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09 May 2010
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"माँ बूढ़ी है"

"माँ बूढ़ी है" माँ बूढी़ है  - कविता वाचक्नवीझुककरअपनी ही छाया केपाँव खोजतीमाँ केचरणों मेंनतशिर होने कादिन आने से पहले-पहले ;कमरे से आँगन तक आकरबूढ़ी कायाकितना ताक-ताक सोई थी,सूने रस्तेबाट जोहतीधुँधली आँख,  इकहरी कायाकितना
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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अनौपचारिक से २ वीडियो

अनौपचारिक  से २ वीडियो भारत-प्रवास में दूसरी बार ५ फरवरी को दिल्ली पहुँची| मेरे लिए विश्वपुस्तक मेले में जाने का वही एक दिन हाथ में था| आगामी २  दिनों तक `अक्षरम',  `साहित्य अकादमी' व `भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्' द्वारा
 
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चेरी के २ पेड़ : माँ की स्मृति में

चेरी के २ पेड़ : माँ की स्मृति मेंआज २४ मार्च २०१०   ! .....माँ को परलोकगामी हुए ४१ वर्ष पूरे हो गए आज। प्रातः उनकी स्मृति में बाहर लॉन में मैंने व मेरी बेटी ने मिल कर दो चेरी के पेड़ लगाए ; एक गुलाबी फूलों का और एक श्वेत पुष्पों वाला ........क्योंकि
 
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बैसाखी,: यमुना और बच्चे

वैसाखी, यमुना और बच्चे ललित निबंध डॉ. कविता वाचक्नवी गर्मी अभी जलाने वाली नहीं हुई थी। आँगन में सोना शुरू हो चुका था। आँगन इतना बड़ा कि आज के अच्छे समृद्ध घर के दस-ग्यारह कमरे उसमें समा जाएँ। एक ओर छोटी-सी बगीची थी। आँगन और बगीची की सीमारेखा तय करती,
 
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रूप की आभा

रूप की आभा दिसंबर के १७ वें दिन सायं जब लन्दन में इस वर्ष का पहला हिमपात प्रारम्भ हुआ तो १८ की प्रातः तुरंत अपने कैमरे से उसके चित्र लेने और उन्हें संजोने तक का विवरण मैंने अपने संस्मरण रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण शीर्षक से लिखा
 
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ब्लॉग के लिए नया विजेट प्रयोग के लिए तैयार है

ब्लॉग के लिए नया विजेट प्रयोग के लिए तैयार है गूगल द्वारा ट्रान्सलिट्रेशन के टूल में नई सुविधाएँ जोड़ने के बाद से जिन साथियों ने यह विजेट लगाया हुआ था, उन्हें कुछ कठिनाइयाँ आ रही थीं| आज मैंने उन्हें सही कर के इसे re-साइज़ भी कर दिया है, ताकि जिनके ब्
 
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रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण

रूप से स्निग्ध हुई प्रकृति और जीवन के एकाकार क्षण मैंने ५ अक्टूबर को जब भीतर बरसात न हो तो इनकी लिपटन सुहाती ही है में लिखा था - रात-भर बरखा हुई...... पर रात को तो लिखते हुए मैं देर तक जग ही रही थी, बिना आहट टिम टिम बुदकी-सी फुहार गिरी जान पड़ती है |
 
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बिटियाएँ

बिटियाएँ कविता वाचक्नवी पिता ! अभी जीना चाहती थीं हम यह क्या किया........ हमारी अर्थियाँ उठवा दीं ! अपनी विरक्ति के निभाव की सारी पग बाधाएँ हटवा दीं.......! अब कैसे तो आएँ तुम्हारे पास? अर्थियों उठे लोग (दीख पड़ें तो) प्रेत कहलाते हैं ‘भूत’(काल) हो जा
 
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हिन्दी में गुणवतापूर्ण लेखन को पुरस्कार की घोषणा

हिन्दी में नेट पर गुणवतापूर्ण लेखन को पुरस्कार की घोषणा Google और LiveHindustan.com ने गत दिनों नेट पर गुणवत्तापूर्ण लेखन को बढ़ावा देने के लिए पुरस्कारों की घोषणा की है क्योंकि गूगल को हिन्दी में अच्छा कंटेंट न होने की शिकायत है| और अच्छे लेखन को प्
 
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प्रीत के वट-वृक्ष!

प्रीत के वट-वृक्ष! - कविता वाचक्नवी फूल बरसे थे नहीं औ’ भीड़ ने मंगल न गाए ढोलकों की थाप मेहंदी या महावर हार, गजरे, चूड़ियाँ सिंदूर, कुमकुम था कहीं कुछ भी नहीं, कुछ छूटने का भय नहीं। गगन ने मोती दिए थे लहलहाती ओढ़नी दी थी धरा ने और माटी ने महावर पाँव
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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भारतीय भाषाओं की कम्प्यूटिंग : लिप्यन्तरण

परसों तथा कल उठाए गए विषय पर अभी विचार विमर्श की प्रक्रिया चल ही रही है, इसी कारण मुझे तद्विषयक सम्बंधित जानकारी के लिए पुन: लिखना आवश्यक लग रहा है | कल उल्लिखित लिप्यन्तरण संसाधनों के विषय में मेरे एक सम्मानित व सम्बंधित विषय में दिन रात जुटे रहने व
 
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भारतीय भाषाओं में लिप्यन्तरण के संसाधन और विधियाँ

कल दी गई जानकारी और सूचना को पढ़ कर एक पाठक ने अपने पत्र में लिप्यन्तरण को लेकर कुछ प्रश्न किया है| वह प्रश्न और भी किसी के मन में हो सकता है, इसलिए अपनी जानकारी के अनुसार उसका यथासंभव उत्तर मैं यहाँ देने का यत्न करूँगी| आशा है, इस से विविध भारतीय भा
 
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गूगल के लिप्यंतरण (फ़ॉनेटिक ट्रांसलिट्रेशन) टूल में नई सुविधाएँ और विकल्प

गूगल के लिप्यंतरण (फ़ॉनेटिक ट्रांसलिट्रेशन) टूल में बहुत-सी नई सुविधाएँ और विकल्प आज गूगल के ट्रांसलिट्रेशन टूल (फ़ॉनेटिक) में कई परिवर्तन किए गए हैं जो सुविधाएँ ब्लोगर डैशबोर्ड पर बुलेट लिस्ट, नंबर लिस्ट, अलायनमेंट, एडिट एचटीएम्एलसोर्स, रिमूव फोर्मे
 
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आप उचित समझें तो वागर्थ को भी वोट दे सकते हैं

मौलिक काव्यलेखन के लिए चुने जा रहे ब्लॉग को वोट दें वागर्थ भी यहाँ नामित है आप उचित समझें तो वागर्थ को भी वोट दे सकते हैं 7 दिन शेष हैं केवल Vaagartha in Hindi by Dr. Kavita Vachaknavee from United Kingdom Post #1 | Post #2 | Post #3 | Post #4 | Post
 
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हँसता हुआ आया ....

हँसता हुआ आया / वन में ललित वसन्त वसंत पंचमी। सूरज ने करवट बदली। कुहासे ने रजाई तहाई। भरपूर अंगड़ाई लेकर धरती जाग उठी। दुबक कर सोए उसके अद्भुत रूप की छ्टा जो फैली तो सारी प्रकृति अपने समस्त साधनों से उसके सिंगार में जुट गई। रंग छलके पड़ते हैं, पेड़ों, प
 
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जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है

पर जब भीतर बरसात न हो तो इन की लिपटन सुहाती ही है....... कल रात सोते सोते से लन्दन का मौसम एकदम बदल गया | लगता है, रात-भर बरखा हुई...... पर रात को तो लिखते हुए मैं देर तक जग ही रही थी, बिना आहट टिम टिम बुदकी-सी फुहार गिरी जान पड़ती है | इसी ठण्डऔर बू
 
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ठोकरें

ठोकरें कविता वाचक्नवी हर नदी के गर्भ में कैसा तराशा रूप लेकर हम चले थे, आपकी ठोकर हथोड़ों, दूमटों ने तोड़कर या फोड़कर आडा़ हमें तिरछा किया है। (अपनी पुस्तक "मैं चल तो दूँ" - २००५ से )
 
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मैंने दीवारों से पूछा

मैंने दीवारों से पूछाकविता वाचक्नवी चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंनेंकिसने तुम्हें छुआ कब – कबबतलाओ तोवे बदरंग, छिली – खुरचीं- सीकेवल इतना कह पाईं -हम तोपूरी पत्थर- भर हैंजड़ सेजन सेछिजी हुईंकौन, कहाँ, कब, कैसेदे जाता हैअपने दाग हमेंत्यौहारों पर
 
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जिस आग ने फूँक दिया था आने वाली सब पुश्तों का भविष्य !

दुआ में याद रखियेगा (यह लेख 23 अगस्त 2007 को अपने प्रथम हिन्दी ब्लॉग अथ (http://360.yahoo.com/kvachaknavee) पर लिखा था। yahoo द्वारा वह ३६० की ब्लॉग सर्विस बंद की जा चुकी है। उस ब्लॉग पर प्रकाशित अपनी सामग्री को धीरे धीरे यहाँ स्थानान्तरित कर रही हूँ।
 
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तुंरत सहायता की अति आवश्यकता है / सहयोग करें

नाम जानने में सहायता की तुंरत आवश्यकता हैमित्रो! नीचे अंकित गीत मैंने अपने बचपन में किसी पाठ्य पुस्तक में पढ़ा है, अथवा बाद में कभी। किंतु कतई स्मरण नहीं आ रहा की यह रचना किस की है व इसे कहाँ पढा है। रचना के शिल्प व कथ्य को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता ह
 
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तुंरत सहायता की अति आवश्यकता है / सहयोग करें

इनका नाम जानने में सहायता की तुंरत आवश्यकता है मित्रो, नीचे अंकित गीत मैंने अपने बचपन में किसी पाठ्य पुस्तक में पढ़ा है, अथवा बाद में कभी। किंतु कतई स्मरण नहीं आ रहा की यह रचना किस की है व इसे कहाँ पढा है। रचना के शिल्प व कथ्य को देखते हुए ऐसा प्रतीत
 
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कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग की बाधाएँ अतीत की बात

कंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग की बाधाएँ अतीत की बात दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में एकदिवसीय शिविर और संगोष्ठी संपन्नहिंदी में स्थानीयता के साथ वैश्विक होने की विचित्र क्षमता है - डॉ. गंगा प्रसाद विमलकंप्यूटर पर हिंदी प्रयोग की बाधाएँ अतीत की बात - डॉ. क
 
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हँसता हुआ आया वन में ललित वसन्त

हँसता हुआ आया वन में ललित वसंतहँसता हुआ आया वन में ललित वसन्त डॉ. कविता वाचक्नवीवसंत पंचमी। सूरज ने करवट बदली। कुहासे ने रजाई तहाई। भरपूर अंगड़ाई लेकर धरती जाग उठी। दुबक कर सोए उसके अद्भुत रूप की छ्टा जो फैली तो सारी प्रकृति अपने समस्त साधनों से उसके
 
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एक समीक्षा और

एक समीक्षा औरगत दिनों जिस पुस्तक के लोकार्पण की सूचना दी थी व तदुपरांत पुस्तक चर्चा के अंतर्गत (स्वतंत्र वार्ता के लिए फिर साहित्य कुञ्ज के लिए) उसकी मीमांसा डॉ. ऋषभ देव जी ने की थी, उसी पुस्तक पर दैनिक हिन्दी मिलाप के लिखा गया उनका रिव्यू भी निजी रू
 
कविता वाचक्नवी
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एक समीक्षा और

एक समीक्षा औरगत दिनों जिस पुस्तक के लोकार्पण की सूचना दी थी व तदुपरांत पुस्तक चर्चा के अंतर्गत (स्वतंत्र वार्ता के लिए फिर साहित्य कुञ्ज के लिए) उसकी मीमांसा डॉ. ऋषभ देव जी ने की थी, उसी पुस्तक पर दैनिक हिन्दी मिलाप के लिखा गया उनका रिव्यू भी निजी रू
 
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रंगों का पंचांग ( कहानी )

रंगों का पंचांग रंगों का पंचांगडॉ. कविता वाचक्नवीफोन के पास रखी घड़ी का समय नहीं बदला मैंने, और न ही अपनी कलाई घड़ी का। ये दोनों अब तक यहाँ साढ़े पाँच घंटे के अंतर पर चल रही हैं। घड़ी में दिखते समय का अर्थ सिर्फ समय नहीं होता, उससे बँध कर चलता जीवन भी हो
 
कविता वाचक्नवी
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`प्रेम' और `तटस्थ' : `समकालीन भारतीय साहित्य'

प्रेम' और `तटस्थ' : `समकालीन भारतीय साहित्य' मेंसाहित्य अकादमी, (३५,रवींद्र भवन, नई दिल्ली) की प्रतिष्ठित द्वैमासिक हिन्दी पत्रिका `समकालीन भारतीय साहित्य' के नववर्षांक (जनवरी-फरवरी २००९ ) के हिन्दी कविता स्तम्भ में मेरी २ कविताएँ ( `प्रेम' तथा `तटस्
 
कविता वाचक्नवी
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पुस्तक चर्चा : "समाज-भाषाविज्ञान : रंग शब्दावली : निराला काव्य"

पुस्तक चर्चा : डॉ. ऋषभदेव शर्मा समाज-भाषाविज्ञान : रंग शब्दावली : निराला काव्य* वाक् और अर्थ की संपृक्तता को स्वीकार करने के बावजूद प्रायः दोनों का अध्ययन अलग-अलग खानों में रखकर अलग-अलग कसौटियों पर किया जाता है। इससे अर्थ की, भाषिक कला के रूप में, सा
 
कविता वाचक्नवी
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साहित्यकार सम्मान समारोह आयोजित

साहित्यकार सम्मान समारोह आयोजित : हिन्दुस्तानी एकेडेमी का साहित्यकार सम्मान समारोह आयोजित इलाहाबाद, 6 फ़रवरी 2009 । (प्रेस विज्ञप्ति)। "साहित्य से दिन-ब-दिन लोग विमुख होते जा रहे हैं। अध्यापक व छात्र, दोनों में लेखनी से लगाव कम हो रहा है। नए नए शोधकार
 
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आज कुछ ऐसा हुआ/ मन विकल है...

आज कुछ ऐसा हुआ / मन विकल है कल ही इलाहाबाद की यात्रा से दोपहर लौटी हूँ। आज उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा में निराला जयन्ती व वसंत पंचमी के आयोजन में एम. ए./एम. फिल. व पी-एच डी. के विद्यार्थियों के सम्मुख मुख्य वक्ता के रूप
 
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हम अ-शोकों के पुरोधा हैं

हम अ-शोकों के पुरोधा हैं तिरंगा : कविता वाचक्नवी मेरा भारत विश्वजाल पर देश-भक्ति की कविताओं का संकलन तिरंगा - डॉ. कविता वाचक्नवी संधि की पावन धवल रेखा हमारी शांति का उद्घोष करती पर नहीं क्या ज्ञात तुमको चक्र भी तो पूर्वजों से थातियों में ही मिला है,
 
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ट्रूली अमेजिंग : आय ऍम टच्ड

ट्रूली अमेजिंग : आय ऍम टच्ड ट्रूली अमेजिंग : आय ऍम टच्ड १९ मिनट के इस वीडियो में एक अमेरिकन ने ताज स्टाफ और एन. एस. जी. कमांडोज़ द्वारा किए-निभाए गए कार्य की, जिसे फर्स्ट हैण्ड अकाऊंट कहते हैं अंग्रेजी में,ऐसी रोमांचकारी जानकारी दी है कि सुन कर चकित
 
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वर्तमान की वह पगडंडी जो इस देहरी तक आती थी.....

युद्ध : बच्चे और माँ (कविता) साहित्य अकादमी के वार्षिक राष्ट्रीय बहुभाषीकवि सम्मेलन की चर्चा मैंने अभी पिछली बार की थी। वहाँ काव्यपाठ में प्रस्तुत अपनी रचनाओं में से एक अभी बाँट रही हूँ। २५ नव. की रात्रि में इसका पाठ करने से पूर्व मैंने अन्यभाषी श्रो
 
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छत पर आग उगाने वाले दीवारों के सन्नाटों में क्या घटता है

कंधों पर सूरज डॉ. कविता वाचक्नवी (स्रोत : अपनी पुस्तक " मैं चल तो दूँ " से)प्रश्न गाँव औ’ शहरों के तो हम पीछे सुलझा ही लेंगे तुम पहले कंधों पर सू
 
डॊ. कविता वाचक्नवी