मेरे पंख,,,,,,,,,,,,,,,,,'s Image

मेरे पंख,,,,,,,,,,,,,,,,,

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28 Mar 2010
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ये क्या हो गया है काशी को,,,,,,,,

जहां तीन साल कि मासूम के साथ दुष्कर्म कर उसे चाकुओं से गोदकर मर दिया जाता है और कोई हलचल नहीं होती,,,,,,,, वाराणसी से नितेश मिश्रा पिछले आठ महीनों से मैं तीर्थ नगरी काशी में सक्रिय पत्रकारिता में हूँ. लेकिन यहाँ का माहौल देखने के बाद बड़ी ग्लानी महसूस
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1- गालिब ने

गालिब ने सब कुछ कह दिया यूं ही ओ मेहरबानों ! तुम्‍हें मेरे कहने पर रंज है क्‍यूं , आज फिर से आसमां जमीं से सिमटना चाहता है समुंदर की गहराइयों में खो जाना चाहता है चोटियों की ऊंचाइयों को चूमना चाहता है तल पर दौड़ना चाहता है फूलों से अठखेलियां करना चाह
Dec 29 2009 11:58 AM
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मेरे पंख,,,,,,,,,

मेरे पंख अब उड़ने लगे हैं सपनों की हकीकत अब पहचानने लगे हैं देखकर दुनिया की रंगत अब वो भी अपनी रंगत बदलने लगे हैं जो हो रहा है इधर उधर उसको भी महसूस करने लगे हैं मेरे पंख अब उड़ने लगे हैं. आज मुद्दतों बाद ये जहरीली हवा में फिर से साँस लेने लगे हैं सप
Dec 29 2009 11:58 AM
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हो दिल खुश जहां,,,,,,,,,

चल मुसाफिर चल हो दिल खुश जहां अब वहीं पे चल दिल यहां लगता ही नहीं ढूंढ रहा दिल सिर्फ़ हसीं रूमानियत के पल चल मुसाफिर चल हो दिल खुश जहां अब वहीं पे चल। ये दुनिया समेटे लगती है सिर्फ़ ग़मों के पल सांसों का कारवां घुट रहा हर पल धड़कनों का जहां रुक रुक क
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बाकी है,,,,,,,

अभी तो उठाया है जाम पूरा पैमाना अभी बाकी है चले अभी हैं चंद कदम हजार कदमों का सफर अभी बाकी है। अभी शूटिंग खतम नहीं हुई है यारों पिक्‍चर का रिलीज होना अभी बाकी है,,,,,,,,,,,,,,, समझने वाले समझ गए हैं ना समझने वालों का -समझना अभी बाकी है।
Dec 29 2009 11:58 AM
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भड़ास,,,,,,,,,,

यहाँ हर कोई अपनी भड़ास -निकालना चाहता है जिसे देखो आज ब्लॉग लिखना चाहता है। सड़कों पर देखते दिखाते हार गए अब अपने अंतस को स्क्रीन पर दिखलाना चाहता है जिसे देखो वो अपनी भड़ास निकालना चाहता है।
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बहना चाहता हूं,,,,,,,,,,,,,,

मौत से पहले जिंदगी को महसूस करना चाहता हूं रहूं ना रहूं मैं- विचार बनकर धमनियों में बहना चाहता हूं। सूख गए होठों पर पानी की बूंद बन बरसना चाहता हूं अंधेरी, पथराई आंखों से आंसू बनकर बहना चाहता हूं। आंत की चुभन को कुंद- करना चाहता हूं पलकों के पीछे की
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मेरी पसंद

न था कुछ, तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा होता डुबोया मुझको होने ने न होता मैं तो क्‍या होता,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गालिब
Dec 29 2009 11:58 AM
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मेरे गीत,,,,

मेरे गीत यूं ही गुनगुनाते रहना। हमें भूल जाना पर हमें याद आते रहना। पंख
Dec 29 2009 11:58 AM
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जाने कब,,,,,,

जाने कब किस घड़ी जिंदगी की शाम हो जाए आखिरी आरजू है बस यही कि- तेरे आगोश में सांसों को ऐहतराम मिल जाय ऐ! खुदा मेरी रूह को तेरी बाहों में पनाह मिल जाय।। 'पंख'
Dec 29 2009 11:58 AM
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अधूरा,,,,,,,,,,,,,,,,, भाग एक

यहां हर अरमा पूरा कहां हो पाता है मौत तो पूरी है पर उसके पहले बहुत कुछ अधूरा रह जाता है । वक्‍त का घूमता पहिया घूमता ही जाता है हर दुआ-बद्दुआ को कुचलता ही जाता है अपनों को गैर बनाता जाता है हर साया पीछे छूटता और छूटता रह जाता है कहीं कुछ अधूरा रह जात
Dec 29 2009 11:58 AM
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जागो फिर एक बार

जागो फिर एक बार देखो क्‍या कह रही है ये वक्‍त की बयार आओ मेरा सीना चीर के भरो एक नई हुंकार जागो फिर एक बार कितना भी ये दुनियावी सर्प फुंफकारे बार-बार कुचल के रख दो इसके फण को कर दो इसके विष को तार तार जागो फिर एक बार। आंखों की कोठरियां पसलियों की टोक
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स्वाइन फ्लू पर बवाल क्यों, देश में हैं और भी खबरें

-बाज़ार का खेल है स्वाइन फ्लूएक अरब से ऊपर की आबादी वाले देश में स्वाइन फ्लू से ११ लोग मर चुके हैं. और मीडिया ने इसे इतना ज्यादा कवरेज दे रहा है मानो कोई इतनी बड़ी महामारी फैलने वाली है कि सारा देश मौत के मुहाने पर खड़ा है.ये क्या है और ऐसा क्यों किया जा
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कुछ का,,,,,,

सपनों की जंग मेंहम जीत गएपरहकीकत में ऐसे हारेकि-जीने की तमन्ना भीन रहीतमन्ना थीकुछ करने कीपर-उस कुछ का पीछाकरते करते आ गएहम वहां जहाँ न आगेरास्ता थान पीछे आखिर वो कुछक्या थाकि-हम आ गए ऐसे मोड़ परजहाँकोई रास्ता ही न थाफिर हौले से पड़े पड़ेइक ख़यालआया हम ही
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शब्दों का,,,,,,,,,,,

अभी तो येशुरुआत हैलड़ने को पाने कोअभी बाकी हैबहुत-पर पाना है क्याये पता ही नहींशब्दों काखेल चल रहा हैसहमा सहमा साभारत देख रहा हैहरियाली की आस मेंसूखे का दर्रासूखता ही जा रहा हैशब्दों का खेलचल रहा हैअन्दर का इंसान मर रहा हैभूख का दरियाबढ़ रहा हैपानी का
Jul 26 2009 04:44 PM