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मेरी बतियाँ

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18 Mar 2010
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भाई

तुम अगर होतेतो शायद झगड़कर घुन्ना बने बैठे होतेहम एक दूसरे सेलेकिन तुम मर चुके बरसों पहलेऔर मेरे लिए तुम अब बस एक विषय रह गए होक्या कुछ और भी संभव थाजबकि न मैं तुमसे कभी मिलान देखा तुम्हें?मुझे तो अट्ठारहवें जन्मदिन परउपहार की तरह दी गईतुम्हारे होने और
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पैदा होने के अफ़सोस में

मेरे लिये 27 दिसंबर के बारे में पहली खास बात यह है कि इस दिन मिर्ज़ा ग़ालिब पैदा हुए थे और दूसरी यह कि उसी दिन मैं भी पैदा हुआ। वैसे तथ्यों का क्रम अगर चाहें तो बदल सकते हैं। इस बार 27 दिसंबर को यानि कल 34 वसंत देख लिये। ज़ाहिर है कि 34 में से कुछ तो पत
Dec 29 2009 11:43 AM
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जौ का रस

मैं बीयरहारी जीव हूँ। बीयर शुरु करवाने का श्रेय हमारे एक डाक्टर साहब को जाता है जिन्होनें मुझे और मेरी दीदी को बीयर पीने की सलाह दी, कि हम थोड़ा वज़न बढ़ा सकें। दीदी ने तो क्या पीनी थी मगर मुझे घर में बैठकर बीयर पीने का बहाना मिल गया। बीयर का कार्यक्रम
Dec 29 2009 11:43 AM
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बल बल जाऊँ मैं तोरे रंगरेजवा

एक पोस्ट में मैनें कहा था कि कुछ रचनाओं में अमरत्व के गुण होते हैं। ग़लत नहीं कहा था। इस बार " छाप तिलक सब छीनी " कैलाश खेर की आवाज़ में सुना और फिर से प्रभावित हुआ। कैलाश की आवाज़ भी उतनी ही दिलकश है जितना ख़ुसरो का लिखा दिलफ़रेब है। (बीच में कबीर भी शाम
Dec 29 2009 11:43 AM
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मानव श्रंखला

उम्मीद कर रहा था कि बंगलौर में भी लोग इकठ्ठे होंगे और मोमबत्तियां जलाएंगे। ऐसा हुआ मगर बहुत ही छोटे स्तर पर और लोगों को इसके बारे में पता नहीं लगा। मुझे भी अखबार से ही पता लगा और अब प्रशासन ने यहां पर किसी भी रैली या गैदरिंग पर सुरक्षा को या खतरे को
Dec 29 2009 11:43 AM
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अफ़सोस और उम्मीद के गीत

ऐसे समय में मुझे ब्रेख़्त से ज़्यादा कुछ नहीं सूझ रहा… वे जो शिखर पर बैठे हैं, कहते हैं: शांति और युद्ध के सार तत्व अलग-अलग हैं लेकिन उनकी शांति और उनका युद्ध हवा और तूफ़ान की तरह हैं युद्ध उपजता है उनकी शांति से जैसे मां की कोख से पुत्र मां की डरावनी श
Dec 29 2009 11:43 AM
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घुन्ना

मैं प्रेम-गीत पढ़ता हूँ और हँस देता हूँ क्या मैनें लिखी कोई कविता तुम्हारे नाम? या गुलदस्ते में सजाकर दिया था तुमनें अपना प्रेम? हम जानते थे प्रेम-कविताओं की क्षुद्रता हँसते थे और हँसते-हँसते रो देते थे तब प्यार हमें ले गया था वहाँ हर चीज़ जहाँ से छोटी
Dec 29 2009 11:43 AM
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चंद ज़रूरी लोगों के नाम

कितना कुछ बदल गया? कुछ लोग आगे निकल गये, कुछ रह गए पीछे साथ कोई न रहा, शांत लहर के नीचे जन्म ले रही हैं मछलियाँ शहर चमचमाकर नए हो गए मगर पुरानी पड़ गईं उनकी स्मृतियाँ, बासी किताबों पर पीलापन चढ़ गया और बाकी बचे खतों को कुतर रही है उदासी, ढहती दीवारों प
Dec 29 2009 11:43 AM
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हेरमान हेस्से, एक बार फिर

हेरमान हेस्से की दो और कविताओं का अनुवाद कर पाया हूँ जिन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। ये और, शिरीष भाई के अनुनाद के लिये दो अनुवाद मैनें अपने दफ़्तर का एक ज़रूरी काम स्थगित करके किये, जोकि अच्छी बात नहीं है, मगर मैं जब भी हेरमान की कविताएँ लेकर बैठता
Dec 29 2009 11:43 AM
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सचेतन में रहेगी पीड़ा

अकेला बैठ अपनी कुर्सी पर मैं सोचता हूँ, सोचता हूँ और हैरान होता हूँ चुप हो जाता हूँ, इतना चुप कि बेआवाज़ी भी सन्न हो जाती है कैसी अफ़ीम घुली थी उन दिनों में जब सड़क पर गुज़रते लोगों से बेपरवाह मैं चूमता था उसका चेहरा हाथों में लेकर? पतझड़ में जब पेड़ ठूँठ
Dec 29 2009 11:43 AM
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बुरा समय

हेस्से की कविताओं का सिलसिला अभी शुरु ही हुआ है। ख़याल तो ये है कि किताब में जो 31 कविताएँ हैं सभी का अनुवाद कर डालूँ। देखें कितना हो पाता है। फ़िलहाल के लिये एक और कविता। अभी हम चुप हैं और कोई गीत नहीं गाते हर कदम भारी हो गया है यह रात थी, जिसे आना ही
Dec 29 2009 11:43 AM
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हेरमान हेस्से की कविताएँ

नोबेल से सम्मानित जर्मन साहित्यकार हेरमान हेस्से मुख्य रूप से अपने तीन उपन्यासों सिद्धार्थ, स्टेपेनवौल्फ़ और मागिस्टर लुडी के लिये जाने जाते हैं मगर उन्होनें कविताएँ भी लिखीं और पेंटिंग्स भी बनाईं। उनका नाम पहली बार जर्मन सीखते हुए पढ़ा था। उस दौरान कि
Dec 29 2009 11:43 AM
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गाव (The Cow)

कायदे से मुझे फ़िल्म से संबंधित कोई भी पोस्ट यहाँ नहीं डालनी चाहिये क्योंकि फ़िल्म के लिये मैनें एक अलग ही ब्लोग बनाया है जहाँ पहली पोस्ट पर कोई भी नहीं आया और अगली पोस्ट पर भी दो एक लोग ही आए। यहाँ वही दूसरी पोस्ट दोबारा डाल रहा हूँ। उद्देश्य है चित्र
Dec 29 2009 11:43 AM
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शराब और शराब

पिछला पूरा महीना शराब और शराबियों की संगत में कटा है और अक्सर शराब सेरिब्रल कोर्टेक्स तक ही पहुंची मगर कई बार भेजे में हिप्पोकाम्पस तक भी पहुंची और ऐसे हर मौके पर हर अभ्यस्त शराबी की तरह मैं भी खूब भावुक हुआ मगर अनुभव से ऐसे मौकों पर अंतर्मुखी होना स
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दूसरा प्यार

दूसरे प्यार में नहीं लिखी जाती पहली अर्थहीन प्रेम-कविता पहला थरथराता चुंबन नहीं लेता कोई दूसरे प्यार में दूसरे प्यार के बारे में नहीं लिखता कोई अभिज्ञान और ना ही होता है शिला-लेखों में उसका वर्णन दूसरा प्यार नहीं रखा जाता छुपाकर बटुए की चोर-जेब में क
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चुप्पी की कोई तो वजह होगी

नाड़ा देखा है? उसके के दो सिरे होते हैं; एक ओर से खींचो तो दूसरी ओर से छोटा हो जाता है। अपनी हालत पस्त है और कुछ नाड़े जैसी भी। शायद उससे भी ज़्यादा पस्त। मैं अपने को कई सिरों से खींचने की कोशिश करता रहता हूँ और जो सिरा छोड़ता हूँ वो सिकुड़ जाता है। कभ
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दीवार के उस पार

सँझा की बेला थी कल कोई यूँ आ खडा हुआ देहरी पर कि झट तुम्हारी याद से भीग गया मैं विलंबित होता है तो खुद ही चला आता है तुम्हारे बारे में सोचना और कितना अप्रत्याशित होता है तुम्हें याद करना मसलन पार्क की बेंच पर बैठे गली के जवान होते बच्चे मुझे देख अचकच
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ग़ाफ़िल कब करेगा दुनिया की सैर?

बचपन में बुनी गयीं फंतासियाँ लंबे समय तक साथ रहती हैं या शायद हमेशा। जब अनुभव का दायरा छोटा होता है तो कल्पना का क्षेत्र असीमित होता है। कलाकार बचपन में जो कल्पनाएँ करता है ज़िन्दगी भर उसके इर्द-गिर्द रचता-बुनता है। मगर जो कलाकार नहीं होते वे? मुझे ल
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नोस्टाल्जिया का नशा

कभी किसी नये रास्ते से गुज़रते हुए पुरानी सी महक नासापुटों में पैठती है तो आदमी वहां पहुँच जाता है जहाँ से वह बहुत पहले गुज़र चुका है। एक छोटी सी तान से अकसर सालों का फासला तय करके वही क्षण वापस आ खडा होता है जिसे भुला दिया गया था या जिसे हम डायरी के
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संशय के बाद

अपने डर को छुपाकर उसे लिखने थे प्रेमगीत किसी को दिखानी नहीं थीं अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ और उन उँगलियों के बीच उलझा संशय उसकी आत्मा अब भी गीली थी प्रेम और उसके इतिहास की भाप में उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो
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मुझपे तेरे ये भरम जाने कितने झूठे होंगे

एक बार फिर देखा; वही पुरानी तस्वीरें, वही उलझी सी लिखावट वाले सलीके से तह किये हुए पत्र। वही लापरवाही से लिखे गहरे-हलके अक्षर। सब समेटकर बड़े से लिफ़ाफ़े में डाल दिये। बगल की फ़व्वारे की दुकान से लकड़ी के महंगे विंड-चाईम्स के खनकने की आवाज़ रह-रहकर गूँज उठ
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"बैले दे ज़ू" देखकर पीयर के लिए

इससे तो बेहतर है अनजान लोगों से बतियाया जाए कुछ भी किताबों में घुसा लिया जाए सिर एक के बाद एक चार-पांच फ़िल्में देख डाली जाएं पूरी रात का सन्नाटा मिटाने के लिये टके में जो साथ हो ले ऐसी औरत के साथ काटी जाए दिल्ली की गुलाबी ठंडी शामें गुलमोहर के ठूँठ क
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परमाणु बम - दूसरे विश्वयुद्ध का निर्णायक हथियार

सापेक्षता के सिद्धांत के द्वारा परमाणु उर्जा की थ्योरी विकसित करने का श्रेय आइंस्टाइन को जाता है जिसके आधार पर तकरीबन चालीस साल बा द परमाणु बम बनाया गया। १९३८ तक यह थ्योरी थ्योरी ही रही। उस साल तीन जर्मन वैज्ञानिकों ने एक खोज की। ओट्टो हान, लीजे माइत
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द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार - २

यह असंभव था कि जर्मनी के आत्मसमर्पण के बाद मित्रदेश मिलकर भी जापान पर काबू न पा सकते। ऐसे में अमेरिका के जापान के ख़िलाफ़ परमाणु हथियार प्रयोग किए जाने के क्या कारण हो सकते थे? दरअसल इवो-जीमा और ओकिनावा में जापान की सशक्त रक्षात्मक प्रणाली से बौखलाए
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द्वितीय विश्व-युद्ध के रहस्यमयी हथियार

गाज़ा-पट्टी पर इज़राइल बमबारी कर रहा है। कल सुबह की चाय अख़बार में मृत बच्चे की तस्वीर देखते हुए पी। दिनभर समाचारों में भी मृत या घायल बच्चे दिखाए जाते रहे। फ़िर एक मेल के जरिये पर्ल-हार्बर के हमले की तस्वीरें देखने को मिलीं और कल से बैठा हुआ nanking m
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मेरी बतियाँ

किसी अच्छी ख़बर की आस बड़ी हो गई है। दिन-रैन इंतज़ार कि कोई ख़बर आने को है। मगर क्या ख़बर? ऐसा क्या होने को है जिसकी उम्मीद है? कुछ भी तो नहीं... फिर? ऐसा भी कोई देखा है जो बेमतलब और अनजान आस के लिए सारे काम छोड़कर बार-बार मैजिक आई से झाँककर कर देखता