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कुछ ग़ज़ल कुछ गीत !

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18 May 2010
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कुछ ग़ज़ल कुछ गीत !

राकेश खण्डेलवाल जी को जन्मदिवस की हार्दिक मंगलकामनायें।तुम सलामत रहो हज़ार बरस …………………………।
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रास्ता ही

रास्ता हीरास्ता ही भूल जाओ एक दिनआओ मेरे घर भी आओ एक दिन बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ोउसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूरधूप जैसे मुस्कराओ एक दिन घर के सन्नाटे में गुम हो
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शब्द हैं अजनबी

शब्द हैं अजनबी शब्द आते नहीं होंठ पर अब मेरे, भावना सो गई शाल इक ओढ़ कर कंठ में स्वर अटकते हुए रह गये, आये बाहर नहीं मौन को तोड़ कर कुछ कहा न गया, कुछ लिखा न गया, वाणी चुप हो रही, शब्द हो अजनबी और वह इक कलम जिसको अपना कहा, वो भी चल दी मेरे हाथ को छोड़ कर
 
राकेश खंडेलवाल
Mar 09 2010 10:23 AM
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आपकी राह उन मोतियों से सजे

फिर नया वर्ष आकर खड़ा द्वार पर,फिर अपेक्षित है शुभकामना मैं करूँमांग कर ईश से रंग आशीष केआपके पंथ की अल्पना मे भरूँफिर दिवास्वप्न के फूल गुलदान मेंभर रखूँ, आपकी भोर की मेज परन हो बाती, नहीं हो भले तेल भी,कक्ष में दीप पर आपके मैं धरूँफिर ये आशा करूँ जो
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:47 AM
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दूर का मसला

दूर का मसला घरों तक आ रहा हैबाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है।आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो,इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है।लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के; फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है।मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस काजीविका के अवसरों तक आ रहा है।इसने
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चित्र मावस का था, रंग भरते रहे

राहें ठोकर लगाती रहीं हर घड़ीऔर हम हर कदम पर संभलते रहेकट रही ज़िन्दगी लड़खड़ाते हुएस्वप्न बनते संवरते बिगड़ते रहेचाह अपनी हर इक टंग गई ताक परमन में वीरानगी मुस्कुराती रहीआस जो भी उगी भोर आकाश मेंसाँझ के साथ मातम मनाती रहीअधखुले हाथ कुछ भी पकड़ न सकेवक्त म
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:47 AM
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जब भी चाहा

जब भी चाहा तुमसे थोड़ी प्यार की बातें करूं पास बैठूं दो घड़ी,श्रृंगार की बातें करूं।वेदना चिरसंगिनी हठपूर्वक कहने लगी आंसुओं की,आंसुओं की धार की बातें करूं।देखता हूँ रुख ज़माने का तो ये कहता है मन भूल कर आदर्श को व्यवहार की बातें करूं।आप कहते हैं प्रगत
Dec 29 2009 11:47 AM
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लक्षण हैं चढ़ रही उमर के

संभल संभल जब उठते हैं पग, अमराई की राहगुजर पेअरे रूपसि ! निश्चित मानो, लक्षण हैं चढ़ रही उमर केधुंधली आकॄतियों के बिम्बों में मन उलझ उलझ जाता हैएक अधूरा छंद अधर पर पाहुन बन बन कर आता हैअभिलाषा की हर अँगड़ाई टूट टूट कर रह जाती हैनिमिष मात्र भी एक बिन्दु
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:47 AM
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अतीत के झरोखों से

मौन है स्वर, ह्रदय गूँगा, आँख में आँसू नहीं हैंइक अपाहिज सी व्यथा का बोझ कांधे पे रखा हैढाक के वे तीन पत्ते, जो सदा शाश्वत रहे हैंआज फिर से सामने आये हैं मेरे खिलखिलातेनीम की कच्ची निबोली पर मुलम्मा चाशनी काउम्र सारी ये कटी है बस यूँही धोखे उठातेतोड
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:47 AM
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वो मेरे बच्चों को

वो मेरे बच्चों को स्कूल ले के जाता था।और उसका बेटा वहीं खोमचा लगाता था॥उन्हें जो धूप से, बरसात से बचाता था ।खुद उसके सर पे फ़क़त आसमाँ का छाता था।भटक गया हूं जहां मैं –कभी उसी वन से,सुना तो है कि कोई रास्ता भी जाता था॥सियाह रात थी, और आँधियाँ भी थीं; ल
Dec 29 2009 11:47 AM
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यादों के दीपक जलते हैं

बिम्ब उलझ कर जब संध्या में, सूरज के संग संग ढलते हैंजाने अनजाने तब मेरी यादों के दीपक जलते हैंसिरहाने के तकिये में जब ओस कमल की खो जाती हैराह भटक कर कोई बदली, बिस्तर की छत पर छाती हैलोरी के सुर खिडकी की चौखट के बाहर अटके रहतेऔर रात की ज़ुल्फ़ें काली रह
 
राकेश खंडेलवाल
Dec 29 2009 11:47 AM
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कह गया था

कह गया था, मगर नहीं आया;वो कभी लौट कर नहीं आया।क़ाफिले में तमाम लोग थे पर,बस वही हमसफ़र नहीं आया।रेल जीवन की ‘टर्मिनस’ पहुंची;किंतु मेरा शहर नहीं आया।ऐसा क्यों लगता है कि जैसे वो,आ तो सकता था, पर नहीं आया।एक मेरी बिसात क्या, सुख तोजाने कितनों के घर नही
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माना मद्धम है

माना मद्धम है, थरथराती हैफिर भी इक लौ तो जगमगाती है मैं अकेला कभी नहीं गातावो मेरे साथ गुनगुनाती हैहां ये सच है के कुछ दरख़्त कटेएक बुलबुल तो फिर भी गाती हैमैं अकेला कहां मेरे मन में एक तस्वीर मुस्कराती हैआँख कितनी ही मूंद ले कोईज़िन्दगी आइना दिखाती
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सबको मालूम थे

सबको मालूम थे हमसे भी भुलाए न गएवे कथानक जो कभी तुमको सुनाये न गए गीत लिखते रहे जीवन में अंधेरों के खिलाफ़और दो-चार दिये तुमसे जलाए न गए दूर से ही सुनीं वेदों की ऋचाएं अक्सरयज्ञ में तो कभी शम्बूक बुलाए न गए यूकेलिप्टस के दरख्तों में न छाया न
Aug 13 2009 08:15 AM
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डा० अमर ज्योति--जन्म दिन शुभ हो

पीर के अश्रुओं से भरी लेखनी, शब्द को जन्म दे, खिलखिलाती रहेराह की धूल यमुना की रेती बनी, आपके भाल टीका लगाती रहेचार दिन छह दहाई शती त्रय दिवस,आज का ही निरंतर करें अनुसरणभोर आ नज़्म की वीथिका में किरण, से गज़ल का कलेवर सजाती रहेसादर शुभकामनाओं सहितराकेश
 
राकेश खंडेलवाल
Aug 01 2009 03:30 AM
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जी हम भी कविता करते हैं

मान्य महोदय हमें बुलायें सम्मेलन में हम भी कवि हैंहर महफ़िल में जकर कविता खुले कंठ गाया करते हैं हमने हर छुटकुला उठा कर अक्सर उसकी टाँगें तोड़ींऔर सभ्य भाषा की जितनी थीं सीमायें, सारी छोड़ीपहले तो द्विअर्थी शब्दों से हम काम चला लेते थेबातें साफ़ किन्तु अब
 
राकेश खंडेलवाल
Jul 24 2009 07:57 AM
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मेरे भोले सिसकते मन

मेरे भोले सिसकते मन! मेरे कातर करुण क्रंदन!न रोओ ; चुप भी हो जाओ;चलो चुपचाप सो जाओ। बढ़ीं इतनी निराशाएं , कि जीवन भार लगता है; बहुत उलझा हुआ इस विश्व का व्यापार लगता है। जनाज़ों के शहर में ज़िंदगी को कौन पूछेगा? मुखौटों के नगर में आदमी को कौन पूछेगा??यह
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मैं इक और गीत रच डालूँ

बुझे बुझे सरगम के सुर हैंथके थके सारे नूपुर हैंशब्दों का पिट गको आतुर हैभावों की लुट हई पोटली अनुभूति के कोष रिक्त हैंऔर तकाजा एक तुम्हारा मैं इक नया गीत लिख डालूँअक्षर अक्षर बिखर गई हैंगाथाय्रं कुब याद नहीं हैंशीरीं तो हैं बहुत एक भीलेकिन पर फ़रहाद न
 
राकेश खंडेलवाल
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गीत

पी के देखा हर नशा हर विष पिया,किंतु फ़िर भी वेदना सोई नहीं। घर से निकले थे बड़ी उम्मीद से सब समस्याओं का हल मिल जायेगा.इस मरुस्थल की नहीं सीमा तो क्या,इस मरुस्थल में ही जल मिल जायेगा। प्यास तन-मन की मगर ऐसी बढ़ी,दिल दुखा तो आँख तक रोई नहीं।वास्तविकताएँ
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नाले याद आते हैं

बहाईं थीं जहां फ़ाकिर ने कागज़ की कभी कश्तीकि जिसके साहिलों पर मजनुऒं की बस्तियां बसतींजहां हसरत तमन्ना के गले को घोंट देती थीलगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसतीहरे वो रंग पानी के औ: काले याद आते हैंतुम्हारे शहर के वो गन्दे नाले याद आते हैंनहीं
 
राकेश खंडेलवाल
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कुछ यूं ही

छंद के बंद आते नहीं हैं मुझे, इसलिये एक कविता नहीं लिख सकालोग कहते रहे गीत शिल्पी मुझे, शिल्प लेकिन नयाएक रच न सकाफिर भी संतोष है तार-झंकार से जो उमड़ती हुई है बही रागिनीशब्द की एक नौका बहाते हुए,साथ कुछ दूर तक मैं उसे दे सका-०-०-०-०-०-०-०-०-०-बोझ उसक
 
राकेश खंडेलवाल
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बस में बैठे

बस में बैठे बैठे आंखें भर आना।याद आज तक है वो तेरा शहर जाना।कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥बाग़ कट चुके,खेतों में सड़कें दौड़ीं;कैसा गाँव कहां छुट्टी में घर जाना॥किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर ज
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सारे छंद बिखर जाते हैं

नाम काव्य का लेकर जब जब होते हैं भाषण, लफ़्फ़ाज़ी अखबारी कतरन या कविता में दिखता न फ़र्क जरा भी और प्रशंसा के अफ़साने जहाँ अपेक्षित बन जाते हैं मित्र ! वहाँ कविता क्या होती ? सारे छंद बिखर जाते हैं इधर उधर की जोड़-तोड़ की पैबंदों वाली रचनायें क्या क्या पढ़ ल
 
राकेश खंडेलवाल
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दुम हिलाना

दुम हिलाना कोई मुहावरा नहीं है। न ही मजबूरी; कृतज्ञता? हरगिज़ नहीं! वह है - एक मानसिकता जो कुत्ते के दांतों पर हावी है।
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मेरे अधरों पर हस्ताक्षर

मेरे अधरों पर हस्ताक्षर प्रिये अधर से तुमने अपने जब से किये अधर पर मेरे हस्ताक्षर, तब से सपनों की बगिया और निखर आई है आतुर हुई कामना भर ले यष्टि कमल को भुजपाशों में आकाँक्षायें हैं सांसों की घुलें महक वाली सांसों में नयनों की पुतली बन रांझा,चित्र हीर
 
राकेश खंडेलवाल
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टूटे यूं संबंध सत्य से

टूटे यूं संबंध सत्य से सभी झूठ स्वीकार हो गये। ठोकर खाते-खाते आख़िर हम भी दुनियादार हो गये॥ बचपन से सुनते आये थे सच को आंच नहीं आती है। पर अब देखा-सच बोलें तो, दुनिया दुश्मन हो जाती है॥ सत्यम वद, धर्मम चर के उपदेश सभी बेकार हो गये। ठोकर खाते-खाते………….
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प्रिन्टर ने इन्कार कर दिया

कवि सम्मेलन की खातिर , ये सोचा कविता चार छाप लूँ लेकिन प्रिन्टर ने कवितायें देने से इन्कार कर दिया तकनीकी के साथ चले हम, इसीलिये की विदा डायरी कम्पूटर पर संजो रखी है, हमने अपनी सकल शायरी जहां कहीं भी जाते अपनी पेन-ड्राइव को ले जाते हैं वहीं छाप कत अप
 
राकेश खंडेलवाल
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उसने कभी भी

उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं . कितना भला किया कि बुराई सुनी नहीं. रोटी के जमा-ख़र्च में ही उम्र कट गई, हमने कभी ग़ज़ल या रुबाई सुनी नहीं . औरों की तरह तुमने भी इलज़ाम ही दिये; तुमने भी मेरी कोई सफाई सुनी नहीं. बच्चों की नर्सरी के खिलौने तो सुन लिए; ढ