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08 Mar 2010
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1411 - बाघों को क्यों मारो ?

1411 - बाघों को क्यों मारो ?जीने का हक तुमको है तोजीने का हक उसको भी दोजि‍यो और जीने दोबाघों को क्‍यों मारो ?. जो जीव तुझमें है वही जीव उसमें भी दोनों ही अंश हैं एक ही ईश्‍वर कीअपने लालच के खाति‍र, न लाद तू पाप गठरी“जहां दया तहँ धर्म, जहां लोभ तहँ पाप”
 
Mahendra
Feb 20 2010 06:20 PM
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पाती

नहीं भूला हूं वो दर्द, वो तकलीफ जो सहे मैंने रो-रो के मनमीत......... कि‍स जुर्म की है ये सजा समझता हूं मैं, हूं बेगुनाह समझ आता नहीं फि‍र क्‍यों न बहें आंखों से आंसुओं की झील कि‍सी को खबर नहीं बि‍लकुल क्‍या बीती मुझ पर, तेरे सि‍वा मैं जब भी रोया न दे
 
Mahendra
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भ्रष्‍‍टाचार

न्‍यायालय में जि‍सकी जड़ है राजनीति‍ में तना सी पकड़ है व्‍यापारि‍क, शासकीय कार्यालयों में उद्योग-धन्‍धों में फैलीं शाखाऐं हैं पूरे इंसानि‍यत में फलती-फूलती, फूल और पत्‍ि‍तयां और दि‍न-ब-दि‍न इसका फैलना ही सबसे बड़ा फल है ये पेड़ कोई और नहीं भ्रष्‍टाच
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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उदासी

अन्‍तर में छाई कोई उदासी तोड़ने के हर संभव प्रयत्‍न कि‍ये उदासी को मेरी वो तोड़ न सके खुद ही की शय, खुद ही मात खाते गये। उदासी है ये उसके लि‍ए जि‍से हम छोड़ आए बि‍छड़ गए, जुदा हुए प्रेम है ये, रूप वि‍योग का लि‍ए। मुझे लूटने की हसरत लि‍ए वो आप ही दफन
 
Mahendra
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कवि‍ता

दुखती रग पर कोई हाथ रखे आह- आह कर चि‍ल्‍लाए हर कोई जो उसका कोई बखान करे तो वाह-वाह कह उठता हर कोई दर्द का ये कैसा रोग । जब शब्‍द नहीं मि‍लते दर्द के मापदण्‍ड के लि‍ए घुमा-फि‍रा कर, शब्‍दों के हेर फेर से इस लहजे हम कहने लगे ये अंदाज शायराना, और हम शाय
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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मैं मन्‍हूष हूं

मैं मन्‍हूष हूं कोई बदनुमा दाग हूं सारे संसार का लगे कर्जदार हूं सारे दुख - दर्द इस जग के देखो सजा देते मुझे मि‍ल के मैं भुगतूं । पत्‍थरों की चोट से भी गहरे-गहरे अहसास, सि‍र आ पड़े ये कहते कर्म (गुमनाम) हूं जैसे कि‍ मैं कोई बेकार वस्‍तु या बेजान हूं
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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गि‍र गया ईमान

पहले ईमान खरीदा जाता था आज ईमान बेचा जाता है.... ढूढ़ने से भी जब मि‍लता नहीं था आदमी कोई बि‍कने वाला अपने स्‍वार्थवश खरीदार लगता था उँचे से उँचा भाव कभी अनमोल था ये ईमान कोड़ि‍यों के भाव बि‍क रहा है आज ईमान इतना गि‍र गया है । पहले ईमान.... आज का लगभग
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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जि‍न्‍दगी तो है बेवफा...

मौत को अपनी, अपने हाथों में लेकर, आजकल मैं घूमा करता हूं जि‍न्‍दगी को दूंगा दगा क्‍यों कि‍ मैं जानता हूं जि‍न्‍दगी तो है बेवफा... मौत को गले लगा लूंगा क्‍योंकि‍ मैं मेहबूब की तलाश में हूं मगर कोई ये न समझे कि‍ मैं मौत को मेहबूबा समझता हूं जो मुझे मेह
 
Mahendra
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कर्मों के खेल

कर्मों का खेल है ये, नहीं मैं गुनहगार मि‍ले कोई ऐसा जो त्रि‍गुण को लगाए फटकार... क्‍यों मुझको रूलाया ? क्‍यों मुझको सताया ? क्‍यों मुझको डराया ? क्‍यों मुझको जलाया ? है कोई क्‍या ? इन सब का जबाब मि‍ले कोई ऐसा जो त्रि‍गुण से करे पूछताछ । कर्मों का खेल
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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एक तू ही मुझे मि‍ल जाए

मेरे सब्र का पैमाना छलक न जाए तू देख जरा, जि‍न्‍दगी से आगे मौत नि‍कल न जाए तेरे इम्‍ि‍तहां की हद और क्‍या होगी तू सम्‍हाल जरा, तेरे कदमों तक मुझे कामयाबी मि‍ल जाए । इम्‍ि‍तहां की कहीं इन्‍ि‍तहां न हो जाए तेरी ये रजा, मेरे लि‍ए कहीं सजा न बन जाए इस रा
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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क्‍या से क्‍या हो गया

कहां था मैं अब कहां हूं कि‍धर चला था कहां जा पहुचां हूं कि‍न ऊचांईयों को छूता था कि‍न गहराइयों में डूब गया क्‍या था मैं, क्‍या हो गया । मानो आसमां का सि‍तारा था अब सागर की गहराइयों का पत्‍थर हो गया उँचे घाट से वास्‍ता था मेरा मानो सागर में उतर गया क्
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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दर्दी दीवाना

दुनि‍यां में जागते दीवाने तो बहुत देखे होंगे मगर हम तो हमेशा सोते ही मि‍ले होंगे दीवाने तो हम भी हैं इश्‍क में मगर ये दावा है मेरे जैसे कोई दीवाने न होंगे। वो यूं छोड़कर गये रह गई बस बरबादी मेरे लि‍ए छोड़ के भी न गये इन्‍तजार भी, ऐसी हुई जुदाई अब इन्
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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दुख और सुख

दुख और सुख आना है जीवन में बंधे हैं दोनो जीवन चक्र में पहले दुख आवे या आवे बाद में सुख को भी आना पड़ेगा जीवन के सफर में । सुख से हमेशा बचकर रहना साथ है इसके काल का घेरा दुख को अपना यार समझना द्वार है ये सतगुरू भक्‍ि‍त का, ये है मेरा मानना । दुख से तु
 
Mahendra
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दीदार

गजल दीदार में तेरे वो करार आता है मुझे सूरत पर तेरी बहुत प्‍यार आता है । तेरी आंखों में प्‍यार कम होता नहीं आंखों से आंखें तभी दि‍ल मि‍लाता है । जहां तक बने पलक न झपके, फि‍र भी छोटा सा दि‍ल खाली रह जाता है । तेरे रूप का नूर चुरा नहीं पाता देखना है, ज
 
Mahendra
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बेजुबांदि‍ल

धड़कने का हक ही नहीं बेजुबांदि‍ल को........ मोहब्‍बत और दि‍ल का क्‍या है रि‍श्‍ता बताने की जरूरत नहीं, मोहब्‍बत के नाम से ही क्‍या असर है होता समझाने की जरूरत नहीं, फड़कता है, धड़कता है भले ही बेजुबां हो धड़कने का हक ही नहीं बेजुबांदि‍ल को........ हक
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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दर्द उठे कसके

मेरी मासूमि‍यत मुझसे छीन के क्‍या मि‍ला तुझे, मेरे लि‍ए गम बीन के फूलों को तूने कांटे बताए हम कांटो पर चलते रहे फूल समझ के । जख्‍म भी तूने दि‍ये मीठे के मीठे बने रहे इसी में मेरा भला बताते रहे दि‍खाते रहे जख्‍म भी क्‍यों भरता भला जब तुम ही इसे कुरेदत
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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बच्‍चे

बच्‍चे, कि‍तने प्‍यारे कि‍तने अच्‍छे बड़े भोले बड़े सीधे चाहे कि‍सी के हों मानुष के या जीवजन्‍तु के हैं जैसे दूध के धुले । उनकी वो मासूमि‍यत उनकी वो आश्रि‍यत हमसे आश लगाऐं उनकी मासूम नि‍गाहें कौन न उनको अपनाए गोद में उठाऐं और खि‍लाऐं तो मन को भी सुकू
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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अपना ही पराया

डराने वालों ने डराया बहुत मैं बस डरता ही गया अपने लि‍ए, अपनों की बेखबरी से जो डरा उस दि‍न से मैं मर गया। उसकी ओर से नि‍राशा ने जो मुझको छुआ छूट गया उसका साथ जो मैंने जकड़ रखा था क्‍यों लगता है मुझे कि‍ मैं लुट गया जो उसने मुझे पकड़ रखा था। मेरे अपनों
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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मि‍स ब्‍यूटी

ऐ मि‍स मैंने तुझे मि‍स कि‍या तुम पर इसका कुछ असर हुआ तू बताए या न बताए सपनों में आके तुझे कि‍श कि‍या ना । नाम न हीं बताया तूने पूछा तो छि‍पाया तूने सोच लि‍या तेरा नाम रखा मि‍स वर्ल्‍ड तुझको मैंने कहा कैसा लगा अब तो कुछ बोलो ना । कैसे कहूं मैं तुमसे प
 
Mahendra
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भक्‍ि‍तपथ

भक्‍ि‍तपथ क्‍यों होता है इतना सख्‍त............... कठनाई भरा, कांटों भरा फि‍र कैसे कोई चलेगा अब हरी भक्‍त कहां मि‍लेगा कौन है जो भक्‍ि‍तपथ पर मि‍टना चाहेगा अब कोई नहीं रहा भक्‍त भक्‍ि‍तपथ क्‍यों होता है इतना सख्‍त............... इन पथरीले रास्‍तों पर
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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पि‍या

बि‍न पि‍या, घबराए मोरा जि‍या जीया तो जीया, न जाए मरि‍या बि‍न दीदार-ए-पि‍या घबराए मोरा जि‍या। कैसे मैं मरि‍ जाऊँ डर लागे मोहिं हँस के मरि‍ जाऊँ जो संग तेरा होहि‍ तेरे दरस सा संग न होय बि‍न पि‍या, घबराए मोरा जि‍या। सोच कई बार आया उडा़ऊँ क्‍यों न मैं अप
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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प्‍यासा मन

मैं प्‍यासा रह गया जब कि‍ पास था समन्‍दर...... लहरों का शोर लगातार ये कहता वेग, ये कौन सम्‍हाल पाया है जा, जा के समा जा मैं मछली सा छटपटाता तड़पता सा रह गया । मैं प्‍यासा रह गया जब कि‍ पास था समन्‍दर...... क्‍यों न डूब सका मेरा जहॉं, दो कदम पर ही तो
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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मैं अपने प्रीतम की

चाहे हाथ उठाओ चाहे हाथ फैलाओ लेकि‍न मैं अपनी जान नहीं दूँगी तुम्‍हें ... जान ये मेरी, मेरे प्रीतम की आन ये मेरी, मेरे प्रीतम की रह लूँगी बनके दासी, स्‍वामी चरनन की पर ये जान नहीं दूँगी तेरे हाथों में चाहे सजा दो, चाहे दात चाहो लेकि‍न मैं अपनी जान नही
 
Mahendra
Dec 29 2009 11:51 AM
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ABOUT ME

आसमां का वो सितारा हूँजिसे ज़मीन पे उतारा गया हैमर के भी जिन राहों से गुजरना नहीं होताउन्हीं राहों से मुझे गुजारा गया है ।यूँ आसान नहीं होताधाराओं का रुख मोड़ देनापहाड़ को रेत सम पीस देना,मिटाने वाले को भी मालूम पड़ गया होगा मौज के विरुद्धबनाने से ज्यादा
 
Mahendra
Jul 27 2009 05:21 PM
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आप की तारीफ़ में

सब कुछ थोथा लागे रे मुझे तो प्रेम के आगे चाँद-सूरज फीके लागें मुझे तो स्नेह के आगे.............. चेहरा उसका ऐसे चमके जैसे सूरज दमके । चाँद को भी शर्म आए जो वो मुस्कुरा दे ॥ रोके से नहीं रूकता है मन मेरा, तू सुन ले । बार - बार इसको घेरे तेरे आकर्षण के
 
Mahendra
टैग: गीत
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आख़िर कैसे भुला दूँ कि आप हमें चाहते हैं

आख़िर कैसे भुला दूँ कि आप हमें चाहते हैं एक बार दिल में बसाने के बाद न जाने लोग कैसे भुला देते हैं बड़ी शिद्दत से है इंतजार उन्हें देखने का जो हमारी खुशी के लिए दुआ करते हैं दिल में जगा कर एक मीठा दर्द प्यार कर, उम्मीद कि किरण दिखाकर फिर ख़बर ही नहीं
 
Mahendra