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14 Jun 2010
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कविता का कठिन रास्ताइष्णु नागर हिंदी के ऐसे विरले रचनाकार हैं जिन्होंने रोजमर्रा जीवन की एकदम मामूली दिखने वाली चीजों, प्रसंगों को अपनी रचनाओं का विषय बनाया है। वह अपनी कविताओं की शुरुआत बहुत छोटी या साधारण बातों से करते हैं पर अचानक हमारा साक्षात्कार
 
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दस कविताएं : मनमोहन

नींद-----दक्षिण दिशा मेंगया है एक नीला घोड़ा बहुत घने मुलायम अयाल हैं और आँखें हैं गहरीकाली और सजलनंगी है उसकी पीठ पर्वतों से गुजरतावह दक्षिण दिशा केबादलों में दाखिलहो चुका है*** बारिश-------कपास के फूलों सेलदी नौकाओ कई कोनों से आओ और एक जगह इकट्ठी हो
 
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इतिहास का अंत

इतिहास की प्रवृत्ति है अपने को दुहराना, यह मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति है; इतिहास के अंत की घोषणाओं के बारे में ही यह बात सबसे ज़्यादा खरी है. न्यू टेस्टामेंट से लेकर हेगल तक ऐसे मृत्यु-सन्देश अनेकों बार जारी किये गए हैं. इतिहास के अंत की घोषणा फ़कत हमारे
 
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लौट आ, ओ धार!

लौट आ, ओ धार!टूट मत ओ साँझ के पत्थरहृदय पर।(मैं समय की एक लंबी आह!मौन लंबी आह!)लौट आ, ओ फूल की पंखडी!फिरफूल में लग जा।चूमता है धूल का फूलकोई, हाय!!***आज शमशेर जी का जन्मदिन है. उनकी यह तस्वीर जापान के क्योटो से लक्ष्मीधर मालवीय से वाया असद ज़ैदी प्राप्त
 
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कसाब के बहाने उन्माद का जश्न

अदालत ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी है। दुनिया ने भारतीय न्याय प्रक्रिया में मुल्क की डेमोक्रेसी को देखा जो मुल्क के बाहरी और भीतरी दुश्मनों को रास नहीं आती है। लेकिन मीडिया अदालत के फैसले का इंतज़ार करने के पक्ष में नहीं था।उसने फैसला आने से पहले ही
 
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नरेन्द्र जैन की तीन कविताएँ

(उनके नए संग्रह काला सफ़ेद में प्रविष्ट होता है से साभार) भाई-----दिवंगत बड़े भाई के लिएजहाँ तक छायाचित्र संबंधी समानता का प्रश्न हैबड़े भाई लगभग मुक्तिबोध जैसे दिखलायी देते थेचेहरे पर उभरी हड्डियाँ और तीखी नाकजीवन रहा दोनों का एक जैसा कारुणिकऔर विषमवह
 
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नरेन्द्र जैन के नये संग्रह से तीन कवितायेँ

भाई-----(दिवंगत बड़े भाई के लिय)जहाँ तक छायाचित्र संबंधी समानता का प्रश्न हैबड़े भाई लगभग मुक्तिबोध जैसे दिखलायी देते थेचेहरे पर उभरी हड्डियाँ और तीखी नाकजीवन रहा दोनों का एक जैसा कारुणिकऔर विषमवह एक प्रतीक जो आया कविता मेंजहाँ होता रहा पुनरावलोकन जीवन
 
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लाल्टू की एक कविता : हुसैन सागर

(दिल्ली से हैदराबाद लौटते हुए)नहीं शहर के उस हिस्से में जहाँ मुझे जाना है दंगा नहीं हुआ है।जहाँ हुआ है, ठीक ठीक किन कारणों से हुआ है, यह मुझे नहीं मालूमपर सोचता हूँ कि हुसैन सागर पर आज शाम कोई न जाएसागर के साथ हुसैन का जुड़ना हिंदुओं को नागवार लग सकता
 
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ਸਾਡੇ ਦਿਲ ਵਿਚ ਵਸਦੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ

ਸਾਡੇ ਦਿਲ ਵਿਚ ਵਸਦੇ ਹੁੰਦੇ ਸੀ, ਹੁਣ ਕਿਥੇ ਡੇਰਾ ਲਾਯਾ ਏ,ਸਾਡਾ ਪ੍ਯਾਰ ਤੂੰ ਬੇਸ਼ਕ, ਬੇਦਰਦੇ, ਬੇਕਦਰੇ ਜਾਣ ਗਵਾਯਾ ਏ...ਤੂੰ ਭਾਵੇਂ ਸਾਥੋਂ ਵਿਛੜ ਗਯੀਂ ਏ, ਪਰ ਦਿਲ ਚੋਣ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਨੀ ਜਾਣੀ,ਤੈਨੂੰ ਆਪਣੇ ਦਿਲ ਦੀ ਧੜਕਨ, ਸਾਹਾਂ ਦੇ ਵਾਂਗ ਵਸਾਯਾ ਏ...ਤੂੰ ਤੁਰ ਚਲੀ ਏ ਕਹਿ ਕੇ ਇਨਾ, ਨਾ ਮੇਰੇ ਰਾਹੇਂ ਪੈ
 
मानव मेहता
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हुसेन प्रकरण : क्या विष्णु खरे ने बूढ़े कन्धों से सेक्युलरिज्म का `भार` उतार फेंका?

विष्णु खरे को उनके `मित्र` ज़िद की हद तक सेक्युलर कवि-चिन्तक बताते रहे हैं। `लालटेन जलाना` समेत उनकी दो किताबें (कविता की) मैंने पढ़ी हैं और वाकई मुझ पर उनकी कई कविताओं का गहरा असर हुआ है। मसलन दिल्ली में मुसलमानों की हत्या के प्रसंग को लेकर उनकी एक कविता
 
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औरतों की कविताएँ : शुभा

1.औरतें----------औरतें मिट्टी के खिलौने बनाती हैंमिट्टी के चूल्हेऔर झाँपी बनाती हैंऔरतें मिट्टी से घर लीपती हैंमिट्टी के रंग के कपडे पहनती हैंऔर मिट्टी की तरह गहन होती हैंऔरतें इच्छाएं पैदा करती हैं औरज़मीन में गाड़ देती हैंऔरतों की इच्छाएंबहुत दिनों में
 
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ईश्वर लीला

(हरिभूमि अखबार की कतरन)
 
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क्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ

मेरे दस सिर हैंक्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ मेरे बीस हाथ हैंक्योंकि मैं एक मुसलमान हूँ मैंने सीता का अपहरण किया हैक्योंकि मैं एक मुसलमान हूँसोने की लंका मेरी राजधानी हैक्योंकि मैं एक मुसलमान हूँमुझे खाक में मिला दिया जाएगाक्योंकि मैं एक मुसलमान हूँलेकिन
 
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हुसैन की कूची से होली के रंग

होली मुबारक दोस्तो
 
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Feb 28 2010 06:44 PM
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हम शर्मिंदा हैं हुसैन

अखबार अभी कुछ देर पहले शाम को उठाया और सन्न रह गया. `द हिन्दू` की बोटम स्टोरी `M.F. Husain gets Qatar nationality` आपने तो सुबह ही देख ली होगी. जो हाल मेरा है, इस देश के महान सेक्युलर मूल्यों में विशवास रखने वाले हर नागरिक का होगा. कुछ नहीं सूझा,
 
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विष्णु नागर के नये संग्रह से चार कविताएँ

दो यात्राएँ------मैं एक यात्रा में एक और यात्रा करता हूँएक जगह से एक और जगह पहुँच जाता हूँ कुछ और लोगों से मिलकर कुछ और लोगों से मिलने चला जाता हूँकुछ और पहाड़ों, कुछ और नदियों को देख कुछ और ही पहाड़ोंकुछ और नदियों पर मुग्ध हो जाता हूँ इस यात्रा में मेरा
 
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Feb 24 2010 04:51 PM
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सच्ची रचनात्मक ख़ुशी बड़ी नेमत है : मनमोहन

एक लिखने वाले को असल इनाम ज़्यादातर अपने लिखने के अंदर ही उसे मिल जाया करता है। एक सच्ची रचनात्मक ख़ुशी, चाहे वह किसी तकलीफ में लिपटी क्यों न हो, एक बड़ी नेमत है- ख़ासकर हमारे इन वक़्तों में, जबकि वह दुर्लभ हो चली है और कम ही को और कभी-कभी ही नसीब हो
 
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लाल्टू की चार कविताएँ उनके नये संग्रह से

मिडिल स्कूलऊँची छतनीचे झुके सत्तर सिरतीस बाई तीस के कमरे मेंशहतीरें अँग्रेज़ी ज़माने कीकुछ सालों में टूट गिरेंगींसालों लिखे खतसरकारी अनुदानों की फाइलें बनेंगींजन्म लेते ही ये बच्चेउन खातों में दर्ज हो गएजिनमें इन जर्जर दीवारों जैसेदरारों भरे सपने हैंकोने
 
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प्रतिरोध का सिनेमा

फोटो 1- दास्तानगोई प्रस्तुत करते राणा प्रताप और उस्मान शेखफोटो 2- गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सईद मिर्ज़ा चार दिनों तक चलने वाला पांचवां गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल ४ फ़रवरी,२०१० के दिन समानांतर सिनेमा के अद्वितीय फ़िल्मकार सईद मिर्ज़ा द्वारा उदघाटन के साथ शुरु
 
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Feb 12 2010 09:29 AM
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ठेठ जीवन के उच्छलित स्त्रोतों के समीप \शिरीष कुमार मौर्य की कविता पर पंकज चतुर्वेदी

शिरीष कुमार मौर्य ने बहुत धीरज, गम्भीरता, संयम और निष्ठा से ऐसी कविता सम्भव की है, जिसमें जीवन-द्रव्य की सान्द्रता है और आत्मतत्व की उदात्तता। यह इस बदौलत कि एक ओर उसमें इस दुनिया से गहरा और निबिड़ प्यार है, दूसरी ओर साधारण इंसान के दुखों से प्रतिबद्ध
 
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अमीर ख़ुसरो की सोहबत

ऐ कि ज़बुत - ए - ताना ब हिंदू बरी हम ज़वी आमोज़ परस्तिश गरी Oh you, the one taunting Hindus on their idol worship; first learn from them how to worship हिंदुओं को बुतपरस्ती का ताना देने वाले! पहले इबादत करने का सलीक़ा उनसे सीख ले। --- दिलत बर गुर्बा ई गर
 
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किसी को क्या, मुल्क की आज़ादी के लिए लड़े थे शाहरुख़ के पिता

`द हिन्दू` में एक छोटा सा ख़त छपा है दिल्ली के त्रिलोचन सिंह जी का। स्वतंत्रता सेनानी हैं। उन्होंने शाहरुख़ खान के घर पर शिव सैनिकों के प्रदर्शन और खासतौर पर शाहरुख़ को पाकिस्तान जाने की नसीहत पर मुख़्तसर सी बात कही है जो किसी भी गैरतमंद हिन्दुस्तानी को
 
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आरएसएस और शिव सेना यानी दो आदमखोर

आरएसएस और शिव सेना `आमने-सामने` हैं। शिवसेना और संघ दोनों आदमखोर हैं, दोनों सदियों पुराने दोस्त हैं और एक-दूसरे के दांव-पेंच या कहें कि नूरा कुश्ती लड़ना बखूबी जानते हैं। देखा जाए तो शिवसेना जिस महाराष्ट्र की उपज है, आरएसएस भी वहीं की पैदाइश है। आरएसएस का
 
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`मार्क्स - जीवन और विचार`

दिल्ली में किताबों का मेला शुरू हो गया है। इसके कोर्पोरेटीकरण के बाद इसमें बिना पैसे वाले किताब के आशिकों का घुस पाना मुश्किल हो गया है, फिर भी ये ६-७ दिन नशे में डूबे रहने जैसे ही होते हैं। मगर यहाँ दूर कोच्ची में सिर्फ उदास ही हुआ जा सकता है सोचकर कि
 
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छोट बड़ो सब सम बसैं, हो रैदास प्रसन्न

जात पात के फेर में, उरझत हैं सब लोग!मानवता को खात है, रैदास जात का रोग!! ..... जात पात में जात है, ज्यों केलन में पातरैदास न माणुस जुड़ सके, जब तक जात न जात!! ..... ऐसा चाहौं राज मैं, जहां मिलै सबै को अन्न!छोट बड़ो सब सम बसैं, हो रैदास
 
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साहित्य अकादमी, सैमसंग की खैरात और साहित्यकार

इस देश की जनता के स्वाभिमान को नष्ट करने के नए नए कीर्तिमान बनाने वाली यूपीए सरकार ने फिर एक नया कारनामा किया। उसकी संस्कृति मंत्रालय ने बहुराष्ट्रीय उपभोक्ता उत्पाद कंपनी सैमसंग की खैरात बांटने के काम में देश की साहित्य अकादमी को ही लगा दिया। साहित्य
 
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सेक्युलर रिपब्लिक और उसकी चुनौतियाँ : सुभाष गाताड़े

इस `सेक्युलर रिपब्लिक` में साम्प्रदायिकता से लड़ने की चुनौती बहुत बड़ी है। उस समय (१९४७ में) बंटवारा हुआ, कत्लेआम हुआ पर फिर भी सेक्युलरिज्म को इस मुल्क की आत्मा से अलग नहीं किया जा सका था। तब लोगों में इतनी दूरियां पैदा नहीं की जा सकी थीं जितनी कि आज हैं।
 
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आईपीएल का संघीकरण?

इंडियन प्रीमियर लीग से पाकिस्तानी खिलाड़ियों को अलग कर दिया जाना बेहद तकलीफदेह है। पाकिस्तान टी-२० क्रिकेट का विश्व चैम्पियन है और इंडियन प्रीमियर लीग के मैच इसी फोर्मेट में खेले जाते हैं। अपने खराब से खराब दौर में भी पाकिस्तानी खिलाड़ी ऐसी स्थिति में कभी
 
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संघ की `संस्कृति`

अभी-अभी दिल्ली से एक दोस्त का मेल मिला जिससे पता चला कि दिल्ली विश्वविद्यालय केम्पस में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के गुंडों ने जनचेतना की बुक वेन पर हमला कर तोड़फोड़ की। संघ और उनकी तरह की ताकतें ऐसा अक्सर करती हैं। राष्ट्रभक्ति और संस्कृति का राग
 
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यह ऐसा समय है

भारत के मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक कुमार साहनी पिछले सप्ताह कोची में एक सेमिनार में हिस्सा लेने आये थे। चाय के वक़्त मैंने उनसे यों ही बतियाने की कोशिश की। मैं जानना चाहता था कि आखिर `माया दर्पण`, `क़स्बा` `तरंग` और ऐसी ही कई यादगार फिल्में दे चुका
 
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विष्णु नागर की एक कविता

मेरा जीवननाक की दिशा में दौड़ाता हैकान, आँखसिर, मुँहकुछ नहींनाक की दिशा में दौड़हाथ, पाँवपेट, पीठकुछ नहींनाक की दिशा में दौड़पीठ की दिशा में अन्धकार हैपेट की दिशा में दौड़मेरा जीवन कहता हैनाक की दिशा में दौड़मेरा जीवन कहता हैक्या करता है?नाक की दिशा में
 
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कृष्ण कल्पित की एक कविता - रेख़ते के बीज

रेख़ते के बीज(उर्दू-हिन्दी शब्दकोष पर एक लंबा पर अधूरा वाक्य)------------------------------------------------------एक दिन मैं दुनिया जहान की तमाम महान बातों महान साहित्य महान कलाओं से ऊब-उकताकर उर्दू-हिन्दी शब्दकोष उठाकर पढ़ने लगा जिसे उर्दू में लुग़त
 
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आदिवासीजन धरती को बचाने की लड़ाई के वॅनगार्ड हैं- ह्यूगो ब्लांको

साठ के दशक में पेरू की दमनकारी सामंती कृषि व्यवस्था के खिलाफ ह्यूगो ब्लांको ने किसानों के सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया. सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने पर उन्हें उम्र-क़ैद की सजा सुनाई गई- उनकी रिहाई के लिए चली अंतर्राष्ट्रीय मुहिम के फलस्वरूप उन्ह
 
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हिंदुस्तान अखबार द्वारा पत्रकारों के शोषण की मुहिम का विरोध करें

हिंदुस्तान टाइम्स समूह के दैनिक अखबार हिंदुस्तान में इन दिनों पत्रकारों से एक एग्रीमेंट पर ज़ोर-ज़बरदस्ती से हस्ताक्षर कराया जा रहा है जिसमें कहा गया है कि उनका मुख्य कार्य पत्रकारिता नहीं है बल्कि वे शौकिया अखबार को कुछ समाचार या रिपोर्ट देते हैं जिनक
 
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व्यथा के भार से थका नागरिक (रघुवीर सहाय पर मनमोहन) अंतिम किस्त

पिछली दो किस्तों से जारी) : रघुवीर सहाय के काव्य संसार में यह चीज बड़ी आश्वस्त करने वाली रही है कि यहाँ हम अपनी उन अनेक बनी-अधबनी चीजों को देखते हैं जिन पर अभी काम चल रहा है और जिनकी जगहें या शक्लें अंतिम रूप से तय नहीं हो गयी हैं। कई महाकवियों के यहा
 
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व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन) दूसरी किस्त

पिछली किस्त से जारी) इसी तरह यह बात भी गौरतलब है कि उन्होंने अपने समय के इस शीतयुद्धीय सुझाव को अमान्य कर दिया था कि `जनतांत्रिक मूल्यों` या `मानव-मूल्यों`, व्यक्ति और `अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता` को अपनी जाहिल और निजी निर्विघ्न दुनिया की ढाल बनाकर खड़
 
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व्यथा के भार से थका नागरिक /(रघुवीर सहाय पर मनमोहन)

मैं यह लेख कल ९ दिसंबर को सहाय जी के जन्मदिन पर देना चाहता था पर यह मुमकिन न हो पाया। सहाय जी पर यह संभवतः सबसे अच्छे आलोचनात्मक लेखों में से है। यह सहाय जी के निधन के बाद लिखा गया था और बाद में असद जैदी और विष्णु नागर द्वारा संपादित पुस्तक `रघुवीर स
 
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`व्यावहारिक` लोग न पढ़ें

मुझे उन तथाकथित व्यावहारिक लोगों की बुद्धि पर हंसी आती है, अगर कोई बैल बनना चाहे तभी वह मानवता की पीड़ाओं से मुंह मोड़कर अपनी ख़ुद की चमड़ी की रखवाली कर सकता है.' - मार्क्स
 
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`व्यावहारिक` लोग न पढ़ें

मुझे उन तथाकथित व्यावहारिक लोगों की बुद्धि पर हंसी आती है, अगर कोई बैल बनना चाहे तभी वह मानवता की पीड़ाओं से मुंह मोड़कर अपनी ख़ुद की चमड़ी की रखवाली कर सकता है.' - मार्क्स
 
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