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14 Jun 2010
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लिखना मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन......

जवाब तो मुझे देना था इसलिए सोचा जिस तरह उसे पसंद है वैसे ही जवाब दूं। किसी के ख़त या आजकी जुबान में कहूँ तो मेल इतना परेशां भी कर सकते हैं या यूं कहूँ कि उन में इतनी ताकत हो कि वो परेशान कर सकें, किसी को वाकई सोचने पर मजबूर कर सकें। इस हद तक कि उसे अपना
 
rakhshanda
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सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो.......

एक बार कहीं पढ़ा था, 'मुहब्बत दुनिया के सारे मसलों का हल है'ईमानदारी से सोचिये क्या ये सच नहीं है मैं कहती हूँ अगर ये सच नहीं है तो इस दुनिया में कुछ भी सच नहीं है।मुहब्बत और सिर्फ मुहब्बत दुनिया के हर मसले का हल है.जब जब इंसान इस जज्बे से दूर हुआ है उस
 
rakhshanda
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ज्योति बाबू.....यू आर इन माई हार्ट.....

उम्मीद तो ख़ामोशी से अपना दामन समेटे कब की जा चुकी थी. फिर भी एक आस जो दिल के गोशे में कहीं सिमटी हुयी थी, आज खामोशी से दम तोड़ गयी. इंसान कितना मजबूर हो जाता है कुदरत के आगे, चुपचाप उसके दिए हुए हर गम कुबूल कर लेना मजबूरी ही तो है.दिल तो सुबह से उदास था,
 
rakhshanda
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ऐ नए साल बता , तुझ में नयापन क्या है ?

अपने ही घर आते हुए जाने क्यों इतनी झिझक हो रही है, वही घर वाही लोग वहीदोस्त पता नहीं कहाँ , क्या नया है? लेकिन फिर भी आज दिल चाहा , अपने दोस्तों के नज़दीक जाने का, और देख लीजिये, हम आगये,दूरी क्यों रही, ये वजह ना ही पूछें तो अच्छा है. कुछ अपना चेहरा नज़र
 
rakhshanda
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सारे त्योहारों की ज़िम्मेदारी हमारे ही जिम्मे क्यों?

रमजान में अफ्तार करने के बाद आराम करने को दिल चाहता है. होता ये है कि दिन भर खाली पेट में जब गिजा (खाना) जाती है तो जिस्म में सनसनाहट पैदा होती है और थोडी गुनूदगी (नींद जैसी) कैफियत पैदा होजाती है. ज़ाहिर सी बात है, ऐसे में सब में ही आराम की ख्वाहिश ज
 
rakhshanda
Dec 29 2009 11:49 AM
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आई है ईद, लेकर उदासियाँ कितनी....

रात मुंबई से फायेज़ा (मेरी कजिन)का फ़ोन आया, चहकते हुए पूछ रही थी कि मेरी ईद की तैयारियां कहाँ तक पहुंचीं , मेरा जवाब सुनने से पहले ही मोहतरमा शुरू हो गयीं अपनी बातें लेकर..’ ’ पता है मैंने इस बार अपनी ड्रेसिंग की तैयारी एकदम अलग तरह से की है , आफ व्ह
 
rakhshanda
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चुप की दहलीज़ पे ठहरा है कोई सन्नाटा

सारा दिन छाजों मेंह बरसता रहा. मौसम एकदम अभी से खुनक(सर्द) होने लगा है. सर्द मौसम की आमद का पैगाम देती ये बारिशें एक अजीब सी उदासी का तास्सिर देती हैं. सब सो चुके हैं लेकिन उसे नींद नही आरही है. दिल की उदासी जब हद से ज़्यादा बढ़ने लगी तो वो कमरे से ब
 
rakhshanda
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वो इक सवाल बड़ा ही अजीब था उसका.....

इक छोटी सी इल्तेजा है, इस पोस्ट को पूरी पढने के बाद ही अपनी राय का इज़हार करें } समाज ने हमेशा अपने उसूलों में औरत और मर्द के लिए वाजेह(स्पष्ट) फर्क रखा. हर मज़हब ने अपने उसूलों में हमेशा मर्दों को रियायत दी है वहीँ ओरतों के मामले में सख्ती से पेश आय
 
rakhshanda
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हम एक हैं,तो एक होने से डरते क्यों हैं?

अपने बारे में कहूँ तो दिल में आई सारी बातें ''अच्छी हों या बुरी'' हमेशा से सामने कह देने की आदी रही हूँ. इस आदत ने मेरे कई दुश्मन भी बनाए हैं, लेकिन अकसर दोस्तों का यही कहना है कि उन्हें मेरी ये आदत पसंद है. ब्लोगिंग की दुनिया में आई तो भी वही हाल रह
 
rakhshanda
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एक सुबह को छू कर देखा......

गुलामी किसी नासूर की तरह होती है. ये दर्द वही समझ सकता है जिसने इसका दर्द सहा हो. जिल्लतों और वहशतों का वो दर्दनाक दौर जो हम ने सौ साल तक झेला है, उसका अहसास हमारी नस्लों को हमेशा याद रहेगा और रहना भी चाहिए. इसीलिए १५ अगस्त की ये मुबारक सुबह जब तुलू
 
rakhshanda
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जब मजबूरियां खूबसूरत हों?

सब से पहले माफ़ी चाहूंगी अपने पढने वालों और दोस्तों से जिन से इतने दिन दूर रही, याद बहुत आई, दोस्तों के घरों(ब्लॉग) में जाने का दिल भी बहुत किया लेकिन कभी कभी मस्रूफियतें इंसान को कहीं का नहीं छोड़तीं. अब देखिये न, ब्लोगिंग की ये दुनिया भी बडी अजीब सी
 
rakhshanda
Dec 29 2009 11:49 AM
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एक शिकवा है मेरे रब तुझ से.....

परसों टीवी पर और कल सुबह अखबार में जो कुछ देखा, न कुछ सोचने के लायक रही न कहने के,कितनी देर तो घर में किसी से बात करने के काबिल भी नही रही, ऐसा हौलनाक मंज़र जिसका कभी ख्वाब में भी तसव्वुर नही किया था किसी ने, नैना देवी मन्दिर के रास्ते में पड़ी वो लाश
 
rakhshanda
Dec 29 2009 11:49 AM
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ये मौसम हमें खा जायेगा...

अब नही जागे तो ये मौसम हमें खा जाएगा धुप चल कर आ गई है साया-ऐ-दीवार तक एक खौफ का साया है हर तरफ, अजीब सा माहौल है शहर का. लब खामोश हैं लेकिन फजाएं इस खौफ की आहट सुन रही हैं. एक निगाह दूसरी निगाह से बडे खामोश से सवाल करती है और जाने क्यों दूसरी निगाह
 
rakhshanda
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कुछ ख्वाब सिसकते रहते हैं....

वो मेरे दिल के बहुत करीब रहती है,उसके लबों से निकला सच है जिसे बस मैंने अपने कलम का सहारा दिया है} वो हमारे ही आस पास की एक औरत है. ज़रूरी नहीं कि मैं उसका नाम लूँ, मैं उस से मुन्स्लिक अपने रिश्ते के बारे में बयान करूँ, ये भी ज़रूरी नहीं है. वो आपके
 
rakhshanda
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वो आईना तो ख़ुद हस्ती में तेरे रहता है...

कभी कभी ऐसा होता है न कि जब हम नसीहतों की बडी सी टोकरी लिए सारे ज़माने को बांटने की कोशिश कर रहे होते हैं तो पता नहीं क्यों, अपना हिस्सा बचाना भूल जाते हैं . शायद हमारे लाशऊर में कहीं न कहीं ये गुमान होता है कि हमें इसकी ज़रुरत नही है . वो तो जब किसी
 
rakhshanda
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जेहनी गुलामी का करार तो हम पहले ही कर चुके हैं....

मेरी इस पोस्ट में मेरी कुछ बातें होसकता है कि कुछ लोगों को नागवार गुजरें, लेकिन मुझे इस की परवाह नही है.) अमेरिका के साथ एटमी करार को लेकर सयासी घमासान अपने शबाब पर है,इसी बहाने अपनी अपनी सियासी रोटियां फिर से ताज़ा करने का मौका सब को मिल गया है.दो चा
 
rakhshanda
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ये रंग-ऐ-सियासत है....दिल थाम के देखें...

पिछले दिनों कुछ अपने आप में इस तरह गुम रही कि होश ही नही रहा कि हमारे आस पास क्या हो रहा है . बहुत हो चुकीं सफर और उसकी यादें …. अब जो इर्द गिर्द देखा तो अहसास हुआ कि इस दरमियान थोड़ा नही बहुत कुछ फर्क आचुका है मुल्क और दुनिया के हालात में . हम इस दुन
 
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रंज-ऐ-सफर की कोई निशानी तो साथ हो.........

शजर न बेच कोई सायबान रहने दे गए ज़माने का कोई निशान रहने दे तुझे नही है ज़रूरत,तू क्यों गिराता है मेरे लिए तो मेरा अस्तान रहने दे सजी हुयी हैं जो कब से बस्तियां न उजाड़ ये ख्वाहिशों की नमो के निशाँ रहने दे तेरा तो तीर भी भारी है इस परिंदे से न खींच ज़
 
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वो चाँद तेरे शहर का........The moon of your city

रात सोयी तो यही सोचकर थी की कल से अकेले बहार नही निकलूंगी लेकिन अजीब बात ये हुयी कि नमाज़ से फारिग होते ही बाहर जाने को दिल मचल उठा . पता नही क्यों बहन को साथ चलने के लिए कहने का भी ख्याल नही आया , और मैं बस उसे दरवाज़ा बंद करने का कहकर बाहर निकल आई .
 
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Some memories of my journey.....वो सफर ....और एक दोस्त का मिलना.. . ..

मेरे सभी पढने वालों की ये पुरजोर ख्वाहिश थी कि इस सफर के बारे में तफसील (डिटेल) से लिखूं. ख़ुद जाने से पहले मैं भी ये सोच कर बड़ी excited थी कि ब्लोगिंग की दुनिया में क़दम रखने के बाद ये मेरा पहला सफर था और अपने इस सफर का हर दिलकश लम्हा मैं उन लोगों क
 
rakhshanda
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Look .......I m back in my beautiful world

मिलना और बिछड़ जाना..... जिंदगी के यही तो रंग हैं.... ये दिल भी कितनी अजीब शै है.रिश्ते बनाना और रिश्तों को सीने से लगा कर इतने करीब कर लेना कि थोडी सी जुदाई भी सूहान -ऐ-रूह लगने लगे,आस पास चाहे कितने ही खूबसूरत मनाजिर क्यों न बिखरे हों,कितने ही दिलच
 
rakhshanda
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meeeeeee........in Shimla

ये है शिमला मेरी जान..... शिमला आये हुए लगभग एक हफ्ता हो चुका है , यहाँ आते हुए खुशी का जो अहसास था , यहाँ आकार मायूसी में बदल चुका ही. सच कहूँ तो शिमला आकर एक अजीब सा दुख और घुटन सी हो रही है. कितनी अजीब बात है कि जो शहर कभी अपनी खूबसूरती में अपनी म
 
rakhshanda
Dec 29 2009 11:49 AM
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WILL MISS MY FRIENDS....TAKE CARE

एक छोटी सी खुशी आप सभी के नाम - अभी कुछ महीनों पहले, कहीं भी जाते हुए बस दो चार दोस्तों को इत्तेला देना ज़रूरी समझती थी. और आज लगता है एक पूरी दुनिया है जो मेरी अपनी है. छुट्टियां हैं, फमिली के साथ शिमला और मनाली जारही हूँ , लेकिन पता नही क्यों खुशी
 
rakhshanda
Dec 29 2009 11:49 AM
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a good news here.... I.P.L is over. एक खुशखबरी सुनो.....आई.पी.एल खत्म हो गया.

अपनी पिछली कई पोस्टों पर पढ़ने वालों के ज्यादा तर कमेंट ‘ एक संजीदा पोस्ट ’ पढ़ने को मिलीं . अच्छा लगा कि हम भी संजीदा लोगों की कतार ( लाइन ) में शामिल थोडे से इंटेललैक्चुअल हैं . लेकिन आज मूड काफी अच्छा है . सुबह से क्या , कल शाम से ही मूड बडा हल्का
 
rakhshanda
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दुर्गा पूजा की वो सुनहरी शाम, जब मैंने पहली बार साड़ी पहनी थी......

यादें जालिम भी होती हैं , तो हसीन भी होती हैं . दिल को जितना तड़पाती हैं , उतना ही सुकून भी दिया करती हैं . कभी कभी तो ये यादें इंसान के अन्दर एक दुनिया सी आबाद कर देती हैं . यादों का मेरी जिंदगी में बड़ा अहम् रोल है. यादों में मैं जीती तो नही, लेकिन
 
rakhshanda
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कलम उठाऊं तो कागज़ सुलगने लगता है....

कलम उठाऊं तो कागज़ सुलगने लगता है.... नज़र में जलता हुआ घर है, क्या किया जाए.. एक छोटी सी कहानी पढ़ी थी . कहानी कुछ यूं थी कि ‘’गिद्धों का समूह बहुत दिनों से भूखा था, खुराक का कोई इंतजाम नहीं था. एक रात सब एक जगह जमा हुए, एक मीटिंग की. एक फैसले के तहेत
 
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और भी मज़बूत बन कर उभरी हूँ....{और फैलुंगी जो लौटाओगे आवाज़ मेरी...}

जिंदगी के रास्ते अजीब से होते हैं , एकदम सीधे हमवार रास्तों में पेचीदा मोड़ कब आजाते हैं , पता ही नही चलता . पिछले दिनों मेरे साथ जो भी हुआ या अभी भी हो रहा है , उनका मेरी जात पर कोई असर नही पड़ा , अगर मैं ये कहती हूँ तो ग़लत कहूँगी . खामोशी से अपने अ
 
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अब औरत होने का सबूत पेश करना होगा?

रमजान का महीना शुरू हुए हफ्ता हो चुका है. इन दिनों कुछ रोजों की मसरूफियत और कुछ नेट की प्रोब्लम्स की वजह से ब्लॉग की दुनिया से नाता तकरीबन टूट सा गया था. अपने पसंदीदा अदीबों और शायरों की याद तो आती रही और उनकी लिखी पोस्ट पढने को दिल भी मचलता रहा लेकि
 
rakhshanda
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इस हसीं रात के दामन में....

शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने कभी शब-ऐ-बारात का नाम नहीं सुना होगा, इसकी वजह इसे बातचीत में इस्तेमाल होने वाले फिकरों में अकसर इस्तेमाल किया जाना रहा है. खुशियों भरे दिनों में अक्सर ये मिसाल दी जाती है, कि आजकल उनके दिन ईद और रातें शब-ऐ-बारात जैसी गुज़र
 
rakhshanda