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भीगी गज़ल

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26 May 2010
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आखिर हमारे चाहने वाले कहाँ गए

रोशन थे आँखों में, वो उजाले कहाँ गएआखिर, हमारे चाहने वाले कहाँ गएरिश्तों पे देख, पड़ गया अफवाहों का असरवाबस्तगी के सारे हवाले कहाँ गएगम दूसरों के बाँट के, खुशयां बिखेर देंथे ऐसे कितने लोग निराले, कहाँ गएआग़ाज़ अजनबी की तरह, हमने फिर कियाकाँटे मगर दिलों से
 
श्रद्धा जैन
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यूँ प्यार को आज़माना नहीं था

कल रात एक मित्र से मेरे ग़ज़ल के सफ़र की चर्चा हो रही थी , चर्चा के दौरान शुरूवाती दौर में कही गई गजलों का जिक्र आया बस मन हुआ कि एक पुरानी ग़ज़ल पोस्ट की जाए दूरी को अपनी बढ़ाना नहीं थायूँ प्यार को आज़माना नहीं थाउसने न टोका न दामन ही थामा रुकने का कोई
 
श्रद्धा जैन
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मेरी ग़ज़लों की चोरी

इंटरनेट ने जहाँ एक ओर लेखकों को ऐसा मंच उपलब्ध कराया है जिसके ज़रिये वे आसानी से अपने विचारों को पाठकों तक पँहुचा सकते हैं वहीं दूसरी ओर इस सुविधा ने बौद्धिक सम्पदा के चोरी किये जाने को भी आसान बना दिया है। बहुत आसानी से लोग Ctrl+C और Ctrl+V का प्रयोग कर
 
श्रद्धा जैन
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फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए

फूल, ख़ुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे आ गए खुद-ब-खुद गजलों में अफ़साने तुम्हारे आ गए रूह को आदाब दिल के, थे सिखाने पर तुलेपर उसे तो ज़िस्म वाले सब इशारे आ गए आंसुओं से सींची है, शायद ज़मीं ने ये फसलक्या ताज्जुब पेड़ पर ये फल जो खारे आ गएहमको तब अपनी मुहब्बत
 
श्रद्धा जैन
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क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़

पलट के देखेगा माज़ी, तू जब उठा के चराग़क़दम-क़दम पे मिलेंगे, मेरी वफ़ा के चराग़नहीं है रोशनी उनके घरों में, जो दिन भरसड़क पे बेच रहे थे, बना-बना के चराग़कठिन घड़ी हो, कोई इम्तिहान देना होजला के रखती है राहों में, माँ दुआ के चराग़ ये लम्स तेरा, बदन रोशनी से
 
श्रद्धा जैन
Feb 11 2010 05:20 PM
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अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गया

अज़ीब शख़्स था, आँखों में ख़्वाब छोड़ गयावो मेरी मेज़ पे, अपनी किताब छोड़ गया नज़र मिली तो अचानक झुका के वो नज़रेंमेरे सवाल के कितने जवाब छोड़ गयापलट के आने का वादा किया था, देने सकूँ मगर वो दिल में, मुसलसल अज़ाब छोड़ गयाउसे पता था, कि तन्हा न रह सकूँगी मैं वो
 
श्रद्धा जैन
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हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते

हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते नज़दीक बहुत तुम रहे, बन जाओ न आदतये सोच के, मिलने तुझे अक्सर नहीं आते जिस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजराउस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल होअब
 
श्रद्धा जैन
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कोई पत्थर तो नहीं हूँ , कि ख़ुदा हो जाऊँ

कैसे मुमकिन है, ख़मोशी से फ़ना हो जाऊँकोई पत्थर तो नहीं हूँ, कि ख़ुदा हो जाऊँफ़ना = तबाह फ़ैसले सारे उसी के हैं, मिरे बाबत भी मैं तो औरत हूँ, कि राज़ी-ओ-रज़ा हो जाऊँधूप में साया, सफ़र में हूँ कबा फूलों की मैं अमावस में, सितारों की जिया हो जाऊँकबा = लिबास
 
श्रद्धा जैन
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कभी

वक़्त करता कुछ दगा या, तुम दगा करते कभी साथ चलते और तो, हम भी बिछड़ जाते कभी आजकल रिश्तों में क्या है, लेने-देने के सिवा खाली हाथों को यहाँ, दो हाथ न मिलते कभी थक गये थे तुम जहाँ, वो आख़िरी था इम्तिहाँ दो कदम मंज़िल थी तेरी, काश तुम चलते कभी कुरबतें
 
श्रद्धा जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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वो मुसाफिर किधर गया होगा

जब मिटा के शहर गया होगा एक लम्हा ठहर गया होगा है, वो हैवान ये माना लेकिन उसकी जानिब भी डर गया होगा तेरे कुचे से खाली हाथ लिए वो मुसाफिर किधर गया होगा ज़रा सी छाँव को वो जलता बदन शाम होते ही घर गया होगा नयी कलियाँ जो खिल रही फिर से ज़ख़्म ए दिल कोई भर
 
श्रद्धा जैन
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आज़ादी का सफ़र

नमस्कार , आज हमारे लिए बहुत ही शुभ दिन है , भारत देश अपनी आज़ादी का इकसठ वाँ जन्मदिन मना रहा है. आज सबके दिलों का जोश देखे तो ऐसा लगता है, जैसे कोई त्योहार हो , ये त्योहार जिसे हर दिल ने मनाया है, चाहे वो मुस्लिम हो, सिख हो, ईसाई हो या हिंदू हो . आज
 
श्रद्धा जैन
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वो सुख तो कभी था ही नहीं,

जिसकी तलाश मुझे भटकाती रही, चाह में खुद को जलाती रही वो सुख तो कभी था ही नहीं बेसबब उन पथरीली राहों पर चलकर खुद को ज़ख़्मी बनाती रही, कभी गिरती कभी सम्हल जाती सम्हल कर चलती तो कभी लड़खड़ाती लड़खड़ाते कदमो को देख लोग मुस्कराते कोई कहता शराबी तो कई पाग
 
श्रद्धा जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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शूल से शब्द

चुभते शूल से शब्द किसी फूल से नाज़ुक एहसास को मुरझा देने पर मज़बूर कर देते हैं और बाग़ में बचतीं हैं कुछ सूखी सी पत्तियां और माली सोचता हुआ कि आखिर साथ साथ चलते हुए क्यों घायल कर जाते हैं दो साथी एक दूसरे को, शायद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दूसरे क
 
श्रद्धा जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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वो लड़की

बस की खिड़की से सिर टिकाए वो लड़की, सूनी आँखों से जाने क्या, पढ़ा करती है, आंसूओं को छुपाए हुए वो अक्सर, खामोश सी खुद से ही लड़ा करती है हर बात से बेज़ार हो गयी शायद हँसी उसकी कही खो गयी शायद गिला किस बात का करे, और करे किससे, हर आहट पर उम्मीद मिटा क
 
श्रद्धा जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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ऐसा नहीं कि हमको मोहब्बत नहीं मिली

ऐसा नहीं कि हमको मोहब्बत नहीं मिली थी जिसकी आरज़ू वही दौलत नहीं मिली जो देख ले तो मुझसे करे रश्क ज़माना सब कुछ मिला मगर वही क़िस्मत नहीं मिली घर को सजाते कैसे,ये हर लड़की हैं सीखती ज़िंदा रहे तो कैसे नसीहत नहीं मिली किसको सुनाएँ क़िस्सा यहाँ, तेरे ज़
 
श्रद्धा जैन
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कितना है दम चराग़ में

कितना है दम चराग़ में, तब ही पता चले फानूस की न आस हो , उस पर हवा चले फानूस = काँच का कवर लेता हैं इम्तिहान अगर, सब्र दे मुझे कब तक किसी के साथ, कोई रहनुमा चले नफ़रत की आँधियाँ कभी, बदले की आग है अब कौन लेके झंडा –ए- अमनो-वफ़ा चले चलना अगर गुनाह है,
 
श्रद्धा जैन
Dec 29 2009 11:54 AM
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कितना आसान लगता था

कितना आसान लगता था ख़्वाब में नए रंग भरना आसमाँ मुट्ठी में करना ख़ुश्बू से आँगन सजाना बरसात में छत पर नहाना कितना आसान लगता था दौड़ कर तितली पकड़ना हर बात पर ज़िद में झगड़ना झील में नए गुल खिलाना कश्तियों में, पार जाना कितना आसान लगता था जिंदगी में प
 
श्रद्धा जैन
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हँस के जीवन काटने का मशवरा देते रहे

हँस के जीवन काटने का, मशवरा देते रहे आँख में आँसू लिए हम, हौसला देते रहे. धूप खिलते ही परिंदे, जाएँगे उड़, था पता बारिशों में पेड़ फिर भी, आसरा देते रहे जो भी होता है, वो अच्छे के लिए होता यहाँ इस बहाने ही तो हम, ख़ुद को दग़ा देते रहे साथ उसके रंग, ख
 
श्रद्धा जैन
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फिर किसी से दिल लगाया जाएगा

अब नया दीपक जलाया जाएगा फिर किसी से दिल लगाया जाएगा चाँद गर साथी न मेरा बन सके साथ सूरज का निभाया जाएगा रस्म-ए-रुखसत को निभाने के लिए फूल आँखों का चढ़ाया जाएगा कर भला कितना भी दुनिया में मगर मरने पे ही बुत बनाया जाएगा आईना सूरत बदलने जब लगे ख़ुद को फ
 
श्रद्धा जैन
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हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’

सबको गले से तुम न लगाया करो ‘श्रद्धा’हमदर्द मगर कोई बनाया करो ‘श्रद्धा’ बैठा करो कुछ देर चराग़ों को बुझा करआँखें कभी खुद से, न चुराया करो ‘श्रद्धा’ जाया करो मेले कभी, बागों में भी टहलोहंस-हंस के भरम ग़म का मिटाया करो ‘श्रद्धा’ बंदूक-तमंचे से जो घिर जाए
 
श्रद्धा जैन
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Sep 10 2009 08:34 PM
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मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना

मुझ सा ही दीवाना लगता है आईना पल में रोता, पल में हंसता है आईनाशायद कोई उम्मीद जगे अब सीने मेंदरवाज़े को शब भर तकता है आईना दिलवर हैं आ बैठे पल भर को पास मेरेइक दुल्हन जैसा अब सजता है आईना गैरों के घर रोशन करने की है आदत चुपचाप इसी धुन में जलता है
 
श्रद्धा जैन
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रब अता करे

आदरणीय गुरु प्राण शर्मा जी की सलाहियतों के बगैर ये ग़ज़ल पूरी होना संभव नहीं था उनके इस स्नेह और आशीर्वाद के लिए मैं जीवन भर अभारी रहूंगी हो एक ऐसा शख्स जो, मोहब्बत-ओ-वफ़ा करेउठाए हाथ जब भी वो, मेरे लिए दुआ करेअकेले बैठूं जो कभी मैं, खुद को सोचती हुईतो
 
श्रद्धा जैन
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Aug 06 2009 05:10 PM
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मिज़ाज फूलों का

जिस्म सन्दल, मिज़ाज फूलों का रात देखा है, ताज फूलों का तेरी खुश्बू , तेरी ही यादें हैं मेरे घर में है, राज फूलों का हुस्न के, नाज़ भी उठाता है इश्क़ को, इहतियाज फूलों का इहतियाज = Need नफ़रतों को, मिटा हैं सकते गर आग को दें, इलाज फूलों का थक गये राग-
 
श्रद्धा जैन
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ये तो कोई ज़ियाँ नहीं

तेरे बगैर लगती है, अच्छी मुझे फ़िज़ाँ नहीं सरसर लगे सबा मुझे, गर पास तू ए जाँ नहीं (सरसर - रेगिस्तान की गर्म हवा) (सबा - ठंडी हवा) मैं जल रही थी, मिट रही थी, इंतिहां थी प्यार की अंजान वो रहा मगर, क्यूंकी उठा धुआँ नहीं कल रात पास बैठे जो, हम राज़दार ह
 
श्रद्धा जैन
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क्या ख़ला हो जाएगा

मुश्किलें आई अगर तो, फ़ैसला हो जाएगा कौन है पानी में कितने, सब पता हो जाएगा दूरियाँ दिल की कभी जो, बढ़ भी जाएँ तो हुज़ूर तुम बढ़ाना इक कदम, तय फासला हो जाएगा लाए थे दुनियाँ में क्या तुम, लेके तुम क्या जाओगे ये महल, ये रिश्ते-नाते, सब जुदा हो जाएगा गर
 
श्रद्धा जैन
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अच्छी है यही खुद्दारी क्या

अच्छी है यही खुद्दारी क्या रख जेब में दुनियादारी क्या जो दर्द छुपा के हंस दे हम अश्कों से हुई गद्दारी क्या हंस के जो मिलो सोचे दुनिया मतलब है, छुपाया भारी क्या वे देह के भूखे क्या जाने ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या बातें तो कहे सच्ची "श्रद्धा" वे सोचे म
 
श्रद्धा जैन
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नज़र नहीं आती

घटा से घिर गयी, बदली नज़र नहीं आती बहा ले नीर तू, उजली नज़र नहीं आती ये कैसा शोर हवाओं में आज़ दिखता है कहीं पे गिर गयी, बिजली नज़र नहीं आती हरेक ओर नुमाइश के दौर हैं यारों कोई सूरत भी तो, असली नज़र नहीं आती कभी सुलझे नहीं माथे की, सलवटें उसकी कोई ता
 
श्रद्धा जैन
Jan 25 2009 06:32 PM
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मैने पहने है कपड़े धुले

आप भी अब मिरे गम बढ़ा दीजिए मुझको लंबी उमर की दुआ दीजिए मैने पहने है कपड़े, धुले आज फिर तोहमते अब नई कुछ लगा दीजिए रोशनी के लिए, इन अंधेरों में अब कुछ नही तो मिरा दिल जला दीजिए चाप कदमों की अपनी मैं पहचान लूं आईने से कुछ ऐसे मिला दीजिए है मुहब्बत गुन
 
श्रद्धा जैन
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जिगर की बात

हमने छुपा के रखी थी सबसे जिगर की बात सुनते हैं फिर भी गैरों से, अपने ही घर की बात छोटी सी बात से ही तो बुनियाद हिल गयी मज़बूत हैं कहते रहे, दीवार ओ दर की बात बनना सफ़ेदपोश तो कालिख लगाना सीख उंगली उठाना बन गया अब तो हुनर की बात बातें फक़त बनाने में न
 
श्रद्धा जैन
Aug 05 2008 07:53 PM
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खो गये

आँखों से गुलिस्तान वो, खवाबों के खो गये रस घोलते बदन थे, गुलाबों के खो गये वो बोलती ज़बान, कहीं जा के सो गयी क़िस्से बग़ावती वो, किताबों के खो गये देखो वो मिट गये, मुक़द्दर की मार से मिलते थे जो निशान, नवाबों के खो गये उलझन में हो जब कि, हर शख्स शहर
 
श्रद्धा जैन
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मालूम न था हमको

आई जो कभी दूरी ,कर देगी जुदा हमको वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको रिश्तों की कसौटी पर खुद को ही मिटा आए हम चलते रहे तन्हा, थे साथ नहीं साए अश्कों के सिवा उनसे, कुछ भी न मिला हमको वो लौट न पाएँगे मालूम न था हमको मौला ये बता दे मुझे, मेरा दिल क्यूँ सुल
 
श्रद्धा जैन
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मूक हमारे हो संवाद

तेरी आँखों से, मेरी आँखों तक प्यार की जब हो वार्तालाप किसी भाषा की बात न हो न हो कोई तब, जातिवाद दूर कही शहनाई बजे और बागों में खिल उठे गुलाब स्पर्श तुम्हारा बजे तरंग बन दूर कहीं जलती हो आग, एक दूजे को जाने हम जब मूक हमारे हो संवाद
 
श्रद्धा जैन
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दर्द

क्यूँ चुप चुप सा खड़ा है दर्द आँखों में जब हरा है दर्द हंसते खिलते लोगों से मिल, कुछ तो शायद डरा है दर्द आँख छुपा लेती जज़्बो को मुंडेरों पे मरा है दर्द यादों की इक आग जलाकर कहा है हमने खरा है दर्द तुमने वफ़ा के सफ़र में “श्रद्धा” सुना, लिखा और प
 
श्रद्धा जैन