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मौन में बात..

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06 Jun 2010
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शंख और सीपियां...

शंख और सीपियां...24th,may, 2010अतृप्त, बैचेन, छल, नींद, समझ..... और फिर हम सुखी रहने लगे। कहते थे कि हम किसी भी तरह से गुज़र जाएगें, धीरे-धीरे ही सही पर हम गुज़र ही जाएगें। फिर बहुत समय बाद......’उदासी’ का कोई संबंध ’उदासीनता’ से नहीं है... या है...?
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‘तोमाय गान शोनाबो...’

‘तोमाय गान शोनाबो...’’मैं थक चुकी हूँ... सुनो... नहीं... मैं सच में बहुत थक चुकी हूँ, समीर प्लीज़... मुझे सोने दो।’समीर कुछ बचपने की हरकतों के बाद पीछे हट गया। उसने अपनी टी-शर्ट भी उतार ली थी। वह धीरे से बिस्तर से नीचे उतरा, उसने टी-शर्ट को दो बार झाड़कर
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निर्मल और मैं....

23rd May 23, 2010निर्मल- जब हम कहानी लिखते हैं-या उपन्यास- तो एक फिल्म चलने लगती है- इस फिल्म में छूटे हुए मकान हैं और मरे हुए मित्र, बदलते हुए मौसम हैं और लड़कियाँ, खिड़कियाँ, मकड़ियाँ हैं और वे सब अपमान हैं जो हमने अकेले मे सहे थे, और बचपन के डर हैं और
May 23 2010 06:15 PM
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‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक....

‘अभी-अभी’ से ’कभी-का’ तक....सूरज ने कहा कि ’देर रात की बात थी। हम सब घबरा गए थे। कुछ समझ में नहीं आया क्या करें। तू समझ रहा है ना?’मैं नहीं समझ रहा था। बहुत धुंधला सा सूरज दिख रहा था उसके चहरे पर मूछ नहीं थी। मैंने दो बार ज़बान पलटानी चाही कि उससे पूछू
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म्मताज़ भाई पतंगवाले.....

म्मताज़ भाई पतंगवाले.....15th feb, 2010…एक काश मैं आनंद को मना कर देता। कैसे बचपन की बेवकूफियों पर मैं अचानक भावनाओं में बह गया?....छुट्टीयाँ बर्बाद हुई सो अगल। मुझे आश्चर्य हुआ तनु ने मुझे रोका नहीं| तनु को क्या पता कौन आनंद है, कौन म्मताज़ भाई हैं।
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निर्मल और मैं....

मैं- इतनी रात गए.. खामोश बैठे हैं?निर्मल- कितना बज रहा होगा?मैं- करीब एक...।निर्मल- कितने रतजगों की कालिख आँखों के नीचे फैली पड़ी है... है ना?मैं- हाँ।निर्मल- किस लिए? क्यों? क्या है वह चीज़ जिसे लगातार टटोलते रहना होता है। कौन सा खिलौना है वह जिससे
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इति और उदय..

इति और उदय... वह फिर वहीं बैठी थी... उसी पार्क की उसी बेंच पे। उसका हाथ उदय के हाथ में था। होंठ कभी तन जाते, तो कभी ढ़ीले पड़ जाते। आँखों के निचले हिस्से में पानी भर आया था। बाक़ी आँखें सूखी पड़ीं थीं। इस अजीब स्थिति के कारण उसका बार-बार पलक झपकने का मन
May 02 2010 09:48 AM
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फ्रिज में रखा हुआ सुख...

किसी कविता का फिर से पढ़ा जाना जो सुख की गुदगुदी पैदा करता है वह उसका पहली बार पढ़ा जाना नहीं करता है। पहली बार का आश्चर्य होता है। दूसरी बार में अपनापन शामिल रहता है। मैं भी बड़े अपनेपन से अपनी कुछ कविताए दुबारा पढ़ता हूँ। दौबारा वही सुख, उसी अपनेपन की
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निर्मल और मैं....

निर्मल- क्या भाई अकेले-अकेले ही चाय पी लोगे... एक मेरे लिए भी बना दो?मैं- वाह! बड़े दिनों बाद... बैठिये मैं चाय चढ़ाता हूँ।निर्मल- तुम जगह ही नही दे रहे हो? ना तो आने की और ना अभी बैठने की?मैं- यहाँ बैठिये... आईये।निर्मल- कितने टुकड़े हैं..? और कितने
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दूसरा आदमी....

दूसरा आदमी...मैं खाना बनाने की तैयारी करने लगा। पीछे से माँ ज़िद्द करने लगी ‘नहीं खाना मैं बनाऊंगी’। इस युद्ध में जीत माँ की ही होनी थी... पर मैं ज़िद्द करके टमाटर, प्याज़, हरि मिर्च काटने लगा।’आप इतनी दूर से सफर करके आई हो। खान आप ही बनाना, मैं बस
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ऊब से सुलह....

दिनचर्या को खगालने लगा। पड़े-पड़े घर में विचरण.. और क्या कह सकता हूँ इसे मैं? घर के मेरे कई ठिये बन गए हैं, (यूं एक कमरे के घर में बहुत गुंजाइश नहीं होती।) यह विचारबद्ध तय नहीं हुए... यह रहते-रहते आदतन और आलस्य की खिचड़ी से पक के तैयार हुए हैं। सुबह मुझे
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म्मताज़ भाई पतंगवाले.....

म्मताज़ भाई पतंगवाले.....15th feb, 2010…एक काश मैं आनंद को मना कर देता। कैसे बचपन की बेवकूफियों पर मैं अचानक भावनाओं में बह गया?....छुट्टीयाँ बर्बाद हुई सो अगल। मुझे आश्चर्य हुआ तनु ने मुझे रोका नहीं| तनु को क्या पता कौन आनंद है, कौन म्मताज़ भाई हैं।
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बेचारा बनना सीखो....

April 14, 2010मेरे घर के सामने (मैं घर के पीछे वाले हिस्से को घर का सामने वाला हिस्सा मानता हूँ) बहुत से बगुले, छोटी चिड़िया, किंगफिशर आदि आकर पेड़ पर बैठते हैं। इस बात से बिलकुल अंजान कि दुनिया बदल रही है। मैं कभी-कभी इन्हें चिल्लकर कहता हूँ... ’अरे
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बेमतलब के खर्च....

देर रात,इन दिनों की क्या कहें? यूं पड़े-पड़े गुज़र रहे हैं मानों बेमतलब के खर्चे। शाम के वक़्त कुछ चिल्लर बची रह जाती है जिन्हें घर में चारों तरफ बिखेर देता हूँ। फिर देर रात तक उनसे लुका-छिपी का खेल खेलता हूँ। जब तक अंतिम सिक्के पर पहुंचता हूँ नींद आ
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निर्मल और मैं....

04/03/10….CALCUTTA…निर्मल और मैं...निर्मल- बड़े दिनों बाद लिखने बैठे हो?मैं- बहुत पीड़ा में था। आपको बहुत याद किया।निर्मल- तो अब कैसी हालत है?मैं- ठीक है... पर बहुत अच्छी नहीं।निर्मल- हम अपने कमीनेपन को उस वक़्त कभी याद नहीं करते जब हम पीड़ा में बहते
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red sparrow... (play...)

30th jan 2010...सही-सही और स्पष्ट-स्पष्ट कह देना भाई....:-)Red sparrow के shows खत्म हुए...नाटक बहुत से लोगों को समझ में नहीं आया... नाटक के बाद बहुत से लोगों से बात हुई... सभी लोगों ने अपनी-अपनी समस्याए बताना चालू की... मैं शांत था... मुझे लगा कि मेरा
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नक़ल नवीस...

चलते-चलते पिंड़लीयों में दर्द होने लगता है... कहीं रुक जाने पर, सो जाने पर भी जब वह दर्द नहीं गया तो मैंने पैरों को मरोड़ना-तोड़ना शुरु कर दिया...कुछ आह और कराह के बाद दर्द का मीठापन भी फीका लगने लगा..., फिर मैंने राह चलते किसी आदमी से सहायता की गुहार
Feb 27 2010 11:50 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी..)

अलस्य सुबह दिल्ली में, होस्टल में हूँ। आज से workshop start है। my back is gone completely… anyways we’ll see. कल काफ्का नाटक पढ़ा (आसिफ़ लिखित) नाटक मुझे बहुत अच्छा नहीं लगा, चूकि काफ्का मुझे बहुत पसंद हैं इसलिए शायद मैं नाटक पूरा पढ़ गया। नाटक में
Dec 29 2009 11:44 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी..)

अलस्य सुबह, निकल जाने की इच्छा है, कल Arena - The Orson Welles Story देखी…. बहुत उमदा थी। उसने अंत में कहा था कि “(I have wasted my life in making films) मैने शायद अपना जीवन फिल्में बनाने में बरबाद कर दिया। शायद मैं और कुछ करता तो वह ज़्यादा संतोषजनक
Dec 29 2009 11:44 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी..)

अलस्य सुबह एक बात मेरे साथ उठी , चरर - मरर करती हुई , ग़ालिब के जूतों की तरह साथ चली , बाथरुम में , बाहर टहलते हुए , किचिन में … । सामने लगे लाल फूलों के चार गुच्छे रोज़ अपनी गति में उगते रहे। सुबह उन्हें ’ सुप्रभात ’ कहने का एक संस्कार बन गया है। ’
Dec 29 2009 11:44 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी...)

अलस्य सुबह , रात चिपकी हुई थी। देर रात तक बारिश होती रही थी। पंजों में जकड़े जाने संभावना में उड़ते रहने के सपने आते रहे। उठते ही कुछ चीज़े साफ सी दिखने लगी थी। सामने पहाड़ पर धुंध तैरती हुई इस ओर बढ़ रही थी। सांस लेना और लेते रहना सुखद है। बैठना और
Dec 29 2009 11:44 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी....)

अलस्य सुबह सब झूठ था। मैं झूठ , व्यवहार झूठ , लिखा झूठ , अगल - बगल रचा संसार झूठ , मन झूठ , आत्मा झूठ ... सच दूर हिमालय सा कहीं खड़ा है , इस बारिश के मौसम में वह धुंध और बादल में कहीं खो गया है। सच तक पहुँचना कितना कठिन है। सब पता होने के बाद भी , मु
Dec 29 2009 11:44 AM
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अलस्य सुबह... (डायरी....)

अलस्य सुबह , बंदरों का एक झुंड़ नास्पाती खाने आया , मैं नास्पाती के पेड़ के नीचे बैठा था। हर तरह से वह मुझे इशारा कर रहे थे कि मैं उनके खाने के बीच के दीवार हूँ ... कृप्या हट जाऊँ। मैं वहीं बैठा रहा , उन्होंने लगभग मुझे चारों तरफ से घेर रक्खा था। फिर
Dec 29 2009 11:44 AM
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इंसान जैसा... इंसान...

ठीक इसी वक़्त क्या हो रहा है भीतर... सारी व्यवस्था में अपने होने की त्रासदी नज़र आ रही है। आस-पास घट रहे बहुत सारे में, कुछ है जो घर कर रहा है। यह सब एक चित्र सा है... सामने बैठा एक आदमी पढ़ रहा है, पर ध्यान कहीं ओर है। एक लड़की कॉफी पी रही है, लड़का
Dec 29 2009 11:44 AM
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घर-घर

बचपन में मैं कुछ तकियों और चादरों का मिला कर घर बना लिया करता था ... उसमें थोड़ा पानी और खाना आने की एक जगह छोड़ दिया करता था। बहुत समय तक मुझे यह लगता था कि .... मैं पूरी ज़िदगी ऎसे ही रह सकता हूँ .... । माँ चिल्ला-चिल्ला कर कहती कि-’बस बहुत हो गया
Dec 29 2009 11:44 AM
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सतोहल डायरी...

हर बात पर बिखर सा जाने वाला वह पात्र कहीं दूर पहाड़ पर, एक बल्ब सा चमकता दिखाई देता है। शरीर पर बहुत चर्बी चढ़ चुकी है, वज़न शरीर का बैठे-बैठे मिली वस्तुओं के कारण बढ़ता ही गया है। एक आराम दायक़ बिस्तर भी तैयार कर लिया है जिसपर बहुत से कारणों से भरे
Dec 29 2009 11:44 AM
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ईकोपा...

आज शायद आख़िरी बार मैं ईकोपा (मेरा घर....) के साथ बैठा हूँ...। दरारें........ कुछ छोटे चहबच्चों से जाले, कुछ बड़े भी... पीठ और सिर के निशानों से भीगी हुई दीवारें, और कुछ नाखूनों के खुरचने का दर्द ली हुई दीवारें....। मैं शांत था... वहीं अपनी कुर्सी पर ब
Dec 29 2009 11:44 AM
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डायरी सी कुछ....

अलस्य सुबह... वह- आओ चलो खेलते है? मैं- क्या खेलेगें? वह- अरे! तुम्हें तो खेलना अच्छा लगता है। मैं- हाँ पर यहाँ, क्या खेलेगें? वह- जो तुम कहो? मैं- मैं बहुत खेल लिया, अब मैं खेल देखना चाहता हूँ। वह- देखना? देखने में वह मज़ा नहीं है जो खेलने में है। म
Dec 29 2009 10:35 AM
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डायरी सी कुछ....

वीना पानी....-’यहाँ से बाहर जाकर नाटक करने में एक अजीब सी थकान होती है, मुझे बिलकुल अच्छा नहीं लगता, ना ही मेरे ग्रुप को... खासकर भारत के बाहर... मेरी इच्छा है कि लोग यहाँ आकर नाटक देखें, यहाँ के नाटक, जिसकी जड़े यहीं है... बाहर जाकर नाटक करना नुमाईश
Dec 29 2009 10:35 AM
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डायरी सी कुछ....

जल्द ही Pondicherry पहुच गया... दिन इस खूबसूरत जगह को देखने में चला गया... काश यहाँ मैं अकेला होता.. शांत.. बिना हिसाब किताब का कुछ... झड़ता रहता...। आँखें देख चोंक नहीं पड़ता.. आहट सुनकर पलटता नहीं फिरता... चलता नहीं, टहलता फिरता... गुम जाने सा पास
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मेरे ना पढ़ने के लिए....

मेरे नाटक पढ़ने के लिए...... http://manavplays.blogspot.com/
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निर्मल वर्मा- बुखार

यूं तो मैं निर्मल वर्मा की हर रचना पर कुछ लिखना चाहता हूँ... पर अभी-अभी पढ़ी उनकी कहानी ’बुखार...’ पढ़ी, इच्छा हुई कि यूं ही कुछ इसके बारे में लिखू...। इतनी सरलता से यह कहानी खिसकते-खिसकते भीतर ऎसी जगह जाकर बैठ जाती है कि आपको लगता है कि आप कोई बहुत
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ख़ाना और गाना...

बेंग्लौर में एक महीने रहने के बाद यात्रा पहाड़ों की ओर बन चुकी है। जुलाई अंत और आधा अगस्त पहाड़ों में ही बीतेगा...” यह सोचते हुए मैं भीतर खुश हो रहा था...। भीतर खुशी के साथ-साथ भूख की भी एक हूक़ उठी... मेरी आँखें खुद-ब-खुद खाने की जगह टटोलने लगी। सोच
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उदासी....

वह कहानी पढ़ते-पढ़ते रुक गया... बाहर बहुत बारिश हो रही थी। उसने किताब टेबल पर रखी और कमरे में टहलने लगा। अंधेरे में, जब बारिश हो रही हो तो कोई भी शहर कितना अजीब लगता है... वह सोचने लगा। पेड़ों के झुंड़ के बीच से, स्ट्रीट लेंप का पीलापन झांक रहा था..
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भय...

धीरे-धीरे सरकते हुए हम यहाँ पहुँच गए है। कई किस्म के Permutation combinations के बाद हम कुछ इस तरीके के बन गए हैं। आपस में एक किस्म की सतर्कता है, फिर सतर्कता का अपना एक भय है.... भय के आते ही उसके बहुत से नियम आ जाते हैं। उन नियमों को टटोलते-टटोलते.
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रोज़ मर्रा सा कुछ....

खुला हुआ कुछ नहीं है सामने , एक बंधे हुए से कमरे में बैठा हूँ ... बाहर धूमकर आता हूँ ... फिर बैठा रहता हूँ ... शहर एक अजनबीपन की चादर ओढ़े रहता है ... बाहर जाते ही पर्यटक सा महसूस करता हूँ सो भागकर वापिस अपने दड़बे में धुस आता हूँ ... । बिखरा हुआ सा
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बेंग्लौर....

देर तक रुम में रहा... दिन में लंच करने चला गया। वँहा menu में rabbit लिखा हुआ था... मैंने खरगोश कभी भी किसी menu में नहीं देखा था मैं चौंक गया। मैंने पूछा तो पता लगा कि खरगोश नहीं है...। खाना ठीक था... तभी एक सज्जन मेरे सामने आकर बैठ गए। कन्नड़ थे...
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सतोहल डायरी... (मंण्ड़ी, हिमाचल)

कल यहाँ से चले जाना है..’ की अंगड़ाई लेकर सुबह हुई....। चाय बनाते हुए भी एक खालीपन सा था। कुछ पढ़ते नहीं बना... सो मैंने पैदल जाना तय किया। चाय पीते हुए सेम भी उठ गया था... उसने कहाँ कि वह भी चलना चाहता है। हम दोनों के बीच बहुत देर तक संवाद शून्यता ब
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सतोहल डायरी... (मंण्ड़ी, हिमाचल)

करीब बीस दिनों के लिए यहाँ हूँ... जगह सतोहल है.. कुल आबादी ४२१...। कुछ कविताएँ लि्खीं जिन्हें आप ’मेरी कविताएँ..” पर जाकर पढ़ सकते हैं....। कुछ दिनों से लिखीं बातों को चिपका रहा हूँ... बिना कांट छांट... धन्यवाद।:-)) देर रात तक जगता हूँ , सुबह जल्दी उ
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शक्कर के पाँच दाने...

नमस्कार है दोस्तों, शक्कर के पाँच दाने का शो... दिल्ली में हो रहा है। पाँच मार्च... शाम ७.३० बजे। कमानी हाल, कापरनिकस मार्ग, मंड़ी हाऊस, दिल्ली। कृप्या पधारें.... और अपने दिल्ली के दोस्तों को भी खबर करें। धन्यवाद है। दिल्ली में मुलाकात होगी। :-) मानव