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19 Apr 2010
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मर रही है मेरी भाषा शब्द शब्द- सुरजीत पातर

पिछले दिनों एक सम्मेलन में जाना हुआ जहाँ नामचीन लेखकों का जमावड़ा था। इस सम्मेलन को आयोजित किया था FOUNDATION OF SAARC WRITERS AND LITERATURE संस्था ने। इस संस्था की कर्ता-धर्ता अजित कौर जी है। इनकी और इनके साथियों की मेहनत का ही नतीजा है कि यह संस्था आज
 
सुशील कुमार छौक्कर
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12 अप्रैल का दिन

आज का दिन खास हैंसबको प्यारा सा अहसास हैंआज के दिन खिली थी एक कलीएक गाँव के गौबर से पूते आँगन में।देखकर दुनिया यह हल्की सी मुस्कराई थीचारपाई पर लेटे-2 नन्हें पैरों से फिर साईकिल चलाईपग-पग चलती रही, धीरे-धीरे बढ़ती रही ।सहेलियों संग गिटों से खेलती
 
सुशील कुमार छौक्कर
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वो

इन दिनों बड़ी उलझन में रहता हैं जिदंगी की जालों को हटाता हैं वो।बच्चों की मुस्कराहट पर जान छिड़कता हैंचाँद न माँग ले ये, आँखे मिलाने से बचता हैं वो।खुशियों की तलाश में दिन-भर घूमता फिरता हैंखुशियों का एक अक्स भी ढूढ़ नही पाता हैं वो।पाँच प्राणियों की पेट
 
सुशील कुमार छौक्कर
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अमिताभ जी की नजर में नाटककार डा. चरणदास सिंद्धू जी (अंतिम भाग)

14.3.1997 को डॉ. राजेन्द्र पाल को दिये गये एक साक्षात्कार में डॉ.चरणदास सिद्धू ने नास्तिकता पर अपने विचार प्रकट किये हैं। ( नाट्यकला और मेरा तजुरबा, पृ.141) यह मुद्दा वाकई गम्भीर है। डॉ.सिद्धू नास्तिक हैं। पहले नहीं थे, बाद में हुए। ( इंगलिश ऑनर्स करते
 
सुशील कुमार छौक्कर
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अमिताभ जी की नजर में डा. चरणदास सिंद्धू ( भाग-2)

अनुभव जब एकत्र हो जाते हैं तो वे रिसने लगते हैं। मस्तिष्क में छिद्र बना लेते हैं और ढुलकने लगते हैं, कभी-कभी हमे लगता है अपनी खूबियों को बखानने के लिये व्यक्ति लिख रहा है, बोल रहा है या समझा रहा है। किंतु असल होता यह है कि अनुभव बहते हैं जिसे रोक पाना
 
सुशील कुमार छौक्कर
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अमिताभ जी की नजर में नाट्ककार डा. चरणदास सिंद्धू जी।

किसी भी व्यक्ति को उसकी किताब से पूरा-पूरा नहीं जाना जा सकता। वैसे भी किसी व्यक्ति को पूरा कब जाना जा सका है, हां उसके करीब रह कर उसकी प्रकृति, उसका स्वभाव, उसकी आदतें आदि जानी जा सकती है और जब ऐसे व्यक्ति किसी के बारे कुछ लिखते हैं तो हम उक्त व्यक्ति के
 
सुशील कुमार छौक्कर
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मेरी माँ बोली "हरियाणवी" में एक कहानी

महादे-पारवती ( महादेव- पार्वती) एक बर की बात सै। पारबती महादे तैं बोल्ली - महाराज, धरती पै लोग्गाँ का क्यूँक्कर गुजारा हो रहया सै? हमनै दिखा कै ल्याओ। महादे बोल्ले- पारबती, इन बात्ताँ मैं के धरया सै? अडै सुरग मैं रह, अर मोज लूट। धरती पै आदमी
 
सुशील कुमार छौक्कर
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आह...... होली पर बेटी, मेरा बचपन लौटा लाई।

नैना की होली। हम अपना बचपन देख नहीं पाते बस अपने बड़े बुजुर्गो से सुन ही पाते हैं, या एक आध घटनाएं हमारी स्मृति में बची रह जाती है। अगर हमें अपना बचपन देखना है तो अपने बच्चों के बचपन के संग हो लेना चाहिए और उस छूटे हुए बचपन को फिर से जीने के लिए। कुछ ऐसा
 
सुशील कुमार छौक्कर
Mar 02 2010 09:16 AM
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गुरुवर के पन्नों में मैं

इनाम की आस यूँ पूरी होगी सोचा ना था।  " जब मैं पांचवी जमात में था, हमारे गाँव में संत रविदास का जन्म समागम किया गया। मैंने गीत लिखा और संगत को सुनाया। चाचा बेला सिंह ने एक रुपया निकाला। लाला जी ने रोक दिया। बटुए से पाँच का नोट निकाला और कहा: " अगर
 
सुशील कुमार छौक्कर
Feb 23 2010 11:52 AM
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फुरसत के कुछ पल यूँ कर बीते।

काफी दिनों के बाद अब जाकर कुछ राहत मिली है तो सबसे पहले अपनी ब्लोग की दुनिया याद आई। इसलिए राम जी के हाथों की जादूगरी के कुछ नमूने लेकर आया हूँ। हुआ कुछ यूँ कि एक काम से गया था कनाट प्लेस, पर वो काम तो हुआ नहीं और पहुँच गया अपनी पसंदीदा जगह मंडी हाऊस ,
 
सुशील कुमार छौक्कर
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Feb 19 2010 09:19 AM
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किताबें

किताबें किताबेंरंग बिरंगीछोटी-बड़ीमोटी-पतलीअलमारी में सेहर पल झाँकती हैं।फिर आकर पास मेरेहँसाती हैं, रुलाती हैंदेर तक मुझसे बतियाती हैंजब छोड़े सारी दुनियातब मेरा साथ निभाती हैं।"माँ"हाथ पकड़कर चलना सिखाती है"मुझे चाँद चाहिए"सपनो को पँख लगाती
 
सुशील कुमार छौक्कर
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अमिताभ जी और सुशील की जुगलबंदी की मुम्बई

ये मुम्बई हैं मेरे यार  देख रहा हूँ रेल की पटरियों पर तारकोल की सड़को पर लोगों को भागते-दोड़ते हुए। हवा गाती नहीं इनकी साँसों में हँसी नाचती नहीं इनके चेहरों पर। रेल में बैठी लड़की की लटे हवा में लहरा रही आँखे उसकी नींद की थाप पर झपक-झपक जा रही।
 
सुशील कुमार छौक्कर
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जिंदगी के रंग- नीरज जी के संग

संघर्ष का रंग- उंगली का दर्द  बचपन के कितने अच्छे होते हैं। इन पंक्तियों को पढ़ते समय हम केवल बचपन की शरारतों को ही याद रखते हैं, संघर्षों को भूल जाते हैं। मेरा बचपन शरारत कम, संघर्षों में ज्यादा बीता है। पिताजी उन दिनों ट्रक चलाया करते थे। महीन
 
सुशील कुमार छौक्कर
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जिंदगी के रंग-सुशील के संग

संघर्ष का रंग-  “ अभी हाथ नही गड़े धरती में मेरे ” जिंदगी की शुरुआत संघर्ष रंग से ही होती है। बाकी के रंग जिंदगी में आते जाते रहते हैं। पर ये रंग आपकी जिंदगी से ऐसा रंग जाता है कि छूटता ही नहीं। फीका हो जाता है पर छुटता नही है। जिस घटना की इस रं
 
सुशील कुमार छौक्कर
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सपने वाली लड़की

सपने वाली "कल्पना"  सपने में आई एक लड़की अनदेखी सी अनजानी सी पर लगती थी पहचानी सी बतला रही थी खिलखिला रही थी जीने की आरजू जगा रही थी फेर कर उंगलियाँ बालों में खूब सारा दुलार लुटा रही थी बैठाकर फिर मुझे साईकिल पर मेरे सपनों को पंख लगा रही थी कुछ द
 
सुशील कुमार छौक्कर
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प्रभाष जी, क्या सचमुच आप इस रविवार "कागद कारे" लेकर नही आऐंगे?

रविवार की सुबह "कागद कारे" का ऐसे इंतजार होता था।   रविवार की सुबह देर तक मैं चाहकर भी सो नही पाता। क्योंकि रविवार है। और किसी चीज का इंतजार है। आँख खुलते ही मुँह से आवाज निकलती है पेपर। नीचे से कोई पेपर लेकर आता। पाँच पेपरों में से जिस पेप
 
सुशील कुमार छौक्कर
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जिंदगी के रंग- विजय जी के संग

जिंदगी खूबसूरत रंगो से भरी हुई है। हर रंग निराला है, प्यारा है। और हर रंग हर दूसरे से जुड़ा हुआ है जैसे सुख से दुख। इसलिए जिंदगी में संघर्ष के रंग के बाद खुशी का रंग आता है। और जीवन में रस घोल जाता है। आज हम भी आ गए अपनी जिदंगी के रंगो को लेकर। संघर्ष
 
सुशील कुमार छौक्कर
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अब वह मरीज कभी दरवाजा खटखटाने नहीं आएगा।

लतिका रेणु जी का फणीश्वरनाथ 'रेणु' जी पर लिखा अंतरंग संस्मरण । भागलपुर जेल से कुछ राजनीतिक-बन्दी पटना अस्पताल में इलाज के लिए भेजे गए थे। मैं यहाँ नर्स-इंचार्ज थी। थोडे दिनों में इलाज कराकर वापस भेज दिए गए। एक दिन वार्ड का चक्कर लगाते हुए देखती हूँ,
 
सुशील कुमार छौक्कर
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जिंदगी के रंग - मीत जी के संग़

आज मीत जी अपनी "जिंदगी के रंगो" से हमें मिलवा रहे है।  जिंदगी रंग बिरंगी  ज़िन्दगी में रंग ही रंग भरे हुए हैं. अगर ये रंग ज़िन्दगी से निकाल दिए जाएँ, तो फिर जीवन का मतलब ही कुछ नहीं रह जायेगा. इन्हीं रंगों को हम दर्द, ख़ुशी, गम, आँसू, और सं
 
सुशील कुमार छौक्कर
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जिंदगी के रंग अनिल जी के संग।

आज अनिल जी अपनी "ज़िदगी के रंगो" से हमारी मुलाकात करा रहे हैं। जीने के लिए साँसों की जरूरत होती है, हर एक नया पल जीने के लिए आपको नयी साँसे चाहिए और अगर आपको किसी एक ऐसी छोटी सी जगह बँद कर दिया जाए जहाँ साँस लेने के लिए कोई आवागमन न हो, उस पर से एक दो
 
सुशील कुमार छौक्कर
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ज़िंदगी के रंग - अमिताभ जी के संग।

आज अमिताभ जी अपनी "ज़िदगी के रंगो" से हमें रु-ब-रु करा रहे हैं। जीवन का नाम ही संघर्ष है। जो प्रकृति प्रद्त्त सनातन है। इसलिये संघर्ष कब किसका खत्म हुआ जो मेरा होगा। हाँ, इसके रूप में समय के साथ बदलाव आते रहे। पहले खोने के लिये कुछ नहीं था तो संघर्ष म
 
सुशील कुमार छौक्कर
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एक सूचना आप सभी साथियों को।

"जिदंगी के रंग" जब जान लेती थकान के बाद भी आपको नींद ना आए तो ख्याल जरुर आ जाते हैं। और इन्हीं ख्यालों की गलियों में आवारागर्दी करते हुए आप कब सो जाते है पता ही नहीं चलता। इन्हीं गलियों में पिछले दिनों मुझे एक ख्याल मिला जिससे मिलकर बहुत ही अच्छा
 
सुशील कुमार छौक्कर
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बेटी की बातें

बिल्ली दौड़ चूहा आयासाथियों नैना बेटी ने मेरा नया नाम बिल्ली ही रख दिया है। जब भी मेरे साथ खेलती है बस बिल्ली ही पुकारती है। बिल्ली अब दूसरा गेम खेलते है। बिल्ली अब चीडिया उड़ी,भैंस उड़ी खेलते है। बिल्ली अब चूहा दोड़ बिल्ली आई खेलते है ..........। जैसे ही
 
सुशील कुमार छौक्कर
Sep 19 2009 10:57 PM
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दो बीघा का किसान

किसान मैं दो बीघा का किसानपालता तीन मवेशी, पाँच इंसानएक कच्चा मकान टूटा साजिसमें खड़ा एक पेड़ बुढ्ढा सारामजी हमारे रुठे हैखेत हमारे सूखे हैकुएँ सूखने लगेचूल्हे बुझने लगेचारा खत्मदाना खत्मपेट उधारी से भरता हैपंसारी रोज तगादा करता हैपत्नी यह देख रोती
 
सुशील कुमार छौक्कर
Sep 19 2009 10:56 PM
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रिश्तें नाते

रिश्तें रिश्तों के धागे उधड़ने लगे हैंना जाने कैसे रिश्तें बनने लगे हैं।खेले थे जिनकी गौद में कभीअब वही भारी होने लगे है।सोचा था बुढ़ापे में मिल जाऐगी दो रोटीअब तो रोटी के साथ ताने भी मिलने लगे हैं।कैसी अजब समय की घड़ी हैपैसे रिश्तों को सीँचने लगे है।कल
 
सुशील कुमार छौक्कर
Sep 19 2009 10:56 PM
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उठ जाग मुसाफिर

उठ जाग मुसाफिर उठ जाग मुसाफिर सुबह को ना जागा , अब तो जाग जीवन की दोपहर होने को आई है। सुन साथी दुनिया पहुँची मंगल पर फ़िर क्यूं तू ठहरा पेड़ की छाँव में देख , परख , चल उठ उठ जाग मुसाफिर सुबह को ना जागा , अब तो जाग जीवन की दोपहर होने को आई है। सुन साथ
 
सुशील कुमार छौक्कर
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चंद मुलाकातों का साया

कुछ यादें , कुछ बातें गुरु की। एक तगड़ा शरीर, एक कड़क आवाज़ और एक सांवला चेहरा जब कफ लगे हुए सफेद कुर्ता पाजाम पहनकर निकलता था तो छात्र ही क्या, टीचर भी अपनी अपनी क्लास में घुस जाया करते थे। जिस दिन नही आए तो समझो बच्चों और टीचरों की मौजा ही मौजा। कोई
 
सुशील कुमार छौक्कर
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पागल

पागल ना जाने क्यूँ चिड़चिड़ाने लगा है बात बात पर वो बड़बड़ाने लगा हैं। बदलतें इंसानी रिश्तों को देखकर किताबों में वो साथी तलाशने लगा है। लोग दो और दो को पाँच बताते हैं बचपन के कयादे को वो खोजने लगा है। बढ़ती जिम्मेदारियों की तपिश में कोयलें सा काला वो होन
 
सुशील कुमार छौक्कर
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गली गली वह घूमता हैं।

कबाड़ी चिड़ियों का अलार्म सुनकर कूड़ॆ के ढेर में से वह उठता है। डाल कंधे पर प्लास्टिक का बोरा बिना खाये वह गली-गली घूमता है। देख उसे कुत्ते भोंकते है लोग नाक मुँह सिकोड़ते है। कड़ी धूप हो या ठुठरती ठंड़ बोरे से अपना शरीर वह ढकता फिरता है। जिन जगहों को देख
 
सुशील कुमार छौक्कर
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मंटो का जन्मदिन और उनसे जुड़ॆ किस्सें

मंटो का जन्मदिन आज मंटो जी का जन्मदिन हैं सोचा आप साथियों के साथ मनाया जाए। कहानियाँ तो आपने पढ़ी ही होगी इसलिए आज कहानी ना देकर उनसे जुड़ॆ किस्से दे रहा हूँ जो कृशन चन्दर जी ने लिखे है। "मंटो: मेरा दुश्मन " किताब में। मैं मंटो के लेखन के लिए बैचेन इसी
 
सुशील कुमार छौक्कर
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आज का एक सच

छोटी सी तनख़्वाह में ............ वक्त की सुईयों ने सबकी जुबान सील दी है। बेटी अपने फटे हुए बस्तें को छिपाते हुए रोज स्कूल जाया करती है। बूढे पिता चंद पैसे बचाने की ख़ातिर कड़ी धूप में इकलौता छन्ना हुआ रुमाल सिर पर रखकर डी.टी.सी बस का इंतजार करते मिलते
 
सुशील कुमार छौक्कर
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गुमशुदा दोस्त की तलाश

दोस्त की यादों की बारात आई हैं। भीड़ से भरे बस स्टेड़ पर, भीड़ से दूर बस का इंतजार करता कोई लड़का, हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा। रुकी बस में ना चढ़कर, चलती हुई बस में ही चढ़ता हुआ कोई लड़का हो या ना हो वो मेरा दोस्त ही होगा। बस की खाली सीटें होने के बा
 
सुशील कुमार छौक्कर
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चुनावों के बीच एक बात कहनी है।

नेताजी चुनावों का शंखनाद हो चुका नेताजी की नींद अब टूट चुकी। तैयार हैं सब अब अपने अपने हथियारों से कोई वादों से बहका रहा, कोई भावनाओं को भड़का रहा। जिसे देखो वही बड़ी-बड़ी बातें करता हैं पर अपने ऐशो-आराम का पूरा ख्याल भी रखता हैं। धूल से पैर ना सन जाए इ
 
सुशील कुमार छौक्कर
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कुछ बातें और शरारतें बेटी की।

बेटी का बचपन यूँ तो अभी बच्ची है पर बातें दादी माँ सी करती है। जब कभी कुछ नया देखती है सवालों की झड़ी लगा देती है। सूरज बाबा संग मुस्कराती जागती है उठते ही बस दूध, पापे माँगती है। जिद करे तो जिददी कहलाए ना करे तो घर खाने को आए। गानों की शौकीन कभी "होल
 
सुशील कुमार छौक्कर
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समाजवाद और गौरख पाण्डेय

समाजवाद समाजवाद बबुआ धीरे धीरे आई समाजवाद उनके धीरे धीरे आई हाथी से आई, घोड़ा से आई अंग्रेज़ी बाजा बजाई, समाजवाद बबुआ..... आंधी से आई, गांधी से आई बिरला के घर में, समाजवाद बबुआ..... नोटवा से आई, वोटवा से आई कुर्सी के बदली हो जाई, समाजवाद बबुआ..... का
 
सुशील कुमार छौक्कर
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बस का सहयात्री

वह रोज इंतजार किया करता था वह मेरा डी.टी.सी की बस नम्बर 234 में पहनकर काली पेंट और सफेद कमीज़ लगाकर आँखो पर काला चश्मा लेकर साथ अपने एक काला बैग चढ़ते ही बस में मेरे बैठने की जगह बना दिया करता था बतलाता था खिलखिलाता था यूँ तो शादीशुदा था पर बातें बच्
 
सुशील कुमार छौक्कर
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इस अंधेरी रात के बाद उजली सुबह कब होगी?

रात के एक बजे, एक आदमी कार से उतर कर, पार्किंग के 10 रुपये के लिए, पार्किंग वाले से पुलिस वाला होने का रोब देखाकर तू तू मैं मैं करता हुआ बिना पैसे दिए शान से चला जाता हैं।.............. रात के डेढ़ बजे, उस जगह से चंद कदम दूर एक आदमी आमलेट दो रुपये मह
 
सुशील कुमार छौक्कर
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मुझे किस किस ने बिगाड़ा और जीवन संवारा।

मैं तो प्रतिदिन यही अनुभव करता हूँ कि मेरे भीतरी और बाहरी जीवन के निर्माण में कितने अगणित व्यक्तियों के श्रम और कृपा का हाथ रहा हैं और इस अनूभूति से उददीत मेरा अंतक:करण कितना छटपटाता है कि मैं कम से कम इतना तो दुनिया को दे संकू जितना मैंने उससे अभी त
 
सुशील कुमार छौक्कर
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चल मेरी सखी

दो चार दिन पहले यूँ ही चार लाईने दिमाग में घूम रही थी। हम ठहरें आलसी आदमी, सोचा चलो घूमने दो काहे उन्हें परेशान करें। पर जब संडे के दिन बेटी को चिड़ियाघर घुमाकर आए। तो हम थक गए थे सोचा वो चार लाईने भी घूमते घूमते थक गई होंगी इसलिए अब उन्हें आराम दे दे
 
सुशील कुमार छौक्कर
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उठो बाबा

उठो बाबा अब नहीं पूछूँगी मेरी मम्मी कहाँ हैं ? मेरे पापा कहाँ हैं ? सबके तो हैं, मेरे कहाँ हैं ? उठो बाबा। अब कौन प्यारी आवाज लगा सुबह उठाऐगा ? अब कौन बस्ता लेकर स्कूल छोड़कर आऐगा ? अब कौन गोल गोल रोटी बना खिलाऐगा ? अब कौन कहानी सुनाकर नींद को बुलाऐगा
 
सुशील कुमार छौक्कर