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03 Jun 2010
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माँग-माँग कर पैसे लाती !

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com परइस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "याद है मुझे , छुटपन में डुगडुगी बजाता , बच्चों को बुलाता वो मदारी
 
Vibha Rani
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गिनती गिन लो प्यारे भाई!

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com परइस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "इस कविता से मेरी नानी की यादें जुड़ी हैं . इस कविता को हमने कहीं पढ़ा
 
Vibha Rani
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अटकन - बटकन, दहिया चटकन

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं-  "केवल तुक मिलाती इस कविता का अर्थ आज भी नहीं पता, लेकिन इसे
 
Vibha Rani
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अम्मा ज़रा देख तो ऊपर,

इस बार कुछ कवितायें प्रतिमा की यादों से. प्रतिमा युवा प्रतिभा की प्रतिमा हैं. बनारस में रहती हैं और बहुत सी गतिविधियों से जुडी हुई हैं. दाना-पानी की तसल्ली के अलावा मानसिक खुराक की जबर्दस्त तैयारी करके रखती हैं. मेरे आग्रह पर उन्होंने यह कविता भेजी है.
 
Vibha Rani
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गुडिया मेरी रानी है!

अभी अवितोको की ओर से बच्चों का थिएटर वर्कशॉप चल रहा है. सबसे छोटी प्रतिभागी है, 4 साल की एक बच्ची- अनुष्का. उसने यह कविता हम सबको सुनाई. अब वह कविता इस वर्कशॉप की प्रस्तुति का एक हिस्सा है. आप भी देखें. प्रस्तुति देखने के लिए भी आप आमंत्रित हैं. और हां,
 
Vibha Rani
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टेसूरा, टेसूरा

यह कविता भी शिवम की ज़बान से. शिवम 2री कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को जरा
 
Vibha Rani
Feb 15 2010 05:26 AM
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सूरज जल्दी आना जी,

इस बार की कविता शिवम की ज़बान से. शिवम 2री कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को
 
Vibha Rani
Feb 14 2010 07:46 PM
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मैं अन्ग्रेज़ी पढी -लिखी

फ़िर से एक गीत, बच्चों के लिए, उनके गाने-नाचने के लिए। रिश्तों की नोक झोंक बच्चों के मुख से और भी ज़्यादा प्रीतकर लगने लगती है, देखें एपी भी- मैं अन्ग्रेज़ी पढी -लिखी, मेरी किस्मत फूट गई मम्मी जी जब मैं जाऊं, पेपर पड़ने ससुरा मेरा आ जाए जी, पेपर-वेपर छोड
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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स्वतंत्रता

स्व राम नरेश त्रिपाठी की यह रचना अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की बात कहती है। सन १८८६ में जन्मे इस कवि के मन में आजादी की ललक कैसी रही होगी, यह सहज ही समझा जा सकता है। १९६२ में, देश जब तरह-तरह क्र परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा था, तब इस कवि को मौत ने अप
 
Vibha Rani
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बहुत दिनों तक चूल्हा रोया

इस बार एक कविता बाबा नागार्जुन की। इसे मैंने अपनी बड़ी बिटिया तोषी को सिखाया था, जब वह ६ या ७ साल की थी। उसने अपने स्कूल में इसे सुनाया था। इस कविता की खासियत यह है की यह हर उम्र, हर वक़्त, हर काल के लिए माजून हाय। इस कविता की एक और खासियत है की इसमे क
 
Vibha Rani
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सड़क सुहानी

सी बी टी की किताब से एक और कविता । आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर । लम्बी-चौडी सड़क सुहानी, भेद न रखती ग्राम-नगर में साथिन बनाती रोज़ सफर में, सच्चे मन से सेवा करती, लम्बी-चौडी सड़क सुहानी। कहीं-कहीं बल खाती जाती, क
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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गुडिया रोई मुन्नी रोई

यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी गुडिया खूब सजाई है, किस गुड्डे के साथ हुई इसकी आज सगाई है. रंग बिरंगी ओढे चुनरिया माथे पर चम
 
Vibha Rani
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एक अजूबा हमने देखा

एक अजूबा हमने देखा कुएं में लग गई आग पानी पानी जर गओ, मछरी खेलें फाग नाव में नदिया डूबी जाए एक अजूबा हमने देखा कुँए में लग गई आग पानी पानी जर गओ, मछरी खेलें फाग नांव में नदिया डूबी जाये -स्वप्निल
 
Vibha Rani
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Chhutpan ki Kavitayen

सीबीटी की कविता की किताब से कुछ कवितायें उनके रचनाकारों के नाम के साथ, आभार सहित। हमें आपकी बचपन में सुनी कविताओं का इंतज़ार है। अपने बचपन की सुनी कवितायें आप हमें ज़रूर भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर। मूंछें ताने पहुंचे थाने चूहे जी इक रपट लिखाने बि
 
Vibha Rani
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जिनके बिगड़ल बा चलनियां तोड़ दे टंगडी

टहलने के फायदे को ध्यान में रखकर यह गीत लिखा गया था बच्चों के लिए। आप भी अपने बच्चों को इसे सिखा सकते हैं। और हाँ, अपने बचपन की सुनी कवितायें आप हमें ज़रूर भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर। कैसे संभले जिंदगानी, पूछे नगरी, पूछे नगरी, हो रामा पूछे नगरी,
 
Vibha Rani
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Dec 29 2009 11:45 AM
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चंदा मामा दूर के,

यह कविता भी हमें रेखा दी के सौजन्य से मिली है। हालांकि यह बहुत पुरानी कविता है और लगभग सभी को पाता है, फ़िर भी इसे यहाँ देने का अपना लुत्फ़ है। चंदा मामा दूर के, पुए पकाए गुड के , आप खाए थाली में, मुन्ने को दें प्याली में, प्याली गयी टूट, मुन्ना गया र
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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एक सफ़ेद कबूतर

इस बार एक कविता हर्ष की, जिसे उनके ब्लॉग से लेकर इधर दे रही हूँ आप सबके लिए। एक सफ़ेद कबूतर, उसके दो पर, एक इधर, एक उधर। दो व्यक्ति, पहने हुए, सफ़ेद धोती, सफ़ेद कुर्ता,सफ़ेद टोपी, एक सफ़ेद कबूतर के इधर, एक उधर, नोचने को तैयार, सफ़ेद कबूतर के पर। अगली
 
Vibha Rani
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देश के सच्चे सपूत कहाना

छुटपन की कवितायें के लिए मैंने रेखा दी से अनुरोध किया। वे मान गई और अपने बचपन की एक कविता लिख के भेजी है, जिसे आपको पेश कर रही हूँ। आप भी हमे अपने बचपन में सुनी कवितायें भेजें, ताकि हमारी नन्ही पीढी इन्हें दुहरा सकें। कवितायें gonujha.jha@gmail.com प
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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"मौसम" पर एक कविता

सूरज तपता, धरती जलती गरम हवा जोरों से चलती तन से बहुत पसीना बहता हाथ सभी के पंखा रहता आरे बादल, काले बादल गरमी दूर भगा रे बादल रिमझिम बूँदें बरसा बादल झम-झम पानी बरसा बादल ले घनघोर घटायें छाईं टप-टप, टप-टप बूँदें आईं बिजली लगी चमकने चम्-चम् लगा बरसने
 
Vibha Rani
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"माँ"

कल मेरे एक मित्र ने मुझसे माँ पर कुछ कवितायें मांगी। मित्र के मित्र की बेटी को अपने स्कूल में माँ पर कविता सुनानी थी। मित्र के मित्र की बेटी को यह कविता दी तो ख्याल आया कि इसे इस ब्लॉग पर भी दिया जाए, ताकि अन्य बच्चे भी इसका उपयोग कर सकें। वैसे भी मा
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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कोठे ऊपर कोठारी

रिश्तों की तरल नोंक झोंक वाला एक और गीत आपके लिए प्रस्तुत है। कहने की ज़रूरत नहीं की इस गीत को भी बच्चे बड़े मजेदार तरीके से प्रस्तुत करते हैं और अपनी मासूम प्रस्तुति से वे एक नया ही गुदगुदाता माहौल तैयार करते हैं। कोठे ऊपर कोठरी, मैं उस पर रेल चलाय द
 
Vibha Rani
Dec 29 2009 11:45 AM
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चिडिया चली चांद के देश

इस बार की कविता कोशी की याद से. आप भी अपनी याद को जरा टटोलिए और अपनी कविता हमें भेजें इस ब्लॉग के लिए- gonujha.jha@gmail.com पर चिडिया चली चांद के देश नन्हें नन्हें पंख संवारे साथ ना कोई संगी साथी चली अकेले बिना सहारे ऊपर को वो उडती जाए बडे मज़े से ग
 
Vibha Rani
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छोटी चिडिया चक चक चूं

इस बार की कविता कोशी की याद से. आप भी अपनी याद को जरा टटोलिए और अपनी कविता हमें भेजें इस ब्लॉग के लिए- gonujha.jha@gmail.com पर छोटी चिडिया चक चक चूं तेरी चोंच ना ठहरे क्यूं फुदक फुदक फुदक रही, डाल डाल पर चहक रही उडे फर फर फर फर फूं छोटी चिडिया चक चक
 
Vibha Rani
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बी सैलानी क्या कहती हैं?

इस बार की कविता पाकिस्तान के एक अज़ीम शायर और अदीब अहफाज-उर-रहमान की. हिन्दुस्तान के जबलपुर में पैदा हुए रहमान साहब पाकिस्तान के मशहूर लेखक और शायर के साथ साथ वहां के तेज़ तर्रार पत्रकार भी हैं. उन्होंने एक साथ पाकिस्तान की तानाशाही सत्ता और प्रेस की
 
Vibha Rani
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आज पिया की सालगिरह है

इस बार एक कविता पाकिस्तान से। इसे महनाज़ रहमान ने भेजा है। महनाज़ एक पत्रकार हैं, लेखक हैं, बहुत ही संवेदनशील इनसान हैं। कई एन जी ओ के लिए काम करती हैं। २३ साल से हमारी उनकी दोस्ती है। हमारी गुजारिश पर उन्होंने ये कविता भेजी है। आप सबसे भी अनुरोध है की
 
Vibha Rani
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यह कदंब का पेड़- सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरे अनुरोध पर संपादक (सृजनगाथा) जयप्रकाश मानस ने अपने बचपन के पिटारे से यह कविता भेजी हैं। उनके ही शब्दों में - "भूला नहीं अब तक । शायद तीसरी या चौंथी में पढ़ा था । कदंब का पेड़ तो था नहीं हमारे घर के आसपास । पर गीत का प्रभाव इतना था कि जब भी दोस्तों के
 
Vibha Rani
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अंगूर का अनार

कुछ बच्चियों ने मिलकर बनाया एक ब्लाग- http://paripoems।blogspot.com/ यह कविता वहीं से ली गई है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें भेजें gonujha.jha@gmail.com पर । बात है यह बहुत पुरानी खा रही थी अंगूर एक रानी बीज उसके गले में फंसता यह देख कर भाई उसका
 
Vibha Rani
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Aug 17 2009 03:32 PM
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क्योंकि पेड़ है जीवन डोर

कुछ बच्चियों ने मिल कर एक ब्लॉग बनाया उन्हीं में से एक कविता यहाँ है। आप भी पढें और अपनी यादों के पिटारे से कवितायें भेजे इस ब्लॉग पर देने के लिए- पर पेड़ों के कट जाने के बाद बचेगी नहीं ये zindagii पूछते हो क्यों क्योंकि पेड़ है जीवन डोर पेड़ कट जाने के
 
Vibha Rani
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रिम-झिम बरसा पानी

कुछ बच्चियों ने मिल कर एक ब्लॉग -उन्हीं में से एक कविता यहाँ है। बारिश पर। आप भी पढें और अपनी यादों के पिटारे से कवितायें भेजे इस ब्लॉग पर देने के लिए रिम-झिम बरसा पानीलो भर जाते हैं सागर नालीनाचते है भालू मोरबच्चे खूब मचते शोरआते हैं जब बदल काले
 
Vibha Rani
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पुरानी यादे ताज़ा करो।

मेरे अनुरोध पर सोनाली सिंह ने अपने बचपन के पिटारे से कुछ कवितायें भेजी हैं। सोनाली सिंह हिन्दी की युवा कथा लेखक हैं। इनकी अभी-अभी एक कहानी "हंस" के मई, २००९ अंक में छपी है- "क्यूतीपाई । आप भी अपने यादों के पिटारे से कवितायें भेजें- gonujha.jha@gmail.
 
Vibha Rani
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जालिम सरकार मिटायेंगे

उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के छिपती मुहल्ले में ९ अक्टूबर, १९०५ को जन्मे छैलबिहारी दीक्षित 'कंटक' हिन्दी के संभवत: पहले ऐसे कवि थे, जो कविता लिखने के कारण जेल गए। तब अंग्रेजों का दमन चक्र जोरों पर था और इनकी लेखनी में एक आग थी, जिसकी आंच से ब्रिटिश नह
 
Vibha Rani
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धरती स्वर्ग समान है.

आज पढ़ते-पढ़ते अचानक गोपाल दास सक्सेना 'नीरज' की यह कविता हाथ लगी। नीरज जी बहुत अच्छे कवि व गीतकार हैं, जिनका सम्मान हिन्दी साहित्य ने अपनी गुटबंदी के कारण नहीं किया। मगर वे इसके मुन्हाताज़ न हो कर अपनी रचना प्रक्रिया में लीं रहते आए हैं। यह कविता उन
 
Vibha Rani