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आज के ग़ज़लकार और ग़ज़ल.

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15 Jun 2010
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सदा अम्बालवी की ग़ज़लें

राजेन्द्र पाल सिंह उर्फ़ सदा अम्बालवी की तीन ग़ज़लें आज शाया कर रहे हैं। आप यूको बैंक में कायर्रत हैं। इनके तीन ग़ज़ल संग्रह शाया हो चुके हैं और कुछ ग़ज़लें अच्छे ग़ज़ल गायकों ने भी गाईं हैं और पत्र-पत्रिकाओं में आप अकसर छपते रहते हैं। अपने ग़ज़ल संग्रह के
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पाकिस्तान के शायर- तौसीफ़ तबस्सुम

आज हम पाकिस्तान के प्रमुख शायरों में से एक जनाब तौसीफ़ तबस्सुम की कुछ ग़ज़लें पेश कर रहे हैं।आम आदमी की मुसीबतें पूरी दुनिया में एक जैसी ही हैं । पाकिस्तान तो हिंदोस्तान का टूटा हुआ बाज़ू है तो वहाँ के दुख-दर्द तो और भी हमारे क़रीब हैं। इधर भी शायर ज़िंदगी
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श्री मनोहर शर्मा ‘साग़र’ पालमपुरी को श्रदाँजलि

सर्द हो जाएगी यादों की चिता मेरे बादकौन दोहराएगा रूदाद—ए—वफ़ा मेरे बादआपके तर्ज़—ए—तग़ाफ़ुल की ये हद भी होगीआप मेरे लिए माँगेंगे दुआ मेरे बाद30 अप्रैल को, श्री मनोहर शर्मा ‘साग़र’ पालमपुरी जी की पुण्य तिथी थी. उनकी ग़ज़लों का प्रकाशन हमारी तरफ़ से उस अज़ीम
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अंतिम क़िस्त-कौन चला बनवास रे जोगी

इस तरही मुशायरे में तक़रीबन ३० शायर-शाइराओं ने हिस्सा लिया। मिला-जुला सा अनुभव रहा । देश-विदेश से ३० शायर एक जगह आकर इकट्ठा हों वो भी लगभग मुफ़्त में ,बताओ और क्या चाहिए। कुछ कच्चे-पक्के शे’र, नये-पुराने शायरों ने सबके सामने रखे हैं। अनुभव और प्रयास का
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अंतिम क़िस्त से पहले दो तरही ग़ज़लें और

कल शाम तक अंतिम क़िस्त शाया हो जायेगी लेकिन अंतिम क़िस्त से पहले ये दो ग़ज़लें और मुलाहिज़ा कीजिए-पूर्णिमा वर्मनसब कुछ तेरे पास रे जोगीकाहे आज उदास रे जोगीमुशकिल रहना देस बेगानेअपना पर अभ्यास रे जोगीखाना, पानी, गीत बेगानेअपनी मगर मिठास रे जोगीदूर नगर में
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आठवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

इस क़िस्त कि शुरूआत इस ग़ज़ल से कर रहे हैं ,जिसमें जगजीत सिंह ने जोगी शब्द को अलग-अलग अंदाज़ में पेश किया है। ठीक वैसे ही जैसे शायरों ने इस मुशायरे में जोगी को नचाया।नये-पुराने शायरों को हमने एक साथ शाया किया है ताकि प्रयास, अनुभव से सीख सके और अनुभव, नये
May 25 2010 06:56 PM
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सातवीं क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

विलास पंडित "मुसाफ़िर" के इस खूबसूरत शे’र के साथ -उसमें विष का वास भरा हैशब्द है जो विश्वास रे जोगीऔर माहक साहब के इस फ़लसफ़े-बीता जीवन,जी लीं साँसेंबीत गया मधुमास रे जोगी-के साथ हाज़िर हैं सातवीं क़िस्त की तीन ग़ज़लें।डा.अहमद अली बर्क़ी आज़मीप्रीत न आई रास
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छटी क़िस्त-कौन चला बनवास रे जोगी

छ्टी कि़स्त की तीन और ग़ज़लें-योगेन्द्र मौदगिल तन का क्या विश्वास रे जोगीतन तो मन का दास रे जोगीभगवे में भगवान बसे हैंजटा-जूट विन्यास रे जोगीउर्मिल पूछ रही लछमन सेकौन दोष मम् खास रे जोगीजाम-सुराही छूट गये सब टूट गया अभ्यास रे जोगीसूरज, चंदा, जुगनू,
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पाँचवीं क़िस्त - कौन चला बनवास रे जोगी

पाँचवीं क़िस्त की ये तीन ग़ज़लें मुलाहिज़ा कीजिए-बाबा कानपुरीरहता नित उपवास रे जोगीमन में अति उल्लास रे जोगीकुछ तो है जो कसक रहा हैक्या मन में संत्रास रे जोगीझर-झर बहते नैना जैसेबारिश बारह मास रे जोगीसूनी-सूनी दसों दिशाएंकौन चला बनवास रे जोगीव्यसनों की चादर
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कौन चला बनवास रे जोगी-चौथी क़िस्त

नवनीत जी की इस अरदास-सांझ ढले सब घर को लौटेंअपनी ये अरदास रे जोगीके साथ और राजेन्द्र स्वर्णकार के इस अनूठे और सुंदर शे’र-प्रणय विनोद नहीं रे !तप हैऔर सिद्धि संत्रास रे जोगीके साथ हाज़िर है ये चौथी कि़स्त- नवनीत शर्माखुशियों को बनवास रे जोगीपीड़ा का मधुमास
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तीसरी क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

मुफ़लिस साहब के इस खूबसूरत शे’र -मीलों मृगतृष्णा के सायेकोसों फैली प्यास रे जोगीके साथ तीसरी क़िस्त हाज़िर है जिसमें जोगेश्वर गर्ग जी की ग़ज़ल भी का़बिले-गौ़र है।साथ ही दूसरी क़िस्त में चंद्र रेखा ढडवाल के इस खूबसूरत शे’र के लिए उनको बधाई देना चाहता हूँ।ताल
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दूसरी क़िस्त- कौन चला बनवास रे जोगी

दूसरी क़िस्त में तीन शाइराओं की ग़ज़लें एक साथ मुलाहिज़ा कीजिए-देवी नांगरानीओढे शब्द लिबास रे जोगीआई ग़ज़ल है रास रे जोगीधूप में पास रहे परछाईंशाम को ले सन्यास रे जोगीछल से जल में आया नज़र जोचाँद लगा था पास रे जोगीहिम्मत टूटी,दिल भी टूटाटूटा जब विश्वास रे
May 13 2010 12:28 PM
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कौन चला बनवास रे जोगी- पहली क़िस्त

"कौन चला बनवास रे जोगी" राहत इन्दौरी साहब की ग़ज़ल से लिए इस मिसरे पर कई शायरों ने ग़ज़लें कहीं है या यों कहो कि राहत साहब की ज़मीन पर शायरों ने हल चलाने की हिमाक़त की है। कई ग़ज़लें आईं है जो कि़स्तों मे पेश की जाएँगी।पहले हाज़िर हैं दो ग़ज़लें-एम.बी.शर्मा
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अनवारे इस्लाम-परिचय और ग़ज़लें

1947 में जन्में अनवारे इस्लाम द्विमासिक पत्रिका "सुख़नवर" का संपादन करते हैं। इन्होंने बाल साहित्य में भी अपना बहुत योगदान दिया है । साथ ही कविता, गीत , कहानी भी लिखी है। सी.बी.एस.ई पाठयक्रम में भी इनकी रचनाएँ शामिल की गईं हैं। आप म.प्र. साहित्य आकादमी
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हसीब सोज़ की ग़ज़लें

1962 में जन्में हसीब "सोज़" बेहतरीन शायर हैं। आप उर्दू के रिसाले "लम्हा-लम्हा"का संपादन भी करते हैं |आप उर्दू में एम.ए. हैं। बदायूं (उ,प्र) के रहने वाले हैं।शायर का असली परिचय उसके शे’र होते हैं और इस शायर के बारे में मैं क्या कहूँ। ये शे’र पढ़के के आप ख़ुद
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प्रेमचंद सहजवाला - परिचय और ग़ज़लें

18 दिसम्बर 1945 को जन्मे प्रेमचंद सहजवाला हिंदी के चर्चित कथाकार हैं। इनके अब तक तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । बहुत सी पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं और आप अच्छे शायर भी हैं। इनकी दो ग़ज़लें आपकी नज़्र कर रहा हूँ-एकज़िन्दगी में कभी
Apr 22 2010 11:51 AM
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द्विजेन्द्र द्विज जी की ताज़ा ग़ज़ल और तरही मिसरा

द्विजेन्द्र द्विज जी की एक ताज़ा ग़ज़ल आप सब की नज़्र कर रहा हूँ। द्विज जी से तो सब लोग वाकिफ़ ही हैं। आप उनकी ग़ज़लें कविता-कोश पर यहाँ पढ़ सकते हैं। उनकी एक नई ग़ज़ल मुलाहिज़ा कीजिए-ग़ज़लमिली है ज़ेह्न—ओ—दिल को बेकली क्याहुई है आपसे भी दोस्ती क्याकई आँखें यहाँ
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राहत इन्दौरी साहब की नई ग़ज़ल

राहत इन्दौरी किसी तआरुफ़ के मोहताज़ नहीं हैं। उनकी एक ताज़ा ग़ज़ल, उनकी इजाज़त के साथ शाया कर रहा हूँ। छोटी बहर की बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है । लीजिए मुलाहिज़ा कीजिए-ग़ज़लतू शब्दों का दास रे जोगीतेरा कहाँ विशवास रे जोगीइक दिन विष का प्याला पी जाफिर न लगेगी प्यास रे
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जनाब नवाज़ देवबन्दी

जगजीत सिंह की मखमली आवाज़ में हर किसी ने इस खूबसूरत ग़ज़ल-तेरे आने कि जब ख़बर महकेतेरी खुश्बू से सारा घर महकेको ज़रूर सुना होगा। इस ग़ज़ल के शायर हैं जनाब नवाज़ देवबन्दी । ऐसी बेमिसाल कहन के मालिक जनाब मुहम्मद नवाज़ खान उर्फ़ नवाज़ देवबन्दी का जन्म 16 जुलाई 1956
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सुरेन्द्र चतुर्वेदी-ग़ज़लें और परिचय

1955 मे अजमेर(राजस्थान) में जन्मे सुरेन्द्र चतुर्वेदी के अब तक सात ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और वो आजकल मुंबई फिल्मों मे पटकथा लेखन से जुड़े हैं.इसके अलावा भी इनकी छ: और पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।किसी शायर की तबीयत जब फ़क़ीरों जैसी हो जाती है तो
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शाहिद कबीर

जन्म: मई 1932निधन: मई 2001किसी अमीर को कोई फ़क़ीर क्या देगाग़ज़ल की सिन्फ़ को शाहिद कबीर क्या देगालेकिन शाहिद कबीर ने ग़ज़ल को जो दिया है उससे यक़ीनन ग़ज़ल और अमीर हुई है। फ़क़ीर इस दुनिया को वो दे जाते हैं, जो कोई अमीर नहीं दे सकता। फलों से लदी टहनियां हमेशा
टैग: शाहिद
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गोपाल कृष्ण सक्सेना 'पंकज'- ग़जलें और परिचय

1934 में उरई (उ.प्र.) में जन्में गोपाल कृष्ण सक्सेना "पंकज" बहुत अच्छे शायर हैं। आपने अंग्रेजी में एम.ए. किया और सागर विश्वविधालय में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक रहे हैं। एक ग़ज़ल संग्रह "दीवार में दरार है" प्रकाशित हो चुका है। कल उनसे बात करके
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मख़्मूर सईदी साहब को श्रदाँजलि

जाना तो मेरा तय है मगर ये नहीं मालूमइस शहर से मैं आज चला जाऊँ कि कल जाऊँ...मख़्मूर1934 को टोंक (राजस्थान) में जन्मे सुल्तान मुहम्मद खाँ उर्फ़ मख़्मूर सईदी, 2 मार्च 2010 को अपनी ज़िंदगी का सफ़र ख़त्म करके इस दुनिया से विदा हो गए। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं-पेड़
Mar 08 2010 03:39 PM
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होली मुबारक

उधर से रंग लिए आओ तुम, इधर से हमगुलाल अबीर मलें मुँह पे होके खुश हर दमखुशी से बोलें, हँसे , होली खेल कर बाहमबहुत दिनों से हमें तो तुम्हारे सर की क़समइसी उम्मीद में था इन्तज़ार होली का... नज़ीर अकबराबादी"आज की ग़ज़ल" की तरफ़ से आप सब को होली मुबारक हो। चंद
Feb 27 2010 05:10 PM
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दिनेश ठाकुर की ग़ज़लें

1963 में उदयपुर में जन्में दिनेश ठाकुर आजकल राजस्थान पत्रिका में वरिष्ट सामाचार संपादक हैं। एक ग़ज़ल संग्रह" हम लोग भले हैं कागज़ पर" छाया हो चुका है। फ़िल्म समीक्षक भी रह चुके हैं और पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं। हाल ही में अनुभूति पर इनकी ग़ज़लें
Feb 23 2010 09:17 AM
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अंसार क़ंबरी-ग़ज़ल और परिचय

1950 में कानपुर में जन्में अंसार क़ंबरी देश के माने हुए शायर हैं और अपने दोहों के लिए भी चर्चित हैं। एक ग़ज़ल संग्रह "सलीबों के क़रीब" भी छाया हो चुका है और उनके दोहों की किताब भी छाया हो चुकी है। बात चल रही थी हिंदी मीटर की तो सोचा क्यों न इसी मीटर की
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मात्रिक छंद और बहर

चलिए आज बात करते हैं क़तील शिफ़ाई साहब की। इनका वास्तविक नाम औरंगज़ेब खान था और क़तील इनका तखल्लुस और शिफ़ाई इनके उस्ताद शिफ़ा से प्रेरित है। इस नाम से हर कोई वाकि़फ़ है और क़तील साहब ने हिंदी मीटर में काफ़ी ग़ज़लें कही। जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में भी ज़िक्र
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देवमणि पाण्डेय की ग़ज़लें

देवमणि पाण्डेय जी का 4 जून 1958 को अवध की माटी में जन्म हुआ। हिंदी और संस्कृत के सहज साधक हैं और आप कवि तो हैं ही मंच संचालन के महारथी भी हैं। सुगम संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों का सहज-संचालन करते हैं। दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं
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गुज़रे वक़्त की बातें

वक़्त कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता। ऐसा लगता है कि हम जैसे किसी पुल की तरह खड़े रहते हैं और वक़्त गाड़ियों की तरह निरंतर गुज़रता रहता है। जब द्विज जी से मिला था कालेज में उस वक़्त मेरी उम्र १८-१९ साल की थी और मैं पंजाबी में कविता लिखता था और शिव कुमार
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मराठी ग़ज़लकार- प्रदीप निफाडकर

"आज की ग़ज़ल" की पहुँच अब धीरे-धीरे बढ़ रही है और मुझे खुशी है कि अब हम सीधे ग़ज़लकारों से जुड़ रहे हैं । इसका उदाहरण हैं प्रदीप निफाडकर जो मराठी ग़ज़लकार हैं और ब्लाग के प्रशंसक भी। एक मराठी ग़जलकार तक ब्लाग पहुँचना मायने रखता है । इस मंच से हम किसी को
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राहत इन्दौरी साहब और अंजुम रहबर

राहत साहब किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। राहत साहब ने एक जनवरी को जीवन के साठ वर्ष पूरे किए हैं। इसी महीने रामकथा वाचक मुरारी बापू ने राहत इंदौरी साहब के गजल संग्रह ‘नाराज’ के हिन्दी संस्करण का विमोचन करते हुए कहा-राम वही है, जो राहत देजो आहत करता है, वह
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विलास पंडित-ग़ज़लें और परिचय

1965 में जन्में विलास पंडित "मुसाफ़िर" बहुत अच्छे ग़ज़लकार हैं और अब तक तीन किताबें परस्तिश,संगम और आईना भी छाया हो चुकी हैं। कई गायकों ने इनके लिखे गीतों को आवाज़ भी दी है। पिछले 25 सालों से साहित्य की सेवा कर रहे हैं। आज की ग़ज़ल पर इनकी तीन ग़ज़लें
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कोई शाख़े-सब्ज़ हिला साईं- महमूद अकरम

शायर होना आसान है लेकिन वली होना बहुत मुशकिल है। गा़लिब का वली न हो सकने का दर्द और बहाना उसके इस शे’र से ज़ाहिर होता है-ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान “ग़ालिब”तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़्वार होतागा़लिब और कबीर में यही फ़र्क है । गा़लिब महफ़िलों में
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डा० मधुभूषण शर्मा ‘मधुर’ की ग़ज़लें

1 अप्रैल 1951 में पंजाब में जन्मे डा० मधुभूषण शर्मा ‘मधुर’ अँग्रेज़ी साहित्य में डाक्टरेट हैं. बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ के धनी ‘मधुर’ अपने ख़ूबसूरत कलाम के साथ श्रोताओं तक अपनी बात पहुँचाने का हुनर बाख़ूबी जानते हैं.इनका पहला ग़ज़ल संकलन जल्द ही पाठकों तक
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एक ज़मीन में दो शायर

एक ज़मीन में दो शायरों की, बराबर के मेयार की ग़ज़लें बड़ी मुशकिल से मिलती हैं। ये दोनों ग़ज़लें एक ही ज़मीन में हैं लेकिन दोनों बेमिसाल और लाजवाब हैं। पढ़िए, सुनिए और लुत्फ़ लीजिए-पहली ग़ज़ल जनाब- अहमद नदीम कासमी की -ग़ज़लकौन कहता है कि मौत आयी तो मर
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स्वर्गीय लाल चन्द प्रार्थी - परिचय और ग़ज़लें

(3 अप्रैल, 1915 -11 दिसम्बर, 1982)स्वर्गीय लाल चन्द प्रार्थी ‘चाँद’ कुल्लुवी हिमाचल के आसमाने-सियासत और अदबी उफ़ुक़ के दरख़्शाँ चाँद थे. आप हिमाचल के नग्गर (कुल्लू) गाँव से थे. इनका कलाम बीसवीं सदी, शमअ और शायर जैसी देश की चोटी की उर्दू पत्रिकाओं में
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नव वर्ष पर-विशेष

ले उड़े इस जहाँ से धुआँ और घुटन इक हवा ज़ाफ़रानी नये साल में द्विज जी के इस शे’र के साथ इस साल की अंतिम पोस्ट आपकी नज़्र है। वसीम बरेलवी की एक ग़ज़ल आज पहली बार "आज की ग़ज़ल" पर छाया कर रहा हूँ, ग़ज़ल से पहले दो शे’र वसीम बरेलवी के- न पाने से किसी के है, न
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नज़र में सभी की खु़दा कर चले - पहली किश्त

ग़ज़ल कह के हम हजरते मीर को ख़िराज—ए—अक़ीदत अदा कर चले इस तरही का आगाज़ हम स्व: साग़र साहब की ग़ज़ल से कर रहे हैं। हाज़िर हैं पहली तीन ग़ज़लें- मनोहर शर्मा’साग़र’ पालमपुरी इरादे थे क्या और क्या कर चले कि खुद को ही खुद से जुदा कर चले अदा यूँ वो रस्म—ए—वफ
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कृश्न कुमार 'तूर' साहिब की दो ग़ज़लें

अक्तूबर 1933 को जन्मे जनाब—ए—कृश्न कुमार 'तूर' साहब ने उर्दू , अँग्रेज़ी और इतिहास जैसे तीन विषयों में एम.ए. किया है.आप हिमाचल प्रदेश के टूरिज़म विभाग में उच्च अधिकारी रह चुके हैं.आपका का क़लाम उर्दू जगत में प्रकाशित होने वाली लगभग सभी पत्रिकाओं में बड़े
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संजीव गौतम की दो ग़ज़लें

इस बार कुछ देरी से ये पोस्ट लगा रहा हूँ लेकिन अब कोशिश करूँगा कि आपको अच्छी ग़ज़लें पढ़वाता रहूँ। इस बार 1973 में जन्में संजीव गौतम की दो ग़ज़लें हाज़िर कर रहा हूँ। इन्होंने हिंदी मे एम.ए. की है और पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर छपते रहते हैं। आशा है कि आपको