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उधेड़-बुन

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11 Jun 2010
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मैं और मेरी बेरोज़गारी

मैं और मेरी बेरोज़गारी, अक्सर ये बातें करते हैंकि नौकरी होती तो कैसा होता, मैं काम से आते वक़्त फूल लाताबच्चों के लिए खिलौने लाता मैं ये करता, मैं वो करतानौकरी होती तो ऐसा होता, नौकरी होती तो वैसा होता मैं और मेरी बेरोज़गारी, अक्सर ये बातें करते हैंये कहाँ
 
Rahul Upadhyaya
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क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?

"क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?"पूछा था उसनेऔर मैं जवाब तुरंत नहीं दे पाया थादेता भी कैसे?अगर कभी किसी ने मुझसे प्यार किया होताया मैंने किसी सेतब तो मुझे पता भी होता किप्यार किस चिड़िया का नाम है"किस सोच में पड़ गए?जल्दी बताओ, तुम मुझसे प्यार करते हो या
 
Rahul Upadhyaya
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कभी-कभी दुआओं का जवाब आता है

कभी-कभी दुआओं का जवाब आता हैऔर कुछ इस तरह कि बेहिसाब आता हैढूँढते रहते हैं रात-दिन जो फुरसत के रात-दिनहो जाते हैं पस्त जब पर्चा रंग-ए-गुलाब आता है (पर्चा रंग-ए-गुलाब = pink slip, नौकरी खत्म का आदेश )यूँ तो तेल निकालो तो तेल निकलता नहीं हैऔर अब निकला है
 
Rahul Upadhyaya
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हवा तो हवा है

हर जगह वो चलती हैवो हमारी-तुम्हारी सांस नहींजो सरहदों में सिसकती हैईश्वर की दृष्टिहै समान सब परजंगल और शहर में वोभेद नहीं करती हैयूँ निकालो तेलतो तेल निकलता नहीं हैऔर अब निकली है धारतो रोके न रूकती हैमरने को तो मरते हैंहज़ारों लोग रोज़लेकिन उड़नेवालों के
 
Rahul Upadhyaya
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Jun 02 2010 08:23 PM
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ज़िंदगी, मौत और तलाक़

ज़िंदगी, मौत और तलाक़एक ही तस्वीर के तीन पहलू हैंएक मेंवो खींची जाती हैदूसरे मेंसजाई जाती हैतीसरे मेंफाड़ दी जाती है=॰=ज़िंदगी मिलती हैमौत आती हैतलाक़ होता हैवैसे हीजैसेदोस्त मिलते हैंरात आती हैऔरसवेरा होता है=॰=जब कोई सब कुछ छीन लेता हैतो उसे तलाक़ "देना"
 
Rahul Upadhyaya
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बड़ी बहन

बड़ी बहन जब बढ़ी हो रही थीमाँ को चिंता बड़ी हो रही थीजब जो चाहे खा ले पी लेकैसे होगे हाथ इसके पीले?एक समय थी फूल सी कायाअब खा-खा के फूल रही है!एक मिली ताई आतातायीबोली बंद करो दुध-मलाईसूखी रोटी में सुख है भाईमाँ को बात तुरंत ये भाईलड़्डू-पेड़ा हलवा-पूड़ीसब के
 
Rahul Upadhyaya
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May 25 2010 09:41 AM
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विंडो खुली है और हवा आती नहीं है

विंडो खुली है और हवा आती नहीं हैकम्प्यूटर की दुनिया मुझे भाती नहीं हैये ओ-के, ये कैंसल, ये कैसे हैं डायलागकहने की छूट जिसमें मुझे दी जाती नहीं हैजला के बचाने की ये उलट-विद्या है कैसीपी-सी में बर्नर की बात समझ आती नहीं हैये इंटर, ये इस्केप, ये कीज़ हैं
 
Rahul Upadhyaya
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मैं लिखता रहा, तुम डिलिट करती रही

मैं लिखता रहा, तुम डिलिट करती रहीमेरी बाते मेरी मेल में सड़ती रहीन बरसी, न गरजी, न निकली कभीबदली उमंगों की दिल में सिकुड़ती रहीलिखने को लिख गए ज्ञानी-ध्यानी बाते कईऔर दुनिया अधकचरे ब्लॉग पढ़ती रहीकवि की कल्पना को कैसे ताले लगेमाँ की सूरत एक सी गढ़ती रहीवो
 
Rahul Upadhyaya
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यदि सुधरा जो मैं

न ग़म होता है, न वहम होता हैतसव्वुर में मेरे जब मेरा सनम होता हैइंसां हैं सभी और सभी मेहरबानवो तो दीवारों का दूसरा नाम धरम होता हैयदि सुधरा जो मैं तो बच्चे हो जाएगे बाँझक्योंकि अच्छों का दुबारा नहीं जनम होता हैतक़दीर पे अपनी जो करते हैं भरोसाहाथों से उनके
 
Rahul Upadhyaya
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इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए

इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुएइक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैंहमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगारोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैंकहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिनऔर हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैंपीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती
 
Rahul Upadhyaya
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मनोदशा

लाल रोशनी केदो गोलों के पीछेमैं खुद को इतना सुरक्षित समझता हूँकि60 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही कार कीस्टीयरिंग व्हील पकड़ेमैंबेगम अख़्तर कीअलसाती हुई ठुमरीबड़ी तन्मयता के साथसुन सकता हूँसुरक्षाअसुरक्षाकल का भयआज की चिंताये सबमनगढ़ंत हैंयापरिवेश के जाए
 
Rahul Upadhyaya
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ब्राउनियन मोशन में जीव-सार सारा

झोपड़ी के दीप सा टिमटिमाता ताराभटकता है नभ में ज्यों भटके शिकाराभटकना ही जीव का दीन-ओ-धरम हैब्राउनियन मोशन में जीव-सार साराभटकना न होता तो पाषाण होतेन हिलते, न डुलते, न होते बीच धाराजीवन है जीना तो बहना है निश्चितजीते जी किसी को न मिलता किनारामोक्ष की आस
 
Rahul Upadhyaya
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Apr 12 2010 09:49 PM
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कैलेंडर और घड़ी

कैलेंडर है एकतिथियाँ कई हैंइनमें स्थितपरिस्थितियाँ कई हैंकैलेंडर से छोटीकैलेंडर से बड़ीदुनिया में नहींकोई ऐसी किताबबारह पन्नों के बीच मेंजो सौंप दे सारा जहाँबच्चों की छुट्टीबुआ का ब्याहग्वाले का दूधधोबी की लिस्टपड़ोसी का डिनरमौसी का नम्बरसोख लेता है सब का
 
Rahul Upadhyaya
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मैंने मोहब्बत की है

मैंने मोहब्बत की है और अनेकों से की हैजिसकी सज़ा मुझे बरोबर मिली हैकहता था मैं महबूब जिनकोपाता हूँ आज मैं दूर उनकोऐसा नहीं कि मोहब्बत में कमी थीबस फ़क़त एक की वो जागीर नहीं थीदुनिया को मोहब्बत से भली रंजिश लगी हैइसीलिए तो हो एक से ऐसी बंदिश नहीं हैझूठ कहती
 
Rahul Upadhyaya
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सोते हैं हम सभी

खोते हैं जब कभीरोते हैं हम सभीरटे-रटाए सेतोते हैं हम सभीइक दिन तो होना हैपाया जो खोना हैफिर भी उदास क्यूँहोते हैं हम सभीजग ने ये जाना हैघर ये बेगाना हैनिर्वस्त्र हो कर केसोते हैं हम सभीखा कर के कसमेंरहते हैं जग मेंस्वछंद जीवन क्योंखोते हैं हम सभीटीका
 
Rahul Upadhyaya
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बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरे

बदलते ज़माने के बदलते ढंग हैं मेरेनए हैं तेवर और नए ही रंग हैं मेरेशुद्ध भाषा के शीशमहल में न रख सकोगे कैद मुझेमैं तुम्हे आगाह कर देता हूँ कि संग संग हैं मेरेये तेरी-मेरी भाषा का साम्प्रदायिक तर्क तर्क दोजैसे सुंदर हैं तुम्हारे वैसे ही सुंदर अंग हैं
 
Rahul Upadhyaya
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21 वीं सदी

डूबते को तिनका नहीं लाईफ़-गार्ड चाहिएग्रेजुएट को नौकरी ही नहीं ग्रीन-कार्ड चाहिएखुशीयाँ मिलती थी कभी शाबाशी सेहर किसी को अब मॉनेट्री रिवार्ड चाहिएजो करते थे दावा हमारी हिफ़ाज़त काउन्हे अपनी ही हिफ़ाज़त के लिये बॉडी-गार्ड' चाहिएघर बसाना इतना आसान नहीं इन
 
Rahul Upadhyaya
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बिल तो है बिल

बिल तो है बिलबिल का विश्वास, क्या कीजैहो गया जोजैसे तैसे पास, क्या कीजैमहीनों से सुनते आए,पास जो बिल हो जाएदुखड़े हमारे दिल केदूर भगा ले जाएबिल में है क्या-क्या कोईमुझको बता ना पाएजल्दी में है हर कोईजल्दी में सब निपटाएकुछ न कहे ये,चुप ही रहे ये,सब के सब
 
Rahul Upadhyaya
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रोशनी है इतनी कि आँख नहीं लगती है

सारा दिन गुज़र जाता हैऔर प्यास नहीं लगती हैदेख के दुश्मन भीतन में आग नहीं लगती हैऐसा भी नहीं किमैं एक रोबोट हूँ यारोकम्बख़्त रोशनी है इतनीकि आँख नहीं लगती हैजीने के तो वैसेकई तरीके हैं लेकिनअपनी ही तबियतकुछ खास नहीं लगती हैआएगा वो दिनजब वो ढूंढेगी
 
Rahul Upadhyaya
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जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँ

जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँमरा है कोई और मैं गीत सुनाने लगा हूँकवि हूँ कवि का धर्म निभाऊँगा ज़रूरदुनिया के ग़म को भुनाने लगा हूँऐसा नहीं कि पहले लड़ाई-झगड़े होते नहीं थेअब हर रंजिश को जामा नया पहनाने लगा हूँये कौम कौम नहीं, है दुश्मन हमारीकह कह के
 
Rahul Upadhyaya
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पिता और देवता

कैसा है ये भारत प्यारेकैसे इसके पुत्तरजो पिता और देवता मेंकरे फ़र्क भयंकरएक की मूर्ति बाहर रखेएक की मूर्ति अंदरकैसा है ये भारत प्यारेकैसे भारतवासीपिता-देवता रहे अलगजबकि वे सहवासीपिता-देवता दोनों देखोदोनों स्वर्गवासीकैसा है ये भारत प्यारेकैसे इसके बंदेजो
 
Rahul Upadhyaya
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सेंट पेट्रिक्स डे

यहाँ और वहाँ में क्या है फ़र्क?पेश हैं कुछ ताजा तर्कवहाँ के लोग बनाए घरयहाँ के बिल्डर्स बनाए हाऊसवहाँ के बिल पाले चूहेंयहाँ के बिल बेचे 'माऊस'वहाँ के लोग करे 'मिस्ड कॉल'यहाँ के लोग करे 'मिस कॉल'यहाँ का प्रेसिडेंट अभी तक 'मेल'वहाँ की प्रेसिडेंट एक
 
Rahul Upadhyaya
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नव-वर्ष - 1 जनवरी को या चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को?

कहने लगे अग्रज मुझसेतुम तो पूरे अंग्रेज़ होअपनी ही संस्कृति सेकरते परहेज़ हो1 जनवरी को हीमना लेते हो नया सालजबकि चैत्र मास मेंबदलता है अपना सालतुम जैसे लोगो की वजह से हीआज है देश का बुरा हालतुम में से एक भी नहींजो रख सके अपनी धरोहर को सम्हालमैंने कहाआप
 
Rahul Upadhyaya
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Mar 16 2010 11:58 PM
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एक था पेड़

एक था पेड़जो लहलहाता था आंगन मेंअब जल रहा हैमेरे फ़ायर-प्लेस मेंएक था पशुजो विचरता था बाग मेंअब पक रहा हैमेरे किचन मेंएक थे पूर्वजजिनकी अस्थियाँबन के जीवाश्म ईधनजल रही हैंमेरी कार मेंऊर्जान बनती हैन मिटती हैसूत्र यही सोच करकरता हूँ मन शांत मैंसिएटल ।
 
Rahul Upadhyaya
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कण-कण में भगवान है

आँखें इतनी कमज़ोर हैं किसपने दिखाई नहीं देते हैंआदमी तो आदमीगधे दिखाई नहीं देते हैंकण-कण में भगवान हैये कुत्ते कब समझेगेकि बिन बादल-बरसात केकुकुरमुत्ते दिखाई नहीं देते हैंकैसे हैं ये महानगरकैसा इनका विकास हैकि बढ़ रही है आबादीऔर बच्चे दिखाई नहीं देते
 
Rahul Upadhyaya
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क़हर

पहले भी बरसा था क़हरअस्त-व्यस्त था सारा शहरआज फ़िर बरसा है क़हरअस्त-व्यस्त है सारा शहरबदला किसी से लेने सेसज़ा किसी को देने सेमतलब नहीं निकलेगापत्थर नहीं पिघलेगाजब तक है इधर और उधरमेरा ज़हर तेरा ज़हरबुरा है कौन, भला है कौनसच की राह पर चला है कौनमुक़म्मल नहीं है
 
Rahul Upadhyaya
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जब तुम आई थी

जब तुम आई थीतब कुछ कोपलें उग आई थीऔर वसंत का आगमन हुआ थाअब वो फूल बन गई हैंऔर शूल सी चुभती हैतुम मेरे कितने पास थीऔर मैं तुमसे कितना दूर!***कहा था किफिर मिलेंगे हमलेकिनजैसे मिले थे कलक्या फिर मिलेंगे हम?***झूठ है कि जीवन क्षणभंगुर है!तुम चंद पलों के लिए
 
Rahul Upadhyaya
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Mar 08 2010 11:24 AM
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स्वामी के दीवाने

हर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैंसब किसी न किसी स्वामी के दीवाने हैंइतनी बेवकूफ़ी भरी है इंसानों मेंकि पढ़े-लिखे भी गधे हो जाएस्वामीजी जो नज़र आ जाए चैनल परतो पांच बजे भी उठ के खड़े हो जाएछोटे-बड़े सब लगते दुम हिलाने हैंहर तरफ़ अब यहीं अफ़साने हैंसब किसी न किसी स्वामी
 
Rahul Upadhyaya
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Mar 06 2010 08:36 AM
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पहेली 33

नापता है पर तोलता नहींकाटता है पर मारता नहींसीता है पर राम नहींमहिलाओं का यह काम नहींयदि होती महिला तो होती दर्जनइसके बिना न हम दिखते सज्जनअब आप ही सुलझाओ मेरी उलझनये न हो तो न हो सुंदर जीवनसिएटल । 425-445-08275 मार्च 2010
 
Rahul Upadhyaya
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Mar 06 2010 05:54 AM
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मंदिर

मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूँभगवान को वैसे का वैसा ही तटस्थ पाता हूँकर्मयोगी जो ठहरे!वही मुद्रावही भाव-भंगिमावही अधरो पे मुरलीऔरसाथ में वही राधाजो कृष्ण को छोड़मुझे देख रही हैंजो किअसम्भवअकल्पितऔरअसत्य हैइन्हीं सब बातों को ले करमैं हो जाता हूँ उनसे विमुखन
 
Rahul Upadhyaya
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Mar 03 2010 02:19 AM
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'हैप्पी होली' न हमसे बोली गई है

होली आई और होली गई हैलेकिन 'हैप्पी होली' न हमसे बोली गई हैभावनाओं की कद्र कौन करता है यारोभाषा के पलड़े में भावना तोली गई हैहम ही सही है और तुम सब गलत होकह कह के हम पे दागी गोली गई हैहिंदी हो, उर्दू हो या भाषा हो कोईइनके हिमायतियों की पोल कब खोली गई
 
Rahul Upadhyaya
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शादी है एक ऐसा अजूबा

शादी है एक ऐसा अजूबाजो अच्छे-खासे को एक दिनबना दे नमूनाबना देटाईगर को बिल्लीऔरबीवी को टाईगरजो देता था फूलवो लगता है 'फ़ूल'दुनिया के आगेकर के भूल कबूलमानो प्राईमरी का बच्चालिखे ब्लैकबोर्ड पे दस बारमाफ़ करे मिस!मैं करूँगा होमवर्क हर बारसिएटल । 425-445-082724
 
Rahul Upadhyaya
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Feb 25 2010 12:09 AM
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सोचता था

सोचता थातुम मिलोगीतो ऐसा होगातुम मिलोगीतो वैसा होगाघंटों हम बातें करेंगेएक-दूसरे को निहारा करेंगेचुप न रहेंगेखूब हँसेंगेंएक-दूसरे की टांग खींचेंगेंलेकिन तुमआई-फोन में घुसी रहीऔर मैंब्लैकबेरी से चिपका रहादिन ढलाऔर रात हुईदिल से दिल कीन बात हुईतुम चलीऔर
 
Rahul Upadhyaya
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Feb 22 2010 04:17 AM
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कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़कीबहुत खूबसूरत मगर सांवली सीचलो चेक करूँ ई-मेल आती ही होगीकह कह के लॉगिन करती तो होगीकोई कॉल शायद मिस हो गया होसेल फोन बार बार देखती तो होगीऔर फिर फोन की घंटी बजते ही वोउसी फोन से डर डर जाती तो होगीचलो पिंग करूँ जी में आता तो
 
Rahul Upadhyaya
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Feb 14 2010 08:40 PM
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राम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पार

जब हो टोयोटा की कंडम कारऔर ओबामा की ठप्प सरकारराम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पारसोच समझ के ली थी कारऔर ओबामा को पहनाया हारउसका नतीजा निकला येकि दे दी दोनों ने मुझको हारराम ही जाने कैसे बेड़ा होगा पारचलना है जिसको वो चलती नहींरूकना है जिसको वो रूकती
 
Rahul Upadhyaya
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त्रासदी

जब खटखटाते थे द्वारकहते थे घर जाइए आपअब मरते हैं आजतो पूछते होकैसे हैं आप?हैटी की जनता कीयदि इतनी थी चिंतातो करते मददजब थे वो ज़िंदाजब कमा के खाने के लिएआते थे वोतरह-तरह के दाँव-पेंच निकाल केभगा दिए जाते थे वोमेहनत-मजूरी की कीमतपाई-पाई से नापते हो तुमऔर
 
Rahul Upadhyaya
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भारत छोड़ो आंदोलन

गुर्रु पासपोर्टगुर्रु विसासुरूर भागने का सब पे चढ़ाहै भारत वो आज कहाँजो अंग्रेजों से था कभी लड़ाजहाँ डाल-डाल पे उड़ने कोआतुर बैठी है चिड़ियावो भारत देश है भैयाजहाँ सत्य, अहिंसा और धरम कीपग-पग उड़ती धज्जियाँवो भारत देश है भैयाजहाँ जो भी परिंदाघर से निकलालौट के
 
Rahul Upadhyaya
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वर्ष का आरम्भ

पहले प्रतीक्षा रहती थी वर्ष के आरम्भ कीक्यूंकि तब डायरी बदली जाती थीपहले प्रतीक्षा रहती थी वर्षा के आरम्भ कीजो सावन की बदली लाती थीअब कम्प्यूटर के ज़माने में डायरी एक बोझ हैऔर बेमौसम बरसात होती रोज हैबदली नहीं बदलीज़िंदगी है बदलीबारिश की बूंदे जो कभी थी
 
Rahul Upadhyaya
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१ जनवरी का इंतज़ार

मैं हर साल१ जनवरी काबड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता हूँआँखें फ़ाड़े-फ़ाड़े ताकता रहता हूँकि जैसे ही वो दिखेमैं उसे सीने से लगा लूँऔर एक पल के लिए भी उसे अलग न होने दूँजैसेकोईबस स्टॉप कीबेंच परबटुआब्लैकबेरीचश्माटोपीयाछतरीरख कर भूल जाएऔर याद आने परउल्टे पाँवदूसरी
 
Rahul Upadhyaya
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