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रूप-अरूप

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10 May 2010
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क्‍या था सच

अहसास बेमानी थे या शब्‍दपता नहीं,कि‍न भावों को पि‍रोकर शब्‍दों का मोती बनाया था,आज पलटती हूंगुजरा लम्‍हातो लगता हैवो शब्‍द, वो खतजि‍नमें सि‍र्फ अहसास समाए हैं,क्‍या वो सच थाया सि‍र्फ कल्‍पनाएं हैं।
 
रश्मि
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कि‍तना गुजर गया वक्‍त

कि‍तना गुजर गया वक्‍तक्‍या कहूंशब्‍द गुम हो गए हैंया, मैं खो गई हूं।ढूंढ रही कोई सि‍रा जि‍से थामकरअपने ही वजूद को अपने अंदर से नि‍काल सकूं,मान लूं, जता सकूंकि‍ मेरे अंदर अहसास अब भी करवटें लेता हैकि‍ मैं जिंदा हूं.....
 
रश्मि
Feb 21 2010 10:36 PM
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हमारी बारी

रात गुजरी नहीं हमने आंखों में गुजारी है आस्‍मां रो चुका है अब हमारी बारी है क्‍या करना है हमें दि‍खाकर अपने अश्‍क दर्द देने वाले जब यही मर्जी तुम्‍हारी है
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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एक प्रश्‍न

एक प्रश्‍न कुरेदता है बार-बार कि‍ जब समय इतना परि‍वर्तनशील है तो क्‍यों अपने दुख-दर्द को बांटता है आदमी,,,, परि‍णति‍ कुछ भी नहीं फि‍र उजालों से छि‍पकर क्‍यों रोता है आदमी।
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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हमें मालूम है

तुझे चाहने से क्‍या होगा हमें मालूम है ये जां इस जि‍स्‍म से जुदा होगा हमें मालूम है हम तड़पते हैं तड़पा करेंगे हर वक्‍त मगर तड़पोगे तुम भी तो कयामत होगा हमें मालूम है खाक में ‍मि‍लना है हमें ‍मिल जाएंगे खामोशी से हक मोहब्‍बत का अदा कैसे होगा हमें माल
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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गम न कीजि‍ए

नशेमन जला है तो फि‍र बना लीजि‍ए चमन के उजड़ने का गम न कि‍या कीजि‍ए साए में अंधेरों के वक्‍त गुजर ही जाएगा वो बैठे हैं पहलू में बस ये सोचा कीजि‍ए करना हो मुश्‍ि‍कल गर फैसला जिंदगी का हर फैसले को तकदीर पर छोड़ दि‍या कीजि‍ए दरि‍म्‍यां हमारे फासला कम न ह
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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गर आप न आए

मुद्दतें गुज़र गईं दीदार न हुआ आपका दिल क्या अब तलक भी बेकरार न हुआ आपका गुनाह है अपना ठहराते हैं गुनहगार नसीब को इस बात पे हमें ऐतबार न हुआ आपका गर आप न आए तो थाम लेंगे हम मौत का दामन कह जाएंगे दुनिया को हमसे इंतजार न हुआ आपका...
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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जुदाई का हौसला

लाऊंगी कहां मैं जुदाई का हौसला क्‍यों इस कदर मेरे करीब आ रहे हो तुम? मेरी हर धड़कन, हर सांस में शामि‍ल हो मगर मेरे हाथों की इन लकीरों में कहां हो तुम? तेरा बनना तो नामुमि‍कन है इस जिंदगी में क्‍यों मुझसे ऐसे वफा नि‍भा रहे हो तुम? उल्‍फत में तेरी हो ज
 
रश्मि
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ये दि‍ल

बेबात ही कभी-कभी भर आता है दि‍ल जाने क्‍यों कभी-कभी तड़प जाता है दि‍ल चाह कर भी नहीं मि‍लता जब रोने का बहाना तब अंदर ही अंदर जल जाता है दि‍ल तन्‍हाइयों से जब जी घबराता है, तब यादों को पास अपने बुलाता है दि‍ल आखि‍र क्‍या करें, कि‍ससे करें शि‍कवा यही स
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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उदास चांदनी

उदास चांदनी कुछ इस तरह हमारे दि‍ल में उतर जाती है गोया सीने में कोई नश्‍तर हौले से चुभा दि‍या हो कि‍सी ने
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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तुम्‍हारा खत

नि‍त नई पीड़ा मन में बोती है असंतुष्‍ि‍ट का बीज और नि‍कलता है पौध अलगाव का मन में फि‍र मच जाता है द्वंद्व और मि‍लता है आंसुओं को न्‍योता आती हैं यादें जाती है मन किंकर्तव्यविमूढ़, तभी 'जिंदगी' को मि‍लता है तुम्‍हारा खत और उठता है फि‍र भावनाओं का ज्‍‍
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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संजीवनी

संजीवनी तुम्‍हारे शब्‍द स्‍मृति‍ कंटक राहों की डोर तुम्‍हारा साथ सागर का ठहराव वि‍श्‍वास अटल चट्टान और हृदय पत्‍थरों से नि‍कलकर बहता हुआ एक नि‍र्मल झरना ये जीवन बस तुममें ही समाहि‍त होगा आदर्श रहोगे तुम 'जिंदगी' याद करेगी तुमको नीले स्‍वच्‍छ आकाश सा,
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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क्‍या-क्‍या ले जाओगे ?

जानती हूं गर मुझसे दूर जाओगे तो लौटा दोगे मेरी तस्‍वीर जला डालोगे लि‍खी हुई मेरी तहरीर छीन लोगे मुझसे मेरा वो नाम फाड़ डालोगे मुझको लि‍खा हर खत और तोड़ दोगे मुझसे हर नाता छुपा लोगे चेहरा जो सामना हो जाएगा मुझसे मगर ये तो बताओ जो मेरे पास है उसे कैसे
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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कैलेंडर

कल बदल जाएगा कैंलेंडर में महीना और बदल जाएगी उसमें छपी तस्‍वीर भी, मगर मैं नहीं बदलूंगी रहूंगी वहीं की वहीं जहां कई बरसों से टंगी हूं मुझे बदलने की इच्‍छा कइयों ने की और मेरा मन भी चाहता है बदलाव, मगर ये संभव नहीं क्‍योंकि‍ मैं कैलेंडर नहीं जो कि‍सी
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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याद राहों की

नि‍र्गंध फूलों से सजता रहा घर खुश्‍बू नहीं तो क्‍या तृप्‍ति‍ तो है इन आंखों को बबूलों से उलझ गई जिंदगी मगर हाथ छूते रहे गुलाब के शाखों को कच्‍ची डगर नहीं पहुंचाती मंजि‍ल को अच्‍छा कि‍या, तोड़ लि‍या नाता सि‍र्फ याद बनाया इन राहों को ।
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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तुम्‍हारी यादें चुराकर

चले जाओगे जब तुम भी हमसे दामन छुड़ाकर रख लेंगे तुम्‍हारी यादों को तुमसे चुराकर नि‍गाहों में जब हमारी दर्द का सैलाब उमड़ेगा रो लेंगे कि‍सी कोने में हम सबसे नजरें बचाकर जमाने को न दि‍खाएंगे हम दि‍ल के दाग कभी तेरी खाति‍र रखेंगे लबों पे हम तब्‍बसुम सजाक
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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कुम्‍हलाया फूल

तुमने देखा तो होगा खि‍ले फूल को कड़ी धूप में कुम्‍हलाते हुए सच कहना क्‍या उस वक्‍त तुम्‍हें मेरी याद नहीं आई ?
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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छुवन का मर्म

कैसे पि‍घलता है स्‍पर्श से सारा वजूद कैसे लेती है जन्‍म पत्‍थरों में नर्म दूब, कैसे नि‍कलती है हृदय की पुकार से मन में गड़ी फांस बहुत आसानी से समझा इनको क्‍योंकि‍ तुम्‍हारी छुवन ने इनका मर्म समझा दि‍या हमें।
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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अरमानों की कलि‍यां

सूख चली है अरमानों की कलि‍यां फीकी पड़ रही है रि‍श्‍तों की मधुरता कौन जानता था ऐसे आत्‍मीय रि‍श्‍तों में भी दरारें हुआ करती हैं जो सोख लेती है सारा अपनत्‍व और रह जाता है अवशेष मात्र ति‍रस्‍कार, उपेक्षा और अंतहीन दूरि‍यां
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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चांदनी रात में बरसात

क्यों हुई आज फि‍र चांदनी रात में बरसात हैं ये चांद के आंसू या रोई है रात कि‍सने कहा था फि‍जाओं से तन्हाई की चादर बि‍छाने देखो उदास हो कि‍तना रोया है चांद ऐ हवा चल जरा करा तो दे अपने होने का अहसास दे तसल्ली देख तो कि‍तनी भीगी है यह रात।
 
रश्मि
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मुखौटे का सच

मैंने हर बार की मुखौटे के पीछे इंसान के असली चेहरे को देखने की पहचानने की कोशि‍श मगर मेरी नजरों ने हर बार धोखा खाया क्‍योंकि‍ असली चेहरों के उपर कई परत थे नकली चेहरों के और मैं उनमें उलझती पहचानने की कोशि‍श करती फि‍र खाकर धोखा खामोश बैठ जाती
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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आकाशबेल

मेरे सपने आकाशबेल की तरह लंबे क्यों होते हैं जबकि‍ हकीकत में मेरे बौने हाथ सपनों के घुटने तक को छू नहीं पाते फि‍र मेरे सपनों को उस उंचाई तक जाने-नापने का क्या हक है.........
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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अकेलेपन का धुंध

जब भी बि‍खरती है मेरे इर्द-र्गि‍द अकेलेपन की गहरी धुंध तुम कि‍सी बहाने अपनी यादों की दस्तक दे जाते हो और घसीट लेते हो जबरन मुझको अपने संग-संग यादों की गलि‍यों में भटकने के लि‍ ए। और मैं जो करती रहती हूं महीनों कोशि‍श तुम्हें भुलाने की वह सारा सब एक झ
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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यादों की तितलियां

पता नहीं तुम भिज्ञ हो या अनभिज्ञ मगर ये सत्‍य है। कोई रैना नहीं बीती ऐसी, जब तुम्‍हारी याद ने यादों का भंवर न उठाया हो, मगर क्षणमात्र को ही क्‍योंकि, पश्‍चात़ इसके बड़ी निर्ममता से दमित कर दी जाती हैं यादें कारण शायद तुम्‍हें ज्ञात हो...
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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सपने में खुद से बातचीत

चुप बैठी रहूं कुछ न करूं पर कोई शुभचिंतक ऐसा तो है जो मेरी तमाम मुश्किलें हर लेगा उदास रहूँ, अकेली फिरूं भले खुद के लिए कुछ न करूं पर वह ऐसा तो है जो मुस्कुराने को कहेगा मेरे सारे दर्द सहेगा और ज़रूरत पड़ी तो सबके सामने मुझे अपनी बाहों में भर लेगा। सच
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM
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कहां हो तुम

मेरी रूह, मेरी धड़कन, मेरी हर सांस में शामिल हो मगर मेरे इन हाथों की लकीरों में कहां हो तुम
 
रश्मि
Dec 29 2009 11:51 AM