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खामोश पहलू ...

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05 Jan 2010
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तुम्हारा इंतजार है..

काफी दिनों बाद कोई पोस्ट करने जा रहा हूँ.. बीते दिनों मसरूफियत ने कुछ घेर सा रखा था सो वक्त नहीं निकाल पाया कुछ पोस्ट करने का.. मग़र बकरे की माँ कब तक खैर मानती आख़िर.. इसलिए आज आ ही गया शायद ही कोई ऐसा पुराने गानों का आशिक हो जिसने हेमंत कुमार का नाम न
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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दौड़...

आजकल तसल्ली को हथेलियों पर मलकर रोज़ अपने चेहरे पर लगा लेता हूँ.. सर्दी जब भी आती है तो खुश्की हो जाती है न.. ज़रा नाज़ुक भी हूँ तो बड़ी जल्दी जाड़ा पकड़ लेता है.. अब भी वो दिन याद आते हैं जब अपने इंजीनियरिंग कालेज के हॉस्टल में कभी कोई बीमार पड़ता थ
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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दरख्त...

ज़िन्दगी का हर दौर अपने आप में इक अलग मज़ा लिए हुए होता है... जब सोच वापस घूमती हुई वहां पहुँचती है... बरसों पीछे बचपन के उन दिनों में... जब दुनिया भर की सारी परेशानियों से दूर हर दिन की शुरुआत होती थी माँ के हमें स्कूल जाने के लिए तैयार करने से... व
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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अनजाने रिश्ते...

दरिया सा बहता वक़्त और साहिल पे खड़ी ज़िन्दगी... यूँ मौजों की रवानी देखती है... कुछ लहरें जाते जाते कुछ सिखा सी जाती हैं... कुछ पशेमाँ कर जाती हैं... कुछ सुकूँ सा दे जाती हैं... ऐसे ही दो वाकये गुज़रे १ हफ्ते में दिल को भीतर तक खुश कर गए... हुआ यूँ क
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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टीस...

बंगलोर की सड़को पर ये एक बहुत अजब मंज़र है कि आप किसी इंसान को रुक कर बात करते देख सकें... शायद वक्त की तंगी कह लें या ज़िन्दगी की दौड़ में भागते इंसान की लाचारी... उस दिन ऐ. टी. एम. से रूपये निकल कर वापस आते वक्त देखा... एक आदमी अपनी गोद में एक छोटा
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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जड़ो से खेलने की सज़ा है..

एक बार देखा एक पेड़ को, ज़मीन पर उल्टा वो पड़ा था.. जड़ें थी हवा में झूल रहीं, शाखों के सहारे वो खडा था.. ' ' झूमे था खुले चमन में वो, मस्तियाँ ही मस्तियाँ चढ़ी थी.. मिली थी आज़ादी ज़मीं से आज, इस बात की ख़ुशी भी बड़ी थी.. ' ' परिंदे रहे थे पूछ.. उसस
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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अक्स

उस रात जब कुछ संजीदा शिकायतें अपने खुश्क लबों पे लिए मेरे कमरे पर तुम आई थी.. और बिस्तर पर चादर की चंद सिलवटों के दरमियाँ बिखरे उन तमाम तनहा लम्हों को बिना पीछे देखे समेट ले गई थी.. तुमको शायद नही पता.. एक चीज़ जो तुम भूल गई थी.. आज भी साहिल करीब जान
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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दौलत

आज भी किसी अधूरी शाम को जो एक किनारे बैठकर हिसाब करता हूँ.. जो ज़िन्दगी के बहीखाते में कुछ कर्ज़े ही बाकी दिखाई देते हैं.. कभी कभी लगता है के या तो हिसाब करना मुझे आया नहीं.. या फिर तजुर्बों की रफ़्तार से ज्यादा तेजी इस हिसाब की है.. गुलज़ार साहब की
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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तू न मिलता तो किसी और से बिछडे होते.. !!

इक दिन यूँ ही बेज़ारी में पन्ने पलटते पलटते नज़र इस शेर पर चली गयी.. वैसे हमारे उम्र के शायरों को ऐसे शेर खास तौर से पसंद आते हैं.. इक मुसीबत जो अक्सर हमारे साथ हुआ करती है वो ये है के महफिलों में लोग धड़ल्ले से ऐसे ही शेरों की फरमाइश किया करते हैं..
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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नशा...

दुनिया भर को समझा लिया.. सब समझ गए.. कमबख्त ये दिल नहीं समझता कभी.. आप बताइए.. कभी ऐसा तो नहीं हुआ आपके साथ के पूरी कुव्वत के साथ कुछ सोचा हो के अब नहीं करूँगा.. मगर फिर कर ही देते हैं.. शायद बात समझ में ना आई हो.. और क्लीअर करता हूँ.. मिसाल के तौर प
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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तलाश..

एक बात बताइए.. कभी खुदा को देखा है किसी ने.. फिर क्यूँ हर सहर ये सजदा करते हैं हम.. क्यूँ हम इस पत्थर की मूरत को इस कायनात की सबसे अज़ीम ताकत समझते हैं.. अगर मैं ये पूछूँ के खुदा को मुतैयाँ करें तो शायद कोई तौज़ीह देना बड़ा पेचीदा काम होगा.. मैंने न
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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एक कतरा ख्वाहिश...

कभी कभी किसी पुरानी बात याद को याद करते हैं तो ऐसा लगता है ना कि कितना ग़लत था मैं.. और अपने आप इतना गुस्सा आता है कि बस.. "अबे तुझे कहा था गरम चाय लेकर आ.. ये क्या है.. बार बार समझाना पड़ेगा क्या तुझे.. एक बार में बात समझ में नही आती क्या बे तुझे..
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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अलसाई शाम...

शाहरुख़ खान की एक फ़िल्म का डायलोग है.. इतनी शिद्दत से मैंने तुझे पाने की कोशिश की है, हर ज़र्रे ने मुझे तुझसे मिलाने की साजिश की है. आज लग रहा है की इसमें कोई सच्चाई नही है.. जितनी शिद्दत से हम तड़प रहे हैं उतनी शिद्दत से तो कभी शहजादे सलीम अनारकली
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Dec 29 2009 11:53 AM
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आंच

दहकती शब के दामन में उस रोज़ तेरी साँसों से जब टकराई थी मेरी सांसें सरगोशियों की लवों से जब हमने उजली की थी रात की हथेली उस तवील लम्स के दौरां रफ्ता-रफ्ता उठती तपिश ने जलाई थी कुछ तेरे भीतर कुछ मेरे भीतर की चिंगारी उस रात आखिर बार जिन बुझते रिश्तों क
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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मेरा खुदा

लगती हैं रोज़ लम्बी.. लम्बी सी ये कतारें चढ़ चढ़ के एक दूजे.. के ऊपर से हैं सब बढ़ते फैली हुई है हर सू धूपों की ये खुशबू मावों के चढावों से भर गए हैं इबादतघर सिक्कों और नोटों के गट्ठे चढ़ चुके हैं कहीं पंडों की आरती है.. कहीं मौलवी की अजां है फ़लक पर
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Oct 14 2009 07:50 PM
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वो जो इक शाइर था..

तुमने इक मोड़ पर अचानक जब मुझको 'गुलज़ार' कहके दी आवाज़ एक सीपी से खुल गया मोती मुझको इक मानी मिल गए जैसे 'गुलज़ार'.. इस नाम को किसी त्आर्रुफ़ की ज़रूरत नहीं.. एक अलग अंदाज़.. एक अलग-अंजान सी तरतीब.. एक सफ़ेद कुरता.. एक पुराना चश्मा.. और दरिया के जैस
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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दफ़्‌अतन

कहीं चाँदनी पिघली होगी शायद कहीं रोशनी बरसी होगी शायद सफहों में कुछ नूर क़ैद था बरसों से धुंधली सी फ़लक में जो गुम गया था गर्द झाड़ी है तूने तो निकल आया है आज उफ़क पर तारीखों के बाद इस रोज़न से दफ़्‌अतन मुझे मेरे हिस्से का चाँद नज़र आया है.. -- 1510
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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कारीगर

"बस आधे घंटे रुकेगी यहाँ.. जिसको खाना पीना है खा लो भाई..", कंडक्टर ने चिल्लाते हुए आवाज़ लगायी तो मेरी आँख खुल गयी.. घड़ी दिन के १ का वक़्त दिखा रही थी.. मथुरा से दिल्ली का सफ़र यूँ तो कोई खास लम्बा नहीं है पर हम हिन्दोस्तानियों की मैनुफैक्चरिंग में ही
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Sep 17 2009 02:18 PM
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हर उम्र एक जुदा आसमां लिए होती है

ज़िन्दगी का वो मोड़ जब बदलाव अपने शबाब पर होता है.. कई चीज़ें बड़ी रफ़्तार से बदलती हैं.. शायद जवानी ही है.. यही वो दौर होता है जब कितनी जल्दी चेहरे के रोयें, दाढ़ीकी शक्ल इख्तियार कर लेते हैं - पता ही नहीं चलता.. किस तरह ज़िदें, ज़िम्मेदारियां बन जाती
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
Sep 17 2009 02:17 PM
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कमरा

वो तस्वीर तिरछी है दीवार पे अब भीकॉफी के वो प्याले यूँ ही मेज पे रखे हैंना गयी हैं सिलवटें तेरे छुअन की अब तकना हटा है तेरी गर्म साँसों का वो दागतकिये में अब भी है तेरे गेसू की खुशबूबिस्तर से अब भी लिपटी है वो चादरज़ुम्बिश हर क़तरे में बाकी है कुछ ऐसेके
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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आदतें

याद है तुमको.. पिछली बारिश में जब भीगते हुए सड़क के किनारे वाली रेहड़ी पर जहाँ हमने एक ही प्याली में चाय पी थी टप-टप...पत्तियों से छन के आती बूँदें बार बार उस प्याली में गिरती थी उसकी मिठास मगर बदली नहीं थी तुम्हारे लबों से बार-बार लगती जो थी.. वहीँ
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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नीयत

अपने कॉलेज जाते वक़्त सुबह सबह देखा.. जो मैदान खाली पड़ा था वहां कुछ मजदूर छोटे छोटे पौधे लगा रहे थे.. और साथ ही इक छोटा सा रास्ता जो हम अपने कॉलेज जाने के लिए शॉर्टकट की तरह इस्तेमाल करते थे.. उस पर कुछ माली घास के छोटे छोटे गुच्छे लगा रहे थे.. मैंन
 
केतन कनौजिया 'शाइर'
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मज़मून

उर्दू का ये बड़ा भला सा लफ्ज़ है.. मज़मून.. इसका मतलब होता है सब्जेक्ट.. और ये जो जमात होती है न शायरों की.. कमबख्त बड़ी ही बेचैन.. बेकाबू.. बड़ी ही बेकरार सी होती है खासकर नए नए मजमूनों के लिए.. और मुए हमारे जैसे नए नए मैनुफैक्चर्ड शायर तो तबियत से
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दिसम्बर की उन रातों में...

इस बार ज्यादा नहीं.. बस कुछ बिखरे ख्यालों को तरतीब देने की कोशिश की थी कभी.. उन्ही को पेश कर रहा हूँ.. दिसम्बर की उन रातों में चुपके से तुम.. दुनिया की नज़रों से छिपाकर अपने घर के आउट हाउस में.. एक अख़बार के लिहाफ में आलू के पराठे और उस छोटे से फ्लास
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जादुई चिराग...

बचपन में एक कहानी सुनी थी अलादीन और उसका जादुई चिराग.. कितना अच्छा होता न अगर हमारे हाथ भी लग जाता वो ही चिराग अलादीन का.. एक दिन सोच रहा था मैं कि मान लो मेरे सामने जिन् निकल के आता और कहता "क्या हुक्म है मेरे आका".. क्या मांगता यार मैं.. सोचना शुरू
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लम्हा...

सरसराते हुए पास से कई बार यूँ ही अचानक से.. देखता हूँ तो दूर तलक जाते हुए दिखता है वो लम्हा.. कोशिश की मैंने कई बार की पकड़ कर सिरहाने दबा के रख लूँ.. लेकिन कामयाब नही हो पाया.. एक दिन सुन रहा था गोलमाल का वो गाना.. आने वाला पल जाने वाला है.. ना जाने
 
केतन कनौजिया