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07 May 2010
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सिर्फ़ नाम बताइए

नौकरी की अर्जी भरते हुएबैंक की पर्ची भरते हुएपरिचय के समय नाम बताते हुएमुझसे क्यों कहा जाता है“पूरा नाम बताइए”क्यों नाम के लिए जातिकिसी पूरक का काम करती हैक्यों संविधान ने आरक्षण लागू कियापर नहीं बनाया वह कानूनजिसमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा जाता“केवल
 
अपराजिता
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खाली कैनवास पर

खाली कैनवास पर पहलेपेंसिल से कुछ बनाती हूँताकि गलती हो तो मिटा सकूँजचे न तो हटा सकूँफिर संभल संभल करतैयार किए रंग भरती हूँअब गलती की कोई गुंजाइश नहींक्योंकि मैं जानती हूँमुझे अलग नहीं सामान्य के बीच रहना है
 
अपराजिता
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कॉलेज की लड़कियाँ

हरी-हरी घास के दरीचों परघने-घने पेड़ों के साये मेंबैठी हैं चिड़ियाँजिनका कोई एक ठिकाना नहींएक जगह से उड़कर यहाँ आई हैंयहाँ से उड़कर फिर कहीं जाएँगीहँसी से गूँजतेखुस-फुसाहट और बातों से भरेकोने-कोने को चिरजीवा करअमरता का नया राग गातीकॉलेज की लड़कियाँ.
 
अपराजिता
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चुगलख़ोर सुर्ख गुलाब

चुगलख़ोर सुर्ख गुलाबखोल गया मेरे सीने में दफ़्न राज़यूं तो आंखों से छलकता थातुमने देखा नहींहोंठों पर थिरकता थातुमने सुना नहींरोम रोम में उछलता थातुमने छुआ नहींऔर चुगलख़ोर गुलाब नेसब कह दिया!
 
अपराजिता
Feb 17 2010 06:31 PM
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थक गई हूँ रोज-रोज

थक गई हूँ रोज-रोजपतझड को बुहारते बुहारते,गिर जाने दोजमीं परसारे पत्तों कोएक एक कर,किमैं समेट सकूँएक साथ सबको।
 
अपराजिता
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ऐसी आवाज़ दे दो

अगर मैं दिल हूँ तुम्हारा,तो मुझे ये दिल दे दो.मैं माफ़ी नहीं चाहती,बस हाथों में हाथ दे दो.ज़िन्दगी भर न भूलूँ जो मैं,वो अहसास दे दो.बख्श दो मुझको - यूँ पल,तुम तड़पाओ ना,सोने से पहलेअपना एक ख्वाब दे दो.आती-जाती सांसों मेंएक शब्द सा सुनती हूँ,इन धुंधले
 
अपराजिता
Feb 02 2010 06:15 PM
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ऐसी आवाज़ दे दो

अगर मैं दिल हूँ तुम्हारा,तो मुझे ये दिल दे दो.मैं माफ़ी नहीं चाहती,बस हाथों में हाथ दे दो.ज़िन्दगी भर न भूलूँ जो मैं,वो अहसास दे दो.बख्श दो मुझको - यूँ पल,तुम तड़पाओ ना,सोने से पहलेअपना एक ख्वाब दे दो.आती-जाती सांसों मेंएक शब्द सा सुनती हूँ,इन धुंधले
 
अपराजिता
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ठूँठ में बदल गए

कुछ बंद दरवाजे हैं कुछ रोज़ सुनी जाने वाली आवाज़ें दीवारें हैं, और बहुत कुछ है बिखरा हुआ जिसे रोज़ समेटती हूँ बस यही तो करती हूँ अपनी ज़िन्दगियों को “हमारी” बनाने की कोशिश में जितनी बार मुँह खोलती बाँहें फैलाती उतनी बार नासमझ करार दी जाती उलटबाँसियों
 
अपराजिता
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कविता रचना कठिन काम है

भावों के उछाल को दिमाग के सवाल को बाँध पाना, संयत बनाना बड़ा कठिन काम है दोस्त, तुम कितनी सरलता से कहते हो आज कल कुछ लिखो विखो और कुछ नहीं तो कविता ही कर डालो, शायद तुम नहीं जानते दोस्त यूँ कागज़ कलम उठाकर बुन देने से मकड़जाल कविता नहीं रची जाती, कवि
 
अपराजिता
Dec 29 2009 11:43 AM
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उनकी आँखें

बाँट लिया करती हैं, उनकी आँखें. चुपके से हौले से न जाने क्या छोड़ दिया करती हैं उनकी आँखें. भाँप लिया करती है मेरा ग़म मेरी उदासी मेरी बौखलाहट, मन तक टटोल लिया करती है उनकी आँखें. उनकी आँखें जिनमें ज़िंदगी है रंग है सपने हैं जो संग है, सच कहूँ मेरा आ
 
अपराजिता
Dec 29 2009 11:43 AM
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हम

हम नींद तो चाहते हैं लेकिन थकना नहीं साथ तो चाहते हैं हाथ देना नहीं कैसा समय है? जब हम सफल होना चाहते हैं सार्थक नहीं !
 
अपराजिता
Dec 29 2009 11:43 AM
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पर दिशाहीन कबतक?

तुमने दिए पंख कहा उड़ो… दिखाया आकाश जिसके असीम विस्तार में उड़ना वाकई सुखद था पर दिशाहीन कबतक?
 
अपराजिता
Dec 29 2009 11:43 AM
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नौकरी

ज़िन्दगी के मायने में इस तरह घुस गई है कि इसके होने से मेरा होना तय है नहीं तो सब बेबात है! ये करती है तय कि तुम्हें कितना आदर मिलना चाहिए मेरे सम्मान का सूचक है नौकरी! न तो मेरी जेब भारी है न ही मेरी ज़बान जानती है कैसे करते हैं चापलूसी, फिर कैसे मि
 
अपराजिता
Dec 29 2009 11:43 AM
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मेरी उम्मीद

दिन उगता है तो उम्मीद करती हूँ दोपहर होने पर उम्मीद करती हूँ दिन ढलने पर भी उम्मीद करती हूँ रात को उसी उम्मीद के साथ अपने बिस्तर पर कम्बल में लिपटकर सो जाते हैं मैं और मेरी उम्मीद !
 
अपराजिता
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हाथी

वे कुछ कहना चाहते हैंकहने के लिए बहाना चुन लियाहाथी कानाक, कान, सूँड़, पूँछपर नाम न कह सकेहाथी कासब कह कर पहेली गढ़ दीउत्तर में मुझ से भीनाम सुनना चाहाहाथी का!
 
अपराजिता
Sep 10 2009 12:03 PM
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स्वार्थी हूँ

स्वार्थी हूँयह जानती हूँ!इसलिएकि तुम गलत न हो सकोमुझे एक और बारहोना पड़ेगा स्वार्थी.इसलिएकि तुम कह सकोतुमने मुझे जाना था सहीमुझे एक और बारहोना पड़ेगा स्वार्थी.इसलिएकि फिर तुम्हारी जुबाँन गुनहगार होन हो सिर लज्जित...मुझे होना पड़ेगा स्वार्थी!
 
अपराजिता
Sep 03 2009 05:58 PM
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हम

हम नींद तो चाहते हैंलेकिन थकना नहींसाथ तो चाहते हैंहाथ देना नहींकैसा समय है?जब हमसफल होना चाहते हैंसार्थक नहीं !
 
अपराजिता
Aug 16 2009 01:24 PM
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मुझे याद है

मुझे याद हैतुमने कहा थामेरे प्रश्न के उत्तर में :-“तुम मेरे जीवन केप्रत्येक विचार मेंप्रत्येक खाली स्थान मेंअपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा चुकी हो।मैं पानी का बिल जमा करवानेचाहे कितनी भी लम्बी लाइन में खड़ा रहूँमुझे लगता हैवहाँ केवल हम-तुम हैंएक-दूसरे से ,
 
अपराजिता
Aug 06 2009 05:44 AM
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पिता की रिटायरमेंट पर

ठहर जाने के लिए आपकी ज़िन्दगी में,मैं, पड़ाव आ ही गया.गुज़रा वक्त नहीं जो आ न सकूँ परमैं, बदलाव आ ही गया.गवाह हूँ मैं आपकी मेहनत कासंघर्ष का, पर भरे कंधों मेंमैं, झुकाव आ ही गया.अभी नहीं हुए हैं आप ज़िम्मेदारियों से निवृत परदेखा न,मैं, सुझाव आ ही गया.हम
 
अपराजिता
Aug 02 2009 07:53 AM
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एक गंभीर सवाल

मैंने भारत के भविष्य कोजलती सड़कों पर नंगे पैरों चलते देखा है.मैंने भारत के भविष्य कोसड़कों पर, चौराहों परभीख मांगते देखा है.मैंने भारत के भविष्य कोफटे बोरे में कबाड़ बीनते देखा है.मैंने भारत के भविष्य कोभूख से बिलखते तड़पते देखा है.मैंने देखा हैएक गंभीर
 
अपराजिता
Jul 24 2009 10:12 PM
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जल: जीवन भी, प्रलय भी

आज सुबह पानी नहीं आया सोसाइटी ने वाटर टैंकर मंगवाया पानी की बूँद-बूँद को लोग तरस रहे थे लड़ झगड़कर अपनी बाल्टियाँ भर रहे थे इधर टैंकर पर लिखा था 'जल ही जीवन है' उधर टेलीविजन पर आ रहा था समाचार बाढ़ से राज्य हो रहा लाचार लाखों की तादाद में लोग बेघर हु
 
अपराजिता
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राखी सावंत : वरण की स्वतंत्रता : स्वतंत्रता का वरण

लोग देखते हैं तुम्हारा चेहरा तुम्हारा बदन तुम्हारा काम और अंदाजा लगा लेते हैं बल्कि यक़ीनन जान लेते हैं तुम्हारे व्यक्तित्व को, तुम्हारी तेज चलती ज़बान पुरूषों को संस्कृति, सभ्यता, परम्परा जैसी चट्टानों पर भीम के गदा की गूँज-सी सुनाई पड़ती है। तुम्हा
 
अपराजिता
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बेटे जैसा बनाने के लिए

वह जुटती रहती है दिनभर बुनती है भविष्य समेटती है वर्तमान अपनी दोनों बेटियों को बेटे जैसा बनाने के लिए.
 
अपराजिता
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ये रातें करे बातें

ये रातें करे बातें चले आओ ये हवाएँ दे दुआएँ चले आओ ये इंतज़ार करे बेज़ार चले आओ ये मौसम करे हमदम चले आओ!
 
अपराजिता
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दान-पुण्य (लघुकथा)

क्या है! जब भी किताब लेकर बैठती हूँ दरवाजे पर घंटी ज़रूर बजती है. खोलने भी कोई नहीं आएगा." दरवाजा खोला तो सामने दस-बारह साल की एक छोटी लड़की फटे मैले फ्रॉक में खड़ी थी. शरीर और बालों पर गर्द इतनी जमी थी मानों सालों से पानी की एक बूँद ने भी इसे नहीं छ
 
अपराजिता
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बचपन की उम्र

मैं सुनाती हूँ अक्सर अपनी आठ साल की भाँजी को कितना अलग था तुम्हारे बचपन से हमारा बचपन। तुम्हारे सारे खिलौने मिल जाते हैं दुकानों पर हम खुद बनाते थे खिलौने कभी मिट्टी से कभी टूटे फूटे डिब्बों से घर का सारा कबाड़ माँ हमें दे देती और हमें लगता मिल गया द
 
अपराजिता
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अब भी मन करता है

तुम्हारा हाथ थामकर चलने को अब भी मन करता है कनखियों से झांककर तुम्हारी मुस्कान चुरा लेने को अब भी मन करता है मन करता है अब भी कि एक छतरी में भीगने से बचने की नाकाम कोशिश करते रहें एक दूसरे से सटे हुए किसी पेड़ के नीचे खड़े रहें न जाने किन किन बातों प
 
अपराजिता
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मेरे घर की रौशनी

तुम्हारा इंतज़ार था तुम आ गई मेरे घर की रौशनी, तुम्हारी मासूम निगाहें जब खुलती है तो टिमटिमाने लगती है आकाश-गंगा इस छोटे से कमरे में, तुम्हारे नन्हें लबों पर अनजाने छिटकी हँसी दिन और देह की थकान चुरा लेती है घर की रौशनी, तुम्हारे नन्हें-नन्हें हाथों
 
अपराजिता
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बचपन की उम्र

मैं सुनाती हूँ अक्सर अपनी आठ साल की भाँजी को कितना अलग था तुम्हारे बचपन से हमारा बचपन। तुम्हारे सारे खिलौने मिल जाते हैं दुकानों पर हम खुद बनाते थे खिलौने कभी मिट्टी से कभी टूटे फूटे डिब्बों से घर का सारा कबाड़ माँ हमें दे देती और हमें लगता मिल गया द
 
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21वीं सदी में घट गई है

मैं सुनाती हूँ अक्सर अपनी आठ साल की भाँजी को कितना अलग था तुम्हारे बचपन से हमारा बचपन। तुम्हारे सारे खिलौने मिल जाते हैं दुकानों पर हम खुद बनाते थे खिलौने कभी मिट्टी से कभी टूटे फूटे डिब्बों से घर का सारा कबाड़ माँ हमें दे देती और हमें लगता मिल गया द
 
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मैं चुरा लेना चाहती हूँ

ज्यों चुरा लेता है गर्मी का मौसम बादलों से थोड़ी बारिश सर्दी का मौसम गुनगुनी धूप की तपिश मैं चुरा लेना चाहती हूँ वक्त तुमसे मिलने का…
 
अपराजिता
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एक चाहत

एक चाहत जो वक्त से जूझना चाहती है हालात से लड़ना चाहती है अपनी औक़ात भुलाकर …
 
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स्वप्न बुनती रही आँखें

स्वप्न बुनती रही आँखें उम्मीदें उम्रदराज़ होती गई। मंज़िल कभी पास कभी दूर मुझे दिखती, मिलती, लड़ती, झगड़ती रही।
 
अपराजिता
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रोना छोड़ दिया है

रज्जू रोया नहीं आज वह बदल गया है अब तक तो रोता ही रहा बिखरने की हालत छोड़ आज वह संभल गया है किसी गीत में बंगला न्यारा बन जाता है वास्तव में कुनबे भी बिखरे हैं. भावुकता का रूदन ज्ञान से सचेत हो जाता है. चाहतों की भी सीमाएँ अब बन गई है जो धीरे-धीरे बढ़
 
अपराजिता
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दुनिया का ढाँचा

यूँ तो देह के भीतर छिपा है कहीं मन कहीं वो लोग जिसे भावों का पुंज कहते हैं लेकिन दुनिया का ढाँचा इसके बिल्कुल उलट है वहाँ मन दिखता है ऊपर-ऊपर, सब तरफ मित्रता भाईचारा, नैतिकता, लेकिन बस ऊपर-ऊपर. इसके ठीक नीचे बहुत गहरे बहुत विस्तृत फैली है देह देह की
 
अपराजिता
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चेहरा

भिखारियों के नाम नहीं होते होते हैं सिर्फ चेहरे, चेहरा लंगड़े का, लूले का, चेहरा भूखे काले नंगे बच्चे का, चेहरा सूखी छाती से चिपकाये माँ और उसके लाल का, चेहरा बूढ़े क्षीणकाय का, चेहरा सर्दी में फटे चीथड़ों के बीच ठिठुरती बुढ़िया का, चेहरा हाथ पैर तोड
 
अपराजिता
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कशमकश

ये बिल्कुल जरूरी नहीं आप मेरी सारी इल्तज़ा मान जायें पर ये बहुत जरूरी है आप मेरी हर इल्तज़ा पर ग़ौर फ़रमायें ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं मेरी हर बात सुनी जायें मानी जायें पर ये बहुत ज़रूरी है आप जब आयें लौटकर जल्दी आयें. ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं आप मेरे साथ
 
अपराजिता
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स्वार्थी हूँ

स्वार्थी हूँ यह जानती हूँ! इसलिए कि तुम गलत न हो सको मुझे एक और बार होना पड़ेगा स्वार्थी. इसलिए कि तुम कह सको तुमने मुझे जाना था सही मुझे एक और बार होना पड़ेगा स्वार्थी. इसलिए कि फिर तुम्हारी जुबाँ न गुनहगार हो न हो सिर लज्जित... मुझे होना पड़ेगा स्व
 
अपराजिता
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चित्रकथा

भूले हुए लम्हों का पता याद आया मेरी मां बहुत भोली बचपन के दिन, दोस्तों की होली वो गांव मेरा घर छोटे छोटे खेल बचपन का सफर छोटा सा कंधा वो बड़ा सा बस्ता कभी हुई हार, पर याद है जब मैं जीता गांव से दिल्ली शहर में आए बढ़ते ही गए कोई रोक न पाए घोषित हुआ जब
 
अपराजिता