डॉ. चन्द्रकुमार जैन's Image

डॉ. चन्द्रकुमार जैन

http://chandrakumarjain.blogspot.com/
ब्लॉगवाणी पर यह ब्लॉग
नयी प्रविष्टी लिखी
03 May 2010
कुल प्रविष्टियां
159
पाठक भेजे
10240
पसंद
797
नापसंद
0
पाठक प्रति पोस्ट
64.40
पसंद करें
1
नापसंद करें

हवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैं...!

बिखरते टूटते लम्हों को अपना हमसफ़र जानाथा इस राह में आखिर हमें ख़ुद ही बिखर जानाहवा के दोश पर बादल के टुकड़े की तरह हम हैंकिसी झोंके से पूछेंगे कि है हमको किधर जानामेरे जलते हुए घर की निशानी बस यही होगीजहाँ इस शहर में तुम रोशनी देखो ठहर जानापस-ए-ज़ुल्मत कोई
पसंद करें
1
नापसंद करें

आइए! धरती बचाएँ....

बड़ी-बड़ी बातों सेनहीं बचेगी धरतीवह बचेगीछोटी-छोटी कोशिशों सेहमनहीं फेकें कचराइधर-उधरस्वच्छ रहेगी धरतीहमनहीं खोदें गड्ढास्वस्थ रहेगी धरतीहमनहीं होने दें उत्सर्जितविषैली गैसेंप्रदूषण मुक्त रहेगी धरतीहमनहीं काटें जंगलपानीदार रहेगी धरतीधरती को पानीदार
पसंद करें
0
नापसंद करें

है जान वहीं अफ़साने में...!

चर्चा है दो ही बातों का, मेरी उम्र के सारे फ़साने मेंकुछ दिन तेरी राहों में गुजरे, कुछ बीत गए मयखाने मेंदुखड़ों का ज़िक्र बयां ग़म का, दिलचस्प है यूं तो किस्सा मेराआया है जब भी नाम तेरा, है जान वहीं अफ़साने में।==========================================नसीम
Apr 18 2010 09:41 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

हम पृथ्वी के नमक नहीं....!

हम पृथ्वी के नमक नहींइंसानियत के खमीर हैंहमारी हथेलियों परभाग्य की रेखाएँ नहींअभिशाप के नक़्शे हैंहमारे ह्रदयहमारे मस्तिष्क का अस्तित्व नहींहमकेवल रस ग्रंथियों के समूह नहीं हैं।============================गुरुदेव कश्यप की रचना साभार प्रस्तुत.
Apr 17 2010 02:12 PM
पसंद करें
1
नापसंद करें

बस एक काम यही.....!

बस एक काम यही बार-बार करता थाभंवर के बीच से दरिया को पार करता थाउसी की पीठ पर उभरे निशान ज़ख्मों केजो हर लड़ाई में पीछे से वार करता थाअजीब शख्स था ख़ुद अलविदा कहा, लेकिनहरेक शाम मेरा इंतज़ार करता थाहवा ने छीन लिया अब जो धूप का जादूनहीं तो पेड़ भी पत्तों से
Apr 15 2010 07:55 AM
पसंद करें
1
नापसंद करें

प्रतिज्ञा हूँ मैं.....!

समय की वर्तुल अंगूठी से पृथकएक विस्तृत प्रतिज्ञा हूँ मैंओ, परित्यक्ता पृथ्वीभविष्य की कोख मेंमैं ही भरत हूँ सुबकियाँ लेतामेरी ही नसों मेंअतीत कीसम्पूर्ण विस्मृत असंपादितप्रतिज्ञाओं कालहू उफनता है।======================गुरुदेव कश्यप की रचना साभार.
पसंद करें
1
नापसंद करें

रंग......बकलम इमरोज़

काले रंग कोकोई भी रंगनहीं रंगताकाली सोच को भीज़िंदगी का कोई रंगनहीं रंगता।=================साभार प्रस्तुत
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरी पसंद....इमरोज़

जीने लगो तो करनाफूलज़िन्दगी के हवाले।जाने लगो तो करनाबीजधरती के हवाले।==================साभार प्रस्तुत...
पसंद करें
0
नापसंद करें

समय और समझ...!

समय हैलोग हैंचीजें हैंनहीं है तोसमय कीलोगों कीचीजों की समझहवा हैपृथ्वी हैजल हैनहीं है तोहवा कोपृथ्वी कोजल कोसहेज कर रखने कीसमझसमय रहते जरूरी हैसबकी परखऔर सहेजकर रखने की जिद.....!===========================हृदयेश मयंक की रचना साभार प्रस्तुत.
पसंद करें
0
नापसंद करें

बहती रहे नदी.....!

पेड़ों कोसींचते रहनापानी सेताकि बची रहेहरियालीधरती की।चिड़ियों कोडालते रहना दानाताकि बचा रहेसंगीतहवाओं में।ह्रदय मेंउगने देना छंद करुणा केताकि बची रहेनमीतुम्हारी आँखों की।शिशुओं को सुनाते रहना लोरीताकि बचे रहें ख़्वाब आँखों के पन्नों पर।भूखे को खिलाते रहना
पसंद करें
0
नापसंद करें

आदमजात हुए क्यों बौने ?

चांदी-सी रातें, दिल सोने,फिर भी अपने-अपने रोने।घर में रहे विदेशी होकर,सुख-दुःख की खा-खाकर ठोकर।हो न सके हम नमक ठीक से,निगल रहे हैं ग्रास अलोने।झिलमिल कोई सुबह न कौंधी,सांझ पड़े गहराई रतौंधी।शादी हुई उधारी वाली,हो न सके फिर अपने गौने।अपनी रातें रहीं
पसंद करें
0
नापसंद करें

झूठे का मुँह काला नहीं देखा !

कहावत है, ज़बां पर सत्य की ताला नहीं देखामगर हर शख्स तो सच बोलने वाला नहीं देखाअगर जागी तलब तो आँख से पी ली, मगर हमनेकभी सागर नहीं ढूँढा, कभी प्याला नहीं देखापहुँचना था जिन्हें मंज़िल पे वो कैसे भी जा पहुँचेडगर की मुश्किलें या पाँव का छाला नहीं
पसंद करें
0
नापसंद करें

मुस्कान घोलिए....

रह जाए टूटकर कोई ऐसा न बोलिएताला है दिल तो प्यार की चाबी से खोलिएख़ुद का कमाल देखना चाहें तो आप भीचेहरे के हाव-भाव में मुस्कान घोलिएखुशियाँ मिलीं तो प्यार में सबमें वो बाँट दींग़र ग़म मिल तो बैठ के चुपचाप रो लिएरहजन मिल हैं बारहा रहबर की शक्ल मेंवो हम न
पसंद करें
0
नापसंद करें

खबर बनती है.

क़त्ल करने या कराने पे खबर बनती हैअस्मतें लुटने, लुटाने पे खबर बनती हैकोई पूछेगा नहीं लिख लो किताबें कितनीअब किताबों को जलाने पे खबर बनती हैनाचने वाले बहुत मिलते हैं इस दुनिया मेंअब तो दुनिया को नचाने पे खबर बनती हैबात ईमां की करोगे तो रहोगे गुमनामआज तो
पसंद करें
0
नापसंद करें

ख़ूब कही.....!

जीवन हमें जो ताश के पत्ते देता है,उन्हें हर खिलाड़ी को स्वीकार करना पड़ता है।लेकिन जब पत्ते हाथ में आ जाएँ,तो खिलाड़ी को यह तय करना ही होता है किवह उन पत्तों को किस तरह से खेलेकि.....वह बाज़ी जीत
पसंद करें
1
नापसंद करें

परस्पर....!

अच्छा मनुष्य अच्छा मनुष्यजरा उस मनुष्य को देखोजो अच्छा है इसलिए रोता हैऔर जो रोता है इसलिए अच्छा हैरोता हुआ मनुष्य अच्छा हैया अच्छा मनुष्य रोता हुआ हैएक सड़क पर मैंने देखे दो लोगएक अच्छा था और रोता थाएक रोता था और अच्छा थाउन्हें इसका एहसास भी नहीं थाऔर अब
पसंद करें
0
नापसंद करें

मत बनाओ....गाँव को अपना निशान

रहने दोगज भर जमीनरहने दोमाटी के घेरेरहने दोखुले सपनेथोड़े तेरे-थोड़े मेरेमत बांधो-सौंधी महकमत बांधोपगडंडी के घेरेकहाँ मिलेगा-फिर खुला दालानअतृप्त नयनपायेंगे कहाँखुला आसमानमतवाली बारिशकिन प्रेमी युगलों काकरायेगी स्नानयौवन की धड़कनकहाँ दौड़
पसंद करें
0
नापसंद करें

हँसी में रुदन...रुदन में हँसी !

हँसी में रुदन के आँसू मुझे दिखने लगे हैं रुदन के आँसुओं पर अब हँसी आने लगी है बनें सौ बार रोने के भले हालात तो क्या हजारों सबब हैं बरबस ख़ुशी छाने लगी है। ===========================
पसंद करें
0
नापसंद करें

दिल को संभलने नहीं देते...!

ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल तुम हो हमें करवट भी बदलने नहीं देते परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले क्यों हमको जलाते हो कि जलने नहीं देते हैरान हूँ किस तरह करुँ
पसंद करें
0
नापसंद करें

किताबों का सफ़र मैंने किया....!

क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफर मैंने किया तू तो नफ़रत भी न कर पायेगा उस शिद्दत के साथ जिस बला का प्यार तुझसे बेख़बर मैंने किया कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचोख़म ज़िंदगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किय
Dec 29 2009 11:39 AM
पसंद करें
3
नापसंद करें

सुना है आपने...?

होंठ बुदबुदाते हैं, दुआ मांगते हैं, वह सुनी है आपने ? हर आरज़ू के पीछे क्या होता है ज़िम्मेदारी या प्यार स्नेह, किसी कमी का एहसास या वह पूरी होगी ही ऐसा अटूट विश्वास हर ख़्वाहिश के पीछे कुछ गूंजता है, सुना है आपने ? ============================ प्रियंक
पसंद करें
0
नापसंद करें

रिश्ते की खोज...!

मैंने तुम्हारे दुःख से अपने को जोड़ा और अकेला हो गया मैंने तुम्हारे सुख से अपने को जोड़ा और छोटा हो गया मैंने सुख-दुःख से परे अपने को तुमसे जोड़ा और अर्थहीन हो गया =========================== सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता साभार
पसंद करें
0
नापसंद करें

अपनी एक कहानी है.

चलते-चलते पाँव थक गए बिना बिचारे बैठ गए जो प्यासे थे घुटनों के बल नदी किनारे बैठ गए अंधियारे के तालमेल की अपनी एक कहानी है दिन वाले सूरज के घर में रात सितारे बैठ गए बैठे हैं कुछ लोग इस तरह लोकतंत्र की छाया में जैसे किसी पेड़ के नीचे कुछ बंजारे बैठ गए
पसंद करें
4
नापसंद करें

प्रतीक्षा....!

यात्रा में प्रतीक्षा आम बात है लेकिन दुनिया में ऐसे लोग भी तो हैं जिनके हिस्से में प्रतीक्षा ही यात्रा है प्रतीक्षा.... चुटकी भर सुख,सुकून,इत्मीनान की ! ===========================
पसंद करें
3
नापसंद करें

प्रार्थना करें,याचना नहीं...!

भगवान से प्रार्थना कीजिए,याचना नहीं। आपकी स्थिति ऐसी नहीं कि कमजोरियों के कारण किसी का मुँह ताकना पड़े और याचना के लिए हाथ फैलाना पड़े प्रार्थना कीजिए कि मेरा प्रसुप्त आत्मबल जागृत हो प्रकाश का दीपक जो विद्यमान है वह टिमटिमाए नहीं वरन रास्ता दिखाने की
पसंद करें
0
नापसंद करें

काम की हद तक हमारा काम है...!

कामयाबी के नहीं हम जिम्मेदार काम की हद तक हमारा काम है ज़ब्र उस मुख्तार पर क्यों कर करें अर्ज़ कर देना हमारा काम है हुस्ने सूरत को नहीं कहते हैं हुस्न हुस्न तो हुस्ने अमल का नाम है रह सके किस तरह अमजद मुतमईन ज़िंदगी खौफ़े खुदा का नाम है ===============
पसंद करें
0
नापसंद करें

दिल के सब ज़ज़्बात लिख.

तू भी मेरी ही तरह कुछ अपने दिल की बात लिख दिन अगर है दिन ही लिख गर रात है तो रात लिखमैं समझता हूँ मोहब्बत का हर एक ग़म और फरेबमुझको अपनी दास्तां लिख दिल के सब ज़ज़्बात लिखक़ैद हैं तेरे भी दिल में सैकड़ों ग़ज़लें कहींआ कलम क़ागज़ उठा लिखने की कर शुरूआत लिखएक
पसंद करें
0
नापसंद करें

इंसान में ही नूर ख़ुद पैदा नहीं होता...!

जो जैसा सोचते करते हैं वैसा कुछ नहीं होताअगर होता भी है तो उनके हक़ में कुछ नहीं होताहैं दौलत के भंवर में डूबने तैयार सब लेकिन कभी नदी नहीं होती कभी मौका नहीं होतान गलती है न धोखा है सरासर ये हिमाकत हैयों सब कुछ जानकर हठ पालना धोखा नहीं होताबढ़ाती जा रही
पसंद करें
0
नापसंद करें

हम वो नहीं हैं जिन्हें रास्ता चलाता है...!

समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता हैजहाज ख़ुद नहीं चलते ख़ुदा चलाता हैये जा के मील के पत्थर पे कोई लिख आएवो हम नहीं हैं जिन्हें रास्ता चलाता हैवो पाँच वक़्त नज़र आता है नमाज़ों में मगर सुना है कि शब को जुआ चलाता हैये लोग पाँव नहीं जेहन से अपाहिज हैं उधर चलेंगे
पसंद करें
0
नापसंद करें

ये नदी कैसे पार की जाए....!

दोस्ती जब किसी से की जाएदुश्मनों की भी राय ली जाएमौत का ज़हर है फिज़ाओं मेंअब कहाँ जा के साँस ली जाएबस इसी सोच में हूँ डूबा हुआये नदी कैसे पार की जाएमेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगेआज फ़िर कोई भूल की जाएबोतलें खोल के तो पी बरसोंआज दिल खोल के भी पी
पसंद करें
0
नापसंद करें

ऐसे-वैसों को मुँह मत लगाया करो...!

उँगलियों से यूँ न सब उठाया करोखर्च करने से पहले कमाया करो ज़िंदगी क्या है ख़ुद ही समझ जाओगेबारिशों में पतंगें उड़ाया करो दोस्तों से मुलाक़ात के नाम पर नीम की पत्तियों को चबाया करो शाम के बाद जब तुम सहर देख लोकुछ फ़कीरों को खाना खिलाया करोअपने सीने में दो गज
पसंद करें
0
नापसंद करें

दिनचर्या.

मेरे कैलेंडर कीचिड़िया काएक पंखरोजाना टूट जाता हैऔर मैंउसे सहेज करडायरी में छुपा लेता हूँ=================सुरेश ऋतुपर्ण
पसंद करें
0
नापसंद करें

ज़ोरे क़लम का अंदाजा...!

नहीं है उसको मेरे रंजो ग़म का अंदाज़ाबिखर न जाए मेरी ज़िंदगी का शीराज़ाअमीरे शहर बनाया था जिस सितमगर को उसी ने बंद किया मेरे घर का दरवाज़ागुज़र रही है जो मुझ पर किसी को क्या मालूम जो ज़ख्म उसने दिए थे हैं आज तक ताज़ा गुरेज़ करते हैं सब उसकी मेज़बानी से भुगत
पसंद करें
0
नापसंद करें

हम चल रहे हैं....!

जब तारों की रोशनी कास्रोत सूख जाएगाहम देंगे रोशनी रातों कोजब हवा पत्थर में बदल जायेगीहम हवा को चलाएंगे=======================ज्वीग्न्येव हर्बर्त
Sep 06 2009 03:06 PM
पसंद करें
0
नापसंद करें

अपना कार्टून....!

अपना कार्टून देखते हुएउसे याद आयायह उसका कल शाम साढ़े चार बजे वाला चेहरा हैउस वक़्त एक जन सभा को संबोधित करते हुएउसकी आँखें एक लोमड़ी की तरहचमक रही थींऔर जब उसने कहा, 'प्यारे भाइयों'तब उसकी जीभ काफी बाहरनिकल आयी थीजिसे देख पाया सिर्फ़ एक कार्टूनिस्टजनसभा को
पसंद करें
0
नापसंद करें

छवि....!

इस दुनिया कीजो छवि है मेरे भीतरउसमें एक स्त्री के वक्ष की तरहथामे हुए हैं उसेनन्हे शिशु हाथ।=====================प्रेम रंजन अनिमेष की पंक्तियाँ साभार.
पसंद करें
0
नापसंद करें

है आसमान किसके लिए...?

नहीं ज़हान तो फ़िर बागबान किसके लिएमैं ज़िंदगी की लिखूं दास्तान किसके लिएमैं पूछता रहा हर एक बंद खिड़की सेखड़ा हुआ है ये खाली मकान किसके लिएगरीब लोग इसे ओढ़ते-बिछाते हैंतू ये न पूछ कि है आसमान किसके लिएहरेक शख्स मेरा दोस्त है यहाँ लोगोंमैं सोचता हूँ कि
पसंद करें
0
नापसंद करें

मेरा क्या...!

बेटा ओममत आनाक्या करेगा यहाँ आकरआने-जाने का खर्च बचेगातेरे बच्चे के कपड़े आ जायेंगेजानती हूँरिक्शा चलाते-चलातेतुझे टीबी हो गई है पहले अपना इलाज़ करामेरा क्या...बूढ़ी कायाचिंता मत करना पुराने पड़ोसियों में नेम-धरम
पसंद करें
0
नापसंद करें

आशा और अभिलाषा.

आशा में हीइस जीवन कीअभिलाषा का बीज छुपा हैदिव्य शिखर छू लियाकि जो भीविनत भाव से सहज झुका है।=======================
Aug 29 2009 08:14 AM
पसंद करें
0
नापसंद करें

बेवफाई हर तरफ़....!

बेहयाई बेवफाई बेईमानी हर तरफ़धीरे धीरे मर रहा आँखों का पानी हर तरफ़फ़िर भी कुछ दिखता नहीं जबकी उजाला ख़ूब हैरौशनी सी तीरगी की तर्जुमानी हर तरफ़मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारों कहींदिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ़किसको-किसको रोइएगा और क्या-क्या
Aug 25 2009 07:23 PM