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अनुरक्ति

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01 Jun 2010
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मैंने ही क्या किया ..............( गीत )

मैंने ही क्या किया किसी की लट उलझी सुलझाने को ! क्यों कोई जुल्फें बिखराता , मेरी धूप बचाने को !! बांध बनाकर ये जलधारा जिसने साधी नहीं कभी ! दौनों हाथ जोड़कर जिसने , अँजुरी बाँधी नहीं कभी ! कोई नदिया रुकी नहीं है , उसकी प्यास बुझाने को !! क्यों कोई
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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ग़ज़ल

घातों में कुछ नहीं मगर हाँ बातों में कुछ तो दम है ! अंधों को भी बेच दिया है मैंने सुरमा क्या कम है !! तुम्हें भले संसार दिखाई पड़ता हो केवल सपना ! लेकिन मुझको तो लगता है जुल्फों में अब भी ख़म है !! यूँ ही नहीं गँवाई हमने जान बेवजह पंडित जी ! खंज़र उसके
 
ललितमोहन त्रिवेदी
टैग: ग़ज़ल
Feb 21 2010 05:59 PM
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यूँ ही नहीं ............( गीत )

कुछ ना कुछ लाचारी होगी ,प्यास प्राण पर भारी होगी ! यूँ ही नहीं किसी के आगे , उसने बांह पसारी होगी !! # नेह व्यथा से सृजन कथा तक , सब दस्तूर निराले देखे ! बच बच कर चलने वालों के , पांवों में ही छाले देखे ! जान बूझ कर जो स्वीकारी ,भूल बहुत ही प्यारी हो
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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मैं अंगारा .......(गीत)

मैं अंगारा तुम अगर तपन से प्यार करो तो आजाना ! मैं जैसा हूँ ,मुझे वैसा ही स्वीकार करो तो आजाना !! # जो चना चबैना तक सीमित वो मेरा चना चबैना क्या जो लेना देना करता हो फ़िर उससे लेना देना क्या मेरी ही तरह अगर तुम भी व्यापार करो तो आजाना ....... # मन में
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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उपालंभ ( उलाहना )............गीत

यह गीत उस उम्र का है जब किसी की राई जैसी उपेक्षा भी पर्वत से बड़ी महसूस होती है !विदा के क्षणों में आँखों का न डबडबाना भी फांस बनकर आंसने लगता है ! कच्चेपन का पक्का गीत ....... यदि तेरे नत नयनों में भर आता नीर नमन का ! तो इतना एहसास न होता एकाकी जीवन
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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औरत ( ग़ज़ल )

नदी की धार चट्टानों पै जब आकर झरी होगी ! तभी से आदमी ने बाँध की साजिश रची होगी !! तुझे देवी बनाया और पत्थर कर दिया तुझको ! तरेगी भी अहिल्या तो चरण रज राम की होगी !! मरुस्थल में तुम्हारा हाल तो उस बूँद जैसा है ! जिसे गुल पी गए होंगे जो काँटों से बची ह
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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तूने भी ज्यादती बनाने वाले मुझसे की... ( गीत )

पावों में जंजीर, दौड़ की इच्छा मन भर दी ! तूने भी ज्यादती बनाने वाले , मुझसे की !! जीवन में सब थोड़ा थोड़ा ये संस्कार उमर भर ओढा रस की बूँदें तो छलकायीं लेकिन कसकर नहीं निचोडा मीरा की झांझर जैसा मन , व्यापारी सा जीवन ! ऊपर से ढाई आखर की भाषा मन भर दी !
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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पहने लाख गेरुआ बाने..........( गीत )

हम सभी कोई न कोई लबादा ओढे हुए हैं और धीरे धीरे यही लबादा हमें सत्य लगने लगता है ! हमारी वासनाएं छूटती नहीं हैं सिर्फ़ वेश बदल लेती हैं ,एक नया लबादा ओढ़ लेती हैं और इसी को हमारे अन्दर बैठा हुआ जोगी परम सत्य मानकर आत्म मुग्ध होता रहता है !इसी आत्म मु
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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आँख से अश्क भले ही न गिराया जाए .....( ग़ज़ल )

आँख से अश्क भले ही न गिराया जाये ! पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !! तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया ! किस तरह फ़िर तेरी देहलीज़ पै आया जाये !! दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम ! मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !! मुझे पसंद है खिलता ह
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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साहित्यिक लफ्फाजी ...........( व्यंग )

लेखन से भी एक बड़ा गुण है ' लफ्फाजी ' किसी तरह की बाजी न होते हुए भी इसके अंत में 'जी 'लगा हुआ है जो इसके सम्माननीय होने का प्रमाण है !जो शब्द ख़ुद ही सम्माननीय हो तो उसे धारण करने वाला तो परम सम्माननीय स्वतःही हो जाता है !जैसे 'महागप्प' को साहित्य म
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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छू गई साँस इक पाँखुरी ........( गीत )

छू गई साँस इक पाँखुरी , प्राण मन गमगमाने लगे ! नैन में जबसे तुम आ बसे , स्वप्न भी झिलमिलाने लगे !! जब से काजल डिठौना हुआ , हो गया जो भी होना हुआ ! झम झमाझम हुई देहरी , छम छमाछम बिछौना हुआ बिन पखावज बिना पैंजनी , पाँव ख़ुद छन छनाने लगे !! नैन में जबसे
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के .........( ग़ज़ल )

खुश्बुओं को जहाँ तुम चले हार के ! थे वहीं पर बहुत पेड़ कचनार के !! आरहा है घटाओं का मौसम मगर ! झेल थोड़े से तेवर भी अंगार के !! इक थपेडे ने आकर कहा नाव से ! कितने थोथे भरोसे हैं पतवार के !! डूबना ही मुकद्दर में जब तय हुआ ! देखलें हौसले हम भी मझधार के
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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व्यर्थ न कर देना तुम पल अभिसार का

प्रश्न छेड़ कर्तव्य और अधिकार का ! व्यर्थ न कर देना तुम पल अभिसार का !! # मन में कब तक व्यर्थ प्रतीक्षा लिए रहोगे जब कोई भी नहीं आएगा द्वार तुम्हारे ! तुम्हें पता है रात कटेगी तारे गिन गिन क्यों ख़राब करते हो फ़िर ये साँझ सकारे ! सहज आदमी होना कितना स
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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अहंकार

अहंकार सब कुछ पाकर भी खुश नहीं होता और प्रेम सब कुछ देकर भी आनंदित होता है ! अहंकार और प्रेम दौनों अपनों पर ही चोट करते हैं जैसे नदी अपने विस्तार के लिए अपने ही किनारों को काट देती है जबकि नदी का अस्तित्व ही किनारों से है ! यदि किनारे न हों तो कोई भी
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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खूब पता था वो सागर है खारा पानी है ......( गीत )

थोड़ी फुर्सत हो तो ही पढियेगा ,आग्रह है मेरा !इस आपाधापी और प्रतिस्पर्धा के युग में" हम जीवन कैसे जीते हैं और कैसे जीना चाहिए "के बीच सेतु तलाशती एक रचना ! गीत खूब पता था वो सागर है खारा पानी है ! फिर भी प्यास बुझाने पहुंचे ये हैरानी है !! बहुत दूर तक
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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ये क्या हो गया.........? (ग़ज़ल)

नींद आती नहीं है ,ये क्या हो गया ? रात जाती नहीं है, ये क्या हो गया ?? प ्रेम हो या कि हो हादसा आँख अब ! छलछलाती नहीं है ,ये क्या हो गया ! अब किसी भी चरण पर कोई आस्था ! सर झुकाती नहीं है, ये क्या हो गया !! वैसे कहने को तो रातरानी है ये ! गमगमाती नहीं
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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टूट पायेंगे नहीं पत्थर ज़रा सी चोट से .........( गीत )

टूट पायेंगे नहीं पत्थर ज़रा सी चोट से ! ये उड़ाने ही पड़ेंगे भूमिगत विस्फोट से !! जो ' विचारों ' का मसीहा था 'बिचारा ' हो गया है ! जिसको होना था भँवर ,वो ही किनारा हो गया है ! हम धरा को कोसते हैं, अंकुरण देती नहीं , क्यों नहीं कहते कि ये बादल नकारा हो
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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है बिलाशक ये दरिया चमन के लिए .....( ग़ज़ल )

ग़ज़ल -----------है बिलाशक ये दरिया ,चमन के लिए ! चन्द बूँदें तो रखलो तपन के लिए !! बदमिज़ाजी न बादल की सह पाऊंगा ! मुझको मंज़ूर है प्यास मन के लिए !! वो तगाफुल नहीं मुझसे कर पाएंगे ! चाहिए आहुती भी हवन के लिए !! याद रखता है इतिहास केवल उन्हैं ! जो कफन ओढ़
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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ढोते ढोते उजले चेहरे .....( ग़ज़ल )

ग़ज़ल ..........( भूली बिसरी .....) ढोते ढोते उजले चेहरे , हमने काटी बहुत उमर ! अब तो एक गुनाह करेंगे , पछता लेंगे जीवन भर !! वो रेशम से पश्मों वाला , था तो सचमुच जादूगर ! मोर पंख से काट ले गया , वो मेरे लोहे के पर !! उसको अगर देखना हो तो , आंखों से
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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अनुरक्ति

ग़ज़ल .......................... वहीं तक पाँव हैं मेरे , जहाँ तक है दरी मेरी ! इसी में सब समेटा है , यही जादूगरी मेरी !! हमें निस्बत गुलाबों से , वो है गुलकंद का हामी ! बचेगी पाँखुरी कैसे , किताबों में धरी मेरी ? खरी तो सुन नहीं सकते , किताबों से दबे
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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चितवन .........( गीत )

तुम्हारी रसवंती चितवन ! और मदिर हो गई चाँदनी घूंघट से छन छन !! झरे मकरंद ,छंद, सिंगार , अलस ,मद,मान और मनुहार हो गया चकाचौंध दरपन ! तुम्हारी ................. चुभी तो नयन नीर भर गई झुकी तो पीर पीर कर गई उठी तो तार तार था मन तुम्हारी ................
 
ललितमोहन त्रिवेदी
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कैसौ आयौ नवल बसंत .....(. गीत - रसिया )

रसिया ) कैसौ आयौ नवल बसंत सखी री मोरे आंगन में ! पोर पोर में आस , प्यास भर गयौ उसाँसन में !! धरा नें ऐसौ करौ सिंगार ! चुनर सतरंगी , पचलड़ हार ! रसीले नैनन में कचनार ! अंग अंग अभिसार झरै, ठसकौरी दुलहन में .... कैसौ आयौ .............. उडे गालन पै लाल अ
 
ललितमोहन त्रिवेदी