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कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है

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04 Mar 2008
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वह मजदूर - २

ऊपरी हिस्से से चली नीचे के तरफ़ बढती चूने लगी कुछ क्षण बाद टिप टिप टिप टिप नीचे की उर्वर भूमि तक पहुँचती , तरलता प्रदान करती शीतलता देती शरीर के सम्पूर्ण हिस्से को झकझोर देने के बाद वेदनामय वातारण में पोंछता एक एक हिस्से से शरीर का पसीना वह मजदूर गहर
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वासना

आ रही थी वह एक अदृश्य स्वप्न - सा यथार्थ का रूप लेते धीरे धीरे धीरे स्मृति पटल में तेज ठण्ड में सूर्य की प्रथम किरण - सा हल्का धूप - देते जरूरत नहीं थी धूप की शीतलता की भी नहीं आवश्यकता एक जलन की थी तपन की थी सिरहन और शिष्कन की थी बन आहार वह विशिष्ट
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कारण अकारण

दर्द उठा भीतर कोई ढूंढ रहा मैं बावला हो पता ना चला कारण कोई क्या तार छिटका दिल का कहीं से या अपने की कोई पुकार आयी बरस पडी आँखें अचानक क्या वेदना नें ले ली है अंगडाई खिन्न मन , टूटी आत्मा, रूठा ह्रदय अनेको विकल्प उस कारण के फ़िर भी उलझा मन अकारण शायद
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पर क्या कभी उस माँ के भी व्यक्तिगत दर्द को समझने की कोशिश हमारा यह समाज और हमारी यह मीडिया करती है ......?

अभी चलेगा । और चलेगा यह तांडव । तब तक जब तक कि इस समाज का शिक्षित और धनिक वर्ग लोभ लिप्सा को चरम गति तक ना पहुँचा देंगे । तब तक कन्या भ्रूण हत्या होता रहेगा । आज पंजाब में , दिल्ली में, हरियाणा में तो कल दूसरे अन्य राज्यों मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश ,
Dec 29 2009 11:44 AM
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.कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है

अभी अभी छूटा था माँ का आँचल दोस्तों का साथ तो मानो भूला भी ना था चलता था मेड़ पर तो पैर डगमगाते थे सच , चड्ढी का नाड़ा बांधना भी तो नहीं सीखा था उठा हाथ पिता का तो मानों मैं बड़ा हो गया ॥ दिन दिन महीने महीने रेघता एक कपड़े के लिए जूते तो स्वप्न ही हो
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अच्छा तो हमें नशीब नहीं बुरा ही बस बनते चलो ...

दोस्त तुम घटे चलो यार तुम मिटे चलो अयोग्यता का प्रचार हो विद्वता का संघार हो ना आएगी कुसमय कभी ये न होगी दुर्दशा कभी ये निर्माण से विनाश पथ पर ऐ यार तुम डटे चलो ॥ संसार है पलट रहा हर द्वार है उलट रहा पहले जहा तरु-पत्तियां , अब धूल ही उचट रहा क्या पेड
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हम जूझ रहे हैं ...........

घूम रहे हैं आज हम बेसुर, बेताल और बिना किसी कारण के हम घूम रहे हैं कहीं जनता की खीझ है एक , एक दूसरे के ऊपर टूट रहा पछाड़ने के चक्कर में , तेज रफ्तार से गिरते लड़खड़ाते कूद रहा तो कहीं गाड़ियों की कर्कश आवाज यहीं कहीं रिक्शेवान की चलती सांसे हैं चपटे गा
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यदि पत्ते ना होते तो ऐसा कुछ भी ना होता......ये जड़ भी काट दिए गए होते .....(पत्र )

पूज्यनीय , माता जी सादर चरण छू प्रणाम । कैसी हो ? मैं तो खुश हूँ इसी से आपके लिए भी आशा करता हूँ की खुश ही होंगी । पर क्या आपको पता है कि दुःख और विपदा ये दोनों ही उस खुशी के एक अभिन्न अंग हैं । जिस खुशी में हम जी रहे हैं । आप जी रही हैं । और और लोग
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जीता आया जीवन क्या जीनें के लिए ही ............

पूछता हूँ कभी कभी आत्मीयता से उठकर ज्यों छोटा बच्चा पूछता है बड़ों से हुडुककर क्या जीवन बना है बस जीने के लिए ही जीता आया जीवन क्या जीनें के लिए ही रख उम्मीदे फ़िर दिल में सोचता हूँ मैं अभी तो दिन बहुत से हैं सवरने के लिए छोटा था , चलना , पढ़ना ,सीखा स
Dec 29 2009 11:44 AM
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यदि आदि तुझसे है तो अंत भी तुझी से है .......

। इस समय मुझे ये नहीं पता की तूं खाना खा रही है या सोनें की तयारी कर रही है अथवा गाय के साथ लुका छिपी खेल रही है क्योंकि रात्रि के ९ बज गए है और रेडियो के "माइ ऍफ़ एम् " पर चांदनी रातें" कार्यक्रम सुरु हो गया है। इस चैनल पर प्रायः पुरानें गीत ही अधिक
Dec 29 2009 11:44 AM
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रोजी रोटी और नैतिकता के आगे भी एक समस्या होती है ....

आज कई दिनों से मैं परेशान हूँ । घर की आतंरिक माहौल या पढ़ाई की समस्या अथवा दो रोटी मिलनें की चिंता या फ़िर ये कहें कि आर्थिक तंगी , सामान्यतः लोग इन्हीं को समस्या का प्रथम कारक सिद्ध करते हैं पर इसके आगे भी एक समस्या होती है जो कहनें को तो तब मानव-मष्त
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वो भी तो जरा तड़पे जो मुझको रुलाती है ...

कोशिश जो किया मैनें अब याद ना वो आए पर याद को क्या कहेना वो आ ही जाती है चाहूं जो भुलाना मैं उनको हरदम हरपल तब याद बराबर क्यूं उनकी ही आती है हर एक फिजाओं में उनकी ही वफाएं हैं फरियाद करें क्या हम हमको ही सताती है एहसान जरा मुझ पर ये याद करो इतना वो
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कलयुग महिमा ......

है युग कलयुग नाम अपारा । सुमिरत भागत सुख संसारा ॥ जौ केहु चाह सदा लड़खड़ाना । कलयुग नाम जपहूँ प्रभु जाना ॥ बिन कलयुग के झगड़ा ना होई । मूरख गदहा दलिद्र कह सोयी ।. अन्दर सास पतोहू के रहता । करत रहत सबके मुंह भरता ॥ बेटवा बोलै जौ गुस्साई । मेहर खीझि के
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मैं सागर के पास जब लहर करे क्यों घात ...........

दिवस बीति रहि आश में आश ना आशा कोय वहि आशा नहीं आश है जिह मैं आशा ना होय ॥ १ ॥ यह जीवन तो फूल है फ़िर क्यों बनता धूल तूं सुख की सागर निधि करता क्योंकर भूल ॥ २॥ राम नाम तूं राम कह कह ना दूजो नाम राम सुबह का नाम है बाकी से है शाम ॥ ३॥ यह जन्म सुख का पुं
Dec 29 2009 11:44 AM
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कितने जगह मनाओगे शहीदी दिवस को ?

चौको न बस सोचो ज़रा ये क्या हो गया संचित सदा की एकता का साख खो गया कैसी घड़ी , समय दुखद , मानव संघार का थी स्वाग ताकांक्षी धरा दानव चिग्घाड़ का ॥ १॥ घटना न कभी ऐसी स्वतंत्र हिंद में हुई रो पड़े जिसने भी उस हालत को सुनी आँखे खुली थी जिनकी वो भी सूर हो ग
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पर आंसू किसका गिरा, आह किसने की , आत्मा ने ही तो की?

आज मन अधीर है । चिंतित है । वह मन जो आज कई दिनों से स्वयं में उल्लासित था आज उसकी ये दशा है मैं स्वयं नहीं कह सकता की आख़िर ऐसा क्यों है । क्यों आज यह स्थिर है , जडवत है , वेग नहीं है , गति नहीं है , थका हारा दंडवत है ? क्या इसे किसी ने कुछ कहा या फ़ि
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जब हिन्दी में सपथ लेने से अबू आजमी (सपा विधायक ) को भरी सदन में थप्पड़ मारा जा सकता है ....... तो हमारी क्या औकात?

क्या लिखूं क्या सोचू और विचारू क्या समझ में तो यही नहीं आता । कमजोरी योग्यता का नहीं है , भाव का नहीं है , विचार का नहीं है , है तो बस उस बात का की माध्यम तो हिन्दी ही है । वही हिन्दी जो कभी फारसी, उर्दू आदि से लड़ती हुई दिखाई दी । लुटी पिटी पर सम्हल
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दोहे

अरस शमन है प्रगति का घमंड वीरवशान क्रोध खंगारत रिश्ते को तजहूँ समय धरि ध्यान ॥ सुरभि चमके सुरभि में तारा ज्यों द्विज पास मानव चमके शुद्धाचरण धरि संतन के आश ॥ अनंत शर्म निज कर्म पर चखि अरस कर स्वाद सोवत विगत समुन्नत लखि रोवत होत बर्बाद ॥ अनिल गुरु सन
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काश एक बार फ़िर तसलीमा नसरीन किसी नये '' लज्जा '' की रचना का करने में सक्रीय हो जाति .........

खुदा करे कि कयामत हो सब ठीक हो जाए "बडी ही चिंता की बात है , बड़ी ही परेशानी की वजह है , और है बडी ही व्यथित कर देने वाली समस्याएं कि एक तरफ़ जहाँ सम्पूर्ण विश्व आतंक के घेरे में सिमटता जा रहा है वहां आज भी विद् जनों के बीच यह आतंकवाद आलोचना और समालोच
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पर थोड़ा उन विद्यार्थियों को देखो , जो उत्तर प्रदेश के बोर्ड-परीक्षा से जुड़े हुए हैं

वैसे तो मार्च का महीना युवाओं के दिल में एक नया रंग लेकर आता है जिस रंग में उनका मन तो प्रफुल्लित हो ही जाता है , तन भी नवरंगी रंगों से सजकर स्वयं में एक नई धुन का संचार करता है । पर थोड़ा उन विद्यार्थियों को देखो , जो उत्तर प्रदेश के बोर्ड परीक्षा से
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जरूरत एक कुशल न्याय-व्यवस्था की ......

मानव उत्पत्ति हुई विकास हुआ विकास होने से परस्पर ईर्ष्या द्वेष बढे । और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष बढ़ने से विभिन्न प्रकार के अपराधों की उत्पत्ति हुई तथा इन अपराधों की वृद्धि से एक बार पुनः मानव समाज विकास की ओर अग्रसारित होने लगा । इन विनाश को रोकने के लि
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यदि मनुष्य दीवाल है जिसे कोई हटा नहीं सकता तो भाषा एक नींव है जिसे हटाने के प्रयास में दीवाल को ही जाना है ......

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो पास होते हुए भी अपनी उपस्थिति नहीं बतला पाती हैं । पर कुछ तो ऐसी होती हैं जो कहीं पर वर्णित या यों कहें की किसी व्यक्तित्व द्वारा कथित अथवा एक विचारणीय अवस्था में उत्पादित होकर भी हमें और हमारी आत्मीयता को अन्दर तक झकझोर डाल
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गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ ....

कहाँ क्या हो रहा घाट रहा क्या राज में कौन कैसे जी रहा क्या होने वाला समाज में नहीं पता मुझे कुछ भी सब भूलता जा रहा हूँ गाँव की हशीन वादियों में बस जीता जा रहा हूँ सुनता हूँ कुछ घटनाएं , अचरज सा कुछ होता है जगाता हुआ हृदय फ़िर भी मौन होके सोता है चिल्ल
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कहता हूँ कुछ कहनें ही दो ...........

रोता हूँ रोने ही दो खोता हूँ खोने ही दो ना दे सको ऐ दुनिया वालो कहता हूँ कुछ कहने ही दो रोटी की कमी रहती है मुझे पानी की किल्लत यहाँ नहीं है मुशीबतें इफराद मेरी दुनिया में चाहिए मुझे क्या और भला इस दुनिया में ही रहनें दो आंखों में आंसू आशाओं के चाहती
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गया चला वह शाल पुराना इन नये दिनों की शान बनो

सत्ता पर काबिज पूज्य जनों फूलो फलो और महान बनो गया चला वह साल पुराना इन नये दिनों की शान बनो क्या हुआ मुम्बई काँप गयी तो सब सैन्य व्यवस्था हांफ गयी तो शाशन की गीला गपाली में दुनिया कमजोरी भांप गयी तो लथपथ खून से यह धरती वरण पाप मार्ग को करती पढ़ते पढ