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Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श)

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16 Jun 2010
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बच्चियों का ख़तना

बच्चियों के ख़तना के ख़िलाफ़ अपीलकई जगहों पर 40 प्रतिशत और कुछ अन्य जगहों पर 70 प्रतिशत तक बच्चियों की ख़तना हुई हैअंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने इराक़ के उत्तरी स्वायत्त इलाक़े कुर्दिस्तान में बच्चियों के ख़तना पर प्रतिबंध लगाने के
 
डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee
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ब्रिटेन में पहला गर्भपात विज्ञापन

ब्रिटेन में पहला गर्भपात विज्ञापनगर्भपात की सलाह देनेवाले विज्ञापन पर चर्च और गर्भपात विरोधी समूहों ने आपत्ति की हैब्रिटेन में टेलीविज़न पर पहली बार गर्भपात सेवाओं के बारे में सलाह देनेवाले एक विज्ञापन का प्रसारण शुरू किया गया है.इस विज्ञापन पर चर्च और
 
डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee
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कि नारी तन मुझे देकर कर कृतारथ कर दिया ओ माँ !

कृतारथ कर दिया ओ माँ !कृतारथ कर दिया ओ माँ !सृजन की माल का मनका बना कर जो , कि नारी तन मुझे देकर कर कृतारथ कर दिया ओ माँ !*सिरजती एक नूतन अस्ति अपने ही स्वयं में रच ,इयत्ता स्वयं की संपूर्ण वितरित कर परं के हित ,नए आयाम सीमित चेतना को दे दिए
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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रत्‍नावली का सच

रत्नावली का सच                मैंने चाहा था तुमको प्रियतम!                मन से, तन से
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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कौन है तू

तेलुगु कविताकौन है तू --------------मैं एक वरूधिनी हूँ !भयभीत हरिणेक्षणा हूँप्रेम करने के दंड के बदले मेंधोखा दी गयी वेश्या हूँहिमपर्वतों को साक्षी मानकर कहती हूँप्यार के बदले मेंवेदना ही मिली आँखों से नींद उड़ जाने की.प्यार करने वाली स्त्रियों को
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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May 09 2010 04:04 AM
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निरुपमा की हत्या की गुत्थियाँ

अपनी गत प्रविष्टि पर  सुजाता जी के दिए लिंक द्वारा अभी चोखेरबाली पढ़ कर -यहाँ  "स्त्रीविमर्श" पर कल गत पोस्ट  " एक पत्र निरुपमा के मित्रों के नाम : पिता का पत्र पढ़कर "   के द्वारा अपनी राय दे ही चुकी हूँ।
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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एक पत्र निरुपमा के मित्रों के नाम : पिता का पत्र पढ़कर

एक पत्र निरुपमा के मित्रों के नाम : पिता का पत्र पढ़कर १)  निरुपमा के जीवन की त्रासदी भयानक है, जाने क्यों गत दिनों मुझे मधुमिता यद आती रही। स्त्री जीवन की ऐसी त्रासदियाँ भयवह हैं और इन्हेम् तत्काल रोका जाना चाहिए। किन्तु ध्यान देने की बात
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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लाज न आवत आपको

एकालापलाज न आवत आपको तुम्हें चबाने को हड्डी चाहिए थीखाने को गर्म गोश्तचाटने को गोरी चमड़ीचाकरी को सेविकाऔर साथ सोने को रमणी.तुमने मुझे नहींमेरी देह को चाहा.पर मैं देह होकर भीदेह भर नहीं थी.मैं औरत थी!मुझे लोकलाज थी!तरसती थी मैं भी - तुम्हारे संग
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद

मानववाद का ही एक अंग है नारीवाद राजकिशोर मानववाद का ठीक-ठीक अर्थ क्या है, मैं नहीं जानता। इसे ले कर मानववाद की धाराओं के बीच भी मतभेद है। इसलिए मानववाद को इस रूप में परिभा।षित करना उपयोगी और निरापद, दोनों जान पड़ता है कि मनुष्यता ने जो कुछ भी
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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स्वेच्छाचार

एकालाप स्वेच्छाचार हाँ, मैं स्वेच्छाचारी हूँ.उन्होंने मुझे हल में जोतना चाहामैंने जुआ गिरा दिया,उन्होंने मुझपर सवारी गाँठनी चाहीमैंने हौदा ही उलट दिया,उन्होंने मेरा मस्तक रौंदना चाहामैंने उन्हें कुंडली लपेटकर पटक दिया,उन्होंने मुझे जंजीरों में
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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कवयित्री का विद्रोह

गत सप्ताह दुबई में अमेरिकन आयडल की भाँति और उसी के ढाँचे पर कवि और उनकी कविताओं को लेकर आयोजित किए जाने वाले "Poet of Millions" में एक अरब कवयित्री हिस्सा हिलाल ने सेमीफायनल से फायनल में प्रवेश किया, जिसका दर्शकों और निर्णायकों ने अति उत्साह से
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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महिला आरक्षण का अधूरापन

© डॉ. कविता वाचक्नवी / Dr. Kavita Vachaknavee
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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वे बिस्तर में पड़ी हैं, पड़ी रहें

आधी आबादी ऋषभदेव शर्मा वे रसोई में अडी़ हैं, अडी़ रहें. वे बिस्तर में पड़ी हैं, पड़ी रहें. यानी वे संसद के बाहर खड़ी हैं, खड़ी रहें? ' गलतफहमी है आपको . सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे. बाकी आधी दुनिया भी छिपी है उनके गर्भ में, वे घुस पड़ीं अगर संसद के
 
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कभी पूरी नींद तक भी न सोने वाली औरतो !

औरतों के नाम कविता वाचक्नवी कभी पूरी नींद तक भी न सोने वाली औरतो ! मेरे पास आओ, दर्पण है मेरे पास जो दिखाता है कि अक्सर फिर भी औरतों की आँखें खूबसूरत होती क्यों हैं, चीखों-चिल्लाहटों भरे बंद मुँह भी कैसे मुस्कुरा लेते हैं इतना, और, आप ! जरा गौर से
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
Mar 08 2010 03:51 PM
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स्त्रीवादियों से कुछ निवेदन : आदर्श स्त्री कौन ?

महिला आंदोलन के समर्थकों ने, एक बहुत जरूरी काम की उपेक्षा की है। वे हमेशा यही बताते रहते हैं कि अच्छे पुरुष को कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए। यह एक जरूरी और उचित माँग है। हर आंदोलनकारी जिनका विरोध करता है, उनकी गलतियों और कमियों को रेखांकित
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
Mar 06 2010 11:17 PM
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मर्दिता

एकालाप मर्दिता बहुत मार खाई मैंने तुम्हारे लिए , तुम्हारे प्यार के लिए. मैंने सपने देखे , तुम्हें अपना माना और बहुत मार खाई पिता के हाथों, समाज के हाथों भी : भला यह भी कोई बात हुई कि औरत सपने देखे कि औरत प्यार करे कि औरत इज़हार करे! मेरा अंग अंग रोता
 
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पुरुष विमर्श - २

से प्रारम्भ हुए पाक्षिक `एकालाप ' स्तम्भ के २००९ - नवम्बर ( प्रथम ) अंक में पुरुष-विमर्श शीर्षक से प्रकाशित कविता के क्रम में इस बार प्रस्तुत है उसका दूसरा भाग - पुरुष विमर्श - २ ऋषभदेव शर्मा ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद सपनों पर पहरे बिठलाए | भाई! तेरा
 
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औरतों के नाम

औरतों के नाम कविता वाचक्नवी कभी पूरी नींद तक भी न सोने वाली औरतो ! मेरे पास आओ, दर्पण है मेरे पास जो दिखाता है कि अक्सर फिर भी औरतों की आँखें खूबसूरत होती क्यों हैं, चीखों-चिल्लाहटों भरे बंद मुँह भी कैसे मुसका लेते हैं इतना, और आप! जरा गौर से देखिए स
 
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ये दो भारतों के बीच के तीसरे भारत की लड़कियाँ

वह कहीं भी हो सकती है! यह कहानी शुरू होती है गुज़री सदी के आखि़री हिस्से से जब निराला की प्रिया किसी अतीत की वासिनी हो गई थी और प्रसाद की नायिकाएँ अपनी उदात्तता, भव्यता, करुणा और विडंबना में किसी सुदूर विगत और किसी बहुत दूर के भविष्य का स्वप्न बन गई थ
 
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पुरुष विमर्श

एकालाप पुरुष विमर्श ओ पिता! तुम्हारा धन्यवाद नन्हें हाथों में कलम धरी. भाई! तेरा भी धन्यवाद आगे आगे हर बाट करी. तुम साथ रहे हर संगर में मेरे प्रिय! तेरा धन्यवाद; बेटे! तेरा अति धन्यवाद हर शाम दिवस की थकन हरी. शिव बिना शक्ति कब पूरी है शिव का भी शक्ति
 
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जाति की जड़ों को काटतीं औरतें

जाति की जड़ों को काटतीं औरतें - शिरीष खरेउस्मानाबाद से, 28-Oct-09 देश में कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा दलितों और आदिवासियों का है। मगर उनके पास खेतीलायक जमीन का महज 17.9 प्रतिशत हिस्सा है। इसी तरह कुल आबादी में करीब आधी हिस्सेदारी औरतों की है। जो कुल
 
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मुझे मेरा पीहर लौटा दो

एकालाप मणिपुरी स्त्री का पर्वगीत मुझे मेरा पीहर लौटा दो कब से देख रही हूँ रास्ता माँ के घर से बुलावा आएगा मैं पीहर जाऊँगी सबसे मिलूँगी बचपन से अपनी पसंद के पकवान जी भर खाऊँगी निंगोल चाक्कौबा पर्व मनाऊँगी बरस भर से देख रही हूँ रास्ता याद आता है बचपन ब
 
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यो मे प्रतिबलो लोके

एकालाप यो मे प्रतिबलो लोके तुम तो त्रिलोक के स्वामी हो. तुमने देवों को जीता है. सब रत्न तुम्हारे चरणों में. सब पर अधिकार तुम्हारा है. तुमने ऐरावत छीन लिया बिगडे घोड़ों को साधा है. धरती पर्वत आकाश वायु पाताल सिंधु को बाँधा है. तुमने मुझको भी रत्न कहा
 
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कौमार्य पर उठा बवाल

पुरुषों के कौमार्य का भी कोई फुलप्रूफ तकनीकी परीक्षक बन पाता तो इस समाचार से खेद न होता : - कौमार्य पर मचा कुहराम मिस्र के एक जाने-माने इस्लामी विद्वान ने माँग की है कि जो महिलाएँ एक उपकरण सहारे कौमार्य का ढोंग करती हैं उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाह
 
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जाने कैसी स्त्री थी वह

एकालापजाने कैसी स्त्री थी वह जाने कैसी स्त्री थी वह ,कितनी धीर ,कितनी सबल !कैसे कहा होगा उसनेमाता पिता से,पीहर और ससुराल से -- नहीं ,मुझे यह विवाह स्वीकार नहीं- न, मैं नहीं मानती बालपने की शादी को- गुड़िया के खेल तक की समझ न थी मुझेविवाह की समझ कैसे होती-
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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Aug 20 2009 08:24 PM
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कैकेयी : महाकाव्य `त्रेता ' का एक सर्ग

महाकाव्य अंश कैकेयी उद्भ्रांत{नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य रामकथा के समस्त स्त्री चरित्रों पर केन्द्रित महाकाव्य `त्रेता ' का एक सर्ग)अपने पिता कैकय-नरेश के अतिशय लाड़-प्यार ने बना दिया था बाल्यकाल से ही मुझे कुछ दु:साहसी, हठी भी।
 
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Aug 12 2009 11:07 AM
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मरेंगी या मारेंगी ये बागी लड़कियाँ

मरेंगी या मारेंगी ये बागी लड़कियाँ चर्चा हमारा/ मैत्रेयी पुष्पा जिन घटनाओं को हम दुर्घटना या कभी-कभी के हादसे मान लेते थे, अब रोज़मर्रा के वाकयात बन गए हैं। अख़बार में, टीवी पर दिन भर हमारे सामने कत्ल, ख़ून के दृश्य होते हैं। यह विचार आता है कि दहशत भरे
 
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हे अग्नि!

एकालापहे अग्नि!हे अग्नि!तुम्हें प्रणाम करते हैं हम।बहुत क्षमता है तुममेंबड़ा ताप है - बड़ी जीवंतता।तुम जल में भी सुलगती होऔर वायु में भी,भूगर्भ में भी तुम्हीं विराजमान होऔर व्यापती हो आकाश में भी तुम।हमारे अस्तित्व में अवस्थित हो तुम प्राण
 
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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Aug 03 2009 02:06 AM
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राधा क्या चाहे

एकालापराधा क्या चाहे ''राधिके!''''हूँ?''''भला क्या तो है तेरे कान्हा में?''''पता नहीं.''''पौरुष?''''होगा.बहुतों में होता है.''''सौंदर्य?''''होगा.पर वह भी बहुतों में है.''''प्रभुता?''''होने दो.बहुतों में रही है.''''फिर क्यों खिंची जाती है तूबस उसी की
 
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अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी !

एकालाप अम्मा, ग़रज़ पड़ै चली आओ चूल्हे की भटियारी ! दो बेटे हैं मेरे. बहुत प्यार से धरे थे मैंने इनके नाम - बलजीत और बलजोर! गबरू जवान निकले दोनों ही. जब जोट मिलाकर चलते, सारे गाँव की छाती पर साँप लोट जाता. मेरी छातियाँ उमग उमग पड़तीं. मैं बलि बलि जात
 
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विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी

विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी(श्रृंखला की कडियाँ )सुप्रणीति वरेण्यागतांक से आगे (भाग-३) ३ एक ऐसा ही विषय “अर्थ-स्वातंत्र्य” है। धन सदा सबल व्यक्ति का अनुसरण करता है। यह सत्य है कि जब भी स्त्री आर्थिक संकट से गुज़र
 
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गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत

एकालाप गाड़िया लुहारिन का प्रेम गीत पिता ने संडासी जैसे दृढ़ हाथों से बड़ी संडासी में पकड़ रखा है तपता हुआ लौहखंड जकड़कर . माँ धौंक रही हवा से फुलाकर धौंकनी लगातार. भट्टी तप रही . दुपहरी भी तप रही . तप रहे हम दोनों. मैं और तुम आमने - सामने , तुम्हारे
 
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सुगंधी की कहानी : उसकी ज़ुबानी (४)

औरत की दुनिया सुगंधी की कहानी : उसकी ज़ुबानी (४) सुधा अरोड़ा गतांक से आगे बहरहाल , शराब की दूकान बंद करने के बाद वड़ा - पाव की गाड़ी शुरु की गई । कुछ लड़कों को साथ लेकर गाड़ी चलाई गई । लेकिन यह काम भी कुछ ही साल तक चल सका , क्यों कि वहाँ भी शराब पीकर झगड़ा
 
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मातृदेवो भव

मातृदेवो भव *** असल में यह एक लोककथा है और लोककथा की शक्ति यह होती है कि जीवन का सार अपने अनुभव के आधार पर लोक उस में भरता है। इन कथाओं की प्रभविष्णुता का मूल स्रोत ही इनकी सामाजिक भूमिका में निहित होता है व जो मूलत: लोकमंगल के लिए ही रची जाती हैं। क
 
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इतिहास हंता मैं

एकालाप इतिहास हंता मैंमैं घर से निकल आई थीतुम्हें पाने को ,मैंने धरम की दीवार गिराई थीतुम्हें पाने को,अपने पिता से आँख मिलाई थी -भाई से ज़बान लड़ाई थी -तुम्हें पाने को!माँ अपनी कोख नाखूनों से नोंचती रह गई ,पिता ने जीते जी मेरा श्राद्ध कर दिया;मैंने म
 
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तसलीमा नसरीन की कविताएँ

तसलीमा नसरीन की कविताएँ पिता, पति, पुत्र (अनुवादः शम्पा भट्टाचार्य) अगर तुम्हारा जन्म नारी के रूप मे हुआ है तोबचपन में तुम परशासन करेंगे पिताअगर तुम अपना बचपन बिता चुकी होनारी के रूप मेंतो जवानी में तुम परराज करेगा पतिअगर जवानी की दहलीज़पार कर चुकी ह
 
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औरत की दुनिया (३)

औरत की दुनियासुगन्धी की कहानी : उसकी जुबानीसुधा अरोड़ागतांक से आगेमेरी सास को हिंदी बिल्कुल नहीं आती थी और मुझे तमिल भाषा का ज्ञान नहीं था । हम दोनो घर में इशारों से एक दूसरे को अपनी बात समझाते और समझते थे , लेकिन मैं एक-डेढ़ साल में अच्छी तरह से तमिल
 
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प्रशस्तियाँ

एकालापप्रशस्तियाँ मैंने जब भी कुछ पायामर खप कर पायाखट खट कर पायाअग्नि की धार पर गुज़र कर पाया पाने की खुशीलेकिन कभी नहीं पाई खुशी से पहले हर बारसुनाई देती रहीं मेरी प्रशस्ति मेंदुर्मुखों की फुसफुसाहटेंधोबियों की गालियाँऔर मन्थराओं की बोलियाँ शिक्षा ह
 
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गर्भभार

एकालापगर्भभारसँभलकर, बहुरिया,त्रिशला देवी के सोलहों सपनों का सचतेरे गर्भ में है.नहीं,दिव्यता का आलोककेवल तीर्थंकरों की माताओं के हीआनन पर नहीं विराजता ;हर बेटी, हर बहूजब गर्भ भार वहन करती हैउतनी ही आलोकित होती है.हिरण्यगर्भ हैहर स्त्री.उसके भीतर प्रक
 
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अधिक पढ़ी-लिखी महिलाओं से उन्हें विवाह करते डर लगता है,

गतांक से आगे“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ” --- –महादेवी वर्मा सुप्रणीति वरेण्या गतांक से आगे (भाग-२) २ आधुनिक वर्ग की नारियों को महादेवी तीन वर्गों में बाँटती हैं : पहली वे, जिन्होंने राजनैतिक आंदोलनों को बढ़ान
 
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