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मेरे आस-पास

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05 Jun 2010
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देवता तो हमारे अन्दर ही बसते हैं ....नजर की जरूरत है

काया विज्ञान का एक बहुत प्यारा सा हवाला एक जगह मिलता है . जब परमात्मा ने सब देवता पैदा कर लिए तो उन्हें धरती पर रहने के लिए भेज दिया .....वहां रहने के लिए उन्हें सुन्दर स्थान चाहिए था . आहार भी चाहिए था . वे फिर लौट कर परमात्मा के पास गए और अपनी समस्या
 
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एक याद ....एक दीप ....एक टीस....

मेरे साथ ही क्यों , अकसर कवरेज कर रहे मीडिया परसन को ऐसी दिक्कत आती होगी , जैसे कि शनिवार की शाम को मैंने फेस की। 10 अप्रैल की शाम को विक्टोरिया हादसे की चौथी बरसी का आयोजन था। शहर भर के लोग हादसे में चले गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए एक दीप
 
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कोई अधिकार नहीं..... कोई उलाहना नहीं

तुम्हें अगर मेरी जरूरत होती तो तुम मुझे इन राहों पर अकेली न छोड़ते । एक लंबे काल तक मैं अपने आप से ही बातें करती रही। कभी तुम्हारे भीतर जा कर सवाल करती तो कभी अपने अंदर से जवाब तलाषती। पर मेरी तुम्हारी चुप सी बातें मेरे अंदर जवान होती और कुछ समय बाद वहीं
 
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मुद्दत बाद .....उम्रें ठहर गईं

मुद्दत बाद ......उम्रें ठहर गईं उनकी नजरें मिलीं .......एक दूसरे को देखा , जैसे तपती गर्मी में ठन्डे पानी के घूंट भर लिए हों । पर ये क्या , उनकी प्यास तो वैसे ही धरी हुई थी । वो दिन , वो घडी , वो पल ऐसे गुजरा जैसे वो मेले में हैं ..... मेले के हिंडोले
 
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आंख को श्राप .....

ईश्वर की ऑंख ईश्वर के चेहरे पर हो तो वरदान है, लेकिन इन्सान के चेहरे पर लग जाए तो शाप हो जाती है .....अपनी आंख को क्या कहूँ ........ कभी कभी ये श्राप मेरी आंख को लग जाता है ..... कई बार ...... उस दिन भी वही हुआ ...... उस दिन ....... थाने के कंट्रोल रूम
 
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दो सहेलियां ....एक देह में रहती हैं

दो सहेलियां एक दूसरे की साथी दो सहेलियां एक , एकांत में जागती है एक ,एकांत में सोती है सोने वाली जागने वाली से ऑंखें चुराती है जागने वाली सोने वाली को उलाहना देती है सोती , सोती क्या है ऑंखें चुराती है जागती , जागती क्या है खुली आँखों से जंगल उगाती है
 
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उसकी प्यास न पानी बनी न आग

उस रात ..................... वो अकेली नहीं ........................... उस के साथ रात भी जली थी ....................... मैंने उसे आग अर्पित की .......................... वो और भी सर्द हुई ................................ समन्दर की बात की
 
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Feb 19 2010 10:18 AM
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पत्र का शीर्षक क्या होगा ?

तुम्हारी किताब छपी ......तुम अरसे तक मुझे खोजती रहीं ......किताब देने के लिए। और फिर किताब दी भी। तेरी मेरी पहचान बस इतनी ही थी। छोटी सी। मै अपनी किताब की समीक्षा और टिप्पणी के लिए किसी महिला आलोचक / साहित्यकार चाहता था । मेरे दोस्त ने तुम्हारा जिक्र
 
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Feb 18 2010 04:08 PM
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इमरोज ......इक लोकगीत सा

एक साया जो सपने में उतरने लगा था....कुछ पहचान नहीं आ रही थी कि किसका साया है। दिखायी देता है कि एक अकेला मकान है, आसपास में कोई बस्ती नहीं है.....उस मकान की दूसरी मंजिल पर एक खिड़की है जिसमें कोई खड़ा है कंधों पर ‘ााल डाल कर। खिड़की के पास रखी मेज पर बड़ा सा
 
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अब वो शांत था ......

उस दिन बेहद कोहरा था । कोहरे से भरे बादल बार बार गाड़ी के सामने वाले शीशे से टकरा रहे थे लेकिन उसे मंजिल पर पहुचने की बहुत जल्दी हो रही थी । गाड़ा कोहरा गाड़ी को स्पीड में आने ही नहीं दे रहा था । सामने एसा लग रहा था जैसे किसी ने धुयाँ धुयाँ छोड़ दिया हो ।
 
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उस खबर के अक्षर और उनकी अजमत

बात बहुत पुरानी है......... मेरे पुराने घर के सामने एक क्रिस्चयन परिवार रहता था। उनके घर के एक बुजुर्ग सड़क पार वाली सामने की चाय की दुकान पर बैठे रहते थे। एक दिन उनकी बहू मुझसे मिलने दोपहर को आई। मैं दोपहर में लंच के बाद ऑफिस के लिऐ निकलने को तैयार थ
 
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ये भी भला कोई वक्त है ......अब आने का

ये भी भला कोई वक्त है अब आने का न तारों की छांव न गुनगुनी धूप की छत न हवा मे मस्तियाँ न बरसात की मदहोशियाँ न ही तेरे आने का कोई इन्तजार
 
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पापा ........मेरे प्यारे पापा

पापा मेरे प्यारे पापा मैं इंतजार करती रही चाकलेट का गुड़िया का उस दिन पापा नहीं आए पापा का शरीर आया तिरंगा में लिपटा हुआ माँ ने बताया पापा शहीद हो गये हैं आसमान में तारा बन गये हैं पापा .....मेरे प्यारे पापा
 
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अनब्याही बातों के ख्वाब

वो अपनी आदत से बहुत मजबूर है। अनब्याही बातें उसे बहुत परेशान करती हैं। सपनों को काढ़ने वाले धागों के लिए वह हमेशा पक्के रंगों की दुआ करती रहती है। किसी के दुख को पता नहीं कैसे अपने भीतर उतार लेती है। दो अलहड़ प्यार करने वालों को उसने बहुत पास से जाना थ
 
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ये बातें अमृता के साथ हैं या उन फूलों के साथ

आज अमृता जी का जन्म दिन है .......अमृता की बात करो तो इमरोज की बात खुद ब खुद शुरू हो जाती है ....इमरोज से बात करो तो वहां सब ओर अमृता ही मिलेंगी .....इमरोज के शब्दों मैं उनकी एक नज्म ..... किसी के साथ बातें की .......पर बात न बनी .......चले .......पर
 
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Aug 31 2009 06:25 PM
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........लेकिन पानियों पर चलने को राजी नहीं होते कदम ....

जिन वजहों से ........ पानियों में कभी बहे ........ वो वजहें अब पानियों में बह गई हैं ........ अब ........ उन पानियों के दो किनारे बन ....... पानियों में ...... उन वजहों को टटोलते हैं ....... पर हर बार हाथ खाली ही रहते हैं ....... थक कर खड़े होते हैं
 
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Jul 28 2009 02:17 PM
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मैं क्या बोलूं .....मेरे पेरों तले की जमीं चोरी हो गई है ...

हमारी दुनिया का इतिहास दो लफ्जों से वाकिफ है, एक वतरपरस्ती लफ्ज से और एक वतनफरोशी लफ्ज से । इनमें एक लफ्ज को इज्जत की नजर से देखा जाता है तो दूसरे लफ्ज को हिकारत की नजर से देखा जाता है। ये जो मीडिया के सामने अपना मुंह छिपाये बैठी है, उससे सब पूछ रहे
 
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शुक्रिया ... ......आपने मुझे याद रखा

मेरे जन्म दिन के मौके पर यूँ तो आधी रात से ही फ़ोन काळ आने शुरू हो गए थे लेकिन सुबह सुबह कविता जी ने जब फोन पर जन्मदिन की बधाई दी और बताया की पाबला जी की पोस्ट में भी जन्मदिन का जिक्र किया गया तो मैंने सिस्टम आन किया ........इसके लिए मैं पाबला जी का
 
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......और नज्म अडोल खड़ी रह गई

रात जब जाग गई तो ...... अपनी ही लिखी नज्म ...... सिरहाने आन खड़ी हुई ...... नींद से बेजार आंखों ने ...... नज्म के फिक्रे के पीछे .......... छिपे साये को देखा.......... साया चुपचाप ....... गारे के इतिहास में उतर गया ........ दबी यादों को कुरेदने लगा...
 
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नज्म अडोल खड़ी रह गई

रात जब जाग गई तो अपनी ही लिखी नज्म सिरहाने आन खड़ी हुई नींद से बेजार आंखों ने नज्म के फिक्रे के पीछे छिपे साये को देखा साया चुपचाप गारे के इतिहास में उतर गया दबी यादों को कुरेदने लगा सिले जख्मों के धागे उसने नज्म के हवाले कर दिये नज्म के होंठों में क
 
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उधड़े हालात सिलती ... ........वो लड़की

वो लड़की ........ जो हर वक्त अपने घर के कच्चे आंगन में बैठी बड़े ध्यान से उधड़े हुए हालात सीती रहती है। इस कदर ध्यान से सीने काम करती है कि लगता है , धागा खुद ब खुद कपड़े पर उगता चला जा रहा है। दिल कहता है...... दुआ भी एक धागा है जिससे बंदे का रब से सिला
 
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जिन्दगी के कुछ टुकड़े ......जो गिर गए कहीं

मेरा एक टुकड़ा मैले दिनों की सीड़ियों में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा खुश रंग आंखों के प्याले में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा बरसात के मौसम में , जुदायी में गिर गया है। मेरा एक टुकड़ा एक छोटी सी भूल के किनारे गिर गया है।मेरा एक टुकड़ा खामोशी के बीच गिर गया ह
 
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पेड़ .......जिस पर अभी अभी बौर आया था

मेरे ‘ाहर में इक प्यारी सी लड़की, जिसने प्यार में धोखा मिलने पर अपनी जान गंवा दी। उसका आखिरी नोट कुछ इस तरह से था............ मैं तुम्हें प्यार की तरह से प्यार नहीं करती , मैं तुम्हें देवता समझती थी। तुमने ‘ाादी करके दिखा दिया कि प्यार हमेशा बराबर वाल
 
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टेड़ी सिलायी उधड़ा बखिया ...ये जीना भी कोई जीना है

कल उसकी नौकरी चली गई। बैंक की नौकरी। अकसर मेरी उससे बात होती थी। कभी बैेंक काउंटर पर तो कभी बैंक के काम से। काफी अच्छे घर की बच्ची थी। नौकरी गंवाने के दो दिन बाद वह मेरे पास आई। बोली.......मुझे अहसास भी न था कि ऐसा हो जायेगा.....नौकरी जाने का गम नहीं
 
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वक्त खड़ा देखता रहा खुले जख्म को.........

चुप सी रात में यादों के रेले में अंदर कुछ तिड़का वो जख्म खुल गये थे जो सिल दिये वक्त ने रेले से एक साया निकला हाथ बढ़ा कर उसने जख्मों से धागा निकाल दिया वक्त खड़ा देखता रहा खुले जख्म को और साया रेले में गुम हो गया
 
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अक्षर......जो भीतर में उतर आते हैं.......

वो है ` और ´वो था,` इसके बीच का फासला केवल दुनिया का बनाया हुआ है, मोहब्बत करने वाले यह फासला नहीं मानते हैं........... दिल की मिट्टी में जब किसी का नाम अंकुरित हो जाता है.........जब उसकी पहचान पनप जाती है तो पेड़ की ‘ााखा कटने के बाद भी सलामत रहती है
 
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रह गया तेरे होने का जिक्र.........

रह गया तेरे होने का जिक्र बन गया खामोश अहसास अब तो आदत सी हो गई है इस जिक्र की क्योंकि ये हर वक्त साथ साथ चलता है कभी ये मेरे दिल में उतरता है और मुझसे बातें करता है बात करने का मन हो न हो यह बात करता है ,तेरे होने की
 
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सुरों की धुनों पर ........

कहते हैं........ जिनकी रगोंं में संगीत होता है, वे जब सुर छेड़ते हैं तो उनकी उंगलियां सहज ही अपने सीने में जा कर रूह की तारें भी छेड़ देती हैं। और फिर उनके संगीत को सुनने वाले भी कई दिलों वाले होते हैं जिनकी रूह खुद ब खुद सुरमय हो जाती है। अभी पिछले सप
 
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अक्षरों का यथार्थ ............

कुछ लेखकों को पढ़ते पढ़ते कई बार ऐसा होता है, जब अक्षर अपने होने का अहसास दिलाते हैं। कई अक्षर बाहर से कुछ और दिखते हैं, उनके भीतर उतर कर देखो तो उनके अर्थ कुछ और ही होते हैं। ऐसे ही कई अक्षरों ने मेरी रूह को छू लिया............ विमल मित्र की कहानी ´घर
 
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जिंदगी रख के भूल गई है मुझे

जिंदगी रख के भूल गई है मुझे और मैं जिंदगी के लिये बह्मी बूटी खोज रही हूं मिले तो जिंदगी को पिला दूं और वो मुझे याद कर ले
 
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हम उलटी दिशाओं के बादल

उस दिन आसमान साफ था बादलों में हलचल थी वो अचानक मिले जब उन्हें होश आया तो काफी आगे निकल चुके थे वापस आना संभव न था उस दिन बदली ने कहा मैं हवाअों के वश में हूं मेरी किसमत में हैं पहाड़ों की चट्टानें मेरे सामने हैं न खत्म होने वाली राहें बिछड़ते हुए उदास
 
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मेरा ब्लॉग हुआ एक वर्ष का

आज मेरे ब्लाग को एक साल हो चला है। समय का पता नहीं चला। जब मैंने ब्लागिंग ‘ाुरू की तो मुझे ब्लाग की ए बी सी डी भी नहीं पता थी। हां, लिखने का ‘ाौक था ही क्योंकि मेरा प्रोफेशन ही ऐसा है। ब्लाग और ब्लािंगंग में मुझे कई लोगों का सहयोग मिला है। ब्लाग से भ
 
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ये कैसे दिन हैं ????

ये कैसे दिन हैं पैर लकीरों से बाहर चलना चाहते हैं कंधे संस्कारों के बोझ से मुक्त होना चाहते हैं माथे पर मोहब्बत का परचम नहीं बस शिकन है शिकवे शिकायत की गूंज है आंखों के खुश्क समंदर में कोई ख्वाब नहीं, किरच है ये कैसे दिन हैं पैरों के नीचे गरम गारा है
 
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वेंटिलेटर पर हैं डाक्टरों के जज्बात

मुझे निधि का फोन आया,आंटी आप जल्दी अस्पताल पहुंच जाओ। पापा की तबीयत बहुत खराब है।ये मेरी फेमिली फ्रेंड की बेटी निधि का फोन था।डस समय रात से सवा बारह बज रहे थे। ये भी घर में नहीं थे। सोचा इस समय कैसे पहुंचू अस्पताल। नीचे वाले फ्लेट से मिस्टर लुभाना को
 
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लुक ऐ बिट हायर

दिल्ली रेडियो के लिये जब विश्व के कुछ लोकगीत अनुवाद करके एक धारावाहिक क्रम में प्रस्तुत किये गये तो उन्हें पुस्तक रूप में प्रकाशित करते समय वह पुस्तक `आशमा` हो ची मिन्ह के शब्द दोहराते हुए उन्हें ही अर्पण कर दी। फिर मुझे हो ची मिन्ह का तार मिला जिसमे
 
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चाँद ......फिजा .....और वेलेनटाइन

कल शाम में वेलेनटाइन डे पर एक स्टोरी लिखने बैठी तो टीवी की खबरें कानों में पढ़ने लगी, गौर से टीवी की ओर ध्यान किया तो फिजा अपने चांद को कोस रही थी। उसके हाथ में मोबाइल था जिसे वह मीडिया को दिखा रही थी कि वर्ष 2006 में चांद ने उसे मैसेज किया जिसमें उसन
 
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जन्म दिन मुबारक इमरोज

कई बातें ऐसी होती हैं जो खास नहीं लगती हैं लेकिन बरसों बाद उनके अर्थ तकदीरी अर्थ हो जाते हैं। एक जगह इमरोज ने लिखा है, मेरा दूसरा जन्म हुआ जब पहली मुलाकात के बाद तुमने मेरा जन्म दिन मनाया और फिर मेरी जिंदगी का जश्न भी तुमने ही मनाया खूबसूरत सोचों के
 
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बादलों के महल में सोया है सूरज

चार दिन पहले ही मकर संक्रांति थी। सोचा रसोई में कुछ बना लूं। दो मन हो रहे थे। मन धुंआ धुंआ था लेकिन बात यह भी सता रही थी कि इस दिन का कुछ तो होना चाहिए। सो खीर चढ़ा दी। खीर की खुशबू से सारा घर महक उठा। इसके बाद खिचड़ी के लिये चावल धोए। चावलों पर जरा सा
 
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