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अमृता प्रीतम की याद में.....

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10 Apr 2010
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Youtube par Amrita..

आज अचानक, youtube.com पर अमृता जी की कवितायें उनकी ही आवाज़ में सुनने को मिली। यहाँ link दे रही हूँ... अगर आप का भी सुनने को मन करे :अज्ज आखां वारिस शाह नुhttp://www.youtube.com/watch?v=tjogouj4kहिज्र दी इस रात
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एक आग रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती है

न जाने कितनी खामोशियाँ आपसे आवाज़ मांगती है न जाने कितने गुमनाम चेहरे आपसे पहचान मांगते हैं और एक आग आपकी रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती हैअमृता के लिखे यह लफ्ज़ वाकई उनके लिखे को सच कर देते हैं ...उनके अनुसार काया के किनारे टूटने लगते हैं सीमा में
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तूने मोहब्बत का योग लिया है योगी !

जिस काल में जल प्रलय आई थी ,दुनिया गर्क हो गयी थी ,उस तूफ़ान में जब जिस नूह ने एक किश्ती बना कर अपने कुछ लोगों को बचाया था और दुधिया पर्वत पर कायम किया था मीरदाद की कहानी वहीँ से शुरू होती है ....नूह ने इस दुनिया से जाने के वक़्त अपने बेटे को बुला कर कहा
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Mar 07 2010 12:31 PM
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मेरा दीन भी तू ,ईमान भी तू

राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई से आगे ...पैरों की कंकड़ी निकालती ,झाड़ियों का सहारा लेती जब मैं पहाड़ की चोटी के करीब पहुँच गयी तो ऊपर से आती चिरागों की रोशनी ने जैसे मेरा हाथ थाम लिया मैंने उसका सहारा लेते हुए छोटी पर कदम रखा तो सामने वही
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Feb 23 2010 11:58 AM
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राँझा -राँझा कहन्दी नि मैं आपे रांझा होई

जवानी आई रे मेरे बचपन के इस गांव में बातें उडती है इन बहती हुई हवाओं में वह ऊँचे ऊँचे पहाड़ों में घिरी हुई वादी थी ,जहाँ सूरज तेजी से उतर जाता है .लेकिन वहां अभी उसके सुर्ख रंग ने नदी के पानी में एक तिलस्म बिछाया हुआ था | देखा वादी के गांव की एक मासूम सी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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खुदा जाने -- उसने कैसी तलब पी थी

लोगों के मन का कोई रिश्ता नहीं होता |सिर्फ घडी दो घडी के लिए वे रिश्ते का भ्रम डालना चाहते हैं | इसलिए लोग चुप रहते हैं ...पर जब किसी को रिश्ते से डर लगता हो .तो ख़ामोशी इस डर को बढ़ा देती है ,इसलिए उसको बोलना पड़ता है ,डर को तोडना पड़ता है ..पर कई रिश्ते
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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ऐ खुदा ! मैंने अपनी नस्ल पर तेरा नाम लिखा है ...

कन्नड़ के एक माने हुए अदीब श्री शिवराम कारंत से जब किसी ने कहा कि अगर आप इजाजत दें ,तो मैं आपका ज़िन्दगी नामा लिखना चाहता हूँ तो उसी वक़्त कारंत हँस दिए कहने लगे भाई !तुम्हे मेरा कत्ल करने की क्या जरुरत है ,जबकि मैं खुद अपना कत्ल कर सकता हूँ ....दुनिया के
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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मैं आसमान बेच कर चाँद नहीं कमाती ....

सारा का पहला ख़त अमृता को १६ सितम्बर १९८० में मिला उस में लिखा था ...अमृता बाजी ! मेरे तमाम सूरज आपकेमेरे परिंदों की शाम भी चुरा ली गयी है !आज दुःख भी रूठ गया है कहते हैं ...फैसले कभी भी फासलों के सपुर्द मत करना !मैंने तो फासला आज तक नहीं देखायह कैसी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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एक थी सारा ...

मैंने आसमान से एक तारा टूटते हुए देखा है ... बहुत तेजी से .आसमान के जिहन में एक जलती हुई लकीर खेंचता हुआ ,,लोग कहते हैं तो सच ही कहते होंगे कि उन्होंने कई बार टूटे हुए तारों की गर्म राख जमीन पर गिरते देखी है मैंने भी उस तारे की गर्म राख अपने दिल के आ
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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एक घटना .....

तेरी यादें ... बहुत दिन बीते जलावतन हुई जियीं की मरी ---कुछ पता नही | सिर्फ़ एक बार --एक घटना घटी ख्यालों की रात बड़ी गहरी थी और इतनी स्तब्ध थी कि पत्ता भी हिले तो बरसों के कान चौंकते | फ़िर तीन बार लगा जैसे कोई छाती का द्वार खटखटाता और दबे पांव छत पर
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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डेढ़ घंटे की मुलाक़ात

अमृता की कवितायेँ खुद में एक कहानी है ,एक एक लफ्ज़ अपनी बात इस तरह से कहता है जैसे ज़िन्दगी का एक सच मुकम्मल रूप से सच है ..और हर बार उनका लिखा कोई न कोई नया अर्थ दे जाता है ...आज इसी श्रृंखला में उनकी एक और कविता . .डेढ़ घंटे की मुलाकात ..जैसे ज़िन्
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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सब चोरियाँ मुबारक !

रात का शिकवा कि दिन जाने को था मेरी दहलीज पार कर मुट्ठी भर सितारे चुरा कर ले गया दिन का शिकवा कि रात जाने को थी मेरी दहलीज पार कर के मुट्ठी भर किरणें चुरा कर ले गयी होंठ चांदी के कटोरे थे मिसरी का एक टुकडा घोल कर -- फिर रात मुस्कराई और दिन हँस दिया स
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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सच और झूठ के बीच ---- कुछ जगह खाली है ....

नग्न आकाश के नीचे -मैं कितनी ही देर---तन के मेह में भीगती रही ,वह कितनी ही देरतन के मेह में गलता रहाफिर बरसों के मोह को --एक जहर की तरह पी करउसने कांपते हाथों सेमेरा हाथ पकडा !चल ! क्षणों के सिर परएक छत डालेंवह देख !परे --सामने ,उधरसच और झूठ के बीच
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Sep 17 2009 06:16 PM
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और वही मैं हूँ --और वही महक है ...अमृता के जन्मदिन पर

हर कोई कह रहा हैकि वह नही रही मैं कहता हूँवह है कोई सबूत?मैं हूँ अगर वह न होतीतो मैं भी न होता ....इमरोज़...इमरोज़ के इन्ही लफ्जों का सच ही सबसे बड़ा सच है .,अमृता तो यही है .कहाँ वह दूर हो पायी है वो हमसे ...आज के दिन उनको याद करते हैं उन्ही के रूमानी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Aug 31 2009 10:46 AM
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और जब तूने पलट कर आवाज़ दी ...

एक असीम खमोशी थीजो सूखे पत्तों की तरह झरतीया यूँ ही किनारे की रेत की तरह घुलती ...पिछली पोस्ट में अमृता की कहानी का ज़िक्र था .उनकी कहानियाँ ज़िन्दगी के यथार्थ से बुनी हैं इस लिए दिल को छू जाती है और अपनी सी लगती हैं ...उनकी आज की कहानी पिघलती चट्टान
 
रंजना [रंजू भाटिया]
Aug 17 2009 11:54 AM
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ज़िन्दगी से सवाल करता एक ख़त ....

अमृता प्रीतम जी ने अनेक कहानियाँ लिखी है इन कहानियों में प्रतिबिम्बित हैं स्त्री पुरुष योग वियोग की मर्म कथा और परिवार ,समाज से दुखते नारी के दर्द के बोलते लफ्ज़ हैं ...कई कहानियाँ अपनी अमिट छाप दिल में छोड़ जाती है .....कुछ कहानियाँ अमृता जी ने खुद
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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उम्र की एक रात थी ,अरमान रह गए जागते

अमृता प्रीतम अपने सपनों पर बहुत विश्वास करती थी .क्यों कि उनके देखे सपने उन्हें कोई न कोई अर्थ दे जाते थे | उनके सपनो की व्यख्या समय समय पर ज्योतिष आचार्य श्री राज जी ने अमृता से मिलने पर की थी |उनके इन्हों सपनो का लेखा जोखा उनकी किताब सितारों के संक
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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प्यार के रिश्ते बने बनाए नहीं मिलते

तू सुगंध है सुगन्ध किसी की मल्कियत नहीं हुआ करती तू मेरी मल्कियत नहीं सुगंध एहसास के लिए हैं बाजुओं में उसकी कल्पना धोखा है अपने आप से धोखे में जीना खुद को कत्ल करना है मैंने खुद को कत्ल किया है मैंने हर पल जहर पीया है हर सोच में तू मेरी है सिर्फ मेर
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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प्रेम ही बंधन ...प्रेम ही मुक्ति

तूने इश्क भी किया तो कुछ इस तरह जैसे इश्क मेंह है और तुम्हे भीगने का डर है !" हर अतीत एक वो डायरी का पुराना पन्ना है ....जिस को हर दिल अजीज यदा कदा पलटता है और उदास हो जाता है .कई बार उस से कुछ लफ्ज़ छिटक कर यूँ बिखर जाते हैं ...कोई नाम उन में चमक जा
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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किताबें शिनाख्त नहीं बनती....

आज की कविता अमृता प्रीतम के आखिरी दिनों में लिखी गयी कविता में से हैं ...अमृता अपने सपनों पर बहुत विश्वास करती थी ,और उनके अर्थो में ज़िन्दगी के मायने तलाश लेती थी .. अपने देखे कई सपनों को उन्होंने नज्मों और कहानी में ढाल लिया ...हर सपना जैसे ज़िन्दग
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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एक "मैं "मेरा समकालीन नहीं

अमृता के लिखे ने हमेशा आम इंसान की भावनाओं ,वहां के माहौल को इस तरह से अपनी कलम से लिखा है कि हर किसी को वह अपने ही घर की .... कहानी लगती है ...वह परिवार मध्यवर्गी हो या चाहे है सिर्फ़ हर किसी को उस में अपना ही अक्स नजर आता है ...उनके उपन्यास एक खाली
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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कई सवाल सदियों से हवा में खड़े हुए हैं....

पिछली कड़ी में " कलम मेरी कुम्हारिन हुई " में कुछ अमृता जी कि लिखी पंक्तियाँ जो मुझे विशेष रूप से पसंद है वह मैंने वहां पोस्ट की ,पर देखा हर किसी को किसी न किसी पंक्ति ने छुआ ,अमृता का लिखा यही असर करता है ,कि व्यक्ति विशेष अपने आस पास खुद को उसी से ज
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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कलम मेरी कुम्हारिन हुई ......

अक्ल इल्म की माटी भीगी कलम मेरी कुम्हारिन हुई गीत जिस तरह जाम ,चाक से ---- अभी अभी हो गये हो उतारे ... दिल की भट्ठी आग जलाई दोनों हाथ उम्र खर्च कर एक शराब हज़ार - आताशा महफ़िल में हम ले कर आये सदियों ने निश्वास लिया इक कैसा शाप दिया है हमको जीवन बाला र
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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नज्म और आवाज़ का जादू ..गुलजार -अमृता

तेरी नज्म से गुजरते वक्त खदशा रहता है पांव रख रहा हूँ जैसे ,गीली लैंडस्केप पर इमरोज़ के तेरी नज्म से इमेज उभरती है ब्रश से रंग टपकने लगता है वो अपने कोरे कैनवास पर नज्में लिखता है , तुम अपने कागजों पर नज्में पेंट करती हो -गुलजार अमृता की लिखी नज्म हो
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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मैं एक लोकगीत जिसको नाम की जरुरत नही पड़ी...

उमा त्रिलोक द्वारा लिखी"अमृता -इमरोज़"किताब की समीक्षा उमा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इस लिए अच्छा नही लगा कि यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली अमृता के बारे में लिखी हुई है ..बल्कि या मेरे इस लिए भी ख़ास है कि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अ
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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दहलीज पर खड़ा इंसान ....

दोस्त ! तुमने ख़त तो लिखा था पर दुनिया की मार्फत डाला और दोस्त ! मोहब्बत का ख़त जो धरती के माप का होता है जो अम्बर के माप का होता है वह दुनिया वालों से पकड़ कर एक कौम जितना क़तर डाला कौम के नाप का कर डाला और फिर शहर में चर्चा हुई वह तेरा ख़त जो मेरे न
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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ज़राबख्तर

मैंने दोस्ती का ज़राबख्तर पहन लिया है और नंगे बदन को अब कुछ नहीं छूता न दुश्मन का हाथ छूता है न मेरे दोस्त की बाहें मैंने दोस्ती का ज़राबख्तर लिया है मैं खुश हूँ , पर आप क्यों पूछते हैं कि कुछ खुशियाँ इतनी उदास क्यों होती है ? अभी कुछ उड़ती चिडियाँ म
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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कुछ खुशियाँ इतनी उदास क्यों होती है ?

मैंने दोस्ती का जराबख्तर पहन लिया है और नंगे बदन को अब कुछ नहीं छूता न दुश्मन का हाथ छूता है न मेरे दोस्त की बाहें मैंने दोस्ती का जराबख्तर पहन लिया है मैं खुश हूँ पर आप क्यों पूछते हैं कि कुछ खुशियाँ इतनी उदास क्यों होती है ? अमृता ने एक जगह लिखा है
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तेरी जगह जुबान पर अब उसका नाम आया है

अमृता जी अपने सपनों पर और कुदरत की शक्तियों पर यकीन रखती थी ..यह आभास उनकी ही लिखी हुई कई किताबों को पढ़ कर होता है ..इसी कड़ी इस जिस किताब से पिछली पोस्ट को मैंने लिखा उस किताब का नाम है अनंत नाम जिज्ञासा .उनका मानना था कि न जाने किस किस काल के स्मरण
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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मेरा अश्वमेघ यज अधूरा है ..अधूरा रहे !

अमृता की आत्मकथा रसीदी टिकट में एक वाकया है कि किसी ने एक एक बार उनका हाथ देख कर कहा कि धन की रेखा बहुत अच्छी है और इमरोज़ का हाथ देख कर कहा की धन की रेखा बहुत मद्धम है .इस पर अमृता हंस दी और उन्होंने कहा की कोई बात नहीं हम दोनों मिल कर एक ही रेखा से
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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इमरोज़ के रंगों और लफ्जों की होली

रंग ... रंगों के साथ खेलते खेलते मैं भी रंग हो गया हूँ कुछ बनने न बनने से बेपरवाह ,बेफिक्र ... होली .. रंग - रंग खेलने के लिए हम तीन इकट्ठे हुए थे -- रंग ख्याल और मैं हमने अपने अपने रंगों से अपने अपने दोनों हाथ भर लिए और खेल शुरू हो गया पहले रंगों ने
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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रंग और लफ्जों का खेल

जब अपने पास सिर्फ एक शाम होती थी हर शाम हम मिलते थे और छोटी सी इस शाम के मद्धिम हो रहे रंगों में चुपचाप एक दूसरे को देखते चलते रहते ..चलते रहते और अपनी शाम पार कर लेते ... फिर वक़्त आया अपनी शाम अपनी उम्र जितनी हो गयी और अपने आंगन में हर रोज़ सुबह के
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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पल पल मोहब्बत जी रही ..ज़िन्दगी के आईने में .....

इमरोज़ चित्रकार मेरे सामने ईजल पर एक कैनवस पड़ा है कुछ इस तरह लगता है -- कि कैनवस पर लगा लाल रंग का एक टुकडा एक लाल कपड़ा बनकर हिलता है और हर इंसान के अन्दर का पशु एक सींग उठाता है सींग तनता है -- और हर कूचा - गली - बाजार एक रिंग बनता है मेरे पंजाबी र
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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यह कर्ण और कविता का जन्म है ...

अचानक --एक कागज आगे सरकता है उसके कांपते हुए हाथो को देखता है एक अंग जलता है ,एक अंग पिघलता है उसे एक अजनबी गंध आती है और उसका हाथ बदन में उतर आई लकीरों को छूता है .. हाथ रुकता है बदन सिसकता है एक लम्बी लकीर टूटती सी लगती है फ़िर जन्म और मौत की दोहरी
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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एक सपना नींद ने बाँहों में भर लिया

वनमहोत्सव यानी पेडों का जश्न .... अमृता ने मास्को में उस वक्त देखा ,जब वह मास्को हवाई अड्डे से शहर की और आ रही थी तब ...यहाँ चालीस किलोमीटर लम्बी राह पर जैसे कोई मेला लगा हुआ था ...लोग हाथो में कुदाली और बेलचे पकड़े मोटरों में से उतर रहे थे ....जवान
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तू जब गीत पढ़ती है....

तू जब गीत पढ़ती है दिल का सूरज इस तरह दिखता जैसे भरी दोपहर को गीतों की आवाज़ इस तरह लगती जैसे गंगा की लहर जैसे बैजू का नगमा पीड़ा अपनी बाहों में लेती है तेरे हुनर का इक तारा बजता है और तेरी मोहब्बत गाती है तेरी दो आँखे इस तरह जैसे ख्यालों के दो चश्मे
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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अमृता जी का एक खूबसूरत उपन्यास - आक के पत्ते

अमृता जी के उपन्यास तथा कहानियां भी जैसे कविता की तरह हैं। अपनी कहनियों और उपन्यासों में अमृता जी ने बहुत से सामाजिक मुद्दे बड़ी शिद्दत के साथ उठाये हैं। आज आप को उनके उपन्यास "आक के पत्ते" का एक अंश पढ़वाते हैं। आक के पत्ते कहानी है उर्मी की
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अमृता प्रीतम की कुछ अमर नज़्में

एक मुलाकात मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था……फिर समुन्द्र को खुदा जाने क्या ख्याल आया उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी मेरे हाथों में थमाई और हंस कर कुछ दूर हो गया हैरान थी…. पर उसका चमत्कार ले लिया प
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तूने लिखा था में आऊंगा ,देशो की सरहदे लाँघ कर

मेरे प्यारे नवराज -कंदला! आज मैंने सतलानाबाद में एक इस तरह का स्कूल देखा है कि उसके बारे में तुम्हे लिखने का मन हो आया है ...इस स्कूल का नाम है लेनिन बोर्डिंग स्कूल ....१६० एकड़ जमीन में इस स्कूल की ईमारत बगीचा झील और खेत है ...पढने के कमरे और उनके बर
 
रंजना [रंजू भाटिया]
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तू अपनी पिटारी में ,मेरी लाख दुआएं रख ले

अमृता के ख़त हो या उसकी नज्म ..पढ़ते जाओ तो एक इबादत बनती जाती है ..इस किताब खिड़कियों में जैसे जैसे मैं अमृता के खतों को पढ़ती गई ..वैसे वैसे ख़ुद को एक बच्ची समझती गई जैसे अमृता ने यह ख़त मुझे लिखे हों ...:) हर ख़त अपने में एक कहानी कहता है और नई ब
 
रंजना [रंजू भाटिया]