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कच्‍चा चिट्ठा

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05 Jun 2010
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एक झूठ - शेष कहानी

उसे जितनी दूर तक जाना चाहिये था वह उतनी दूर ही गया। क्या यह सच था ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह अपने आप से ही झूठ बोल रहा हो!'कब से जानती हो उसे?''वैसे तो उसे मैं बहुत दिनों से जानती हूँ। मेरे साथ ही पढ़ता था।''और ऐसे कब से जानती हो!''एक साल से।''शादी करोगी
 
मथुरा कलौनी
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एक झूठ

कहानियों के लिये सामग्री हमें आसपास की जीवन से मिल जाती है। पात्रों के जीवन में झॉंक कर और कुछ कल्पलना के रंग भर कर कहानी बन ही जाती है। सावधानी यह बरतनी पड़ती है कि पात्र या घटनायें बहुत करीब की न हों। बच्चे क्या सोचेंगे, भाई साहब कहीं बुरा न मान जायँ
 
मथुरा कलौनी
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ऐसा भी होता है

दिखने में दुबले-पतले लेकिन स्वस्थ। उम्र होगी 75 के आस पास। स्मार्टली मंच में आये। कुछ औपचारिक संबोधन के बाद आप बीती सुनाने लगे। उन्हीं के शब्दों में।मुझे अपनी पत्नी की बहुत चिता लगी रहती है। अभी वह 72 साल की है। वैसे तो वह बहुत एक्टिव है। चलती फिरती है।
 
मथुरा कलौनी
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हम आपको तकलीफ देना नहीं चाहते

जावेद साहब अपने किसी काम से बेंगलोर आये हुए थे। उम्मीद कर रहा था कि आजकल में मुझसे मिलने आयेंगे। फोन करके उन्होंने बताया कि वे कल का लंच मेरे साथ करेंगे क्यों कि लंच के बाद ही उन्हें ट्रेन पकड़नी है। नहीं तो मिलना नहीं हो पायेगा। मैंने कहा कि आप आइए। लंच
 
मथुरा कलौनी
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विषकन्या

कुछ दिन पहले मैंने एक लघु उपन्यास 'विषकन्या' की रचना की थी। उपन्यास में रहस्य और रोमांच तो है ही, साथ ही मैंने हास्य का पुट देने का प्रयत्न किया था। मुलाहिजा फरमाइयेकार में जिन्दा लाशबेला को इन्तजार करते चालीस मिनट हो गए थे। एक तो खड़े खड़े उसके पाँव दुख
 
मथुरा कलौनी
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जरा ऊँचे स्वर में बोलिये

मुझमें एक व्याधि है, वह यह कि जब आप मुझसे बहुत धीमे स्वर में बात करते हैं तो मेरी समझ में नहीं आता है। सुनाई पड़ता है कि आप कुछ कह रहे हैं पर समझ में नहीं आता है कि आप क्या कह रहे हैं। यह हो सकता है आपको मामूली बात लगे पर यह एक भयंकर समस्या है।जब छोटा था
 
मथुरा कलौनी
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कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गया

बनने का बड़ा शोर था कैसे खामोशी से ढह गया। कौन है जो कहकहे सब बटोर कर ले गयाइतने नादॉं तो न थे हम फिर क्यों रवानी में बहते रहे। आशियॉं जलाया किसी ने हम तो बस सुलगते रहे।वो तुनकमिजाजी, कॉफी की महफिलेंदेर से आना बनाकर बहानाचले थे साथ हम जो दो कदम बस वही
 
मथुरा कलौनी
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एक सकारात्मक सोच

लोग कहते है कि मैं नेगेटिव हूँ। यानी हमेशा नेगेटिव सोचता हूँ। मैं कहता हूँ कि मैं जैसा भी हूँ ठीक हूँ। किसी और के लिये नहीं तो कम से कम अपने लिये तो ठीक ही हूँ। और मैं किसी से राय माँगने तो नहीं निकला हूँ न कि भैया मुझे बता दो कि मैं नेगेटिव हूँ या
 
मथुरा कलौनी
Feb 25 2010 05:47 PM
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हाई वोल्ट वाली जानलेवा मुस्कान

चेहरा सुदर्शन हो और भोलापन लिये हुये हो तो यह अच्छे नाक-नक्श और भोलेपन का यह मेल बड़ा जानलेवा सिद्ध हो सकता है। चेहरा देख कर ही इनके सौ खून माफ कर देने को दिल करता है। यहाँ पर उनकी बात नहीं हो रही है जो बड़े जतन से भोलापन ओढ़े रहते है जिनके बारे में कहा
 
मथुरा कलौनी
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तुमने कुछ कहा होता - दूसरा और अंतिम भाग

एक दिन बड़े आत्मविश्वास के साथ मुस्कराते हुए सुमति मेरे पास आई और अपनी शादी का कार्ड दे कर चली गई। मैं आसमान से ऐसा गिरा कि किसी खजूर पर भी नहीं अटका। चारों खाने चित। और तब मुझे पता चला कि सुमति को खो कर मैं क्या खो रहा हूँ। चार दिन तक तो मेरे दिमाग में
 
मथुरा कलौनी
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चारों ओर चिल्लपों मची है

चारों ओर चिल्लपों मची है कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। जब सभी इस तरह हमें बताने में जुटे हैं तो हम भी ऐलानिया तौर पर मान लेते हैं कि यह साल गुजर रहा है और नया साल आ रहा है। वैसे सच कहूँ मुझे पहले से ही मालूम था कि यह साल गुजर रहा है और न
 
मथुरा कलौनी
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सब कुछ ठीक ठाक है - दूसरा और अंतिम भाग

चौथे दिन चंद्रिका ने मुझे विक्टोरिया मेमोरियल बुलाया। अनिच्छित मन से, और भारी कदमो से वहाँ पहुँचा। चंद्रिका पहले ही पहुँच चुकी थी। गंभीर तो वह सदा ही रहती थी। उस समय साधारण से अधिक गंभीर लग रही थी। 'प्रताप मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ पर तुम्हें द
 
मथुरा कलौनी
Dec 29 2009 11:47 AM
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खुली तिजोरी

हमारी संस्कृति कहती है अतिथि देवो भव। मेहमानों के साथ कैसा व्‍यवहार करना चाहिये यह हमें बचपन से ही सिखाया जाता है। आजकल ब्रांड-युग में लोग घुट्टी के बारे में नहीं जानते होंगे नहीं तो कहता कि अतिथि सेवा-सम्मान हमें घुट्टी में पिलाया जाता है। ऐसे अतिथि
 
मथुरा कलौनी
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ऐसे कुछ अशआर चाहिये

इधर कुंठा उधर त्रास है आँखें वीरान मन नीराश है डरे सहमे से दिन हैं काली डरावनी हैं रातें भटके हुओं को राह दिखाये ऐसे कुछ चिराग चाहिये सोते हुओं को जगाये ऐसे कुछ अशआर चाहिये ऊँची दीवारें हैं खिड़कियॉं हैं तंग निकलने के रास्‍ते हो गये हैं बंद हताशा में
 
मथुरा कलौनी
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मैं भी कहाँ शिकायत कर रहा हूँ!

दफ्तरी जीवन से अवकाश प्राप्त करने के बाद अपनी दिनचर्या एकदम बदल गई है। सुबह देर से नींद खुलती है। आलस के मारे बिस्तर छोड़ते छोड़ते आठ तो बज ही जाते हैं। सुबह घूमने की इच्छा इच्छा ही रह गई है। आज दृढ़ निश्चय के साथ सुबह प्रात: भ्रमण के निकला तो वह दिख
 
मथुरा कलौनी
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बस हाइजैक

यह घटना वास्तव में घटी है। रात का समय था। बस हल्द्वानी से दिल्ली जा रही थी। रात के करीब दो बजे बस रामपुर पहुँची, वहाँ चार व्यक्ति बस में चढ़े। उस समय बस के यात्री निद्रा की विभिन्न अवस्थाओं में थे। कोई खरर्ाटे ले रहा था तो कोई करवट बदल रहा था। उन चार
 
मथुरा कलौनी
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चिराग का भूत - हँसी से भरपूर प्रहसन

आदमी की इच्छाओं का अंत नहीं। यदि आपको चिराग का जिन्न मिल जाए तो आप उससे क्या माँगेंगे! पढ़िए एक हँसी से भरपूर प्रहसन। - मथुरा कलौनी चिराग का भूत स्थान - रास्ता पथिक - (स्वगत) यह पेड़ की छाँव में कौन बैठा हुआ है। कोई बेचारा लगता है। किस्मत का मारा लगत
 
मथुरा कलौनी
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वो बस मुस्कराये और जाँ निकल गई

श्रीमती जी को बेटी दामाद से मिलने की प्रबल इच्छा हुई। मुझसे कहा गया मैं जाती हूँ दुबई। एक महीने के बाद लौटूँगी। तब तक तुम मेरी बिल्लयों की देखभाल करना। मैं अकेला और मेरे साथ दो बिल्लियाँ। बस समझ लीजिये एक महीने तक यही चलेगा। बिल्लियाँ न होती तो मैं '
 
मथुरा कलौनी
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उसके बारे में

सभी जानते हैं उसके संबंध में लेकिन कोई भी उसका नाम अपनी जुबान पर नहीं लाता। नाम उच्चारण करने में बहुत अश्‍लील लगता है। पहले तो बड़े बड़े साइन बोर्डों में, नगरपालिका की दीवारों पर और सिनेमा के पर्दे पर ही उसका नाम दिखाई पड़ता था पर जबसे टेलीविजन लिया है
 
मथुरा कलौनी
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एक पल

यह नि:शब्द रात यह स्वच्छ चांदनी पेडों पर यह झींगुर का बोलना यह मेढक की टर्र टर्र शहर के कोलाहल से दूर इस गांव में क्या यह स्वर्ग उतरा है धरती पर यह तारों भरा आसमान यह मधुर मंद बयार हौले हौले से उडते ये तुम्हारे केश अपार यह चांदनी कितनी रहस्यमय लगती ह
 
मथुरा कलौनी
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अलोहा

कभी कभी अपराध बोध होता है कि मैंने बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा। अधिकतर सोच में पड़ जाता हूँ कि लिखूँ तो क्या लिखूँ। यह कंप्यूटर की देन है कि मुझे RSI व्याधि है। यानी देर तक कीबोर्ड प्रयोग करने पर मेरे हाथ में दर्द होने लगता है। मैं मन को सांत्वना दे
 
मथुरा कलौनी
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परसनल स्पेस

तारा को लेने जा रही हो या मैं जाऊँ? तारा अब घर नहीं आना चाहती है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसने काल सेंटर ज्वाइन कर लिया है। कहती है जब घर ही नहीं है तो क्यों आऊँ। फिर वह हम दोनों में से किसी एक को चुनना नहीं चाहती है। मिलना है तो हमें ही जाना पड़ेगा उ
 
मथुरा कलौनी
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मेरी खिड़की से

तीन साल पहले जब मैं अपने नये फ्लैट में शिफ्ट हुआ तो खिड़की से यह दृश्य देखा। भले ही बेंगलोर को उद्यानों का शहर कहते हैं पर खिड़की से झाँकने पर ऐसे दृश्य बहुत कम ही देखने को मिलते हैं। ऐसे मनोरम बाग को देख कर दिल बाग-बाग हो गया था। सुबह पक्षियों के कलरव
 
मथुरा कलौनी
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अभी अभी पहाड़ से लौटा हूँ।

अभी अभी पहाड़ से लौटा हूँ। एक नया गॉव देखा हड़तोला। भुवाली से कार से डेढ़ घंटे की चढ़ाई है। खूब बारिश हो रही थी। पहाड़ों पर बरसातबरसात बंद होने के बाद निखरा सौंदर्यजिधर देखो फलों के बाग है।हड़तोला से पिथेरागढ़ गये। अल्‍मोड़ा के पास भांग के झाड़ मिले।
 
मथुरा कलौनी
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वह एक आवारा कुत्ता था।

मैं तहसील के बाहर पत्थर पर बैठा इंतजार कर रहा था। वह मंथर गति से शाही चाल चलता हुआ मेरे पास आया। अपनी पनीली आँखों से मुझे देखने लगा मानो कह रहा हो'कुछ खिलाना-वाना है तो बोलो। नहीं तो मैं चलता हूँ।'मुझे उसका यह एटिच्यूड भा गया। मुझे भी भूख लग ही रही थी।
 
मथुरा कलौनी
Aug 07 2009 02:09 PM
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सब कुछ ठीक ठाक है

अवकाश प्राप्त करने के बाद पिताजी गाँव चंदनी में बस गये हैं। बीस बीघा जमीन है। जमीन के बीचोबीच आरामदेह और सुरुचिपूर्ण मकान बनाया है। दाहिने और बाएँ पड़ोस में उनके मित्र बसे हुए हैं। यारदोस्त अच्छे हें। पेन्शन है। बैंक में अच्छा बैलेन्स है। मतलब पिताजी
 
मथुरा कलौनी
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बहुत मनुहार के बाद भी...

कहानी रुकी नहीं हम अनदेखा करते गये, होनी थी कि टली नहीं मोड़ ले कर आगे बढ़ गई, कहानी रुकी नहीं विकट पगडंडियाँ थी और घूप थी तेज हम प्यासे रह गये पनिहारिन थी कि रुकी नहीं बहती रही पुरवाई, और भीगती गई पलकें साश्रु नयनों से पर एक भी आँसू टपका नहीं हवाओं
 
मथुरा कलौनी
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कभी आ कर तो देखो

रस्में पुरानी ही सही, पांव की बेड़ियां ही सही हो कर दूसरों के, रस्में निभाकर तो देखो तुम्हारी थी दुनियाँ तुम्हारी ही है दुनियाँ हमें भी कभी दुनियाँदारी सिखा कर तो देखो खुली हवा में सांस ले ली, मेड़ों मे अठखेलियां कर ली अब बंद है आशियाना, इसमें समा कर
 
मथुरा कलौनी
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बेंगलोर में ख़राशें का सफल मंचन

हमारा पिछला नाटक कब तक रहें कुँवारे हँसी ठहाकों से भरपूर था। अगले मंचन के लिये एक कॉमेडी की तलाश थी। हाथ लग गया गुलज़ार का लिखा नाटक ख़राशें। मैं साधारणतया उतना भावुक व्यक्ति नहीं हूँ। पर नाटक पढ़ा तो मैं तो हिल गया। सोद्देश्य मंचनीय नाटक कम ही मिलते
 
मथुरा कलौनी
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ख़राशें

पिछले नाटक में बहुत हँस लिये अब हँसी रोक कर एक गंभीर विषय पर कुछ देर सोच लें। गुलज़ार के शब्दों में 'ज़रा सा आओ न, बैठो वतन की बात करें।' यों तो वतन की बात टाइमपास करने के लिये की जाती है। बैठकों में ज्ञान प्रदर्शन के लिये की गई बौद्धिक बकवास। पर हम
 
मथुरा कलौनी
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बेतुकी तुकबंदी और मंच की कैद

कहानी व्यंग्य लेख नाटक कोई भी विधा हो, सामने कोरा कागज हो और हाथ में लेखनी हो तो कुछ न कुछ बन ही जाता है। उससे भी बढ़िया सामने कंप्यूटर हो तो क्या बात है। दस बार लिखो, दस बार डिलीट करो, कोई सबूत नहीं रहता कि आपने एक पेज लिखने में कितनी बार काटा छाँटा
 
मथुरा कलौनी
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होली

होली कहीं पिचकारी की मार, कहीं रंगों की बौछार है कहीं उड रहा अबीर, तो कहीं गुलाल है भीगी चोली है, भीगा है चोला भी कुछ रंग यहॉं हैं, कुछ रंग वहॉं भी हैं कुछ रंग चरणों में अर्पित, कुछ माथे पर शोभित हैं कौन अपना कौन पराया है, रंगों ने भेद मिटाया है रंग
 
मथुरा कलौनी
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गंदगी उलीचने के बहाने

आजकल भारतीय संस्‍कृति को लेकर लोग बहुत परेशान हैं। मैं भी परेशान हूँ। आजकल 'पब कल्‍चर' की बात चल रही है। मुझे तो ये शब्‍द ही समझ में नहीं आते हैं। पब में जाना पब कल्‍चर कहलाता है तो जो रेस्‍तरॉ में जाना क्‍या कहलायेगा। सिनेमा कल्‍चर कभी सुनने में नही
 
मथुरा कलौनी
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सूज़ैन का बिस्तर

मीनाक्षी - पहले तुम बोलो। गनेश - मैं पहले क्यों बोलूँ? पहल तुमने की है। तुम ही पहले बोलो। मीनाक्षी - नहीं तुम। यू फर्स्ट। गनेश - सवाल ही नहीं उठता। यू फर्स्ट। लेडीज फर्स्ट। मीनाक्षी - देखो पहले आप, पहले आप में गाड़ी छूट जाएगी। गनेश - जिसको गाड़ी पकड़
 
मथुरा कलौनी