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11 Apr 2010
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आइए, छलें हम खुद को

मोह जब हो भंग, तो आदमी खुद को ठगा सा महसूस करता है। उसे लगता है कि वह अब तक खुद को छल रहा था। वैसे खुद को छलने वाले लोग भी होते हैं, आत्ममुग्ध, आत्मरति के शिकार। पर जब वाकई दूसरों के हाथों छले जाएं, तो उनकी पीड़ा मुखर हो जाती है। पीड़ा के ऐसे क्षणों में
 
अनुराग अन्वेषी
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पत्नी की गैरमौजूदगी और मेरा ओछापन

अनिता, अनुनय और मान्या के बिना शुरू के दो दिन तो मैंने खूब चैन से गुजारे। लगा कि 17 मार्च की खुशियां बरकरार हैं। अगर स्वर्ग होता होगा तो शायद उसका सुख यही है। पर तीसरे दिन से ही मेरा भ्रम टूटने लगा। मुझे मेरा घर अचानक पराया लगने लगा। दफ्तर से लौटता तो
 
अनुराग अन्वेषी
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खुशियां हैं बरकरार

सुबह 5 बजे सोने गया और अब 10:30 बजे सो कर उठा हूं। कोई शोरगुल नहीं। खूब गहरी नींद आई। सोकर उठा तो मोबाइल में 18 मिस्ड कॉल दिखी। चार बार मेमसाब (मेरी श्रीमती जी) ने फोन किया था। बाकि 14 साथी-संगतियों की कॉल थी। सोचा था इन सात दिनों में पुराने बचे कई काम
 
अनुराग अन्वेषी
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आजादी की पहली सुबह

जब से दिल्ली आया। घर में अकेला रहने को तरस गया। सोलह मार्च की शाम श्रीमती जी गईं मायके। चैन के सात दिन गुजारूंगा। जब से टिकट कटा, दिन काटने मुश्किल हो गए थे। सत्रह तारीख का बेसब्री से इंतजार करता रहा। सोलह की शाम उन्हें ट्रेन में बैठा, दफ्तर आया। वीकली
 
अनुराग अन्वेषी
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हांफती हुई पीढ़ी का वैलंटाइंस डे

प्यारी बेटा,कैसी है तू? पढ़ाई-लिखाई का क्या हाल है? समय का इक्वल डिस्ट्रिब्यूशन किया है न? देख बेटा, पढ़ाई के साथ मस्ती भी बेहद जरूरी है। जितनी ईमानदारी से पढ़ती है उतनी ईमानदारी के साथ मस्ती भी कर। किसी एक चीज पर पिले रहने से मुकाम तो हासिल कर लेगी, पर
 
अनुराग अन्वेषी
Feb 14 2010 11:56 PM
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क्या यही है न्यूज चैनलों का सच?

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दूर से जितना लुभावना लगता है उसका सच उतना ही भयानक है। मेरी एक बेहद करीबी मित्र है जो दिल्ली के एक न्यूज चैनल में काम करती थी। पर वहां उसे अपने बॉस के अप्रोच ने इस कदर डरा दिया कि उसने नौकरी छोड़ दी। उसने कसम खाई कि वह कभी किसी
 
अनुराग अन्वेषी
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दिल्ली में डरा-सहमा मन- 2

डर एक मनोभाव है, बेहद स्वाभाविक मनोभाव। पर जब यह दूसरे मनोभावों पर हावी होने लगे, तो बात चिंताजनक होने लगती है। लड़कियों का मन बेहद कोमल होता है, बल्कि कहना यह चाहिए कि मन के दो रूप हैं - कोमल और कठोर। कोमल मनोभाव स्त्री मनोभाव है और कठोर, पुरुष मनोभ
 
अनुराग अन्वेषी
Dec 29 2009 11:42 AM
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मुकम्मल तस्वीर की तलाश में तेंदुलकर

लेखक नरेंद्र पाल सिंह का आत्मकथ्य : जानने वाले मुझे एनपी के नाम से पुकारते हैं। पत्रकारिता में कदम जमाए दो दशक से ज्यादा हो चुके हैं। करियर का आगाज बतौर खेल पत्रकार किया लेकिन फिर टेलीविजन पत्रकारिता में कई साल गुजारने के बाद अब क्रिकगुरुऑनलाइन डॉट क
 
अनुराग अन्वेषी
Dec 29 2009 11:42 AM
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कौन कहता है कि 'पा' अमिताभ बच्चन की फिल्म है

पा में न अमिताभ दिखते हैं, न उनकी एक्टिंग की ऊंचाई। दरअसल, उस करेक्टर में अभिनय की गुंजाइश ही नहीं थी। अमिताभ की एक्टिंग देखनी हो तो ब्लैक जैसी दर्जनों फिल्में हैं। इसलिए कहना पड़ता है कि यह फिल्म किसी एक्टर के लिए नहीं याद की जाएगी। कर्स्टन टिंबल और
 
अनुराग अन्वेषी
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मी मंदबुद्धि मुंबईकर बोलतो आहे

रामदास कदम को एनडीटीवी पर बोलते सुना। शुक्र है उनका कि यहां वह हिंदी में बोल रहे थे। उसी हिंदी में जिसमें शपथ लेते समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी के साथ उन्होंने हाथापाई की। इसे कहते हैं दुकानदारी। मराठियों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए (यह बहस का
 
अनुराग अन्वेषी
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घर की याद

भवानी प्रसाद मिश्र ने यह कविता जेल में लिखी थी। चूंकि वह भी देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लड़ रहे थे, लिहाजा, कुछ वक्त के लिए अंग्रेजों ने उन्हें भी जेल में कैद कर लिया था। जब वह जेल में थे बारिश का मौसम था। तेज बारिश हो रही थी। घर की याद उन्हें ब
 
अनुराग अन्वेषी
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अश्लील कौन : मकबूल फिदा हुसैन, बिहारी लाल, प्रेमचंद या कि हम

मैं ने कई बार कई जगहों पर पढ़ा और सुना है कि मकबूल फिदा हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं की कई अश्लील पेंटिंग बनाई थी। इसी कड़ी में सरस्वती की तस्वीर भी थी। गर एम. एफ. हुसैन का विरोध इसी मुद्दे पर हिंदू कर रहे हैं तो मुझे लगता है कि मकबूल फिदा हुसैन वाकई
 
अनुराग अन्वेषी
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मुंहबोली बहन से रिश्ता अवैध है?

आज से नवभारत टाइम्स डॉट कॉम ने अपनी वेबसाइट पर ब्लॉग की शुरुआत कर दी है। कुल 12 ब्लॉगर्स हैं फिलहाल। जाहिर है यह संख्या बढ़ेगी। सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक या कह लें कि तमाम तरह के मुद्दों पर वहां चर्चा होगी। मेरा यह लेख नवभारत टाइम्स डॉट कॉम पर आया ह
 
अनुराग अन्वेषी
Oct 14 2009 07:39 PM
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अब विवेक की कविता उड़ा ली गई

विवेक ने एक बेहद खूबसूरत कविता लिखी है। यह कविता उसने हरियाणा से लौटने के बाद लिखी थी। शीर्षक है - कत्ल से पहले बहनें, बहनों के कत्ल के बाद। उसके ब्लॉग 'थोड़ा सा इंसान' पर 27 जुलाई की पोस्ट है यह। बेशक संवेदना को झकझोर कर रख देने वाली कविता है। आप भी
 
अनुराग अन्वेषी
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उसका सुख मेरे सुख से बड़ा कैसे?

यह है मणिराम। हिंदी में एमए पास का दावा करनेवाले इस रिक्शेवाले से मेरी मुलाकात तकरीबन 10 दिन पहले हुई थी। पिछले शनिवार को नवभारत टाइम्स के कॉलम 'आंखों देखी' में इसे जगह मिली। हालांकि आज जब मैं इसे अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर रहा हूं, तीखी धूप को कल रात हुई
 
अनुराग अन्वेषी
Jul 28 2009 10:46 PM
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सात सुरों की धुन (पापा का ब्लॉग)

साथियो, आज से मेरे पापा ने भी ब्लॉगिंग शुरू कर दी। ब्लॉग का नाम रखा है सात सुरों की धुन। उनका इरादा है कि इस ब्लॉग पर वह अपनी कविता, गीत और गजल पोस्ट किया करेंगे। लेख, कहानी, आलोचना या समीक्षा के लिए एक दूसरा ब्लॉग वह तैयार कर रहे हैं। उसका नाम दिया
 
अनुराग अन्वेषी
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आप भी देखें मेरी दुर्दशा

रमणजीत के हर इलस्ट्रेशन में एक नई चमक दिखती है, एक नया आयाम दिखता है। उन्होंने मेरे आग्रह पर यह इलस्ट्रेशन तैयार किया। और सच कहूं तो इस इलस्ट्रेशन को देखने के बाद मेरा परिचय मेरे चेहरे की कुछ लकीरों से हुआ। कितना रोमांचक होता है अपने चेहरे को दूसरे क
 
अनुराग अन्वेषी
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मत करें दान, करें मतदान

गीदड़ कहता शेर से नया जमाना देख एक वोट तेरा पड़ा मेरा भी है एक पता नहीं किसकी पंक्तियां हैं यह। पर यह सच है कि वह जमाना लद गया जब शेर जैसे लोग बाकी तमाम लोगों को गीदड़ सरीखा समझते थे। अपनी गीदड़ भभकियों से सबको डराते फिरते थे। साथियो, लोकतंत्र का यह
 
अनुराग अन्वेषी
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संकोच में फंस गया हूं

नमिता जोशी मेरी अच्छी दोस्त हैं। उन्होंने मुझे एक मेल किया और जिद ठान ली कि इसे मैं पोस्ट के रूप में अपने ब्लॉग पर डालूं। संकोच के साथ मैं उनकी इस जिद भरी गुजारिश पूरी कर रहा हूं। -अनुराग आज आप सब लोग जिरह के सरताज अनुराग अन्वेषी जी को जन्मदिन की शुभ
 
अनुराग अन्वेषी
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आगरा हो या दिल्ली : हालात हर जगह एक से हैं

नमिता शुक्ला को दिल्ली आए हुए अब साल भर होने जा रहा है। स्वभाव से वह निर्भीक हैं और पेशे से पत्रकार। वह मानती हैं कि डर नाम का भाव हम सबों के भीतर बसा होता है। और कोई भी छोटी-सी घटना उस डर को उभार सकती है। तकरीबन दो साल पहले आगरा के एक अखबार से बतौर
 
अनुराग अन्वेषी
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ब्लॉगर साथियो से अपील

साथियो, अभिनीत मेरा भांजा है। उम्र से महज 12 साल, पर बुद्धि से 21 साल वालों बड़ा। पटना में रहता है। सेवेंथ का स्टूडेंट है। बगैर किसी की मदद के उसने बना लिया है अपना ब्लॉग। खास बात यह कि उसे ब्लॉग बनाने की प्रेरणा मिली अपनी मां को ब्लॉगिंग करते देख, ज
 
अनुराग अन्वेषी
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मां की गोद का जादू

आज पता नहीं क्यों, सुबह से ही मन काफी अशांत था। बचपन की तमाम यादें सिरहाने आकर बैठ गयी थीं। उन दिनों में लौटने को जी मचल-मचल जा रहा था। पर यह मुमकिन न था। इन सब के बीच मां बेतरह याद आती रही। जाहिर है मेरी बेचैनी दुनी हो गई। क्या करता, अपनी पुरानी कवि
 
अनुराग अन्वेषी
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दिल्ली इज नॉट सेफ फॉर गर्ल्स

डर सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं लगता, डरते पुरुष भी हैं इस माहौल में। आने वाले दिनों में इस ब्लॉग पर पुरुषों के भी ऐसे अनुभव आपको पढ़ने को मिलेंगे। फिलहाल कात्यायनी उप्रेति ने अपना यह अनुभव हम सबों के लिए लिख भेजा है। वह दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर र
 
अनुराग अन्वेषी
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मैंने रंजू की कविता चुराई

आज मैंने रंजना भाटिया की कविता चुरा ली। वह कविता जो उन्होंने अपने ...वें जन्मदिन (उम्र नहीं बतायी जाती) पर लिखी थी। उनकी ही कविता उन्हें जन्मदिन पर गिफ्ट कर रहा हूं।
 
अनुराग अन्वेषी
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हुस्न हाजिर है

हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को। पर ये पंक्तियां सुनकर सजा देने के लिए बढ़े पांव जड़ हो जाते हैं। मुझे लगता है... अरे कहां मैं अपनी बात सुनाने में लग गया ! मेरे लगने को मारें गोली, आपको क्या लगता है यह जरूर बताएं... husn hazir.mp3
 
अनुराग अन्वेषी
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हां लगता है मुझे डर

सोनिया वर्मा मैं अगस्त 2006 में कानपुर से दिल्ली आई थी। मेरे जैसी न जाने कितनी लड़कियां अपने छोटे से शहर से देश की राजधानी में बेहतर करियर बनाने का सपना संजोए आई होंगी, लेकिन यहां आने के बाद वे भी इस बड़े शहर की कुछ कड़वी सचाइयों से वाकिफ हुई होंगी।
 
अनुराग अन्वेषी
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हुस्न हाजिर है

हुस्न हाजिर है मुहब्बत की सजा पाने को। पर ये पंक्तियां सुनकर सजा देने के लिए बढ़े पांव जड़ हो जाते हैं। मुझे लगता है... अरे कहां मैं अपनी बात सुनाने में लग गया ! मेरे लगने को मारें गोली, आपको क्या लगता है यह जरू बताएं... अनुराग अन्वषी जिरह संवाद का त
 
अनुराग अन्वेषी
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दिल्ली में डरी-सहमी लड़कियां

नौकरीपेशा लड़कियों के करेक्टर पर दबी जुबान चर्चा हमेशा होती रही है, अगर नौकरी की अनिवार्य शर्त हो नाइट शिफ्ट, तब तो चर्चा ज्यादा रंगीन हो जाया करती है। पर इन नौकरीपेशा लड़कियों की परेशानियों की चर्चा को यह समाज हमेशा हाशिये पर रख कर चला है। देश की रा
 
अनुराग अन्वेषी
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हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ

कि सी व्यक्ति को क्या सिर्फ इसलिए याद कर लेना चाहिए कि आज उसका जन्मदिन है; या इसकी कोई दूसरी वजह भी हो? सच बात तो यह है कि हर दिन कई-कई लोगों का जन्मदिन होता है, लेकिन हम सिर्फ उन्हें ही याद करते हैं जिन्होंने ऐसा कोई सकारात्मक काम किया होता है, जिसस
 
अनुराग अन्वेषी
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सोच समझ कर लिखें ब्लॉग में

जो लोग ब्लॉग को निजी डायरी मान बैठे हैं और इस नाते जो मन में आए यहां बुकड़ देते हैं; उन्हें दैनिक हिंदुस्तान में आज छपी यह खबर जरूर पढ़नी चाहिए। नई दिल्ली के विशेष संवाददाता के हवाले से यह खबर छापी गयी है। दैनिक हिंदुस्तान की इस खबर को साभार जिरह पर
 
अनुराग अन्वेषी
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चलो, व्यूह रचें

मां की कविता प्रतीक्षा पढ़ते हुए ये बातें 26 दिसंबर 95 की रात लिखी थीं। प्रतीक्षा यहां पढ़ी जा सकती है। निःशब्द होकर बिखर जाना, किसी ताजा खबर की आस में सचमुच बहुत बड़ी भ्रांति है सच है कि सपने प्यारे होते हैं लेकिन वासंती बयार के साथ उन्हें उड़ा देना
 
अनुराग अन्वेषी
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मां

मां की कविता 'गूलर के फूल' पढ़ते हुए 6 फरवरी 95 की रात 2 बजे मेरी प्रतिक्रिया यह थी। 'गूलर के फूल' 'चांदनी आग है' (मां की कविताओं का संग्रह) में शामिल है। कविता यहां पढ़ी जा सकती है। गूलर के फूल की तलाश में तुम बि-ख-र-ती गयी और बुनती रही हमारे लिए बर
 
अनुराग अन्वेषी
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आग-राग

मां की कविता 'साक्षी' पढ़ते हुए 9 फरवरी 95 की रात यह कविता लिखी थी। यह कविता चांदनी आग है संकलन में शामिल है। 'साक्षी' यहां पढ़ी जा सकती है। -अनुराग अन्वेषी आग मेरे भीतर है। राख मैं भी हुआ हूं। पर आग, किसी समझौते का नाम नहीं मित्र। बल्कि आग होना नियत
 
अनुराग अन्वेषी
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तय करें अपनी भूमिका

भाई से भड़वा और नेता से दलाल होने का अहसास जब पसरा हो अपने आसपास तो कहने की ज़रूरत नहीं कि अंधेरा गहरा है और चुनौतियां ज़्यादा इसलिए अब बेहद जरूरी है कि मूकदर्शक की भूमिका से हम उबरें और नये साल के सूरज के साथ संघर्ष बन उभरें
 
अनुराग अन्वेषी
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सलाम और लानत के मायने एक हो गये हैं क्या?

एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे और एनकाउंटर स्पेशलिस्ट विजय सालस्कर वाकई शहीद हुए या अपनी लापरवाही की वजह से मारे गए? यह सवाल उठाते हुए यह ध्यान है कि इस वक्त यह सवाल बहाव के विपरीत तैरने की जोखिम उठाने जैसा है। पर वाकई यह सवाल जेहन में उ
 
अनुराग अन्वेषी