मां पार
 
PREETI BARTHWAL
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“शिवा”

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PREETI BARTHWAL
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जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..........

आज नितीश राज जी (मेरे सपने मेरे अपने) का जन्मदिन है। उन्हें इस अवसर पर जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई । सोचा आज के इस शुभ दिन में अपनी रचना उन्हें तोहफे के रूप में दूं आशा है पसन्द आएगी। मीठे पल, मीठी यादों का,साथ हो हरदम, मीठे वादों का,पलभर को भी गर आए
 
PREETI BARTHWAL
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Sep 04 2009 09:06 AM
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देखो चांदनी रात में..........

खोये-खोये से चांद पर,जब बारिश की बूंदे बैठती,और बादल की परत,घूंघट में हो, उसे घेरती,तब फिसल कर गाल पर,एक तब्बसुम खिलने लगे,देखो चांदनी रात में,अम्बर धरा मिलने लगे।कुछ मंद-मंद मुस्कान सी,आंखें चमक बिखेरती,हाथों की लकीरों पे हो जैसे,नाम अम्बर फेरती,यूं धरा
 
PREETI BARTHWAL
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कुछ प्यार की बातें होती............

सबसे पहले तो बहुत दिनों बाद आने के लिए आप सभी से माफी चाहूंगी। अब क्या करें कम्प्यूटर ही चलने को राजी नहीं था। जैसे ही ऑन करते शुरू होने से पहले ही बन्द हो जाता। बहुत हाथ जोङने के बाद अब इसका मूड ठीक हुआ है तो इससे पहले कि ये दुबारा बिदके अपनी पोस्ट डाल
 
PREETI BARTHWAL
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कहीं खोया हुआ अपना, वो सामान मिल जाए............

कहीं खामोश पन्नों पे,बीते लम्हों की कहानी,बदलते वक्त की हसरत,बदलती जिन्दगानी।मुसाफिर भी बने इसमें,हमसफर भी बनने आये,मुकद्दर में ही, न था जो,वो, दर से ही लौट आये।पत्थर के मकां भी थे,मिट्टी की मजारें भी,दरारें उसमें भी उतनी ही,दरारें इसमें थी जितनी।पिघलती
 
PREETI BARTHWAL
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Aug 07 2009 06:20 AM
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शायद ये ख्वाब वाली, नई उम्र हो जैसे..........

जिस रात में, मिली थी,मुझसे मेरी महोब्बत,उस रात ही कहीं पे,दिल खो दिया था मैंने।बन फूल, खिल रही थी,तितली-सी उङ रही थी,होठों की एक हंसी ने,मन छू लिया हो जैसे।बिन घुंघरूओं के बजती,पैरों में अब तो पायल,मैं नाचती थिरकती,दिल झूमता है ऐसे।लगने लगा है सबकुछ,अब
 
PREETI BARTHWAL
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Jul 31 2009 06:07 AM
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जैसे अमावस का चांद हो.........

समीर जी (उङनतश्तरी) को जन्मदिन की बहुत बहुत शुभकामनाऐं। आप हमेशा हमारी होसला अफजाई करते रहे और हमें टिपियाते रहें। मोतीचूर का बहुत बङा लड्डू हमारी और से आपके लिए। हम ढूंढते रहते है,नज़रें उठाके उसको,जाने कहां छुपके बैठा है,वो, बादल की ओट में।पत्थरा गई ये
 
PREETI BARTHWAL
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.......मेरी आशायें.......

अपनी मुठ्ठी में,बादलों को बांधती हूं,क्योंकि मैं उङना चाहती हूं।अपनी उंगलियों में,सितारें सजाती हूं,क्योंकि मैं उनको छूना चाहती हूं।अपने होंठों पे,मोतियों को थामती हूं,क्योंकि मैं लव्ज़ों को सजाना चाहती हूं।अपनी आंखों में,चांद छुपाती हूं,क्योंकि मैं
 
PREETI BARTHWAL
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कुछ बातें यादों के झरोखों से.....

कुछ बातें हमेशा याद आती हैं, कुछ खट्टी...कुछ मीठी यादें। यादों के झरोखे उन एहसासों को याद करा देते हैं जो कभी आवेग में लिए गए एक निर्णय को सालों बाद बचकाना कहने पर मजबूर कर देते हैं तो कभी गर्व की अनुभूति करा देते हैं।आज शाम घर के अंदर की उमस और गर्मी से
 
PREETI BARTHWAL
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Jul 25 2009 01:44 PM
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यूं ख्वाब रोज सजाया करो...........

जो होंठो को मुस्कान दे, उन्हीं लम्हों को, आंखों में बसाया करो, सलवटें न पङ जाए, उनमें कभी, इन्हें रोज सुलझाया करो, ख्वाब ही तो हैं मासूम से, धुंधले न हो जाए कहीं, ये ख्वाब रोज, पलकों पे सजाया करो। .......... प्रीती बङथ्वाल "तारिका" (चित्र- साभार गूगल
 
PREETI BARTHWAL
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जब बारिश भीग रही थी..........

सुबह हुई तो देखा, बारिश भीग रही थी, हम भी भीग रहे थे, तन्हाई भीग रही थी। जब-जब देखूं उसको, वो शरमा-शरमा जाती, लाली सी हो जाती, बिजली चमका जाती। मन देख-देख यूं उसको, मयूरा डोल रहा था, हरी-हरी धरा पर, हर पत्थर बोल रहा था। सूरज की आंखे कैसे, धुंधला-धुंध
 
PREETI BARTHWAL
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शु्क्र है फिर भी आये तो...........

देर लगी आने में तुमको, शुक्र है फिरभी आये तो.... तङप रहे थे जिस मौसम को, वो काली बदरा छायी तो। रिमझिम-रिमझिम फुहारों में, ठण्डी पुरवाई है संग..., आओ भीगे इन बूंदो में, खेले बचपन वाले रंग। चहकें चिङिया, मोर नाचते, हम भी होले इनके संग, पैर थिरकते, ताल
 
PREETI BARTHWAL
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दबे पांव आने दो बदरा...........

हे सूरज महाराज...... गर्मी को बरसाओ ना यूं , पत्थर सा सिकवाओ ना यूं , दबे पांव आने दो बदरा, पानी-पानी को तरसाओ ना यूं । ना मुसकाते रहो यूं अकेले, खङी धूप में, बिन सहेले, तुमको होगी कसम चांदनी की, दिन में तारे, दिखलाओ ना यूं , दबे पाव आने दो बदरा, पान
 
PREETI BARTHWAL
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यूं सामना खुद का खुदी से हो गया.....

सोचा न था....., यूं जिन्दगी से धोखा हो गया, यूं सामना, जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।। रब मिल गया था सोच कर, खुश हो लिए, आंखे खुली तो, रब न जाने कहां खो गया, यूं सामना, जब ख़ुद का, ख़ुदी से हो गया।। दिल दर्द के, समन्दर में डूबा जा रहा, आंखे भी छलक कर,
 
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मेरा सागर........

जिसके लिए इसबार की रचना लिखी है उसी के हाथों से बनी पेंटिंग इसबार पिक्चर में लगाई है आपको भी जरुर पसन्द आयेगी। उसने अपनी मन पसन्द चीज यानी कि कार को इस पिक्चर में बनाया है।" प्यारी और मासूम है सूरत, पर मन चंचल है, सच्चे दिल का शहजादा है, और नटखट है,
 
PREETI BARTHWAL
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मासूम-सा दिल है ऐ "तारिका".......

कितनी बदल गई तस्वीरें, क्या थी खुशियां क्या थे गम, खुद को ही न पहचान सके, जब टकराये खुद से ही हम। जब-जब याद करें वो लम्हें, आंखें भूल गई ज्योती, टूटे माला के मनको-सी, टपक रहे मन के मोती। सपने रह-रह तङपाते हैं, अफसाने....बस बन जाते हैं, जैसे कोरे कागज
 
PREETI BARTHWAL
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देखो-देखो ये महाकाल..........

नेताओं ने, फेंका जाल, फसी है जनता, बुरे हाल, महंगाई की, पङी है मार, देखो-देखो, ये महाकाल। लूटपाट का, बना माहोल, बाद में लूटे, पहले मांगे वोट, बाहर खोलें, एक दूजे की पोल, अन्दर सबका, डब्बा गोल। तुम भी पेट भरो रे भैया, हम भी माल दबायेंगे, जनता भोली बहक
 
PREETI BARTHWAL
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तुम दीया हो, मैं हूं बाती सनम........

हम एक सफर के, साथी सनम, तुम दीया हो, मैं हूं बाती सनम, दिल के चमन में, जब खिलते गुलाब, कांटों के संग, खुशबू आती सनम। जीवन में साथ, निभाने की कसमें, पत्थर में, नाम लिखाने की रसमें, वो दरख़तों के नीचे, शाम बितानी सनम, हम एक सफर के, साथी सनम, तुम दीया ह
 
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मैं लहर हूं, सागर में खो जाती हूं............

सच कहना क्या तुम भी मेरा, दर्द समझते हो? पत्थर से टकराना, फिर बहजाना, क्या अर्थ समझते हो? न मिल पाना अपनों से, घुट कर रह जाना, जीवन है संघर्ष मेरा, न कुछ पाना, बस खोते जाना, क्या ये सच, समझते हो? मैं रोऊं भी तो, क्यों कर, न इसका एहसास तुम्हे होगा। तु
 
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दिल ढूंढता है फिर वही...........

दिल ढूंढता है फिर वही, मां का आंचल। जिसकी छाया में सारे दिन की थकान, छूमंतर हो जाती। जिसके हाथों की गरमाहट, माथे को सहलाती, अपने होने का एहसास कराती, और हर मुश्किल आसान हो जाती। दिल ढूंढता है फिर वही, मां का आंचल। कुछ कहने से पहले ही, सब कुछ समझ जाती
 
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मैं प्यार का समन्दर..........

अहसास में, डुबो कर, प्यार की, कलम से, लिख दिए, जज़्बात, जो खिल रहे, कमल से। मैं डोर से बंधी हूं, तेरे प्यार का है बंधन, तुम डूब जाओ मुझमें, मैं प्यार का समन्दर। मैं मोम-सी पिघल कर, तेरी सांसों में बसूंगी, तुम जबभी पलके मूंदों, बस मैं ही मैं दिखूंगी।
 
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कभी वक्त मिले मुझसे, तुम मिलने आ जाना.....

जज़्बात महोब्बत के, सीने में धङकते हैं, फुरसत में कभी तुम भी, इससे सुनने आ जाना। मैं तन्हा हूं फिर भी, कुछ बाते करती हूं, कभी वक्त मिले, मुझसे, तुम मिलने आ जाना। रह-रह के मचलता र्है, आंखों में जो बसता है, वो सपना बनकर के, तुम मुझको सुला जाना। मैं नीं
 
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ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए.....

कहने को तो कहते हैं, हम तोङ के लायेंगे, इन चांद सितारों को, भर देंगे दामन हम, जों मोतियों की बारिश हो। पत्थर को तराशेंगे, नाखूनों से अपने, जब तक न बन जाए, मूरत मेरे माही की। चुन लेंगे फूलों को, तेरी महक घुली जिनमें, फिर बन जोगी तेरा, तेरे नाम की माला
 
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मेरी कल्पनाएं और मेरे शब्द...

चांद को चांद न कहूं, रजनी का चिराग कहूं, तारों को तारे न कहूं, निशा की बारात कहूं। देख कर यूं पलटना, ये लहरें नहीं, सागर की अंगड़ाई हैं, दर्द के भंवर ने जैसे, कहीं गर्म हवा सहलाई है। पक्षियों का चहकना भी, हो जैसे मीठा राग कोई, एक कतार में बैठे हो, कई
 
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प्रिय.......तुम मन को छू लो।

प्रिय, तुम मन को छू लो, मैं अंतर्मन को छू लूंगी, पास तुम्हारे जितनी दुनिया, रंग खुशियों के भर दूंगी। पंख लगे हर सपने में, जब आभास तेरा, बने पंख मेरे, चुन लूं हर वो तारा जिसपे, गुदे हुए हैं नाम तेरे। सोज़ तुम्ही मेरा, साज़ भी तुम हो, मेरे दिल की हर बा
 
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माता तेरे रुप हजार तू ही करती बेङा पार......

तू ही अम्बे तू जगदम्बे, माता तेरे रुप हजार, तू ही काली तू ही दुर्गे, तू ही करती बेङा पार। तेरे दर्शन के अभिलाषी, आंखे दर्शन के बिन प्यासी, प्यास बुझादे अबकी बार, माता तेरे रुप हजार, तू ही करती बेङा पार। तुम हो वैष्णों पहाङा वाली, मां, तुम सब भक्तों क
 
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तुझको मैने याद किया है, और कुछ किया भी नहीं.......

मैंने हमेशा तुझे, इस जिंदगी में खुश ही देखा, या तेरी रहगुजर में, दुःखों को तलाशा ही नहीं, ये कहूं तो, सच भी है और झूठ भी है, तुझको मैने याद किया है, और कुछ किया भी नहीं। जब कभी शाम की तन्हाई में, तू रहा भी हो, मैने अपनी तन्हाई में, तुझको पुकारा भी नह
 
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कैसे जीवन को जीती वो?..........

जब कहते हैं, आजाद हैं हम, तो नारी को, क्यों दिया बंधन, लम्बें परदें की ओटों में, क्यों बांध रहे उसको बंधन? क्या सोचा है,..कभी तुमने, कैसे जीवन को जीती वो?.. रस्मों की ओट में डाले हुए, सारे बंधन को सहती वो?.. कहते हैं हया का परदा है, क्या परदा नही, तो
 
PREETI BARTHWAL
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हर रंग लगे रसीला.......

रंग लगा हर चेहरा देखो, लाल हरा, और पीला, प्यार के रस में भरे हुए, हर रंग लगे रसीला। हर कोई राधा कृष्ण बना, कोई धर्म का डोल बजे ना, न कोई गोरा, न कोई काला, बस एक ही रंग, सजे यंहा, रंग लगा हर चेहरा देखो, लाल हरा और पीला, प्यार के रस में भरे हुए, हर रंग
 
PREETI BARTHWAL
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तू इस तरहा से मेरी जिन्दगी में शामिल है।....

जैसे हवाओं में महक का घुलना, फूल में, खुशबू का मिलना, ख्वाब का, पलकों में पलना, रोशनी का, दिये से जलना, तू इस तरहा से, मेरी जिन्दगी में शामिल है। जैसे सीप में मोती का मिलना, बारिश में, इन्द्रधनुष बनना, होठों में, हंसी का खिलना, मंदिर में, शंखनाद होना
 
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मेरा हर शब्द है,...........

मेरा हर शब्द है, मेरी ही किताब की तरहां, रेखाओं में छिपे जज़बात, उस गुलाब की तरहां, जिसकी हर पंखुङी, दर्द के कांटों से बनी, जिसके आंसू हैं, प्यालों में शराब की तरहां, मेरा हर शब्द है, मेरी ही किताब की तरहां।। कहीं पर कुछ छूट गया, और कहीं अफसाने हैं ब
 
PREETI BARTHWAL
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