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खुली किताब

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10 Mar 2010
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हुसैन और तसलीमा में फर्क़

मकबूल फिदा हुसैन कलाकार हैं। तसलीमा नसरीन भी कलाकार हैं। हुसैन का जन्म भी मुस्लिम परिवार में और तसलीमा का भी मुस्लिम परिवार में जन्म। लेकिन हुसैन साहब भारत को अलविदा कह गए और तसलीमा भारत को अपना दूसरा घर मानती हैं। दोनों में भारत को लेकर जो नजरिया है
 
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बिंदास का इमोशन अत्याचार

इंटरटेनमेंट टीवी बिंदास वाकई बिंदास है। उस पर इन दिनों एक खास शो बड़ा पॉपलर है। इमोशनल अत्याचार। शब्द भले ही अनुराग कश्यप की फिल्म देव डी के गाने से लिया गया हो पर इसमें दिखाई जाने वाली कहानी बिलकुल अलग कलेवर की है। अगर आपको अपनी प्रेमिका या अपने प्रेमी
 
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Feb 23 2010 10:49 AM
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क्या सचमुच कविता एक सैल्फिश विधा है ?

हंस के नवंबर अंक के संपादकीय में राजेंद्र यादव लिखते हैं-"कविता की सारी संभावनाएं निचोड़ी जा चुकी हैं। वहां नया करने के लिए कुछ भी नहीं। सामान्यीकरण की प्रक्रिया में अपने असली व्यक्तिगत को छिपाया जा सकता है। कविता एक सैल्फिश विधा है। कविता में स्रोत और
 
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अपराजिता

लड़ने और जूझने का दम बचपन से ही भरती थी। क्या पता था कि पल-पल प्रतिपल यही दिनचर्या में शामिल हो जाएगा। उसके लिए कभी कोई हरा भरा चिकना रास्ता नहीं था और शायद इसीलिए फिसलने का डर भी कम था। रास्ते बीहड़ सुनसान या थकान से भरे हों तो उठते गिरते आदमी संभल
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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संतन को कहां सीकरी सो काम...बिसर गए हरिनाम

शराब आत्मा और मन दोनों को खोखला कर देता है' ये उक्ति देश के राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी के है। ऐसा नहीं कि वो सिर्फ कहने के लिए कोई भी बात कहते थे। बल्कि ज़िंदगी भर उन्होंने उसको निभाया भी। गांधी के सत्य के प्रयोग का यही अचूक हथियार था। इस वाकये
 
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धमाके में मेरी मौत हुई तो....

डरने लगा हूं लगातार हो रहे धमाके से। सोचता हूं अगर मेरी भी मौत किसी धमाके में हो गई तो क्या होगा? कई बार तो ये भी सोचता हूं कि धमाके में मेरी मौत हो गई और साथ में कोई आईडेंटिटी कार्ड नहीं रहा तो कोई मेरी लाश को कैसे पहचानेगा? कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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आमिर खान का 'बाज़ारवाद'

प्रिय मित्रों, अगर आप आमिर खान के फैन्स क्लब के सदस्य हैं तो मुझे माफ कीजिएगा। अगर आप आमिर के मिस्टर परफेक्शनिस्ट वाले व्यक्तित्व को आदर्श मानते हैं तो फिर से माफी मांगता हूं। और अगर आप ये मानते हैं कि आमिर लीक से हटकर चलने वाले अभिनेता हैं तो आपके स
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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26/11 एक महीने बाद

रोशनी को इस बात का ठीक-ठीक एहसास नहीं है कि उसके पापा कहां चले गए हैं। मम्मी को टूटकर घंटों रोते देखती है, दादी को रोते देखती है तो उसे एक मिनट के लिए लगता है कि पता नहीं ये लोग इतना क्यों रो रहे हैं? दादा जी तो कहते हैं कि पापा काम पर गए हैं। काम खत
 
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' डिप्रेशन में आडवाणी '

पांच राज्यों के विधानसभा के नतीजे से बीजेपी को सबक लेने की जरूरत है। बीजेपी के थींक टैंक अरुण जेठली जैसे नेताओं को तो खासतौर से। उन्हें समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रीय मुद्दे अब मायने नहीं रखते। जनता को विकास की चीजें नजर आएंगी तो फिर कोई कुछ भी कर ले...
 
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साध्वी प्रज्ञा को बचाना है !

आज से ठीक दो दिन पहले बीजेपी के शीर्षस्थ लालकृष्ण आडवाणी ने भोपाल में चुनावी सभा में सरेआम ऐलान किया कि साध्वी प्रज्ञा को मुंबई एटीएस ने जानबूझकर फंसाया है। उन्होंने दावे के साथ जिक्र किया कि साध्वी प्रज्ञा पर ये उनका पहला वक्तव्य है। उन्होंने इसका क
 
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सबसे बड़ा सच---'झूठ'

हम जिस दौर में जी रहे हैं वहां सबसे बड़ा सच है 'झूठ'। जो जितनी चालाकी से झूठ बोलता है, जो अपने ग़लत कारनामों को आसानी से छुपा सके--वो ही है आज की सबसे बड़ी जीत। राहुल राज का एनकाउंटर नहीं हुआ उसकी हत्या की गई--ये कोई और नहीं बल्कि फॉरेंसिक एक्सपर्ट क
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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एनकाउंटर का खौफ

दिल्ली के जामिया नगर के बाटला हाऊस में एनकाउंटर। एक तरफ दिल्ली पुलिस के दावे और दूसरी तरफ बाटला हाऊस में रहने वाले लोगों की बातें। जाहिर है दोनों में सच तो कोई एक ही है। या तो वहां से निवासी या फिर दिल्ली पुलिस। एनकाउंटर पर तमाम पत्रकार और बुद्धिजावी
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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कौन लौटाएगा सिमरन की हंसी?

शिवराज पाटिल की उम्र कितनी होगी? 73 साल के पाटिल। अपनी इस उम्र में उन्होंने अपने घर में किसी को ऐसे बिलखते देखा होगा जैसे तड़प रही है पांच साल की मासूम सिमरन। शायद नहीं। राजनीति के जिस मकाम पर पाटिल साहब हैं कम से कम उससे तो नहीं लगता। बेसहारा और लाच
 
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प्रचंड की खुली पोल

नेपाल के नए प्रधानमंत्री प्रचंड। माओवादियों के प्रखर और ओजस्वी नेता। ऐसा नेपाल की जनता ही नहीं माओवाद को मानने वाले भी कहते थे। नेपाल में राजशाही को जब तक खत्म नहीं कर लिया तब तक चैन नहीं लिया। प्रचंड खुद अब सत्ता में हैं। लेकिन इससे पहले वो माओवादी
 
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Dec 29 2009 11:48 AM
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"मोहल्ला" के अविनाश (नए ब्लागर्स के पालनहार)

नए ब्लागर्स के पालनहार। उन्हें मंच देने वाले। उनकी आवाज को एक मंच देने वाले। यशवंत के भड़ास से नफरत करने वाले पर नए ब्लागर्स की भड़ास को अहमियत देने वाले---अविनाश। मोहल्ला ब्लागर्स चलाने वाले अविनाश। एनडीटीवी में बड़े पद पर काम करने वाले अविनाश। टेली
 
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राजेश जोशी और आज के कवि

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे? क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं सारी रंग बिरंगी क
 
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इस्तेमाल की भाषा

यूज एंड थ्रो की इस दुनिया में मैं बिकाऊ बनकर नहीं रह सकती। आप भले कह लें कि जब से आपने मुझे बाजार में उतारा है, मेरी कीमत बढ़ गई है। लोग मुझे इस्तेमाल करने लगे हैं। मेरे सहारे जाने क्या-क्या खरीद बेच लेते हैं। कब तक इस शर्मनाक दौर से गुजरती रहूंगी। फ
 
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कथाकार, हंस के कार्यकारी संपादक और राजेंद्र यादव

हंस के संपादक श्री राजेंद्र यादव की बौद्धिकता, उनके भाषण, उनका आचार व्यवहार, उनका आक्षेप लगाने का तरीका--और वगैरह-वगैरह न जाने कितने रूप की दुनिया कायल है। माफी चाहता हूं दुनिया नहीं हिंदी साहित्य का एक मठ। एक ऐसा मठ जो उन्हें कहानीकार के तौर पर उत्क
 
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आखिर क्या चाहती है भारत सरकार

दिलों को जोड़ने वाला खेल और भारत में जुनून और धर्म का दर्जा रखने वाला क्रिकेट एक बार फिर राजनीति और कूटनीति की भेंट चढ़ चुका है। मुंबई पर आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध फिर से नाजुक दौर में पहुंच गए। और दोनों देशों के संबंधों के उतार-चढ
 
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वाह! रे तेरी माया

कैसा वक्त आ गया है। मां-बाप के लाखों रुपए खर्च करके MBA की पढ़ाई की। मां-बाप ने सपना देखा, बेटा/बेटी किसी बड़ी कंपनी में एमबीए बनेंगे। अच्छी सैलरी होगी। बच्चे की ज़िंदगी संवर जाएगी। लेकिन वक्त का तकाज़ा देखिए। बच्चे लाइन में खड़े हैं। वो भी मायावती द
 
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मठाधीशों और चमचों की जमात

मित्रों, हंस के सितम्बर अंक में मेरी-तेरी उसकी बात में राजेंद्र यादव ने आखिरकार अपनी पुरानी कुंठा उजागर कर दी। अपनी पत्रिका है वो चाहे जो लिखें। किसी के बाप की हिम्मत है जो उन्हें रोक ले। उन्होंने शुरुआत परसई जी की लघुकथा से की है--सुबह-सुबह एक नेता
 
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नवाज के इस रूप को देखिए

इस तस्वीर को देखकर आप एक बार के लिए चौंकेंगे तो जरूर। है भी चौंकाने वाली। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री मियां नवाज शरीफ और दुनिया का सबसे खूंखार और हजारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुलाने वाला आतंकी ओसामा बिन लादेन। आप को लग रहा होगा कि दोनों की तस्वीर
 
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Sep 08 2009 02:45 AM
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कलियुग के 'हनुमान'

दिल्ली में एक कहावत है---पड़ी डंडी को उठा लिया। जी हां, कलियुग के हनुमान के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। कलियुग के राम(अटल बिहारी वाजपेयी)के शिथिल पड़ते ही बीजेपी की औकात सामने आ गई। एक-एक कर पार्टी के तमाम दिग्गज धूल फांकने लगे हैं। लौह पुरुष(आडवाणी) कितने दिन
 
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अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

कहते हैं हर किसी का अंत आता है। चाहे वो रावण हो या फिर प्रभाकरण। अंत तो तय है। इन दिनों लालू को देखकर आपको क्या महसूस होता है? क्या लालू का 20 साल का राजयोग अब खत्म होने पर है? या हो चुका है? मुझे तो लगता है लालू का राजनीतिक करियर अगले पांच साल तक कु
 
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इसे जरूर पढ़ें

इस बच्चे की गोद में जो नवजात शिशु है वो न तो इसका अपना भाई है न ही इसके अंकल का बेटा। नवजात किसी पड़ोसी का भी बच्चा नहीं है। जिसकी गोद में बच्चा है उसका दावा है कि ये नवजात किसी और का नहीं बल्कि उसी की बेटी है। जी हां, इस 13 साल के बच्चे का दावा है क
 
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जाग गई जनता

वीं लोकसभा के परिणाम में जीत भले ही यूपीए को मिली हो। लेकिन इस जीत को गौर से देखे तो कई महत्वपूर्ण बदलाव के संकेत मिलते हैं। जनता अब लाचार और बेचारी नहीं रही। जनता ने ये समझना शुरु कर दिया है कि क्या अच्छा है और क्या खराब। बहकावे की राजनीति करने वालो
 
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ये महापर्व नहीं है

ये कैसा लोकतंत्र है? चुनाव मुद्दाविहीन है। पिछले डेढ़ महीने में हर पार्टी ने अपना एजेंडा बदला है। घोषणा पत्र में जो कुछ प्रकाशित करवाया, उसपर किसी रैली में उस दल के नेता ने जोर नहीं दिया। अगर आप गंभीरता से चुनाव को फॉलो कर रहे हों तो आप को इस बात का
 
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सीरियल का सुनहरा दिन

बात गए दिन सास-बहू और उनकी लड़ाई के। हिंदी सीरियल में नया ट्रेंड चल पड़ा है। सामाजिक कुरीतियों को नए सिरे से उजागर करने का। एक झटके में सात-आठ साल से चल रहे सास-बहू के सीरियल के दर्शकों में कमी आ गई। दर्शक को ऐसे सीरियल पकाऊ लगने लगे। दरअसल दर्शक बेह
 
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