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17 Jun 2010
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एक सपनाः इच्छाधारी हाथी

मैं अपने घरवालों के साथ किसी जंगल में हूं . हम सब सोने की तैयारी में हैं। मुझसे कहा गया कि सारे खिड़की-दरवाजे बंद कर लो, ये जंगल हाथियों से भरा पड़ा है। वो किसी भी वक्त हम पर हमला कर सकते हैं।..मुझे डर लगने लगा। मैं सबसे अंदर वाले कमरे में जाकर सो गया।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Jun 05 2010 03:43 PM
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आतंक की दस्तक

क्या हुआ जोसियासी मेंढक नहीं टर्राया इस बार,क्या हुआ जोबादलों का रंग काला नहीं पड़ा इस बार,लहू की बारिश होगी इस बार भी खूब,बारुदी फसलें खूब लहलहाएंगी इस बार,आतंक के मॉनसून ने दे दी है दस्तकलेकिन कोई काट नहीं पाएगा अबकी बार !
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Jun 01 2010 08:53 PM
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चले गए सब !

जिन्हें गाना थावो गाकर चले गए,जिन्हें नाचना थावो चले गए नचाकर,हो गया सब गाना-बजानाचले गए सबअपना-अपना रोल निभाकरचेहरे पर नए-नए चेहरे लगाकररंग-पुते नकली चेहरों सेकातिल मुस्कान बिखेरकरचले गए सब,चले गए तालियां पीटने वाले भीअब तू भी दफा हो जा रो- गाकरकुछ बाकी
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Jun 01 2010 07:56 PM
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एक भयंकर कविता

गूंगों ने गाया गानाबहरों ने सुनकर मारी सीटी,लंगड़ों ने दिखाया नाचअंधों ने किया वाह-वाह,मुर्दों ने सुनाए लतीफेलूलों ने खूब बजाई तालियां,लोकतंत्र के अजब मंच परनेताओं ने क्या खूब की नौटंकी !
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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'माला'वती की जय हो !

नोट पे नोट...हजार-हजार के हों या सौ-दो सौ के....नोटों की माया...नोटों की माला....हर तरफ माया की माया...हर तरफ मायाजाल....और महामाया अपनी माया को किसी भी कीमत टूटता हुआ नहीं देख सकती...5 करोड़ की माला पर इतना बवाल हुआ...इनकम टैक्स की जांच बैठ
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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क्या ये सेना तैयार है ?

अभी जंग का ऐलान नहीं हुआ। अभी कहीं भी युद्ध का शंख नहीं सुनाई दिया, लेकिन चोला बदल रही भगवा पार्टी ने खड़ी कर दी अपने नए महारथियों की फौज। सेनापति (अध्यक्ष) नितिन गडकरी, 11 उप-सेनापति (उपाध्यक्ष), 10 सिपहसालार (महासचिव), 15 छोटे सिपहसालार (सचिव), 6 दूत
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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का करिहें नेताइन ?

देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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का करिहें नेताइन ?

देश की आधी आबादी की चिंता सबको है सरकार को, विपक्ष को, महिला आयोग को और नारी हितों की झंडाबरदार उन तमाम संगठनों को भी जो आए दिन जंतर-मंतर पर अपनी तख्तियों के साथ पहुंच जाते हैं और चिलचिलाती धूप में भूखे-प्यासे रहकर वो सारे काम करते हैं जो ये साबित कर दे
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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कुर्सी का मोह या राष्ट्रगान का अपमान ?

ये तस्वीर है पटना में किसी फंक्शन की। ई-मेल के जरिए मिली। समारोह में राष्ट्रगान चल रहा है सभी लोग राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े हो गए हैं लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अपनी पत्नी राबड़ी देवी के साथ बैठे कोई कागज पढ़ने में मशगूल हैं। ये कुर्सी का
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Feb 17 2010 10:22 PM
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बिक रहा बापू का घर

इन तस्वीरों को देखने से शायद ये नहीं लगता कि कभी इस घर में महात्मा गांधी जैसा ‘नंगा फकीर’ भी रहा होगा, लेकिन हकीकत यही है। बात केवल इतनी ही होती तो कुछ गनीमत थी, लेकिन चौकाने वाली बात तो ये है कि इस घर की नीलामी हो रही है। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी ज
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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पहली अंगड़ाई से लेकर आखिरी जम्हाई तक...

सुबह की पहली अंगड़ाई से लेकर रात की आखिरी जम्हाई तक सपने को हकीकत समझ हर आदमी सोता है एक कुंभकर्णी नींद, ढोल-नगाड़े बजते रहते हैं जिनकी जहरीली धुनों पर नाचता जाता है वो नींद में ही, मदारी के बंदर की तरह, खतरनाक बम धमाकों की आतिशबाजी और उसके बाद फैले
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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ये साजिश है या कुछ और...?

खामोश हो गई है मुर्गे की बांग, अब सुनाई नहीं देती सुबह की अजान, सूरज भी अलसाता है अब चेहरा दिखाने से, मंदिर में भजन भी अब होने लगे हैं देर से, सब हो गए हैं किसी की साजिश के शिकार।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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तोड़-फोड़-बंद-आंदोलन-तूफान

छात्र-संघ की बहाली नेताओँ की खुशहाली प्रचार, शोर-शराबे धमाके, फूल-मालाएं भाषण, नामांकन चलिए मतदान कर आइए जीप तैयार है। छात्र-संघ गठित शपथ, महोत्सव, प्रतियोगिताएं आंदोलन तेज... छात्र-हित की अनदेखी ''नहीं सहेंगे-नहीं सहेंगे'' तोड़-फोड़ नाराजगी धरना-प्र
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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कविता-कहानी-मन की परेशानी

मुझे नहीं पता 'छंद' क्या है 'अलंकार' क्या होता है 'कविता' किसे कहते हैं 'कहानी' क्या बला है, मन की भावनाएं जब मस्तिष्क से विद्रोह करती क्रांति की उम्मीद में संगठित हो जाती हैं तो उन्हें व्यक्त करना जरूरी हो जाता है, लोग उसे कविता कह मजा ले लेते हैं।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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बहुत कुछ बदल गया है !

बहुत कुछ बदल गया है मेरा गांव मेरा जिला दुकानें बदल गई हैं प्रधान बदल गया है विधायक बदल गया है सांसद बदल गया है खेत बदल गए हैं स्कूल बदल गए हैं मंदिर बदल गए हैं मस्जिद बदल गए हैं .... पर नहीं बदला है मेरा घर वहां आज भी मेरे मां-बाप रहते हैं और हमेशा
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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रुपिया-पैसा-जिन्दाबाद !

माइक से अटक-अटक कर चिल्लाता लोकतंत्र खींच रहा था लोगों को अपनी ओर और बदलता जा रहा था भीड़तंत्र में, बच्चों की किलकारियों के बीच तालियों का शोर दबता जा रहा था, जनता के मुंह से निकलता 'वाह-वाह' 'आह-आह' में प्रतिध्वनित हो रहा था, 'ब्रेक' के दौरान बंटती
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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छिपकली की टिक-टिक...

एक बड़े कमरे में नीरवता की साथी एकमात्र टिक-टिक...घड़ी की और दीवार पर रेंगती अपने शिकार की ताक में बैठी छिपकली की, अब केवल घड़ी की- टिक-टिक,... खामोशी... और उसने शिकार को दबोच लिया, कीड़ा छटपटाया-चिल्लाया- बर्र-बरर्र-बररर्र...फर्र-फरर्र-फररर्र....की
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Dec 29 2009 11:43 AM
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विश्वामित्र ने बनाया था डायनासोर

विश्वामित्र की सृष्टि से जन्म हुआ था डायनासोर का...जी हां, सुनने में ये बात बेहद अजीब लग रही है....लेकिन ये दावा है एक सिद्धसंत का...हिमाचल प्रदेश में कूलू जिले के महायोगी सत्येन्द्र नाथ ने ये दावा किया है कि हिमालय में एक लाख साल पहले डायनासोर और इस
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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चुभन

दर्द जज्ब है आंखों से सीने में मेरेवक्त फिर भी मजाक करता हैहजारों कोशिशें करता हूं भुलाने की मगरमेरा जमीर रह-रहकर सवाल करता है,धंसा खंजर गवाही देता हैमसला कत्ल का है दिखाई देता हैमगर साबित कौन करेगासाजिशों के शिकंजों से लड़कर सच कोआज भी सच भी डरा-डरा
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
टैग: कविता
Aug 08 2009 11:40 PM
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ये प्यास है बड़ी.....!

''ऐ...ऐ'' ''...???...!!!!'' ''ऐ....ओ............मुझे भी चाहिए......मैं भी पिऊंगा.......!'' कानों में पड़ी ये मासूम आवाज एक बच्चे की थी....अपने कॉलेज के सामने खड़ा विकी गटागट कोल्ड ड्रिंक गटक रहा था....कि तभी इस बच्चे की आवाज से वो हड़बडा़ गया...वो बच्चा
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Aug 08 2009 05:00 PM
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बारुदी सुरंग से गुजरता लोकतंत्र

बारुदी सुरंग से गुजरतालोकतंत्रचिल्ला रहा है माइक पर -"आओ मेरे पीछे चले आओविकास के पथ परआगे बढ़ने के लिए....!"(२० फरवरी २००५ को लिखी थी मैंने...)
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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कैसे बना रहूं मैं अच्छा इंसान !

बहुत मुश्किल हैएक इंसान काइंसान बने रहना,उससे भी ज्यादा मुश्किल हैएक अच्छे इंसान काअच्छा इंसान बने रहना,अगर कुछ मुश्किल नहींतो बसएक इंसान काहैवान बनना,और दुनिया फिलहालइसी आखिरी मुश्किल कोऔर भी आसान करने मेंजी-जान से जुट गई है।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Aug 04 2009 08:11 PM
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लव आजकल !

कल का लवआज कल चिंदी-चिंदी होकरबिखर गया हैकमबख्त इश्क की तरह,अब सारे कमीनेफ्लर्ट कर-करकेलाइफ पार्टनर कोडिच करने में जुट गए हैं,किसी अज्ञात का डरसता रहा है उन्हेंलेकिन फिर भीसब के सब किनारे खड़े होकरतलाश रहे हैं अपना-अपना लकचिल्लाते हुएतमराज किलविस की
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Aug 04 2009 03:27 PM
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फिलहाल एक ब्रेक...!

कहते हैंइश्क में आदमीकरने लगता है शायरियांलेकिन यहां तोब्रेक-अप के बादसालों से खामोश पड़ेज्वालामुखी सेफूट पड़ा है कविताओं का लावा ।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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सिगरेट और लड़कियों की 'कशमकश'

१जितना खींचोउतनी छोटी होती जाती है।२पियो तो परेशानीना पियो तो परेशानी।३गर्ल फ्रेंड भी ऐसी ही होती हैंचाह कर भी नहीं छोड़ सकते।४सिगरेट का धुंआ पीने वाले की नाक से पहलेलड़कियों की नाक तक पहुंच जाता है।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Aug 01 2009 04:12 PM
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क्यूं बीता जाए बैरी सावन !

चैत्र बीतासमझ में आयाइश्क परवान चढ़ानकली होली के मराठी-बंगाली रंग में,बैसाख बीतासमझ में आयाचेचक के हजारों दानों की तरहझूठी मोहब्बत का महल भीझड़ गया,जेठ-आसाढ़ बह गयापसीने, गुस्से और आंसुओं की बाढ़ में,लेकिन अबबीता जा रहा है सावनऔर कुछ भीनहीं आ रहा समझ
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
Aug 01 2009 10:44 AM
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काव्यात्माओं का सृजनशील तांडव

उस शहर मेंमुझेमिली चंद काव्यात्माएंबौद्धिकता की स्वच्छ चादर में लिपटीछंद, अलंकार, रस की मर्मज्ञ,परिष्कृत भाषा केआदर्श प्रतिमानव्यक्त करते थे उनकेविचारों को,मेरे पल्ले पड़ा बहुत कमऔरों से पूछा-उन्हें 'अर्थ' समझ नहीं आया था''बड़े ही उच्च विचार हैंजल्दी
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
टैग: कविता
Jul 26 2009 08:41 PM
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छोटी होती कविताएं

१जाओ !जा के कह दोउन खामोश बेताबियों से,तूफान के सही वक्त काइंतजार करें !२एक काली धुंधछा रही है आंखों के पास,सब कुछ दिख रहा हैसाफ-साफ, सच-सच,चश्मा पहन लो झूठ-फरेब कावरना आंख-हमेशाधुंधले को ही सच मानने लगेगी।३जलती हुई तीली कोमाचिस के पास न आने दो,जलाकर खाक
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
टैग: कविता
Jul 26 2009 06:38 PM
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चांदनी में तूफान

हर रातज्वार आते रहते है,चांद फिर भी ठहराटुकुर-टुकुर देखताअपने कर्तव्य कीइतिश्री समझ लेता है,सुबह होने परचांदनी रात का छद्म अहसासदर्द बनकरसूरज की रोशनी मेंऔर भी बढ़ने लगता है,शायद तूफान का वक्तनजदीक आ रहा होता है।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
टैग: कविता
Jul 25 2009 04:35 PM
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मोबाइल चुर गया

उसका लॉज दो विरोधी खेमों में बंट गया था। उनमें से एक का नेता वो खुद था। कुछ ही दिनों पहले सार्वजनिक फोन के लिए चंदे को लेकर नोंक-झोंक हो गई थी, मार-पीट की नौबत आ गई थी। वो तो भला हो मकान मालिक का जो ऐन वक्त पर आ गया था और मामला ठंडा पड़ गया।उसका मकान
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
टैग: कहानी
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पृथ्वी का विरह-राग

ऐ सूर्य ! क्यों जला रहे हो इतना प्रचण्ड विरह है मुझसे अलग होने का या क्षोभ है अब तक ठंडा न हो पाने का, मैं न हटती तो शायद मुझे अब तक तुम राख का ढेर बना डालते झिंझोड़ते-झिंझोड़ते मेरा अस्तित्व अपने अग्निधूम में फूंक उड़ा डालते, तुम्हारे ही तो चक्कर का
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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एक पिल्ले की कहानी

एक दुबली-पतली कुतिया ने एक खूबसूरत पिल्ले को जन्म दिया। कुछ दिनों बाद वह बिना पूछे ही लोगों के घरों में आने-जाने लगा। लोग उसे तू...ह....तूह....कह पुचकारते, दुलारते लेकिन दहलीज के भीतर जाते ही दुरदुरा देते। किसी बच्चे का दूध जूठा कर देने पर 'मां' ने प
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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...और कितना कुचलोगे !!

सड़क के एक किनारे से दो पहिए की छोटी गाड़ी पर घिसटती मानवता जा रही थी उस पार, चार पहिए की बड़ी गाड़ी पर सवार बाजारुपन से कुचल गई फिर भी घिसटती रही अब गाड़ी पर नहीं सड़क की सतह से एकाकार हो रही थी बार-बार कुचली जाकर ।
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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काउंट डाउन बाइ कैलेन्डर

बड़ी-सी दीवार पर एक छोटा, फटे पन्नों वाला कैलेन्डर हर रोज जिंदगी की लंबाई एक दिन कम कर देता है, हम हर महीने पन्ने बदलते रह जाते हैं, एक अदृश्य तलवार काटती जाती है हमारे अस्तित्व को धीरे-धीरे...
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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हॉय बेबी...!!! यू आर टू हॉट...!!

आज फिर रास्ता चलते किसी ने सीटी नहीं बजायी आंख नहीं मारी किसी ने न कोई टकराया न हाथ ही दबाया ...यहां तक कि किसी ने उसके 'बॉडी' का नंबर तक नहीं पूछा 'हॉय बेबी' तक नहीं कहा किसी ने - घर आते वक्त उसका चेहरा उतरा हुआ था देर रात तक निहारती रही वो खुद को आ
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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खुश हो गए सारे के सारे गांडू !

तारीख ०२ जुलाई.....सुबह सुबह टीवी ऑन किया....ब्रेकिंग न्यूज चल रही थी...समलैंगिकता अब अपराध नहीं...दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकों को दे दी मान्यता...मन तो किया टीवी फोड़ दूं.....ऑफिस गया तो वहां का भी माहौल इस खबर से खासा प्रभावित था। हर बंदा दूसरे को
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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खो गया है दिल इन कविताओं की तरह....

माफ करना देखकर हुस्न तेरा ग़र हो जाऊं शायर-दीवाना तो माफ करना। बंधके खिंचा चला आऊं तेरे सदके पे बार-बार तो माफ करना। हो जाए ग़र इश्क तुझे हौले-हौले मुझसे तो माफ करना। उड़ जाए नींद रातों की तेरी ग़र मुझसे तो माफ करना। बेचैन है ये दिल-ए-नादां ग़र थाम ल
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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कहां गई मेरी कविताएँ....!

पिछले कई महीनों से कविताएँ लिखना बिल्कुल बंद है....अब तक जो लिखी हैं वो कम से कम ब्लॉग पर प्रकाशित कर दूं, यही सोचके लिख रहा हूं ) १ काश ! क्या कहूं क्या ना कहूं इस व्यथित उर की व्यथा, सोचता हूं काश ! मैं भ्रमर होता इठलाता फूलों के मुख पर कह देता मन
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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और जूते मारो....एक से कुछ नहीं होने वाला...तब तक मारो जब तक सुधर न जाएं...

जूता मारो स्सालों को....एक जूते से कुछ नहीं होने वाला, जूतों की माला पहना दो...ये सब के सब इसी लायक हैं...'' कुछ ऐसा ही कहना चाहते हैं सिख समुदाय के उत्तेजित लोग। और सरकार उनकी नाराजगी प्रेशर कुकर की तरह टाइटलर का टिकट काटकर कुछ देर के लिए निकाल देना
 
मिथिलेश श्रीवास्तव
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कटुआ कहने में खराबी का है भाई!

कटुआ कहने में खराबी क्या है भई....जो वो हैं वही तो कहा है वरुण गांधी....ये गाली कहां से हो गई जो न्यूज चैनलों पर इस शब्द के आने पर लंबी बीप लगा दी जा रही है, अरे जब किसी को डायन कहे जाने पर किसी को आपत्ति नहीं हुई.....किसी को काफिर कहे जाने पर आपत्ति
 
मिथिलेश श्रीवास्तव