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प्रत्येक वाणी में महाकाव्य...

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20 May 2010
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पुराने गीतों की उम्र कितनी है?

दर्द भरे गीतों, जिन्हे आज की पीढ़ी कुछ हिकारत और बहुत कुछ अजनबीपन से देखती है, की भारतीय फ़िल्मों में समृद्ध परंपरा रही है। गानों की एक पीढ़ी बहुत कुछ अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी की नौटंकियों से प्रभावित रही है या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि मुम्बईया फ़िल्में
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फिर सावन रुत की पवन चली

आज हम एक और कलाकार का आगाज़ यहाँ करना चाहते हैं जोकि कम मशहूर हैं मगर उनकी चंद गज़लें हम दो दोस्तों को बेहद पसंद आयीं थीं और हमनें उनकी कैसेट मिलकर लम्बे अरसे तक तलाश की थीं। दरअसल मुन्नी बेगम मेरे दोस्त ने पहली बार मुझे सुनाई और खुद सुनी थी और एक दिन वह
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मास्टर मदन - अबूझ प्रतिभा

इंटरनेट बड़े काम की चीज़ है। इसपर घर बैठे-बैठे इतने काम हो जाते हैं कि कहीं जाने की ज़रूरत नहीं। इस वजह से बैठे-बैठे कमर दर्द को न्यौता दे बैठा। मगर सुखद पहलू यह है कि इसी की बदौलत दुनिया के सुदूर कोनों पर बैठे कई लोगों से मैं आज संपर्क में हूँ और कई अनदेखे
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तस्वीर तो बन ही गई

इस ब्लॉग पर हमनें फ़िल्मी संगीत की बात कम ही की है। इसके पीछे को पूर्वाग्रह नहीं है; बस ऐसा मौका पड़ा नहीं सिवाय तलत और रफ़ी साहब की दो पोस्टों के अलावा। पिछले काफ़ी समय से यहां पोस्ट डालने का अंतराल भी बढ़ता रहा है, जिसकी वजह से मेरे पास काफ़ी सारे विचार और
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प्रकृति-पुत्र की प्रेम-अभिव्यक्ति

लगता है दो दिन पहले सुनाए जागर को सुनकर यहाँ आने वाले लोग डर गए थे। सिवाय मीत भाई के कोई भी अपनी हाज़री नहीं लगा गया। इसलिय सोचा आज कुछ हटकर और ऐसा लगाया जाए जिसमें मास की रुचि हो। कन्ट्री म्युज़िक ने एल्विस प्रेस्लि और गार्थ ब्रुक्स से होते हुए लंबे र
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देवताओं का आह्वाहन और लोकगीत - जागर

जागर के बारे में मैं कुछ कहूँ इसकी ज़रूरत नहीं। आज एक ऐसे ब्लोग पर पहुँचा जहां जागर के सम्बंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है। फिर भी इतना तो ज़रूर बताऊँगा कि यह गायन की ऐसी विधा है जिसके द्वारा देवताओं का आह्वाहन किया जाता है और उनसे अपनी समस्याओं का न
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महफ़िल सजी है सुख़नगोई की मलिका पुख़राज के संग

यूँ समझ लीजिये कि महफ़िल उरूज पर है और एक ओर सुख़नगो बैठे हैं, दूसरी ओर सुख़नफ़हम। इस ओर बैठी हैं मलिका पुख़राज। बात छिड़ी है ग़ालिब की। मलिका ने सुर साधे ही हैं और कह रही हैं ग़ालिब की ये ग़ज़ल: जहां तेरा नक़्शे-क़दम देखते हैं ख़ियाबां-ख़ियाबां इरम देखते हैं दिल-
Dec 29 2009 11:49 AM
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एक आवाज़ स्टूडियो से बाहर और स्टूडियो के अंदर

एक आवाज़ जो इस देश के हज़ारों-हज़ार लोगों का स्वर बनी, एक स्वर जो अवसाद में, उल्लास में, यों कहें कि रोज़मर्रा के हर मूड में बतौर आदर्श लोगों के मानस में छाया रहा। अपने भीरु व्यक्तित्व की सतहों के नीचे छिपे नायक को कल्पना में जब भी लोगों ने सुरों में नहल
Dec 29 2009 11:49 AM
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भुला दिया गया एक गीत

ट्रैफ़िक पर लिखी दूसरी किस्त पर पाठक न मिलने की फ़्रस्टेशन में डूबते-उबरते हुए मैनें संगीत के अपने गोदाम में टटोलना शुरु किया तो फ़िल्मी संगीत के स्वर्णिम युग से ठीक पहले के दौर के गीतों पर नज़र गई। यह वह युग था जो पारसी थियेटर की सपाट गायकी के प्रभाव से
Dec 29 2009 11:49 AM
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सिद्धेश्वर दा के हुक्म पर गोपालबाबू

आज गोपालबाबू फिर गा रहे हैं ज़रा छोटे ही अंतराल पर। इसके पीछे सिद्धेश्वर भाई का हाथ है। इस गीत का थीम भी विरह ही है और इसमें स्त्री घुघूती से गुहार कर रही है आम की डाल पर बैठकर न गाने के लिये क्योंकि उसकी घुर-घुर सुनकर स्त्री को अपने पति की बेतरह याद
Dec 29 2009 11:49 AM
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मोहे सुहागन कीनी रे

किसी-किसी के लेखन में अमरत्व का गुण इस कदर होता है कि भुलाए नहीं भूलता। सलीके से हिन्दी के पहले कवि अमीर खुसरो का लिखा कितने बरसों से गाने वालों के लिये इंस्पिरेशन रहा है। अब इस गीत को ही लीजिये। बचपन में जब वो फ़िल्मी गीत सुना था तो उसका मुखड़ा समझ मे
Dec 29 2009 11:49 AM
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मेरी बओ सुरीला

यह गीत कहीं गहरे से उठता है हालाँकि जोशीला और समुदाय में गाया जाने वाला गीत है मगर किशन सिंह पवार की आवाज़ बहुत दूर ले जाती है। कई बार लगता है आप ख़ुद ही वहां कौतिक में लोगों के साथ नाच रहे हैं।पिताजी को जब ये गीत सुनाया तो बेहद खुश हुए। वे लंबे अरसे
Dec 29 2009 11:49 AM
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ऐ ‘दाग़’ तुम तो बैठ गए एक आह में

कुछ फ़नकार ऐसे होते हैं जिनकी शरण हम बार-बार जाते हैं। ऐसे कलाकारों की मेरी फ़ेहरिस्त थोड़ी लंबी है। रफ़ी और तलत साहब इसी श्रेणी में आते हैं। जब ग़ज़लों की बात आती है तो उस्ताद मेहदी हसन साहब और फ़रीदा आपा भी ऐसे फ़नकार हैं जिनकी ओर जाने का बार-बार मन करता ह
Dec 29 2009 11:49 AM
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हीरे नी रांझा जोगी हो गया

ऐसा बिरले ही होता है कि हम यहां पर एक ही कलाकार को छोटे अंतराल पर दोबार लाएं, मगर कैलाश खेर के लिये मैनें अपवाद रख छोड़ा है। वह इसलिये क्योंकि एक कलाकार को या एक तरह के संगीत को भी मैं लगातार ज़्यादा दिनों तक नहीं सुनता, मगर यहां भी अपवाद बन गया है। पि
Dec 29 2009 11:49 AM
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चांन जैहे मुखड़े ते गिठ-गिठ लालियां

आसा सिंह मस्ताना को भले ही कई लोग नहीं जानते हों मगर इतना तय है कि जो गीत मेरे पास है उसे सबने कभी न कभी ज़रूर सुना होगा। अगर अपनी एक पूर्व-सहकर्मी को कोट करूं तो आसा सिंह "ब्लैक एंड वाइट गीत" गाने वाले गायक थे। मुझे तो उनकी आवाज़ कई बार रफ़ी साहब से मे
Dec 29 2009 11:49 AM
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शिव बटालवी - अज दिन चड्या तेरे रंग वरगा

शिव बटालवी कोई नया नाम नहीं है। हालांकि मैं पंजाबी नहीं समझता और आजतक शिव के गीतों का कोई अनुवाद भी मेरे हाथ नहीं पड़ा, मगर जो भी छुटपुट पढ़ पाया हूँ उससे इस कवि की महत्ता पता चलती है। पंजाब में शिव घरेलू नाम है और उनके गीतों को जगजीत, नुसरत, हंस राज ह
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नैहरवा

मुंबई में जो हुआ उससे दिल तो टूटा ही मगर उससे भी ज़्यादा तकलीफ़ अपने प्यारे नेताओं के ढंग देखकर हुई। मैं राजनीति से इस कदर दूर रहता हूँ कि उस बारे में पढ़ता तक नहीं हूँ, मगर इस मर्तबा पुलिस, एन एस जी और आतंकवादियों के बीच चल रही गोलाबारी के इतर जो देशभर
Dec 29 2009 11:49 AM
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बाइलेस दे ओरो

स्पेनी संगीत ने पन्द्रहवीं शताब्दी में गिटार के अविष्कार से लेकर आज तक एक लंबा सफ़र तय किया है और यह अनायास ही नहीं कि विश्वभर में जब लोकप्रिय संगीत की बात चलती है तो स्पेनी गीतों की चर्चा ज़रूर होती है और भाषा की दीवार भी अपने-आप ही पार हो जाती है। आज
Dec 29 2009 11:49 AM
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मन कुन्तो मौला

नुसरत साहब ने परंपरागत सूफ़ी गायकी से निकलकर इस विधा को जिस तरह से आमजन से जोड़ा, वह बेमिसाल था। वे पिछली सदी के चंद बेहद ज़रूरी और प्रभावी कलाकारों में से एक थे। उनका असमय जाना बेहद दुखद था। यदि वे जीवित होते तो हमारे पास कुछ और अच्छा संगीत होता। उनके
Dec 29 2009 11:49 AM
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गुलाब के खिलने तक

नाना मौस्कुरी का ज़िक्र यहाँ पहले भी हो चुका है और हमनें वादा भी किया था कि अगली बार उनका गाया "White Roses from Athens" aka " Weisse Rosen von Athens " सुनाया जाएगा। यह एक अद्भुत गीत है और बार बार सुनने का मन करता है। जर्मनी में १९६१ में ग्रीस के बार
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बानू का जाना

ब्लॉग पर मेरी उपस्थिति ना के बराबर चल रही है और इसी के चलते मुझे बानू के इंतेकाल के बारे में कबाड़खाना पर नज़र दौड़ते हुए काफ़ी देर से पता चला। अजीब ही सी बात है कि पिछली ही पोस्ट से इकबाल बानो का आगाज़ प्रत्येक वाणी पर हुआ था। जब मैंने उन्हें सुनना श
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लाजिम है कि हम भी देखेंगे

बरसों पहले इकबाल बानो की एक कैसेट एक दुकान पर दिखी। तबतक उनका नाम नहीं सुना था और खरीदने की एकमात्र वजह यह थी कि कैसेट मेरे बजट में थी और थोड़ी सी जिज्ञासा मेहदी हसन और फरीदा खानम के अलावा किसी और पाकिस्तानी गायक की ग़ज़ल सुनने की। जैसाकि हमेशा होता ह
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आए न बालम

अभी तक तो कोई भी शुद्ध शास्त्रीय संगीत पर आधारित पोस्ट इधर चस्पां नहीं की है। सो आज जो टटोलने लगा तो एकाएक नज़र बड़े गुलाम अली साहब पर पड़ी। ऐसा कलाकार हो तो क्या छोड़ा जाए और क्या चुना जाए इसका कोई मतलब नहीं रह जाता। वे चुनाव से ऊपर की चीज़ हो जाते है
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सुस्वरलक्ष्मी का आठवां सुर

दक्षिण में रहते हुए कर्णाटक संगीत मुझे बार-बार आकर्षित करता है, खासकर मंदिरों में बजता हुआ संगीत। अगर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत श्रृंगार प्रधान है तो कर्नाटक संगीत भक्ति प्रधान। ऐसा नहीं कि गोदावरी पार करने से पहले मेरा कभी कर्णाटक संगीत से साबका
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ख़ुद तेरी लागली

कुछ ख़ास नहीं... डेढ़ महीने की इस ब्लॉग से छुट्टी के बाद आज अचानक ही मैदान में उतर आया। दरअसल काम की व्यस्तता और कमर का दर्द एक ही रफ़्तार से बढ़ते रहे और ठीक से कुछ भी नहीं हो पा रहा था। अब भी कोई अन्तर नहीं पड़ा है मगर लगा दोस्त कहीं नाराज़ न हो जाएँ
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"आबार हाबेतो देखा" मन्ना दे के स्वर

मन्ना दे जी पर किसी फोरम में चर्चा चल रही थी। सवाल था कि क्या बॉलीवुड में मन्ना दादा की उपेक्षा हुई? कुछ लोगों का मानना था कि उनकी उपेक्षा हुई और कुछ का मानना था कि यह सही नहीं है। हलाँकि मेरा मानना है कि उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार गाने का मौका नह
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ख़ैर मिज़ाजे हुस्न की यारब

बेहद आसान से शब्दों में कैसे मानी भरे जाते हैं मलिका-ऐ-ग़ज़ल बेग़म अख़्तर से बेहतर कौन जानता होगा? जो कई बार सायास लगता है वह कितनी सहजता से बेग़म अख़्तर निभा लेती हैं इसका एक नमूना देखिये जिगर मुरादाबादी की इस अत्यन्त खूबसूरत ग़ज़ल में... नीचे पूरी ग़ज़ल
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ओरियंटल गीत का जादू

जैसे-जैसे पश्चिम से लोग आकर भारत में बसते गए, वैसे-वैसे यहाँ की संस्कृति में बहुत कुछ जुड़ता गया। संगीत को ही लें तो आज जो शास्त्रीय संगीत का या लोक संगीत का रूप है उसमें गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत सामंजस्य है। दूसरी ओर नौटंकियों और पारसी थियेटरों
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झुक-झुक देखें नयनवा

शास्त्रीय संगीत की समझ अनिवार्य है ऐसा हमें नहीं लगता। समझ हो तो माशा-अल्लाह, न हो तो भी ठीक। ऐसे कई लोगों से साबका पड़ा है जिन्हें समझ नहीं मगर वे उसका आनंद लेना जानते हैं. खैर हम यहाँ कोई शुद्ध शास्त्रीय संगीत नहीं लगा रहे, इसलिए यह चर्चा बेमानी है.