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swati : रेगिस्तान में पड़ रही है बर्फ

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10 May 2010
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sirf maa ke liye

जीवन पल्लवित और परिष्कृत करने वाली माँ के लिए.....वात्सल्य का हर क्षणचम्पई सी मुस्कुराहटअनुपमित स्नेहऔर निवाए से हाथों नेसीखों का एक गुच्छा बना करमन पर सजाया है ,सजावट का अनुशासनबांधे है हर उदगारहर स्वप्न-सींचन...माँ की आंखों से आया है
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उन उलझी बूंदॊं कॊ ....

थका हुआ कॊकिल का जॊड़ा...... आ छुपा है नैनॊं में नैनॊं का सिमटा सा साहिल .....सट के है सॊया पड़ा उन उलझी बूंदॊं कॊ ....पलकॊं से निथार रहा है कि कभी तॊ सुलझेंगी गाँठें मरणासन्न मन की गही हर धुँए कॊ दबा यहीं पार जाएगा हर पॊखर औ पल-पल यूं छाया पली ......
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haiku-rang

हूक हिय की बरबस छलकीभीगी दुनिया
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क्या लौटेगा वसंत

नदी किनारे, घास पर पग सहलाता, बौद्ध मंदिर को स्वयं में समाए टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर डोलता-सा रायन, अपने स्वच्छंद चेहरे पर धूप का ताप लिए, मेरी ओर ही चला आ रहा था। अपने गेरुए चोंगे में, सर मुँडाए, रायन मुझे सदा से किसी ऐतिहासिक बौद्ध भिक्षु की भाँति ही
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गीत को तुम्हारे...........

गीत को तुम्हारे तरसता है जी ..... तुम्हारे उन नैनों के लिए जिन में बैठी हंसती मै लजीली उस लम्हे की डाली को झुकाता रहता है जी .... जो तुम्हारे स्पर्श से पुलके उस कौमुदी के बिखरे कणों को बिनता रहता है जी ...... बस पुराना जो ख्वाब लौटा सिर्फ़ तुम्हारे ल
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प्रकृति-वधु

दुग्ध की धारा काई का उबटन प्रकृति-वधु लाल सिंदूर शुभ चंदन-टीका आई प्रातः
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हाइकु और उनके नियम

पीले में लाली अग्नि में छिपी ठण्ड पलाश -पुष्प ओस की बूँद जग को दिखलाये जीवन -बिम्ब पिछली पोस्ट में जब मैंने एक हाइकु प्रकाशित की, तब मेरे पास बहुत सारी टिप्पणियां आई जिसमे सराहना भी खूब हुई......मै बस हाइकु के मुख्य नियम एक बार फिर दुहराना चाहूंगी ..
Dec 29 2009 11:44 AM
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हाइकु [त्रिपदम]

आंखों के पाखी लौट चले घरौंदा रुकी न रात
Dec 29 2009 11:44 AM
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पावस प्रात बिखरी पड़ी है ......

पावस प्रातः बिखरी पड़ी है..... ले सीली सी ताप औ हलकी सी भाप पावस प्रातः बिखरी पड़ी है ..... बादल से न बोलूं आज फिर छितराऊ रश्मि का राज नग -शिखर पर टिका कर कोहनी भोर-नवोढा विचर रही है झील -झील की बूँद-बूँद में पावस प्रातः निखरी पड़ी है ..... नील गगन का क
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एक और दुबई-रत्न.....सुन्दरता का स्पर्श

पहली बार जब ये चित्र देखा था तब मेरा भी मुंह ऐसे ही खुला रह गया था जैसे की अभी आप का खुला है.....ये है दुबई में तैयार हो रही ''dubai towers''जो की अगले वर्ष तक पूरी हो जायेगी ....और इस वृत्त में जो वो छोटा सा पानी का घेरा खुला रह गया है न.....वहीं बैठ कर
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हाइकु

जीवन-क्रम पानी की कहानी है......सूखा, सुनामी
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सिन्दूरी सिंगार..

सुबह की बाहों में लिपटी हुई मैं हर करवट पर मुस्काती बिखरे बालों में तुम्हारे ही पोर पाती सारा आकाश जड़ जाता तुम्हारे ही शब्दों से उन्ही शब्दों के पार हाथों में हाथ लिए भोर को नींद से जगाती ओस छिड़क कर पत्तों पर पेड़ों से नीरा छलकाती औ दूर उस छोटे मन्दिर
Aug 22 2009 01:47 AM
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शुभ हो स्वाधीनता का दिन

सभी देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की बधाई और मुझे सभी की ओर से जन्मदिन पर ढेर सारा प्यार ........स्वाति१५ अगस्त २००९
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venice में जब झांके नैन ......विमुग्ध हुई ,विह्सा मन

venice के जल के तीर पर बसी इमारतें ..... हर जल-गली के ओर पर हैं होटलें ........ venice के आस-पास हैं छोटे-छोटे द्वीप .... venice के सुप्रसिद्ध मास्क ....... जल-विचरण के लिए बनाया गया motor-boats के लिए water-station.......
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स्विट्जरलैंड में सपनीले दिन......भाग १

" अपटु विधाता जो धुनता रहा ...बादल थे या रुई के फाहे ,पारदर्शी फर्श पर गगन के धुन-धुन कर बिखराता रहा....हर तार की तन-तन झंकार पर बूँदें रही जनमती श्वेत फाहों के बीच ,मौसम और कलसा गया........" इसे गद्य कहूँ या पद्य ...............स्विट्जरलैंड के द्वितीय
Aug 12 2009 10:56 PM
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उन लफ्ज़ों को चूने दो.....

अधरों पर तुम्हारे जो तरसती रही सदा हर वो बात ....... जिसे नैनों ने तुम्हारे संजो रखा था ख़ुद में आज फिर ,चिर प्रत्याशा में हूक रहा है जी ........ उसी इक अनहुए स्पर्श के लिए कि इक बार अधरों से उन लफ्ज़ों को चूने दो........
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बूंदों की रुन-झुन

बूंदों की रुन-झुन औ गीले स्पर्श की गीली सी धुन .... सुमन का यौवन कि पंखुडी का कटाव इस द्वैत का समस्त भाव संपूर्ण रूप का ये इक छल हर उर बांधे....हर पल-पल.......
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सांझ की लाली

सांझ की लाली या लाली का आँचल हीरे जडी साड़ी कि राधा -हृदयांचल यहाँ 'लाली' शब्द में अलंकार के कारन पहली पंक्ति में ' लालिमा' और दूसरी पंक्ति में 'राधा' के अर्थ प्रयुक्त हुए हैं
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हर बूँद हर्षित

प्रिय में विलीन प्रिय को समर्पित न बूँद भर विरह बस.......हर बूँद हर्षित
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उनीनी आँखों का सपना बन.........

उनींदी आँखों का सपना बन तुम अब तक मेरी पलकों में उलझें हो.... हर सुबह मलती रही जग की धूप चुभती रही पर किरचें हैं कि धुलती नहीं नैनों में काजल का भ्रम बना हुआ है अब तक विरह की श्यामलता टिकी है बिछा हो ज्यों हर पथ औ इसी पथ पर प्रिय रुकी हुईं हूँ उसी मो
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उसी ढलान पर चढी थी मैं ............

उसी ढलान पर चढी थी मैं ...... प्रिय तुम्हे पाने की खातिर तनती रही , समतल सनी शीशे की सी बिछी रही और तुम थे उस ऊंचाई पर चांदनी की चाह ओढे झक रजत चन्द्रिका की शुभ्र प्रभा की रश्मियों से घिरे था यही विधि का नियम न पहुँचना था मुझे , न पहुँची मैं बस चलती
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प्रज्ज्वलित है पलाश आज

प्रज्ज्वलित है पलाश आज ..... फ़िर से उठी है उमस अलसाई सी घास निर्निमेष निहारती अरुण पुष्पों के कटाव पलाश का हर उतार - चढाव कच्चे कोपलों की अग्नि में ज्यों निष्ठुर का तप्त छल और हर अन्तर का पराग ज्यों प्रिय का चिर अनुराग प्रज्ज्वलित है पलाश आज ........
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अंतर्ज्ञान

तन की सीमाओं को जो जान पाती मैं फिर कभी न चाह करती तिनकों की ओक़ पर से ओस चुगने की ................. और मन के जो घेरें हैं असीमित खदेड़ते है मुझको वर्जित जग को पाने की खातिर ...........
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कृष्नायी राधा ज्यूँ

बन बन खोजे कृष्ण बियारी कित खोयी मोरी राधा प्यारी पुते हाथ, ले पिचकारी संग गुलाल काचौ,काचौ राग-रंग पछि-पछि देखे फूल पात सब कित छाई छोरी , दरस को रस पीत फूल बिच पीरी तितरी उस पर श्याम की पीली चुनरी ज्यों चंद्रदेव होड़ लगावे निज आभा संग चांदी छावे औ रा
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झीनी सी कोहरे की चादर

झीनी सी कोहरे की चादर सुबह-शिशु को गरमास ओढाये है शिशु के कपोलों की लाली छिपती नहीं है कम्बल में अरुणाई की मादकता सुमन-सौरभ के भार से लदी छलकी जाती है जग में और जग की निष्ठुर क्रीडा चल रही है अनवरत ...................
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बसंती हाइकु

सादा माखन संग मक्की की रोटी बसंती स्वाद पीत पराग हर पंखुडी पीली बसंत आयो सुन पुकार संग हवा की धार डोले सरसों नर्म किरण नर्म फूलों के गाल बसंती प्रातः इतने दिनों के अन्तराल के लिए क्षमा चाहती हूँ.........निरंतर लिखने का प्रयास जारी रखूंगी....
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जिस कोने में खड़ी हूँ मैं ........

जिस कोने में खड़ी हूँ मैं ..... यहाँ से तुम कुछ थके से हो यहाँ देखो एक बारी आओ सर में बादाम-तेल दाब दूँ गरम झुके से नैना तुम्हारे मेरी आँखों का सहारा पा लें छू लूँ तुम्हारे अधरों को ह्रदय तुम्हारा सागर बहा लें तुम्हारे हाथ ,खोज रहें हैं मेरी मुस्कान क
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उस पल की परीक्षा

उस पल की परीक्षा न हार न जीत जिसमें उस आस का अनुभव न मिलन न बिछोह जन्में बस रुका हुआ धुआं बसे रहे श्वासों में हर छाया की छाई पुती हो हाथों में अन्दर का शोर न बाँध पाए सीने में क्या बह निकली धारा रिसते मन के घावों से या टीस चुभी है आजीवन मरण की जो है
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हाइकु-प्रकृति

नील गगन पत्तों का झुरमुट खग-संसार वृक्ष की गोद टहनी का पलना पाखी चिहुंके पिछली पोस्ट पर भी जो टिप्पणियां मिली ,उनके लिए सभी को आभार........अनुपम जी का प्रयास भी बड़ा ही सुंदर रहा.....इस विधा में हम यदि थोडी मेहनत करें तो यह और भी खिल कर सामने आयेगी ;
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उस त्वेष का यौवन

निर्झर धारा की हर बूँद पर आच्छादित उदयाचल का पिघला सोना अपनी प्रभा पर स्वयं इठलाता प्रवाह में निज वेग के उमंग संग इतराता बलखाता शशि का सौजन्य झुठलाता किरण की फुनगी पर बैठ मधु-पर्क चख कर फिर नीचे,नग को ध्यान में लीन निहार रहा है ,मान रहा है निज को अज्
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सींच रही हूँ अब तक

कनखियों से निहारते तुम्हारे नैनों में मेरा घर , समय की शाख पर बहुत सूखा सा लम्हों के चिकने पात पर टिका नहीं बस मिटटी उड़ती रही और , कंटीली डालों पर सुमन-श्वास की आस सहारे मैं अब तक जड़ सींच रही हूँ......
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दार्जिलिंग --हरियाली के घेरे

जादुई कॊहरा फैला यूँ फिर-फिर,हर पल हर क्षण ,बन महक हवा में तिर -तिर,मन जाए रंगॊं से सन,गुनगुनाती धूप घिर-घिर,हौले से तापे जॊ तन,पराग-प्लावित पाँते जॊ गिर-गिर,बाँध जाए हठीले मन,घन की अमृत-बूँदे झिर-झिर,जाने कहाँ से सीख ये फन,लुटा कर कॊष सकल फिर फिर,ध
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सब कुछ खो जाता है.....

६ साल पहली लिखी हुई कविता.... पीले पत्तों के बीचआंखों के मीठे पाखी उदास होते हैतुम्हारी यादआहत कर जाती हैसब कुछ खो सा जाता हैमौसम कुहरा सा जाता हैपनीली आँखे छोटी हो जाती हैऔर फ़िर सिर्फ़ तुम होते होयादों मेंमैं सिमटती हूँ अपने आप मेंआंखों के आगे आँचल
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हरी है छाया तुम्हारी

हरित पातों से तुम ,यूँ घेर रखा है तुमने ,मेरे सारे पल , सारे क्षण ,छाल तुम्हारी ,छाया में तुम ,इतने हरे ,इतने शीतल ,पग तले इतने मखमल ...कि पीली उजास ,जले है मुझसे ,नीली शाम ,छुप गई आकर आँखों में ...माटी के पैरों में ,तुमने रत्न उढ़ेल दिए हैं ,देखो, सा