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अपनी बात

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08 Mar 2010
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मीरा की स्त्री अस्मिता और भक्त छवि

उपनिवेशकाल में यूरोपीय विद्वानों की भारतीय इतिहास में दिलचस्पी भी उनकी अपने साम्राज्य के सुदृढ़ीकरण और विस्तार का हिस्सा थी। भारतीय समाज में जब भी वर्चस्ववादी ताकतों का जोर बढ़ा, उनके विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर भी यहाँ हमेशा मुखर हुए हैं, लेकिन इन
 
डॉ.माधव हाड़ा
Mar 04 2010 02:07 PM
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लोकप्रिय साहित्य, चित्रकथा, फिल्म और कैसेट्स-सीडीज में मीरा

निर्मित छवि और यथार्थ अक्सर कहा जाता है कि मीरा के संबंध में ज्ञात कम है, लेकिन प्रचारित सबसे अधिक है। मीरा पारंपरिक अर्थ में संत-भक्त नही थी, लेकिन मध्यकालीन धार्मिक-साम्प्रदायिक आख्यानों और उपनिवेशकालीन इतिहास में यत्नपूर्वक उसका यही रूप गढा गया। म
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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राष्ट्रीय आंदोलन और हिंदी कविता

लगभग दो सौ सालों के ब्रितानी शासन के बाद भारत आजाद हुआ। एक तरह से 1757 में ब्रितानी शासन कायम हुआ और यहीं से उसके विरुद्ध संघर्ष भी शुरू हो गया, जो 1947 तक बराबर जारी रहा। इसकी प्रकृति, ढंग और नजरिया हमेशा और हर जगह एक से नहीं रहे। इसमें कई उतार-चढ़ाव
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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अपना फसाना मतलब आत्मकथा

आत्मकथा भी अन्य गद्य विधाओं की तरह आधुनिक युग की देन है। युग-निर्माता तथा युगांतरकारी व्यक्तियों को जानने-समझने में आत्मकथाएं सब से अधिक मदद करती हैं। इन के द्वारा हम उन व्यक्तियों के निजी जीवन के आत्म-संघर्ष को, उनके समय की ऊहापोह और उथल-पुथल को जान
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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हिंदी में गद्य विधाओं का विकास

प्लासी की निर्णायक विजय के बाद अंग्रेजों की रीति-नीति में बदलाव हुए। उन्होंने यहां रेल, भाप के जहाज और तार की आधुनिक संचार-व्यवस्था का विस्तार किया। उन्होंने यहां के धार्मिक-सामाजिक मामलात में अब तक चली आ रही अहस्तक्षेप की नीति को छोड़कर ईसाई धर्म प्र
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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विविध सरोकारों वाली पैनी व्यंग्य रचनाएं

हिंदी में साहित्यिक सक्रियता इस कदर कथा-कविता एकाग्र रही है कि उसमें कथेतर गद्य विधाओं की कोई खास पहचान नहीं बन पाई। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी आदि कुछ रचनाकारों ने अपनी असाधारण प्रतिभा से बीच में व्यंग्य को एक मुक्कमिल साहित्यिक अनुशासन की पहचान दिलवाई
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक का तुगलक का मूल्यांकन

बहुमुखी प्रतिभा के धनी गिरीश कारनाड आधुनिक भारतीय नाटक और रंग जगत की महत्वपूर्ण शख्सियत है। नाटक उनका पहला प्रेम है, लेकिन फिल्मों में लेखन, अभिनय और निर्देशन में भी उन्होंने कीर्तिमान कायम किए हैं। उनके कन्नड नाटकों के कई आधुनिक भारतीय भाषाओं में अन
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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भारतीय परिप्रेक्ष्य में आधुनिक कन्नड़ साहित्य

कन्नड़ साहित्य भारतीय साहित्य का अभिन्न अंग है। इसका विकास क्षेत्रीय जरूरतों के तहत अलग ढंग से हुआ है, लेकिन संपूर्ण आधुनिक भारतीय साहित्य से बहुत अलग नहीं है। इसके सरोकार, चिंताएं और आग्रह कमोबेश वही हैं, जो दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य के हैं। कन्
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक का वैशिष्ट्य

आजादी के बाद के सपनों के पराभव और मोहभंग की कन्नड़ में रचित नाट्यकृति तुगलक का आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में खास महत्व है। यह कृति उस समय लिखी गई जब आधुनिक भारतीय नाटक साहित्य में ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विषयों पर पुनरुत्थान मूलक नाटक लेखन का जोर था। हिं
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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आधुनिक भारतीय नाटकों में इतिहास-मिथक

तुगलक आजादी के बाद के सपनों के पराभव और मोहभंग का रूपक है। इसमें अपने समय और समाज के द्वंद्व और चिंता को इतिहास में विन्यस्त किया गया है। इतिहास और मिथ के रूपक में अपने समय, समाज और व्यक्ति के द्वंद्व और चिंता को व्यक्त करने वाली नाट्य रचनाएं आधुनिक
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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तुगलक का हिंदी नाटक पहला राजा से साम्य-वैषम्य

भाषायी भिन्नता के बावजूद आधुनिक भारतीय साहित्यकारों की चिंताए, सरोकार और द्वंद्व कमोबेश एक जैसे हैं। नेहरूयुगीन मोहभंग के यथार्थ को 1964 में तुगलक में कन्नड़ रंगकर्मी और नाटककार गिरीश कारनाड ने मध्यकालीन मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक के रूपक प्रस्तुत
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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भारतीय परिप्रेक्ष्य में आधुनिक कन्नड़ साहित्य

कन्नड़ साहित्य भारतीय साहित्य का अभिन्न अंग है। इसका विकास क्षेत्रीय जरूरतों के तहत अलग ढंग से हुआ है, लेकिन संपूर्ण आधुनिक भारतीय साहित्य से बहुत अलग नहीं है। इसके सरोकार, चिंताएं और आग्रह कमोबेश वही हैं, जो दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य के हैं। कन्
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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भारतीय साहित्य की पहचान

भारतीय साहित्य की कोई एकरूप पहचान गढ़ने से पहले इसके वैविध्य को समझ लेना बहुत जरूरी है। सदियों से यहां विभिन्न धर्मों-संप्रदायों, संस्कृतियों और भाषाओं के लोग परस्पर सहभाव के साथ रहते आए हैं। इस सहभाव से जो अंतर्क्रिया और संवाद हुए हैं उससे इस वैविध्य
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक का हिन्दी अनुवाद और अनुवादक

तुगलक का हिंदी अनुवाद विख्यात रंगकर्मी और सिने शख्सियत बी.वी.कारंत (बाबु कोडि वेंकटरामन कारंत) ने किया है। बी.वी.कारंत का जन्म 1928 में कर्नाटक के दक्षिणा कन्नड जिले के बंटवाल ताल्लुक के मांची गांव में हुआ। रंगमंच से कारंत का पहला साक्षात्कार तब हुआ
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड का नाट्य कर्म

विख्यात नाटककार, कवि, अभिनेता, निर्देशक, आलोचक, अनुवादक और सांस्कृतिक प्रशासक गिरीश कारनाड का जन्म महाराष्ट्र के माथेराम में एक कोंकणीभाषी परिवार में 19 मई, 1938 को हुआ। कारनाड ने 1958 में धारवाड स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक की भाषा और संवाद

सल्तनतकालीन शासक वर्ग से संबंधित होने के कारण तुगलक की भाषा और संवाद अभिजातवर्गीय हैं। इनमें दरबारी अदब-कायदों की बारीकियों को समाविश्ट किया गया है। इसके एक-दो चरित्रों को छोड़कर शेष सभी चरित्र मुसलमान हैं, इसलिए वे नफीस और अदब-कायदों वाली उर्दू बोलते
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक की रंग योजना

तुगलक विख्यात रंगकर्मी गिरीश कारनाड की मूलत: कन्नड़ में रचित नाट्य कृति है, जिसके हिंदी सहित कई आधुनिक भारतीय भाशाओं में अनुवाद और मंचन हुए हैं। इसके नाटककार गिरीश कारनाड आधुनिक भारतीय साहित्य और रंगमंच की महत्वपूर्ण शख्शियत हैं। यह कृति आदर्शवादी, स्
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक में हमारा समय और समाज

तुगलक अपने समय और समाज के द्वंद्व और यथार्थ का सम्मोहक रूपक है। कोई समकालीन रचनाकार इतिहास या मिथ को केवल उसकी पुनर्रचना के लिए नहीं उठाता। जब इतिहास या मिथ में कहीं न कहीं वह अपने समय और समाज का साद्श्य पाता है, तभी वह उसे अपनी रचना का विषय बनाता है
 
डॉ.माधव हाड़ा
Dec 29 2009 11:52 AM
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गिरीश कारनाड के नाटक तुगलक में इतिहास और कल्पना की जुगलबंदी

तुगलक आधुनिक भारतीय नाटक और रंगमंच के शीर्षस्थानीय रंगकर्मी गिरीश कारनाड की मुस्लिम शासक मुहम्मद बिन तुगलक के जीवन पर आधारित नाट्य रचना है, जिसमें देश की आजादी के बाद के दो-ढाई दषकों के आदर्शवाद और उससे मोहभंग के यथार्थ को सम्मोहक रूपक में प्रस्तुत क
 
डॉ.माधव हाड़ा
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साहित्य के समक्ष ग्लॉबलाइजेशन, बाजार और मीडिया की चुनौतियां

विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं और संस्कृतियों का मेल और एकरूपीकरण ग्लॉबलाइजेशन है, जिसकी शु़रुआत पंद्रहवीं सदी में उस समय हुई, जब कुछ साहसी यूरोपीय व्यापार की मंशा से नए देशों की खोज में निकले। ग्लॉबलाइजेशन का पहला चरण 1492 में कोलंबस की नयी और पुरा
 
डॉ.माधव हाड़ा
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गोरा का पुनर्पाठ

रवीन्द्रनाथ का गोरा पुनरुत्थान में अंतर्निहित बंधे हुए, क्षुद्र और विछिन्न हिंदुत्व के छद्म को उजागर करनेवाला विलक्षण और क्लासिक उपन्यास है। यह सही मायने में संकीर्ण हिंदुत्व का साहसपूर्ण और ओजस्वी जवाब है। प्रस्तुत है इस उपन्यास का पुनर्पाठ: संकीर्ण
 
डॉ.माधव हाड़ा
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इतिहास और आख्यान की जुगलबंदी

उपनिवेशकालीन दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी विद्रोह पर एकाग्र हरिराम मीणा की रचना धूणी तपे तीर को यों तो उपन्यास की संज्ञा दी गई है, लेकिन यह इतिहास और दस्तावेज भी है। गल्प के अनुशासन में होने के कारण यह एक औपन्यासिक रचना है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज होन
 
डॉ.माधव हाड़ा
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जीवन की पुनर्रचना

अन्य कथेतर गद्य विधाओं में जीवनी सर्वाधिक प्राचीन है। पश्चिम में जीवनी लेखन बहुत पहले से शुरू हो गया था। युनानी जेनोफोन और प्लूटार्क तथा रोमन टैसिटस और सेयेटोनियस जैसे जीवनीकार वहां 1800 वर्ष पहले हो गए थे। आरंभ में जीवनियां विशिष्ट व्यक्तियों-राजाओं
 
डॉ.माधव हाड़ा
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यादों से बुनी और बनी रचना

संस्मरण फिलहाल एक लोकप्रिय साहित्य विधा है। लोगों में संस्मरण लिखने की होड़ लगी हुई है। हिंदी में भी संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं। संस्मरणों की बढ़ती हुई लोकप्रियता पर टिप्पणी करते हुए विलियम जिंसर लिखते है कि ´´यह संस्मरण का युग है। बीसवीं सदी के अंत स
 
डॉ.माधव हाड़ा
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चंद्रधर शर्मा गुलेरी होने का मतलब

चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानियां हमारी विरासत का हिस्सा है। विरासत के साहित्य की आलोचना और मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि यह अपने समय से कितना आगे है। मतलब यह कि अपने समय के साहित्य की प्रचलित रूढ़ियों का अतिक्रमण कर इसने अपने को जीवंत और प्रासंग
 
डॉ.माधव हाड़ा
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दास्तान-ए-यायावरी

आधुनिक कथेतर गद्य विधाओं में यात्रा वृत्तांत भी प्राचीन साहित्यिक विधा है। समय के साथ इसके स्वरूप और चरित्र में बदलाव होते रहे हैं। इतिहास, आत्म चरित्र आदि के प्रति अनास्था और उदासीनता के कारण भारत में यात्रा वृत्तांतों की समृद्ध और निरंतर परंपरा नही
 
डॉ.माधव हाड़ा