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11 Jun 2010
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आत्माहत्या के विरुद्ध

पहले उम्मीद प जीते थेअब जीने की भी उम्मीद नहीं   बतौर अंतिम विकल्प ये प्रयास कर रहा हूँ.इस आशा में कि शायद राह कुछ हमवार हो, आसान हो.आत्महत्या वही लोग किया करते हैं, जिन्हें ज़िन्दगी से बेहद प्यार होता है. ये कहना कोरी गप्प है कि वो कायर होते
 
शहरोज़
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ज़रुरत मानसिकता बदलने की

हर तरफ जय महिला जय महिला..का शोर है.....मेरी महज़ इतनी सी इल्तिजा है कि सिर्फ  कविता लिखना या शोर करना हम सबका न हो मक़सद..अपनी कोशिश हो कि सूरत बदलनी चाहिए.बहुत पहले लिखी एक कविता अपने संकलन उर्फ़ इतिहास से आप  सभी के लिए...उन अनाम लड़कियों के
 
शहरोज़
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या हुसैन वा हुसैन...तस्लीम [A] कर या न कर

नींद ....अचानक कभी नहीं ...आई लेकिन इधर ऐसा ही हो रहा है...और जानते हैं..उसका समय कब होता है जब मैं खर्राटें लेने लगता हूँ..ठीक उसी वक़्त  मुआज्ज़िन  अज़ान पुकार रहा होता है या दूर मंदिर से शंख की आवाज़ आ रही होती है ...जी आप सही समझ रहे हैं..रूह
 
शहरोज़
Mar 06 2010 01:58 PM
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इन्द्रियों पर नियंत्रण सब से बड़ा जिहाद है.

संतान की तरह सेवकों की सेवा करो.उन्हें वही खिलाओ जो तुम खाते हो.बदन से पसीना गिरने से पूर्व ही मजदूरों को उनकी मजदूरी दे दो.अनाथ और औरतों का हक मारना सब से बड़ा गुनाह है.तुम में सब से बेहतर वह है जो अपनी पत्नी के साथ सब से अच्छा व्यवहार करे.पानी कम से कम
 
शहरोज़
Feb 27 2010 07:32 PM
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नेताओं का मिशन :कमीशन दर कमीशन

हाल-बेहाल बैसाखी छोड़ , खड़ा हो मुसलमान तुष्टिकरणभाजपा नेतृत्व की सरकार हो तो हर ओर हिन्दू-हिन्दू !!और इसके बरक्स सरकार कांग्रेसी नेतृत्व की रही तो मुसलमानों  का शोर है.हमें इस तरह के शोर की मुखालिफ़त करनी चाहिए.ऐसी सारी राजनितिक क़वायद "तुष्टिकरण" के
 
शहरोज़
Feb 27 2010 11:54 AM
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मेरे न रहने पर

मेरे न रहने परखिड़की पर चाँद अटक जायेगाकमरे में रौशनी छिटका करेगीकुछ न कुछ चमक रहा होगामेज़ पर बिखरे पन्नेफर्श पर खिलौनेटिफिन तैयार कर स्त्री पति को सौंपेगीसमय पर खा लेने की ताकीद के साथहर पुरुष की पत्नी और प्रेमिकाविश्व की सबसे सुन्दर कृति होगीदेह बिना
 
शहरोज़
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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

-बिस्मिल अज़ीमाबादी!जी हाँ!! इस मशहूर क्रांतिकारी पंक्ति जिसने अंग्रेजों की चूलें हिला दीं थीं.जिसे गुनगुनाते हुए  अपना सर्वस्व होम करना देशवासी अपना फ़र्ज़ समझते थे.इस ग़ज़ल के रचयिता आप ही हैं.दरअसल ख्यात देशभक्त जिनपर हमें नाज़ है, रामप्रसाद बिस्मिल
 
शहरोज़
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.रमेश बत्रा .:....मौत/खुदकशी/हत्या

जिंदादिल इंसान और उम्दा लेखक का जाना !बाबूजी के पास सुबह-सुबह पहुंचा.सहारा उठाया : रमेश बत्रा नहीं रहे!सहसा विशवास नहीं हुआ. लेकिन दिल्ली की कई तल्खियों की तरह यह भी स्वीकारना विवशता थी.कभी लगता है, बत्रा जी ने आत्महत्या की.एकबारगी नहीं, धीरे-धीरे!खुद को
 
शहरोज़
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अफ़ज़ल से हम हिसाब करें

यह मीनारों मेहनत से उठती अज़ानेंमशीनों में ढलते यह ग़म के तरानेनए साल की खै़रियत चाहते हैंइबादत में डूबे यह कल कारख़ानेयह माटी की महिमा है, माथे से लगा लोयह पत्थर की मूरत है, सर को झुका लोयह लाशें तरसती रही hain कफ़न कोनए साल में पहले इसको संभालोबहुत पहले
 
शहरोज़
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खड्गसिंह

बस्स धुन में चढ़ते जाना पहाड़ों और पेड़ों पर इससे बिल्कुल अंजान कि वहाँ काँटे और ज़हरीले जीव भी हैं बचपन की आदतें कहीं छूटती भी हैं । हम सब कुछ भला-भला सा समझने के आदी जो ठैरे जानती तो थी कि वह कई अस्तबलों में जाता है अब उबकाई आती है कहते कि वह बिल्कुल
 
शहरोज़
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अन्तिम भाग :रविवार में पढिये

दिन भर की मजदूरी के बाद घर लोटा पिता बच्चे को छाती से चिपटायेगा उसके गर्म स्पर्श से संगृहीत करेगा ऊष्मा ,उर्जा पिता की तरह टांगो पर टांग चढाये बच्चा अख़बार देखेगा पिता पुलकित होगा मंद -मंद..............
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:53 AM
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शेष .....

खिड़की से झांकता हुआ पार्क या बस स्टाप पर गुटुरगूं करते युगल को देख कबाब बन धुंआ उगलता जाएगा उसका विश्वास लबरेज़ होगा की सारी स्त्रियों को सिर्फ़ वही तृप्त कर सकता है । शेष रविवार में ...
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:53 AM
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ऐसा नया साल हो!

समय खुशियों का नहीं , सो इक निवेदन अवश्य है, बक़ौल शकील शम्सी : गुल कर गए कितने ही चरागों को धमाके मुमकिन हो तो इस साल चरागाँ नहीं करना हैं खून से रंगीन हर इक शहर की गलियाँ इस दौर में तुम जश्न का सामां नहीं करना लेकिन हम भारतीय जन्मजात उत्सव-धर्मी हैं
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:52 AM
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आतंक के विरुद्ध जिहाद!

देश के लिए कुर्बान मुजाहिदीनों को सलाम! पाठक चौंक रहे होंगे । मैं क्या बेवकूफाना हरकत कर रहा हूँ.सच मानिए उन आतंकवादियों से लड़ते हुए जामे-शहादत पी जानेवाले वो तमाम जांबाज़ मुल्क के सिपाही, अफसर और आम नागरिक ही मेरी नज़र में सबसे बड़े मुजाहिदीन हैं। मु
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:52 AM
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मुसलमान जज़्बाती होना छोड़ें

मायूस न हों और आक्रोशित न हों। -हज़रत मोहम्मद स. विभाजन के ठीक वर्ष-भर बाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा एक सर्वेक्षण कराया गया था। यह सन् १९४८-४९ की बात है। सात बड़े शहरों यथा मुंबई, कोलकाता, चेन्नई , अहमदाबाद, पटना, अलीगढ और लखनऊ में रहने वाल
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:52 AM
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अनपढ़ क्यों हैं मुस्लिम औरतें

तुमने अगर इक मर्द को पढाया तो मात्र इक व्यक्ति को पढाया। लेकिन अगर इक औरत को पढाया तो इक खानदान को और इक नस्ल को पढाया। ऐसा कहा था पैगम्बर हज़रत मोहम्मद ने । लेकिन हुजुर का दामन नहीं छोडेंगे का दंभ भरने वाले अपने प्यारे महबूब के इस क़ौल पर कितना अमल क
 
शहरोज़
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अलविदा!! अहमद फ़राज़

हिन्दुस्तानी का शायर अहमद फ़राज़ : किस-किस को बताएँगे जुदाई के सबब हम उर्दू ज़बान हिन्दुस्तानी उपमहाद्वीप की साझा-संस्कृति और परम्परा की उपज है.यह ऐसी भाषा है जो आज भी विभाजित दो बड़े भूभागों को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है.ग़ज़ल की इसमें महती भ
 
शहरोज़
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शर्म उनको मगर नहीं आती !

पिछले दिनों उर्दू लेखकों की धर्मान्धता पर मैंने सवाल उठाया था.अच्छा लगा कई लोग मेरे साथ खड़े हुए.मेरा मानना है कि साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यक समाज की हो या बहुसंख्यक समाज की दोनों खतरनाक होती है. सतीश सक्सेना जी ने प्रतिक्रिया दी।आप ख़ुद भी विद्वान् हैं
 
शहरोज़
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दिल पर रख कर हाथ कहिये, देश क्या आजाद है

सवाल दर सवाल है , हमें जवाब चाहिए और ये सवाल उनका है, जो दमित हैं, दलित हैं, शोषित हैं । बड़े अनमने ढंग से लिख रहा हूँ। उत्सव की गहमा-गहमी और मैं कहाँ दुखियारों और पीडितों , गरीबों की बात लेकर बैठ गया। मुझे सिवा अश्वनी की एतिहासिक जीत के कुछ और नज़र न
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:52 AM
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उर्दू लेखकों की धर्मान्धता

यास यगाना पर इस्लाम-विरोध का इल्ज़ाम शर्म उनको मगर नहीं आती तहजीब और गंगा-जमनी गहवारे का गवाह शहर लखनऊ से बहुत बुरी ख़बर मिली है.अपने समय के मशहूर उर्दू शायर यास यगाना पर आयोजित होने वाले परिसंवाद को कथित कट्टरवादी उर्दू के लेखकों के दबाव के कारण स्थग
 
शहरोज़
Dec 29 2009 11:52 AM
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इस्लाम की व्याख्या !

आतंक के ग्रास बने तमाम मासूमों के नाम वक़्त फ़ज्र का मुअज़्ज़िन की सदा अस्सलातो-खैरुन-मिनन-नोम और तुम्हारा इस्लामिक बम आ गिरता है नमाज़ी-समेत मस्जिद हो जाती है शहीद। ऐ ! पाक हुक्मराँ व्याख्या करो अपने इस्लाम की। ( प्रात:काल की नमाज़ , अज़ान पुकारनेवाला ,
 
शहरोज़
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आदमी,आदमी सा

सूरज , सूरज सा चाँद, चाँद कुत्ता, कुत्ता सा गिरगिट, गिरगिट फूल, फूल सा शूल, शूल मित्र ! कब दिखेगा आदमी, आदमी सा
 
शहरोज़
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बच्चे कभी दूध की बोतल नहीं पीते

फिर बच्चे चर्चा में हैं । एक ताज़ा सर्वे कहता है कि देश में 52 फीसदी बच्चे यौन दुर्व्यवहार   के शिकार होते हैं। 14 साला बच्ची से यौन अनाचार करने वाले पुलिस के एक वरिष्ठ अफ़सर की तस्वीर दांत निपोरते हुए छपती है। उसे महज़ छह माह की सज़ा मिली है और तुर
 
शहरोज़
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कैसे करोगे शादी ! वधु मिले तब न!!

खुशियाँ और रंगीनियाँ किसे भली नहीं लगतीं.और ज़िंदगी में शादी!! ऐसा लड्डू जो खाए तो पछताए और न खाए तो भी आंसू बहाए.लेकिन जिन्हें ज़िंदगी से कूट-कूट कर प्यार है,उनकी भी तमन्ना लबरेज़ है और ढेरों लबाबब अपेक्षाएं हैं अपने संसार की! अपने घर-आँगन की, अपने रा
 
शहरोज़
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खुद भूखी चिंता दूसरों की रोटी की

सब जानते हैं कि भारत गाँव में बस्ता  है.लेकिन अभी-अभी हुए रमाकांत  कथा-सम्मान में राजेन्द्र यादव ने कहा और उचित कहा कि भारत गाँव में जीता नहीं है बल्कि मरता है .और वहाँ भी सब से अधीक दुर्दशा औरत की ही रहती है.खेती-बाडी में मजदूरी करते लोगों
 
शहरोज़
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मुस्लिम औरतों की दयनीय स्थिति : ज़रूरत है एक बी आपा की

महिलाएं चाहे जिस वर्ग, वर्ण, समाज की हों, सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं, दमित हैं, पीड़ित हैं। इनके उत्थान के लिए बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत की थी। महात्मा गांधी ने देश के उत्थान को नारी के उत्थान के साथ जोड़ा था। मुस्लिम और
 
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विवादित है ‘नारी’!

वाह भाई! वाह!!! अब ब्लागर भी महिला-पुरुष, हिंदू - मुसलमान, अवर्ण-सवर्ण हो गया। औरत होने की सज़ा लिखने के बाद कइयों ने मुझसे कहा कि मुझे यह सब उनके हवाले छोड़ देना चाहिए। यानी महिला ब्लागरों के। आप अपने समाज के बारे में क्यों नहीं लिखते। मुस्लिम ब्लागर
 
शहरोज़
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औरत होने की सज़ा

महिलाओं के साथ बेइज़्जती’ कइयों ने नारी के सर दोष मढ़ने की कोशिश की है। उनका कहना है कि औरतें इन दिनों खुद ही भोगवस्तु बनने को उतारू हैं। अपनी चालढाल से पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा करती है। किसी हदतक इसे स्वीकार किया जा सकता है। यह मौजूदा
 
शहरोज़
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उर्दू के श्रेष्ठ व्यंग्य

जिसे पढ़कर हँसी आ जाय वो हास्य हो सकता है,लेकिन जिस रचना का पाठ अन्तस् तक विचलित कर दे वही व्यंग्य हैं। राजपाल से उर्दू व्यंग्य पर हमारी एक पुस्तक आई उर्दू के श्रेष्ट व्यंग्य इस पुस्तक की ज़रूरत इसलिए पड़ी कि उर्दू के कुछ महत्त्वपूर्ण व्यंग्य लेखकों
 
शहरोज़
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नाम तो मुझको भी अपने क़ातिलों का याद है

आज मुंबई हादसे की बरसी है. विशेष लोक अदालत में २६५ गवाहों की सुनवाई हो चुकी है. सिर्फ़ दस गवाह रह गये हैं और पूरी आशा है कि मामले की सुनवाई जल्द ही मुकम्मल कर ली जाएगी. लेकिन आम जनता के बीच असली सच कब आएगा या आकर भी अपना चेहरा तकता रह जाएगा, खुदा ही
 
शहरोज़
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तेरा साया

साथियों, यूँ क्षमा-याचना महज़ औपचारिकता होगी लेकिन बात सच है.और धतूरे की तिक्ता कैसी भी हो, वजूद उसका अपनी जगह अटल है,और ज़िन्दगी तो कहीं धूप-छाओं.ग़म की चाशनी में ही तो सुख का सुस्वादु लड्डू मयस्सर होता है.और साथी, आप से अलग कहाँ रह पाया सुकून से.ज़
 
शहरोज़
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बोलना चाहता हूँ प्रतिबंधित कर दिया जाता हूँ

इधर इतना कुछ टूटा, इतना बिखरा कि सँभालते- सँभालते .बार-बार इक शे' र जेहन में आता रहा : हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता जिस इलाके में रहता हूँ, इसे ही ख़ास मानसिकता में पल्लवित पत्रकार आतंकवादियों का अड्ड
 
शहरोज़